धर्म ईमान का पहरुआ है – डॉ. दुर्गादत्त पाण्डेय

चिंतन

बुनियादी प्रश्न यह है कि क्या विश्व का जनमानस धर्म को बाहरी लबादा समझकर जब चाहे उतारकर फेंक सकता है? क्या धर्म मात्र ‘फैशन’ की चीज़ है? हकीकत तो यह है कि धर्म हमारे भीतर पैठा हुआ जीवंत भाव है. द्वंद्व के क्षणों में जब मनुष्य यह कहता है कि वह ‘धर्म संकट’ में फंस गया है तो उसके इस कथन को किसी मज़हब से जोड़ना हास्यास्पद नासमझी है. ‘धर्म-संकट’ वज़नी शब्द है और इंसानियत का प्रतिनिधि है. धर्म हमारे ईमान का पहरुआ है और चरित्र का सशक्त पुरोधा भी. धर्म को इंसानी व्यवहार से अलग करके जीवन जीने की प्रसव-पीड़ा से सारा विश्वमानव गुज़र रहा है. यदि समय रहते इस पीड़ा से मुक्ति न मिली तो समग्र मानवजाति के लिए यह अतिसार का कारण बनेगी. दुर्भाग्यवश आज संस्थागत धर्म की विकृति और नीतिविहीन राजनीतिक लम्पटता के नाते विश्व के सामने सर्वनाश का भयावह दृश्य गहराता जा रहा है. जिस धर्मनिरपेक्षता की चर्चा विश्व में चल रही है, वह धर्म से खुला संवाद किये बगैर कारगर नहीं होगी. इस संवाद में धर्म
या तो नये तेज के साथ उभरेगा या फिर पुरानी दुनिया में सड़ने के लिए अभिशप्त हो जायेगा.

मार्क्स धर्म सम्बंधी अवधारणा को यदि उसकी समग्रता में समझता तो धर्म का जनता से जीवंत सम्बंध स्थापित हुआ होता और तब ‘यांत्रिक अर्थवाद’ की औकात का पता चल गया होता. मार्क्स को विश्वास था कि पीड़ा खत्म होते ही धर्म स्वत लुप्त हो जायेगा. परंतु ऐसा नहीं हुआ. न पीड़ा गयी न धर्म मिटा. यदि भूख की पीड़ा से हल्की निजात मिली भी तो धर्म की पीड़ा ने इंसान को धर दबोचा. साम्यवादियों की यह धारणा बेमानी है कि धर्म का अंत सामाजिक समस्याओं का अंत है. हर समाज में धार्मिक मूल्य धुरी का काम करते हैं, जिनके इर्द-गिर्द लोगों के आचार-व्यवहार संचालित और संयमित होते हैं. धर्म से मज़हबी भाव मिटाने का एक ही उपाय है कि लोगों में धर्म की समझदारी विकसित की जाय. उदात्त धार्मिक मूल्यों के सहारे उन्मादी संवेगों को रोका जा सकता है और उन्हें लोक मंगल की दिशा में मोड़ा जा सकता है. पश्चिमी विचारक बर्गसां ने धर्म को ‘सामाजिक तथ्य’ की संज्ञा दी है और मार्क्स तथा फ्रायड की इस धारणा की भर्त्सना की है कि ‘धर्म भ्रम के सिवा कुछ नहीं है.’ लोगों को समझाने की ज़रूरत है कि कृष्ण, राम, बुद्ध या ईसा की पूजा बाहर से करना पर्याप्त नहीं है, यदि हमारे भीतर इनकी अभिव्यक्ति या निर्मिति नहीं होती है.

