दो कविताएं : सुधा अरोड़ा

♦  सुधा अरोड़ा  >

हर स्त्री एक जलता हुआ सवाल होती है
एक स्त्री जब एक त्री भर नहीं रह जाती
एक जलता हुआ सवाल बन जाती है
ऐसे सवाल को कौन गले लगाना चाहता है

सवालों से कतरा कर निकल जाते हैं अपराधी पुरुष
और अपनी ही जात के साथ बेवफाई करती बेगैरत औरतें
खड़ी हो जाती हैं जवाब का मुलम्मा पहने
सवाल बनी औरत के सामने
मज़बूत करती हैं अपराधी पुरुषों के कंधे

सवाल के बरक्स खड़े कर दिये जाते हैं
कई गैरज़रूरी सवाल
कि लोग उलझे रहें उनमें
और सवालों को सवाल ही रहने दिया जाये

इन सवालों से भी किया जाता रहा है ऐसा सुलूक
जैसा स्त्रीयों से किया जाता रहा सदियों तक !

सदियों के खिलाफ़ तैयार हो रहा है एक मोर्चा
बाज़ार भरा है नये से नये यंत्रचालित उपकरणों से
लेकिन कुछ भी नहीं है आधुनिक
कुछ भी नहीं है नया
न आय पॉड, न थ्री डी होम थिएटर, न टैब्लेट कम्प्यूटर !
सिर्फ लड़कियों का सिर उठाना है नया
सिर्फ उनका इनकार है नया !
सदियों की चुप्पी के खिलाफ़ बोलना उनका
जबरन कहला ली गयी ‘हां’ के खिलाफ़
उनका ‘नहीं’ है नया !
तुम अपनी हिंस्र कामुकता को लपेटकर प्रेम की चासनी में
अपनी आंखों की लिप्सा में आतुरता सजाकर
रचते हो प्रेम का सब्जबाग़ उनके लिए !
तुमने यही सीखा सहस्राब्दियों तक !
ठोकर मार देना एक लड़की का
तुम्हारे प्रस्ताव को
एकदम नया है !
तुम पचा नहीं पाते जब इस इनकार को
तो असलियत पर उतर आते हो
अपने चेहरे पर नकाब बांधे
फेंकते हो उसके मुंह पर तेजाब पीछे से
सामने आकर लड़ने का हौसला नहीं तुममें !
तुम अपनी आतुरता, अपनी हिंसा,
अपने प्रतिशोध के साथ खड़े रहो वहीं
जहां सदियों से खड़े हो !
क्यों कि ज़िंदा इंसान ही चला करते हैं आगे
 रचा करते हैं कुछ नया.
तुम्हारी बर्बरता के खिलाफ़
लड़कियों का अपने लिए एक मुकाम बनाना
है बिल्कुल नया !   

(मार्च 2014)

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