दो मुल्क, तीन लोग, दो खत

जवाहरलाल नेहरू,

1962 में हुए भारत चीन युद्ध के सम्बंध में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने महान दार्शनिक, गणितज्ञ, सामाजिक अध्येता, इतिहासकार और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक बर्टेंड रसेल के साथ अपना अपना पक्ष रखते हुए लंबा पत्राचार किया था. ये सारा पत्राचार बर्टेंड रसेल द्वारा सम्पादित और दिसम्बर 1963 में प्रकाशित किताब ‘एन अनआर्म्ड विक्टरी’ में समाहित है. पुस्तक तब से भारत में प्रतिबंधित है. संयोग से निम्नलिखित दो पत्र उस पुस्तक में शामिल होने से रह गये थे और ये बर्ट्रेंड रसेल की आत्मकथा में शामिल हैं. नवनीत के लिए ये पत्र जुटाये हैं कथाकार अनुवादक सूरज प्रकाश ने.

 

(चाऊ एन लाइ का बर्ट्रेंड रसेल के नाम)

पेकिंग, नवम्बर 1962
द अर्ल रसेल
माय डीयर लॉर्ड

मैं पूरे सम्मान के साथ दिनांक 16 नवम्बर और 19 नवम्बर 1962 के आपके पत्रों की प्राप्ति की सूचना देता हूं. मुझे ये पढ़कर बेहद खुशी हुई है कि आपने 21 नवम्बर के चीन की सरकार के वक्तव्य का स्वागत किया है और उसका समर्थन किया है. आपकी शुभकामनाओं और चीन और भारत के सीमा विवाद के शांतिपूर्ण समझौते के आपके प्रयासों और विश्व शांति के मसले पर आपकी गहरी रुचि का मैं दिल की गहराइयों से आपका आभार मानता हूं. आपने अपने पत्रों में चीन की जनता के प्रति जो गहरी मैत्री दर्शायी है और चीन के इलाके ताइवान में अमेरिकी कब्जे की आपने जो भर्त्सना की है, मैं इसके लिए हृदय से आपका आभार मानता हूं.

चीन की सरकार ने 24 अक्तूबर 1962 को एक वक्तव्य जारी करके तीन प्रस्ताव सामने रखे थे. दुर्भाग्य से तीनों के तीनों प्रस्ताव बार-बार भारत सरकार द्वारा ठुकरा दिये गये. भारत सरकार द्वारा किसी भी समझौते पर पहुंचने से इन्कार करने और सैन्य सीमा संघर्ष को लगातार बढ़ाते रहने को देखते हुए चीन-भारत सीमा की रोज़ाना बदतर होती जा रही हालत को पलटने के नज़रिये से, सीमा-विवाद को रोकने में अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाने के मकसद से और चीन भारत के सीमा-विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से निपटाने के लिए चीन की सरकार ने 21 नवम्बर 1962 को एक वक्तव्य जारी किया जिसके अनुसार तीन उपायों की घोषणा की गयी है. इनमें एकतरफा युद्ध-विराम शुरू करना और अपनी खुद की पहल पर चीन द्वारा पूरी सीमा-रेखा से पीछे हटना शामिल है. अब मैं आपको ये बताना चाहता हूं कि 22 नवम्बर से पूरी चीन-भारत सीमा पर चीनी सीमा रक्षक सैनिकों ने गोलाबारी बंद कर दी है. मैं विश्वास करता हूं कि हमारा ये कदम आपकी उन इच्छाओं के अनुरूप है जो आपने अपने संदेशों में व्यक्त की हैं.

आपने 19 नवम्बर के अपने पत्र में सुझाव दिया है- ‘सारे ट्रुप उस खास इलाके को खाली कर दें- जिस पर भारत ने 7 नवम्बर 1959 से 8 सितम्बर 1962 तक कब्जा कर रखा था और जिसे चीन अपना मानता है.’ मैं विश्वास कर रहा हूं कि आपने यह नोट किया होगा कि चीनी सरकार ने 21 नवम्बर के अपने वक्तव्य में यह घोषणा की है कि पहली दिसम्बर से शुरू करते हुए चीन के सीमा रक्षक गार्ड वास्तविक नियंत्रण की उस रेखा से पीछे हट कर 20 किमी पीछे चले जायेंगे जो 7 नवम्बर 1959 को चीन और भारत के बीच मौजूद थी और इस तरह से हमारी फौजें 8 नवम्बर 1962 की पोजीशन से बहुत पीछे चली जायेंगी. चीनी सरकार यह आशा करती है कि भारत सरकार भी चीनी सरकार के 21 नवम्बर 1962 के वक्तव्य पर सकारात्मक रूप से कार्रवाई करेगी और हमारे कदमों की ही तरह के कदम उठायेगी. भारत सरकार एक बार ऐसा कर लेगी तो चीन-भारत सीमा शांत हो जायेगी और चीन और भारत के बीच 40 कि.मी. चौड़ा इलाका मिलिटरी रहित इलाका बनाया जा सकेगा. यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि चीन और भारत के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा के अपनी अपनी तऱफ के मौजूदा इलाके में दोनों देशों के प्रशासनिक प्राधिकारी अपना अपना काम करते रहेंगे.

