दुनिया का खेला

♦  अनुपम मिश्र   >

मैं उनसे कभी मिल नहीं पाया था. सभा गोष्ठियों में दूर से ही देखता था उन्हें. अपरिचय की एक दीवार थी. यह कोई ऊंची तो नहीं थी पर शायद मेरा अपना संकोच रोके रहा आगे बढ़ कर मिलने से. आज उनकी स्मृति में हम सब यहां एकत्र हुए हैं. उन्हें मैं प्रणाम करता हूं.

अशोकजी ने कभी अंग्रेज़ी में एक सुंदर पंक्ति लिखी थी- एकदम नाटक वाली- वन्स अपोन ए टाईम वाली शैली में. वे कहीं परिचय दे रहे थे मध्यप्रदेश का. पहला ही वाक्य था- वन्स अपोन ए टाईम, देयर वाज़ नो मध्यप्रदेश! उससे भी पीछे के काल में लौटें तो कहा जा सकता है कि कभी दिल्ली भी नहीं थी.

पर नाटक तो थे. ऐसा भी कह सकते हैं, नाटक तो था. यहां आप बहुवचन से हट कर एकचन पर आ जाएं तो नाटक शब्द को मानो पंख लग जाते हैं. ज्यादा विस्तार, व्यापकता और गहराई इस एकवचन में आ जाती है. तो दुनिया में नाटक था. दुनिया का खेला था. और इस खेल के बीच नाटक भी खेले जाते थे. कोई हज़ार बरस पुराने ये किस्से हैं पर लगेगा कि ये तो आज की ही बात है.

नाटक खेले जाते थे. कुछ उन्हें पसंद करते थे. और कुछ नापसंद भी. शुरू में किसी बात को नापसंद करने वाले थोड़े किनारे बैठते रहे होंगे-तटस्थ. फिर वे बीच में बहने लगे होंगे. नाटकों में विघ्न डालने का, तरह-तरह की रुकावटें डालने का नाटक भी शुरू हो गया था तब.

आज तो बहुत से ऐसे दल हैं, समूह हैं, जिनकी भावनाओं को चाहे जब, चाहे जहां, चाहे जिस बात से आघात पहुंच जाता है. तब वे अपनी आहत हो चुकी भावनाओं को शांत करने का एक ही तरीका जानते हैं, अपनाते हैं- अशांति फैलाना. नाटक हो, किताब हो, संगीत हो, कला प्रदर्शनी हो- सब पर एक ही तरीका लागू होता है.

तब की, कुछ हज़ार बस पहले की परिस्थितियां क्या थीं, क्या पता हमको. पर नाटक शुरू होने से पहले मंगलाचरण, विघ्न हरण की अनेक गतिविधियां सामने आने लगी थीं. पर विघ्न न आयें, उपद्रव न हो जाए इसकी भी पूरा शात्र रचा जाने लगा था उस समय. यह सारा काम सूत्रधार के हाथों में सौंपा जाता था. सूत्रधार नेपथ्य से रंगभूमि में, रंगमंच पर प्रवेश करता. उसकी इस क्रिया का नाम था- रंगावतरण. उसके साथ एक तरफ पूर्ण कलश यानी जल से भरा कलश लिये एक सहायक ध्वजा लिये आता.

यह सब काम बहुत ठीक ठुमक-ठुमक कर, अभिनय, संगीत, प्रकाश की मदद से खूब आनंद के साथ किया जाता था.

कहने को अभी नाटक शुरू ही नहीं हुआ है पर विघ्न विनाशक नाटक तो जारी ही है. कलश के जल से सूत्रधार पूरी रंगशाला और मंच को शुद्ध करते हैं, आचमन करते हैं. फिर बारी आती है ध्वज की.

