नयी दिशांए नये आयाम

♦    केजिता    

     हर साल कहीं-न-कहीं जमीन एक हल्की-सी करवट लेती है, फिर न जाने कितने जन आखिरी करवट सो जाते हैं.

     क्या भूचाल का कोई इलाज नहीं खोजा जा सकता? कम-से-कम इतना तो हो ही सकता है कि आने वाले भूकम्प का इशारा मिल सके और लोगों को भावी सम्भावित जान माल के खतरे के बाबत आगाह किया जा सके.

     दरअसल में इस दिशा में कई कोशिशें हुई भी हैं. क्या कुछ कामयाबी भी मिली है? हाल ही में हुए अध्ययन से कुछ आशा बधने लगी है.

     इस अध्ययन का श्रेय है डॉ. आर.एम. डेरेलवुड तथा डॉ. रैक्स बी. एलेन को. ये दोनों ही वैज्ञानिक संयुक्त राज्य अमेरिका के भू-सर्वेक्षण विभाग के अंतर्गत ‘नेशनल सेंटर फॉर अर्थक्वेक रिसर्च’ से सम्बंधित हैं. विस्तृत अध्ययन और प्रयोगों के बाद ये शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि भूकम्प से पूर्व पृथ्वी का काफी बड़ा हिस्सा कुछ झुक जाता है.

     उन्होंने यह भी बताया कि मानफ्रांसिस्को से चालीस किलो मीटर-पूर्व की तरफ 11 जून 70 को जो हल्का भूकम्प आया था, उससे लगभग 29 घंटे पहले मानफ्रांसिस्को का सम्पूर्ण खाड़ी क्षेत्र डैन विल नगर की तरफ झुक गया था.

निरोधी पौधा

     तीन के बाद कभी नहीं दो या तीन बस, हम दो हमारे दो… मतलब साफ है. जो न समझे, वह अनाड़ी है.

     परिवार-नियोजन कार्यक्रमों की कृपा से शारीरिक सम्पर्क से लेकर प्रजनन-प्रक्रिया तक की वह सभी जानकारी आम आदमी तक पहुंच गयी है, जिसे आज से कुछ वर्ष पहले तक प्रचलित सामाजिक मूल्यों के संदर्भ में अशोभनीय कहा जा सकता था.

     खाने की गोली इस मामले में सब से ताजा तजवीज है. इसमें मुख्य प्रभावी रसायन है डाओसजेनिन. यह पदार्थ पाया जाता है डाओसकोरिया डेल्टायडिआ नामक पेड़ में, जो हमारे यहां के हिमालय में होता है. पदार्थ दुप्राय है और इसलिए स्वाभाविक ही है कि यह कुछ महंगा हो.

     कोशिश जारी है कि कैसे इस पदार्थ की कीमत की जाये. दो रास्ते हैं- एक तो यह कि इन जंगली पेड़ों की उपज को बढ़ावा दिया जाये. दूसरा रास्ता जरा टेढ़ा है- इस पौधे की ही ऐसी नयी किस्म का विकास किया जाये, जिसमें निरोधक पदार्थ की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक हो. यह विज्ञान का क्षेत्र है.

     भारतीय कृषि-अनुसंधान संस्थान (नयी दिल्ली) के निदेशक, भारत के प्रसिद्ध कृषि-वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामिनाथन ने बताया है कि उनका संस्थान इस दिशा में तेजी से अनुसंधान कार्यों में लगा हुआ है. कोई वजह नहीं कि कामयाबी न मिले.

कितना बढ़ेंगे?

     हर जीवधारी जन्म के समय नन्हा-सा आकार लिये संसार में आता है और समय के साथ-साथ बढ़ता जाता है. एक निश्चित अवस्था में आकर उसके शरीर की बढ़वार रुक जाती है. कैसे बढ़वार होती है, और कैसे रुक जाती हैं?

     हममें से कुछ बेरोकटोक फूलते ही चले जाते हैं. कितना ही कम खाइये, डाइटिंग कीजिये, स्लिमिंग के लिए खोजे जाने वाले किस्म-किस्म के कीमती तरीके आजमाइए मगर असर कोई नहीं. आखिर क्यों? दूसरी तरफ कुछ ऐसी हस्तियां मौजूद हैं कि दिन रात जुगाली करते हैं, घी-दूध-मेवा-मिष्ठान्न कुछ-न-कुछ खाते ही रहते हैं, मगर फिर भी सींकिया. जिज्ञासा होती हैं, ऐसा क्यों? यह तो ठीक है कि शरीर के अंदर चलती रहने वाली अनेक जैविक एवं जैवरासायनिक अभिक्रियाएं इसका कारण है मगर यह बात तो अंधेरे में लाठी घुमाने जैसी चीज रही.