धर्म ‘मतवाद’ न होकर एक धारक तत्त्व है. जब हर व्यक्ति के भीतर धर्म जगेगा तभी लोकमंगल होगा. मनुष्य को कुदरत ने ऐसी शक्ति दी है कि वह सृष्टि के विधान को पहचान ले, धर्म को भीतर की आंख से देख ले और तदनुसार जीवन को ढाल ले. हम धर्म का अर्थ खो बैठे हैं. कैसी विडम्बना है कि ‘धर्म’ शब्द सुनते ही लोगों के कान खड़े हो जाते हैं. आखिर यहां किस धर्म की बात हो रही है- हिंदू धर्म की, इस्लाम धर्म की, बौद्ध धर्म की या ईसाई धर्म की. लगता है कि जैसे इन पुछल्लों को लगाये बिना धर्म सार्थक नहीं बनेगा. सच तो यह है कि धर्म का स्वतंत्र अस्तित्व है और उसे बैसाखियों की ज़रूरत नहीं है. यह कैसा आश्चर्य है कि धर्म को ‘इस्लाम धर्म’ या ‘ईसाई धर्म’ कहते ही इस्लाम या ईसाई प्रमुख हो जाता है और धर्म गौण. लोग जुनून में छाती ठोंककर कहते हैं कि वे कट्टर मुसलमान हैं या कट्टर हिंदू. कोई आदमी यह नहीं कहता है कि वह कट्टर धार्मिक है. कट्टर धर्मनिष्ठ होना कठिन है.

धर्म अपना स्वभाव है- सत्यस्वरूप है. मनुष्य का धर्म मानवता है, जो उसे पशु से अलग करता है. समाज का धर्म सुव्यवस्था है, जो उसे अस्तव्यस्त जंगल से अलग करता है. मनुष्य में पाशविक वृत्तियों का आनयन उसकी मृत्यु है और समाज में अमर्यादाओं का आनयन उसका सर्वनाश है. इसीलिए महाभारत घोषणा करता है कि धर्म को मारने वाला मर जाता है और धर्म की रक्षा करने वाला सुरक्षित रहता है- ‘धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित।’ जब हम कहते हैं कि अग्नि का धर्म ‘दाहकता’ है तो उस समय हम यह नहीं पूछते कि यह हिंदू धर्म की अग्नि है या ईसाई धर्म की अग्नि. सभी जराधर्मा हैं, व्याधिधर्मा हैं और मरणधर्मा हैं, वे चाहे हिंदू हों या मुसलमान हों अथवा ईसाई हों. अग्नि का स्वभाव है जलाना. वह जिस पात्र में जलेगी उसको जलायेगी और आस-पास के वातावरण को भी गरमा देगी. ठीक इसी तरह का धर्म विकारों का भी है. भीतर विकार जगाओगे तो जलोगे. काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, अहंकार सदृश विकार पहले हमें व्याकुल बनायेंगे और फिर अगल-बगल के लोगों को परेशान करेंगे. यह विकार न हिंदू को छोड़ेगा, न मुसलमान को छोड़ेगा और न पादरी को. क्रोध का स्वभाव है इंसान को जलाना. यह जलन न तो ‘पारसी जलन’ है और न ही ‘यहूदी जलन’. यह कुदरत का विधान है कि तुमने क्रोध किया है, अत जलना ही होगा. गोस्वामी तुलसीदास ने मानसिक परिताप का मनोविश्लेषण इस प्रकार किया है-

काम वात कफ लोभ अपारा

क्रोध पित्त नित छाती जारा

प्रीति करहिं जब तीनिउ भाई

उपजइ सन्निपात दुखदाई

विकारों से मुक्त होते ही चित्त निर्मल होने लगता है. वह मैत्री, प्रेम और करुणा से भर जाता है. इतनी शांति मिलती है कि क्या कहने? यह शांति किसी जाति या सम्प्रदाय की सम्पत्ति नहीं है. यह मनुष्य का सहज धर्म है. जब तक यह धर्म हृदयस्थ अनुभूति में नहीं उतरता तब तक यह मात्र बुद्धि-विलास है. कबीर ने इस धर्म को भीतर देखा तभी तो कहा- ‘मैं कहता आखिन्ह की देखी, तुम कागद की लेखी रे’. हम तो लड़े जा रहे हैं धर्म के नाम पर. सारा समय विवाद में चला गया और कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा. भीतर देखे बिना बात नहीं बनेगी- ‘जन नानक बिनु आपा चीन्हें कटे न भ्रम की काई रे.’ सच (धर्म) के सहारे चलते-चलते परम सत्य तक पहुंच जाओगे. जहां किसी मतवाद का सहारा लिया वहां किसी बड़ी कल्पना में उलझ जाओगे और सत्य के दीदार का अवसर चूक जाओगे. प्रकृति कहती है कि तुमने विकार जगाया नहीं कि मैं तुरंत दण्ड दूंगी. यह पोथियों में नहीं मिलेगा. यह तो भीतर की गहराई में डूबने से मिलेगा. यदि धर्म समझ में नहीं आया तो धारण क्या करेगा?