आज बहुत कम लोगों को यह याद रह पाया हो कि इस ध्वज का एक विशेष नाम होता था. काम तो विशेष था ही. इसे जर्जर ध्वज कहते थे. आज की हिंदी में इसका मतलब कुछ ऐसा लगेगा- फटा हुआ झंडा. पर भला फटा हुआ, जर्जर ध्वज फहराकर कोई क्यों नाटक करेगा? यह तो एकदम भव्य झंडा होता था. ठाठ से लहराता हुआ. इसे उठा कर पूरे रंगमंच पर इस कोने से उस कोने तक घुमा कर सूत्रधार आ सकने वाले सभी विघ्नों को जर्जर कर देता था.

अब बारी आती एक विशेष नृत्य द्वारा भगवान शिव और विष्णु की पूजा अर्चना की. सूत्रधार बहुत ही ऊंचे दर्जे के अभिनय के साथ यह सारा काम करता. बायें पैर से विष्णुजी और दायें से शिव भगवान को स्मरण किया जाता. बड़ा ही कठिन काम होता यह. पहला पद, वाम, त्री का माना गया है और दूसरा पद, दक्षिण, पुरुष का. आज की भाषा में कहें तो जेंडर सेंसेटिव वाला कर्तव्य भी पूरा हो गया.

नाटक अभी भी शुरू नहीं हुआ है.

फिर सूत्रधार जर्जर ध्वज की पूजा चार तरह के विशेष फूलों से करता. तब बारी आती नाटक में इस्तेमाल होने जा रहे तरह-तरह के वाद्य यंत्रों की पूजा की. ऐसा न हो कि वे प्रस्तुति के दौरान बेसुरे हो जाएं. उनके तार टूट जाएं या कि मृदंग उतर जाएं.

अब आयी बारी नांदी पाठ की. उस समय भी ये राजा लोग हमारे आज के नेताओं की तरह मुख्यमंत्रियों की तरह खूब लड़ा करते होंगे. तभी तो हर नाटक के प्रारम्भ में नांदी पाठ में बचे सब देवताओं को प्रणाम कर लेने के बाद सूत्रधार को अपने राजा की विजय की कामना भी करनी पड़ती थी.

मुझे न तो संस्कृत नाटकों की इतनी बारीक परम्परा का कोई अंदाज़ था और न दुनिया के इस खेला का. शायद तब मैं आठवीं में पढ़ता था. सन् 1959-60 की बात होगी. दिल्ली में कोई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह हो रहा था. उसमें एक हिस्सा बड़ी फिल्मों का था तो एक हिस्सा बहुत ही छोटी फिल्मों का. इतनी छोटी की हम सोच भी न पाएं. केवल तीन मिनट की फिल्मों का प्रदर्शन. ऐसी अनेक फिल्मों में से जिसे पहला पुरस्कार मिला था, उसे देखने का संयोग मेरा हाथ लग गया था.  यह फिल्म कनाडा के किसी महान निदेशक ने बनायी थी.

फिल्म शुरू होती है कनाडा की एक झील के दृश्य से. सुंदर नीला पानी. तब वैसे भी हमारे जल-स्रोत इतनी बुरी तरह से प्रदूषित नहीं थे. झील में एक नाव तैर रही है. नाव में एक पिता-पुत्र बैठे हैं. पिता चप्पू खे रहे हैं, 6-8 बरस का बेटा उन्हें निहार रहा है.

कैमरा ऊपर उठता है. अब पूरी झील दिखने लगती है. कैमरा और ऊपर जाता है. झील के किनारे बने सुंदर घर आते हैं परदे पर. फिर और ऊपर. पूरा मोहल्ला, फिर और ऊपर उठता जाता है कैमरा. पूरा राज्य, पड़ौसी देश अमेरिका, फिर दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, यूरोप, एशिया, लो पूरी गोल सुंदर हमारी धरती. कैमरा अभी भी उठता जा रहा है. फिल्म शुरू हुए अभी एक मिनट भी नहीं हो पाया है. बगल से चांद झांक गया, अब अन्य ग्रह शनिचर आदि, जिनसे आजकल लोग बहुत डरने लगे हैं और कुछ टी.वी. चैनल शनि महाराज की शांति करवाने में विशेष योग्यता भी रखते हैं. खैर