चीनी सरकार यह आशा करती है कि भारत सरकार अपना पिछला नज़रिया बदलने की इच्छा दर्शायेगी और दोस्ताना बातचीत के ज़रिये चीन-भारत सीमा विवाद सद्भावना के तरीके से सुलझाने का प्रयास करेगी. मैं आशा करता हूं कि आप भारत सरकार को इस बात के लिए मनाने के लिए अपने खास प्रभाव का इस्तेमाल करते रहेंगे कि वह चीनी सरकार के 21 नवम्बर के वक्तव्य का सकारात्मक रूप से जवाब दे और हमारी ही तरह के कदम उठाये. साथ ही साथ चीनी सरकार यह भी उम्मीद करती है कि मैत्री भाव रखने वाले सभी देश और शांति चाहने वाले सभी गणमान्य व्यक्ति अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके भारत सरकार को इस बात के लिए मनायेंगे कि वह सम्मेलन की म़ेज पर वापस आकर बात करे. इस तरह के प्रयास शांति बनाये रखने में अहम भूमिका निभायेंगे.

दिल की गहराइयों से मेरा अभिवादन स्वीकार करें.

– चाऊ एन लाइ

(जवाहरलाल नेहरू का बर्ट्रेंड रसेल के नाम)

प्रधानमंत्री आवास
नयी दिल्ली
दिसम्बर 4, 1962
गोपनीय
सं. 2155/पीएमएच/62
द अर्ल रसेल
प्लास पेनरिन, पेनरिंड्यूडरेथ
मेरियोनेथ, इंगलैंड

डीयर लॉर्ड रसेल,

सबसे पहले तो मैं इस बात के लिए माफी मांगता हूं कि मैं 23 नवम्बर 1962 के आपके पत्र और उसके बाद मिले आपके तार का जवाब देरी से दे रहा हूं. आप जब भी, जो भी चाहें मुझे बिना झिझक लिख सकते हैं, मैं हमेशा आपके विचारों और सलाह का स्वागत करूंगा.

आपने जो कुछ भी लिखा है मैंने उस पर बहुत गहराई से विचार किया है. मुझे आपको ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि शांति के लिए आपके जुनून से मैं गहरे तक प्रभावित हुआ हूं और इसकी गूंज मेरे अपने मन में भी हो रही है. निश्चित ही हम नहीं चाहते कि चीन के साथ हमारा सीमा युद्ध चलता रहे और निश्चित ही हम यह भी नहीं चाहते कि यह युद्ध फैलकर न्यूक्लीयर शक्तियों के बीच फैले और उन्हें अपने लपेटे में ले. इस बात का भी खतरा पैदा हो रहा है कि भारत में सैन्य मानसिकता फैले और सेना की ताकत बढ़े.

लेकिन लोकतांत्रिक समाज में इस बात की सीमाएं होती हैं कि सरकार क्या कुछ कर सकती है. चीन के हमले को लेकर भारत में इतनी मज़बूत भावना घर कर रही है कि अगर इस बारे में कुछ न किया गया तो कोई भी सरकार टिक नहीं सकती. परिस्थितियों ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को इस बात के लिए मजबूर कर दिया है कि वह चीन की कड़ी भर्त्सना करे. इसके बावजूद, यहां कम्युनिस्टों की हालत खराब है और उनका संगठन चारों तरफ के विरोध के चलते धीरे-धीरे गायब ही होता जा रहा है.