जहां धर्म की बात आती है वहां हम यह मानकर सोचना ही बंद कर देते हैं कि ‘मज़हब में अकल को दखल नहीं.’ जिस दिन हम सोचना बंद कर देंगे, उस दिन धर्म अंधविश्वास बन जायेगा. कोई बात इसलिए मत मान लेना कि किताब में लिखा है. मान्यताएं पंथों में बांट देती हैं. सत्य को ही देखो और इसे ही धर्म समझो. इसके अतिरिक्त जो कुछ है सब पाखण्ड है. कल्याण इसी में है कि सचियारा बनो और झूठ को बेनकाब करो.

अंधे कभी अंधों का मार्गदर्शन नहीं कर सकते. धर्मांध पुरोहित, पादरी या मौलवी धर्म के मर्म को नहीं समझ सकते. उनकी दृष्टि में कोरा कर्मकाण्ड ही धर्म है. जब धर्म सिद्धांत हमें चीटियों की परवाह करना सिखायेगा और व्यवहार में अन्य धर्मों के अनुयायिओं की हत्या को न्यायसंगत ठहरायेगा; जब एक धर्म दूसरे धर्मों के अनुयायिओं को अपने धर्म में दीक्षित करने का हर सम्भव अमानवीय प्रयत्न करेगा; शोषण को बढ़ावा देगा; रंग भेद के आधार पर व्यक्तियों को मानवोचित अधिकार से वंचित करेगा और शांति के स्थान पर युद्ध को पसंद करेगा तो हर समझदार व्यक्ति धर्म से घृणा करने लगेगा. धर्म की इन्हीं गलत प्रवृत्तियों से तिलमिलाकर मार्क्स धर्म को कोसता है और अफीम कहता है, जिसके नशे में भोली गरीब जनता को सुला दिया जाता है, उनकी चिंतन-शक्ति कुण्ठित कर दी जाती है, उनका ध्यान सामाजिक अधिकारों से हटाकर मिथ्या स्वर्गिक सुख की ओर मोड़ दिया जाता है, उन्हें श्रम की मशीन के रूप में इस्तेमाल करके पूंजी पैदा की जाती है और हथियार के रूप में पूंजी का प्रयोग करके उनका दोहन-उत्पीड़न किया जाता है. धर्म के विरुद्ध मार्क्स की प्रतिक्रिया है- ‘धर्म सताये गये प्राणिओं का रुदन है, हृदयहीन विश्व का हृदय है और गरीबों की अफीम है.’ लेनिन ने धर्म को आध्यात्मिक अत्याचार की संज्ञा दी है. नेपोलियन ने व्यंग्यात्मक लहज़े में कहा है कि धर्मांध जनता को विश्वास है कि भावी जन्म में वे मुझसे अधिक सुखी होंगे. अच्छा है कि धर्म की यह मनोवृत्ति लोगों में बनी रहे ताकि मेरा ऐश्वर्य भरा जीवन बरकरार रहे. अत धर्म के दरवाज़े को सबके लिए खोल दो. फ्रायड ने धर्म को मनस्ताप और ईश्वरास्था को बचकानी हरकत और झूठी चिंतानिवारक युक्ति कहा है. मानव पीछे लौटकर अपने शैशव कालिक पिता की दमित प्रतिमा को भूलवश परमपिता ईश्वर समझ बैठता है और उसकी शरण में जाकर प्राकृतिक आपदाओं से अपने को सुरक्षित रहने का झूठा दिलासा देता है. इपीकुरस का विचार है कि अपवित्र वह नहीं है, जो भीड़ के देवता को मानने से इंकार कर देता है, अपवित्र तो वह है, जो भयवश भीड़ के देवता को स्वीकार कर लेता है.