हमारा सौर मंडल, हमारे सौर परिवार के सभी सदस्य अगल-बगल से निकलते जाते हैं. अब हमारी आंखों के सामने हमारी आकाश गंगा आने लगी है- अनगिनत तारे, सूरज छोटे और सूरज से बड़े भी. फिर और आकाश गंगाएं. डेढ़ मिनट भी अभी नहीं हो पाता है कि पूरा परदा असंख्य झिलमिल सितारों, तारों, बिंदुओं से ठसाठस भर जाता है. कहीं कोई ज़रा-सी भी जगह नहीं बचती.

विराट दर्शन!

अब कैमरा बड़ी ही तेज़ी से वापस आने लगता है नीचे. उसी रास्ते. सब दृश्यों को वापसी के क्रम में दिखाते हुए वापस झील पर. झील में अब नाव पर. नाव में चप्पू खेते पिता के हाथ पर. हाथ पर बैठा है एक मच्छर. अब मच्छर के डंक से कैमरा खून में जाता है. खून की नस में दौड़ रहे हैं लाल कण, सफेद कण. अब वह विराट दर्शन की तरह सूक्ष्म दर्शन करता जाता है. जितना वह ऊपर गया था, उतना ही वह शरीर में भीतर उतरते जाता है.

इस विषय के जानकार बताते हैं कि हममें से हरेक के शरीर में कोई 90 लाख करोड़ जीवाणु, सूक्ष्म जीव रहते हैं. यही अपने आप में कितना बड़ा खेला है. हम एक विचार पर बनी एक ही संस्था में 20-25 लोग, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, कवि, लेखक एक साथ नहीं रह पाते. एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते रहते हैं पूरा जीवन. और ये हैं 90 लाख करोड़ को टिकाये रहते हैं. तो दुनिया का एक बहुत बड़ा खेला तो हमारे अपने इसी चोले में खेला जा रहा है. जो लोग हज़ारों बरसों से आत्मा की खोज कर रहे हैं क्या पता यही आत्मा हो?

तो न यह सूक्ष्म जगत हमें पकड़ में आता है न वह विराट जगत. इन दोनों का गणित हमारे किसी भी गणित से परे है. दूरियां प्रकाश वर्ष में नापी जाती हैं और फिर भी हम उन्हें माप नहीं पाते. दस-पांच बरस में एकाध बार अपनी धरती से सिर्फ 80-90 किलोमीटर ऊपर जाकर हम अपने विज्ञान-ज्ञान की शान बघारें– यह करीब-करीब मूरखपना ही है.

इसी मूरखपने में से निकली यह समझदारी इस तीन मिनट की फिल्म देख कर. इसे देख दूरियां क्या हैं यह भी हम भूल जाएंगे और नजदीकियां क्या हैं, विराट क्या है, सूक्ष्म क्या है, इस सबकी परिभाषा भी बदल जाती है.

आपकी अनुमति हो तो हम एक बार फिर रंगशाला में झांक लें. लीजिए विस्तृत नंदी पाठ सम्पन्न हो गया है और अब हमारे सूत्रधार कुछ ऐसी बातों की सूचना विदूषक के साथ दर्शकों को दे रहे हैं जो उस जमाने की चलती बातें, ब्रेकिंग न्यूज़ होंगी. ठीक सुनाई तो नहीं दे रहा पर वे बालू की भीत और पवन के खम्बे की बात कर रहे हैं शायद. सूत्रधार का ध्यान एकदम ताज़ी घटनाओं पर चला गया है. रेते की दीवार में से बीच की विभक्ति ‘की’ हटा दें. बचा क्या रेत-दीवार, रेत और दीवार. पवन का खम्बा में से क्या जोड़ें, क्या हटाएं- उसे अभी यहीं छोड़ दें. बस पवन से ही काम चला लें अभी.