इसके अलावा, ऐसे दूसरे कई महत्त्वपूर्ण मसले हैं जिन्हें कोई भी फैसला करने से पहले ध्यान में रखने की ज़रूरत है. यदि राष्ट्रीय स्तर पर घुटने टेकने और अपमान के घूंट पीने की कोई बात आती है तो ये भारत की जनता पर बहुत ही बुरा असर छोड़ेगी और राष्ट्र के निर्माण के हमारे सारे प्रयासों को बहुत ही गहरा धक्का लगेगा. इस समय पूरे भारत में जो जन भावना की लहर चल रही है उसे सैन्य नज़रिये के अलावा राष्ट्र के काम के लिए एकता और क्षमता निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. सैन्यीकरण और राष्ट्रीयता विकसित करने के अतिरेकी रूपों से जुड़े खतरे किसी से छुपे नहीं हैं, लेकिन इस बात की भी सम्भावनाएं हैं कि भारत की जनता और अधिक रचनात्मक तरीके से काम करे और जो खतरे हम पर मंडरा रहे हैं उन्हें अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करे.

अगर हम पूरी तरह से लोकप्रिय भावना के खिल़ाफ काम करते हैं, जिसे काफी हद तक मैं खुद भी मानता हूं, तो उसके नतीजे वही होंगे जिनका आपको डर है. दूसरे आकर सब कुछ अपने कब्जे में ले लेंगे और देश को विनाश की तरफ धकेल देंगे.

चीन के प्रस्ताव जिस रूप में आये हैं, वे खास तौर पर लद्दाख में दबदबे की स्थिति हासिल करने की ही बात कहते हैं. इन्हें वे भविष्य में भारत पर और हमले करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. जैसा कि आप जानते ही हैं, आज का चीन शायद अकेला ऐसा देश है जो किसी परमाणु युद्ध की भी परवाह नहीं करता. यह सुनने में आया है कि माओ त्से तुंग ने कहा है कि वह इस बात की परवाह नहीं करते कि कुछ लाख लोग मारे जायेंगे क्योंकि उसके बाद भी कई लाख लोग ऐसे होंगे जो उनके बाद भी चीन में ज़िंदा रहेंगे. अगर वे इस हमले से कोई फायदा उठाते हैं तो इससे उन्हें भविष्य में और हमले करते रहने का मौका मिलेगा. वे शांति स्थापित करने की सभी वार्ताओं को एक सिरे से बंद ही कर देंगे और निश्चित ही परमाणु युद्ध लाकर ही मानेंगे. इसलिए मैं महसूस करता हूं कि इस विनाश से बचने के लिए और साथ ही साथ अपनी जनता को मज़बूत करने के लिए, हथियारों आदि से परे, हमें ऐसी ताकतों के आगे बिल्कुल भी सरंडर नहीं करना है या नहीं झुकना है जिन्हें हम विनाशकारी मानते हैं. ये पाठ मैंने गांधीजी से सीखा है.

अलबत्ता हमने चीनी प्रस्ताव को ठुकराया नहीं है, पर हमने अपनी तरफ से एक विकल्प सुझाया है जो कि दोनों ही पक्षों के लिए सम्मानजनक है. मुझे अभी भी उम्मीद है कि चीन इसे स्वीकार करेगा. हां, भले ही कुछ भी हो जाये, हम युद्ध-विराम को भंग नहीं करने वाले हैं और न ही सैन्य हमले ही करने वाले हैं.

यदि इन शुरुआती मुद्दों को संतोषजनक ढंग से सुलटा लिया जाता है, तो हम सीमा समस्या के समाधान के लिए कोई भी शांतिपूर्ण तरीके अपनाने के लिए तैयार हैं. इन तरीकों में किसी मध्यस्थ को बीच में लाना भी हो सकता है.

जहां तक हमारा मामला है, हम गुट निरपेक्षता की नीति का पालन करने की आशा रखते हैं. हालांकि मैं ये बात मानता हूं कि दूसरे मुल्कों से सैन्य सहायता लेना इस पर असर डालेगा. लेकिन जो परिस्थितियां हमारे सामने हैं, उनमें हमारे पास और कोई उपाय नहीं है.

मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि आपने जो व्यापक मुद्दे उठाये हैं, वे हमेशा हमारे सामने हैं. हम ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहते जिससे हमारी धरती पर संकट के बादल मंडरायें. अलबत्ता, मैं यह सोचता हूं कि अगर हम चीन के सामने घुटने टेक देते हैं तो कहीं ज़्यादा बड़ा खतरा हमारे सामने होगा और वे सोचते हैं कि वे जिस नीति पर चल रहे हैं, उससे वे फायदे ही फायदे में रहेंगे.

आपका ही

जवाहरलाल नेहरू

 (जनवरी 2016)

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