हिंदूधर्म की बिगड़ती हुई स्थिति पर चिंता व्यक्ति करते हुए विवेकानंद ने कहा था कि न तो हम वेदांती रह गये हैं और न ही पौराणिक. हम अंधविश्वासी और पाखण्डी हैं. धर्मांधों की तुलना में अनीश्वरवादी बेहतर हैं. अंधविश्वासी आत्मघाती है और अनीश्वरवादी सच्चे अर्थ में जीवित है और किसी के काम आता है. बर्नार्ड शॉ का कथन है कि युद्ध के दौरान गिरजाघरों को बंद कर देना चाहिए क्योंकि राष्ट्रीयता के उन्माद में वे अपने देश के कार्यों को सराहने लगते हैं और जीसस के वचन को भूलकर युद्ध को भड़काते हैं. सार्त्र ने ईश्वरास्था को दुरास्था कहा है. धर्मांध व्यक्ति अपनी असफलताओं के लिए बहाना ढूंढ़ता है और इसके लिए ईश्वर को दोषी ठहराकर निश्चिंत होना चाहता है. इस दृष्टि से ईश्वरास्था उत्तरदायित्व के भार से बचने का एक खूबसूरत बहाना है. वास्तविकता यह है कि मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है. वह अपनी नियति का निर्धारक, मूल्यों का स्रष्टा और अपने विकास पथ का स्वयं प्रदर्शक है. वह दुनिया में अकेला है और ईश्वर के बिना उसे स्वयं अपने अस्तित्व को सारयुक्त करना है. मज़हबी व्यक्ति अपने प्रति ईमानदार नहीं होता है और अपने से ही अपनी वास्तविक स्थिति छिपाता है. नीत्शे के विचार में धर्म मनुष्य को निस्तेज, निर्बल, आलसी और कापुरुष बना देता है. जब तक ईश्वर को ‘मृत’ नहीं घोषित किया जायेगा तब तक मनुष्य ईश्वर के सामने दीन बना रहेगा और स्वयं महामानव बनने की पुरजोर कोशिश नहीं करेगा. जैनधर्म के तीर्थंकर की तरह नीत्शे का महामानव दिव्य लोक का निवासी न होकर इसी दुनिया में रहता है और कठोर साधना करके राम, कृष्ण, बुद्ध की तरह समाज में अपनी अलग आकर्षक पहचान बना लेता है. कबीर ने भी धर्म को बाहरी आडम्बरों से हटाकर अंतर्मन से जोड़ने की बात की है. ‘माला जाप’, ‘तिलक छाप’, ‘पाथर पूजा’ और ‘कठमुल्लाओं की बांग’ की उन्होंने खिल्ली उड़ायी है. मज़हब (धर्मवाद) यदि मानवता के विरुद्ध है और तर्क के प्रतिकूल है तो उसके खण्डन में सुसभ्य ज़िद प्रशंसनीय है. शंकर, महावीर, बुद्ध, सुकरात, स्पिनोज़ा, गैलीलियो, कोपर्निकस जैसे मनीषियों ने अमानवीय धर्म की धज्जियां उड़ायी हैं.

यह निर्विवाद है कि धर्म के नाम पर लोगों को ठगा गया; उनका शोषण किया गया और उनके साथ अत्याचार किया गया. फिर भी धर्म की सामाजिक उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता. धर्म को इस आधार पर गलत ठहराना उचित नहीं है कि धर्म का लोगों ने दुरुपयोग किया और उसकी आंच में अपने स्वार्थ की खिचड़ी पकायी. यदि धर्म के मानवीय रूप को मार्क्स, नीत्शे, फ्रायड, सार्त्र जैसे मनीषियों के सामने रखा गया होता तो धर्म के विरुद्ध उनकी ऐसी तीखी धारणा न बनती. यदि धर्म का कोई दुरुपयोग करे तो इसमें धर्म का क्या दोष है? वास्तव में सत्धर्म न तो अफीम की गोली है, न मनस्ताप है और न ही दुरास्था है; अपितु यह परिशुद्ध मस्तिष्क की खोज और संतुलित जीवन जीने के लिए संजीवनी बूटी है. धर्म इहलोक का नियमन करते हुए परलोक के साथ मन को जोड़ता है. धर्म उस बहुदलीय पुष्प की तरह है, जो अर्थ और काम रूपी पंखुड़ियों को सुनियोजित करके मोक्ष सौरभ बिखेरता है. ईश्वर की बाहर से पूजा करना पाखण्ड है. मंदिर जीवन का साध्य न होकर चित्तशुद्धि का मात्र साधन है. सच्ची धार्मिकता इस बात में है कि मनुष्य जीवन में ईश्वर के सद्गुणों को परिपूर्ण करे और सर्वत्र दिव्यता की अनुभूति करते हुए किसी को तुच्छ न समझे.

फरवरी 2016

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