ऐसे प्रसंगों से सूत्रधार नाटक की कहानी का बीज बो देते हैं आने वाले कथानक की तरफ दर्शकों को एक संकेत देकर. फिर धीरे-धीरे इसी बीज के सहारे कथानक का पूरा वृक्ष खड़ा होने वाला है.

मुझे ठीक याद नहीं कि नाट्य शात्र नामक यह ग्रंथ कब लिखा गया होगा. पर विद्वान बताते हैं कि तीसरी शताब्दी में, यानी आज से कोई सत्रह सौ बरस पहले इस ग्रंथ को नये सिरे से सजाया संवारा गया था. सम्पादित किया गया था. कुछ अनावश्यक प्रसंग हटाये गये थे, कुछ उस ज़माने के हिसाब से ज़रूरी प्रसंग जोड़े भी गये थे. इसी ग्रंथ का एक पूरा अध्याय नाटक के प्रारम्भ की तैयारियों का विशद विवरण करता है. हमारे सूत्रधार ने जो कुछ भी अभी तक किया है वह इसी ग्रंथ के बारहवें अध्याय पर आधारित है.

वापस दुनिया के खेला पर. पचास बरस भूल जाएं. ये इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार आदि जो गिनती हम सब जानते हैं उनसे परे है. अरब-खरब ही नहीं, गिनती बताने वाले पद्म, शंख जैसे नये शब्द इसमें गली-गली घूमते हैं. इन शब्दों को तो हमने किसी और संदर्भ में सुना भी है पर ऐसे भी शब्द हैं जिन्हें प्रायः हम सुन नहीं पाते-अन्त्य-यह एक संख्या है और इसमें 1 के आगे 14 ज़ीरो लगते हैं. 100,00,00,000,000 इकाई, दहाई वाली शैली में शायद 100 खरब. इस गणित को आसानी से समझने के लिए बाद में और शब्द आये- अनादि और अनंत. न शुरू का कुछ पता न अंत का कोई ठीक हिसाब.

नाट्य शात्र हमारे हाथ आया कोई 17 सौ बरस पहले और दुनिया का खेला किस तराजू पर तुलेगा, उसके बाट कितने वज़न के होंगे वह सब कल्पना से परे हैं. खगोल शात्र के मामले में जो विस्तार है, जो फैलाव है वह तो स्टीफन हॉकिंग ही जाने, पर जिसे हम कूप-मंडूक कह कर उसका मज़ाक उड़ाते हैं, हमारे कुंए के उस मेंढक को आकाश जितना दिखता है, हमें भी उससे ज्यादा इसका कुछ पता नहीं. हम उन्हीं दो शब्दों को अनादि-अनंत को दुहरा कर अपनी विद्वता झाड़ देते हैं.

अनगिनत अभिनेता, नायक, एक से बढ़ कर एक किस्से कहानियां, वो भी हर रोज़ जुड़ने वाली और पूरी धरती पर फैला शानदार रंगमंच. इस खेला में दर्शक, अभिनेता का अंतर भी मिट जाता है. कभी हम अभिनय करते हैं तो कभी हम अभिनय देखते रह जाते हैं. फिर एक ही आदमी के कई रूप हो जाते हैं यहां- बहुरूपिया.

इस विशाल खेला में हम सब सज-धज कर एक से एक बहुरूपिये बन कर उतरते हैं, अपनी भूमिका खोजते हैं. कभी अच्छी, कभी खराब. कुछ का खेला ठीक से पूरा हो जाता है. कुछ का अधूरा छूट जाता है. कुछ का जीवन की कहानी के किसी खास मोड़ पर आकर अटक जाता है, भटक जाता है. तो जीवन के इस खेल को अच्छे से खेलते जाने के लिए ठीक आंख चाहिए. ठीक पांख, पंख चाहिए. इस आंख-पांख का संतुलन साध कर रखना पड़ता है. नहीं तो ऊंची से ऊंची, बड़ी से बड़ी जगह पर पहुंच कर भी हम ऐसे गिर पड़ते हैं कि फिर उठाये नहीं उठ पाते. भौतिक रूप से गिरते ही हैं, हम अपनों की नज़रों में भी गिर जाते हैं.