     हमें यह मालूम है कि शरीर में अनेक ग्रंथियां हैं, जिनसे कई प्रकार के आंतरिक स्राव निकलते हैं, जो शरीर पर भिन्न-भिन्न विशिष्ट प्रभावों के लिए उत्तरदायी होते हैं. इन स्रावों में अनेक जटिल रासायनिक यौगिक होते हैं, जिन्हें हारमोन कहा जाता है. पीयूष-ग्रंथि (पिट्यूटरी ग्लैंड) मानव शरीर में सबसे अहम ग्रंथि है. मस्तिक से जुड़ी यह ग्रंथि एक ऐसे हारमोन को जन्म देती है, जो मानव के विकास में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है.

     शरीर-विकास के लिए उत्तरदायी इस हारमोन को अलग करने में सबसे पहले 1956 में डॉ. सी.एच. ली को सफलता मिली. वे कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के हारमोन शोध-संस्थान के निदेशक हैं और दीर्घकाल से पीयूष-ग्रंथि पर कार्य करते रहे हैं. अगले दस वर्ष तक वे अपने सहयोगियों के साथ इस यौगिक की संरचना का पता लगाने में निरंतर रहे और तब कहीं जाकर उन्हें कामयाबी मिल सकी. फिर चार वर्ष तक वे जूझते रहे कि इस यौगिक का संश्लेषण किसी भांति किया जा सके. यह काम भी हुआ और इस जटिल हारमोन का पहली बार संश्लेषण भी कर लिया गया.

     6 जनवरी 1971 को मानफ्रांसिस्को में डॉ. सी.एच.ली और प्रो.फिलिप आर. ली ने अपनी सफलता की घोषणा करते हुए कहा था- ‘यह खोज हर पुरुष महिला और बच्चे के लिए महत्त्वपूर्ण है.’

     विशेषज्ञों के अनुसार अब सिद्धांत यह सम्भव हो गया है कि आदमी के कद को नियंत्रित किया जा सके. यानी समाज को साढ़े तीन फुटे अथवा सात फुटे व्यक्तियों से छुटकारा दिलाया जा सकेगा.

     कैंसर और अन्य प्राणहारी रोगों से सम्बंधित शोधकार्यों को एक नयी दिशा भी इस खोज के फलस्वरूप मिल सकेगी. और इन सवालों के जवाब भी शायद मिल सकेंगे कि हम कैसे बढ़े हैं? एक खास अवस्था में पहुंचकर बढ़ने का सिलसिला क्यों रुक जाता है?

सागर के तल की खोज

     सागरतलीय खोज काम के लिए जापानी तकनीशियनों ने एक नये किस्म का जहाज (अंडरसी वर्कशिप) तैयार किया है.

     बीस फुट लंबा और पांच फुट चौड़ा दीर्घवृत्तीय (एलीप्स) आकार वाला यह जहाज तीन व्यक्तियों को महाद्वीपों के सागर निमग्न बालूतटों पर पहुंचा सकता है. एक हजार फुट गहरे लगेंगे. केबल और पाइपलाइन डालने से लेकर तलीय खोजबीन के महत्त्वपूर्ण कार्यों तक को यह बखूबी निपटा सकता है. जहाज में चौदह ‘पोर्टहोल’ तथा अनेक आधुनिकतम एवं अत्यंत प्रभावशाली सुरक्षात्मक साधन हैं.

कम्प्यूटरी भविष्यवाणीः

     एक दिलचस्प खबर पिछले दिनों पढ़ने को मिली आगस्बर्ग (पश्चिमी जर्मनी) की एक कम्प्यूटर कम्पनी ने 1896 से लेकर 1968 तक के ओलिंपिक परिणामों के आधार पर 1972 के म्यूनिख ओलिंपिक के लिए कम्प्यूटरी भविष्यवाणियां की है. म्यूनिख में क्या होगा, कम्प्यूटर से जानिये-सौ मीटर की दौड़ इस बार भी 9.9 सेकेंडों में जीत ली जायेगी.

     महिलाओं की ऊंची कुदाई का वर्तमान रेकार्ड (1.91 मीटर) जो कि 1961 में रुमानिया की वालेन्डा बेलास ने कायम किया था, म्यूनिख में टूट जायेगा और 1.98 मीटर ऊंचाई का नया रेकार्ड स्थापित होगा.

कारखाने से खेत में

     किसी कपड़े के कारखाने में गये हैं कभी? तेजी से घूमते तकुओं के चारों तरफ कैसी धूल-सी छायी रहती है.

     यह कपास-धूलि कुछ उपयोगी भी हो सकती है,किसी ने सोचा था? मगर केंद्रीय लोक-स्वास्थ्य इंजीनियरिंग शोध-संस्थान के शोधकर्ताओं ने इस बात को सोचा, प्रयोग व परीक्षण किये और एक अद्भूत परिणाम निकाला.

     कपास-धूलि उत्तम खाद के रूप में काम में लायी जा सकती है. नाइट्रोजन और फास्फोरस से युक्त यह कपास-कचरा बहुत अच्छा कम्पोस्ट बना सकता है. 1,000 किलो ग्राम कपास कचरे से 650 किलोग्राम तक कम्पोस्ट मिल जाता है. तैयारी चल रही है इस नये खाद को छोटे-छोटे पैकटों में भरकर घरेलू बगियाओं तक पहुंचाने की.

(मार्च 1971)

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