रामजी के साथ मर्यादा और पुरुषों में उत्तम जैसे विशेषण, गुण जुड़े ही हुए थे. जब तक आंख और पांख सही रहे तो रावण रथी, बिरथ रघुबीरा भी चल गया. ऐसा बेमेल युद्ध भी राम जीत गये. पर, आंख-पांख का संतुलन बिगड़ा नहीं कि उन्हीं के लाड़ले बेटों ने उनका घोड़ा, अश्वमेध का घोड़ा रोक लिया था. पूरा जीवन लोगों से, एक से एक समर्पित भक्तों से घिरे रहने वाले राम का अंत अकेलेपन में हुआ. सन्नाटे में हुआ. सरयू नदी में जल समाधि से हुआ. शायद ऐसी ही अनंत घटनाओं को देख दुनिया का खेला की तुक से ‘मैं हूं अकेला’ से जोड़ते रहे हैं कवि लोग.

श्री कृष्ण की लीला तो लीला ही है. लीला अपरम्पार. पर देखें कि वे अपनी छोटी-सी उंगली से इंद्र का क्रोध निपटा देते हैं, गोवर्धन उठा कर किसी और के बसाये गये गांव को बाढ़ से बचा लेते हैं. पर उनकी खुद बसायी भव्य नगरी द्वारिका समुद्र में डूब जाती है. उसे वे बचा नहीं पाते.

तो इस शानदार खेला में किसी भी चीज़ की कमी नहीं- इसमें से चाहे जितने किस्से निकाल लो, चाहे जितने किस्से इसमें जोड़ दो- यह उपनिषद के शब्दों में हमेशा पूर्ण ही बना रहता है.

नाटक में नौ रस हैं, दुनिया के खेला में भी नौ रस तो हैं ही भाई, पर इनमें नाटकों के अतिरिक्त एक रस और जुड़ गया है. आप सब भी हैरान होंगे कि नौ के दस कैसे हो गये. इस रस का नाम है- गन्ना रस! गन्ने का रस भी मिल जाता है. कैसे? आपने गन्ने का रस ठेले पर सामने खड़े होकर पीया ही होगा. पहले साबुत गन्ना डालते हैं. फिर एक बार रस निकल आया तो उसी गन्ने को दो बार मोड़ कर फिर रस निकाला जाता है. फिर तीसरी बार दो के बदले तीन-चार मोड़ कर अदरक, नींबू लगा कर फिर निचोड़ा जाता है. जब तक इन सारे छिलकों का रस न निकल जाए- दुकान वाला रुकता ही नहीं. इस खेले की दुकान वाला भी हम सब का रस कभी-कभी इसी शैली में निकालता है. इतना समय तो आपका बर्बाद नहीं करना है. पर दो-चार रसों में गन्ना रस देख ही लें हम.

दुख से शुरू करें. करुण रस है और इस खेला में पेश है एक नमूना.

कोई साठ बरस पहले की बात है. एक बांसुरी वादक थे. श्रेष्ठ पहले दर्जे के कलाकार. शायद उन दिनों वे रेडियो पर भी बांसुरी बजाते थे. प्लेग फैली. परिवार में इनको मिला कर सात सदस्य थे. पत्नी मरीं रोग से. बहुत ही प्रेम करते थे. अर्थी उठा श्मशान. लौटते हुए सारे रास्ते रोते  रहे. संभाला मुश्किल से. घर आये तो पिता मरे मिले. सूरज ढल गया था. रात भर शरीर घर में रहा. ये सामने बैठे रोते रहे. सुबह उनका संस्कार किया. लौटे तो मां जा चुकी थीं. एक-दो-तीन. अब आंसू रुक गये थे. वे स्तब्ध मौन हो गये. अगले   तीन दिनों में तीन बचे सदस्य और गये. अंतिम सदस्य को अग्नि देने के बाद इनका न सिर्फ मौन टूटा, ये तो ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे थे- ‘अरे, बंसीवाले तू मेरी परीक्षा लेना चाहता है. ले ले. मैं भी सब कुछ छोड़ वृंदावन आता हूं. तेरी परीक्षा लेने.’ पूरी ज़िंदगी फिर वे वृंदावन की गलियों में घूमते हर छोटे-बड़े मंदिर के सामने बांसुरी बजाते जाते.

हास्य रस में भी गन्ने का रस मिलेगा. लीजिए एकदम ताज़ी चीज़. नेल्सन मंडेला का किस्सा है अभी कुछ दिन पुराना. आज़ादी की अद्भुत लड़ाई लड़ी. हममें से कुछ की आधी उमर बराबर वर्ष जेल में काटे. देश को आज़ादी दिलायी. फिर राष्ट्रपति भी बने. पूरी दुनिया में 95 के पूरे होने पर उनका जन्मदिन मनाया गया था और इसी सबके बीच उनके शहर की नगरपालिका ने उनके ऊपर बकाया बिजली-पानी का बिल भेज दिया हैं- दंड समेत कुछ लाख रुपए का!

कुछ हज़ार बरस पीछे लौटें. ‘सौ साल जिओ’ जीवेत शरदः शतम का आशीर्वाद सबने सुना है. मृच्छकटिकम नाटक में नायक-नायिका का नाम उनके किस्से कई लोग जानते ही हैं. नाटक में एक चोर है शर्विलक. नायक के घर में चोरी के लिए सेंध मार कर घुसा है. विदूषक को सोता देख आशीर्वाद देता है- मैत्रेय, स्वपिहि वर्षशतम्. भैया इसी तरह सौ बरस सोते रहना.

वीभत्स रस के भयानक उदाहरण तो इस खेखे में भरे पड़े हैं. कभी का भी, कहीं का भी अखबार उठा लें हंसते-खेलते, खाते-पीते विज्ञापनों के बीच पूरा अखबार इसी से भरा मिलता है.

पर वीभत्स रस का किस्सा सुनना ही हो तो जनरल नैकेड बट का सुन लें. अफ्रीका का पश्चिमी-दक्षिणी छोर- लायबेरिया नाम का देश. वर्षों तक गृह युद्ध चला है यहां. इसमें एक पक्ष का सेनापति था जोशुआ. इसने अपने विरोधियों को मार कर उनके जिगर को काट कर नाश्ता भी किया है. पांच-सात बरस के बच्चों तक की सेना बना डाली. इन बच्चों को युद्ध में घसीटने के लिए वह सबसे पहले बच्चों से उनके माता-पिता की ही हत्या करवा देता था. यह विचित्र सेनापति दूसरे पक्ष पर हमला करते समय बस पैर में सैनिक वाले भारी-भरकम जूते पहनता, हाथ में आग उगलती बंदूक, अंग पर कोई कपड़ा नहीं इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ आदि की दुनिया में इसका दूसरा नाम पड़ गया था जनरल नैकेड बट, नंगधड़ंग सेनापति. जोशुआ ने अपने ही 20,000 लोगों को मारा था, वहीं के लोग, शायद कबीला, जाति अलग थी और शायद बोली भी. सभी देशों में नवनिर्माण की यही परिभाषा है आजकल! अब इस वीभत्स रस में एकदम से अद्भुत रस जुड़ता है.

खून से सने शिखर पर खड़े जोशुआ को बंदूकों की कानफोडू आवाज़ों के बीच न जाने कहां से अंतरात्मा की आवाज़ सुनाई पड़ जाती है. वह बंदूक फेंक देता है. चल पड़ता है तीर्थ यात्रा पर. तीर्थ कौन-सा? वे सब मुहल्ले, घर जिनमें घुस-घुस कर उसने लोगों को मारा था. उनका जिगर परिवार के लोगों के सामने ही काट कर खाया था. सलाहकारों ने समझाया, ऐसा मत कर भूल कर भी. लोग छलनी बना देंगे तुम्हारी. इन रसों में अब वीर रस जुड़ता है एक नये रूप में. जोशुआ किसी की नहीं सुनता बस अंतर-आत्मा की सुनता है. गज़ब की हिम्मत. अब वह एकदम निहत्थे, सचमुच अपनी आत्मा के बल पर, उनके बीच जाकर हाथ जोड़ कर अपने पाप का प्रायश्चित करता है. उस पर कहीं भी हमला नहीं होता. वह लोगों के पैर छूता, खुद रोता, दूसरे रोते.

हमारे ही देश के एक युवा फोटोग्राफर भी कोई कम हिम्मत नहीं दिखाते. उनका नाम
है- रॉयन लोबो. वे भी इसके पीछे-पीछे कैमरा लेकर फिल्म बनाते हैं. ये है दुनिया का विचित्र खेला.

क्रोध में किसी पर चप्पल जूते फेंकना अब कोई नयी बात नहीं बची है. जूता फेंकने वाला भी क्रोधी, जिस पर फेंका वह भी आग बबूला. पर एक खेला 1914 में दक्षिण अफ्रीका में खेला गया. जनरल स्मट्स उस समय पूरी दुनिया में फैले ब्रितानी साम्राज्य के सबसे बहादुर, सबसे कुशल, सबसे योग्य, सबसे सख्त और सबसे क्रूर प्रशासक माने जाते थे. खुद गांधीजी जैसे विनम्र व्यक्ति के शब्दों में सबसे ‘धूर्त’ लोगों में गिने जाते थे. दक्षिण अफ्रीका में प्रारम्भ हुए सत्याग्रह में इन दोनों के कड़वे प्रसंग कई हैं. जनरल स्मट्स ने इनको जेल में डाला था. शायद वे गांधीजी को मार डालना भी चाहते थे. न जाने कब गांधीजी की तेज आंखों ने उनके पैर का नाप लिया और उन्हें एक सैण्डल की जोड़ी अपने हाथ से बना कर भेंट की. जनरल स्मट्स ने बाद में कभी लिखा था कि उनके पैर इस योग्य नहीं कि वे इतनी पवित्र सैण्डिलें पहन सकें. क्रोध रस शांत रस में बदला और फिर ग्लानि तक में.

इस खेला में अक्सर हम सबको लगता है कि हम जो काम करना चाहते थे, वो तो हमें करने ही नहीं दिया गया. तो ये अच्छा खासा ज़माना ज़ालिम जमाने में बदल जाता है हमारे लिए.

तालियां कब पिटती हैं जब आपके सामने नाम, गुमनाम नहीं, नाम और नम्बर लिखी बनियान पहले ग्यारह लोग रोकने को खड़े हों. तब आप गोल कर दिखाएं. तालियां तभी बजती हैं. विघ्न इस खेला में रोज़ आएंगे. गुमनाम भी, नम्बर और नाम वाली बनियानें पहने भी.

ऊपर कहीं दुनिया के खेला की तुकबंदी अकेला से की गयी है. पर निवेदन है कि यह काम बस कवि पर ही छोड़ें. हम और आप इस खेला को ठीक से खेलना चाहते हैं तो अकेला को अकेला ही छोड़ दें. दुकेला बनें. दूसरों का साथ लें, दूसरों का साथ दें. तिकेला, चौकेला से भी बढ़कर सौकेला जैसे नये शब्द ही नहीं, नये सम्बंध भी बनायें. इस खेला को, भले ही वह आपको सौतेला बनाना चाहे, आप सौतेला न बनायें.

(नेमिचंद जैन स्मृति व्याखान  (सम्पादित)

(नटरंग प्रतिष्ठान, 16 अगस्त 2013)

(मार्च 2014)

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