दिनकर का दर्द

‘कुरुक्षेत्र’, ‘हुंकार’, ‘रश्मिरथी’ ‘संस्कृति के चार अध्याय’ जैसी रचनाएं लिखनेवाले रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के जीवन में त्रास, पीड़ा, कष्ट और यातनाएं कम नहीं रहीं. प्रस्तुत पत्र उस पीड़ा का परिचय देता है. यह पत्र उन्होंने अपने अंतरंग मित्र को, जो उस समय अमेरिका में थे (जिनका नाम यहां देना उचित नहीं है) लिखा था, जिसे उन्होंने अपने अग्रज पद्मभूषण, साहित्य-वाचस्पति डॉ. (स्व.) पं. सूर्यनारायण व्यास को इस आकांक्षा के साथ भेजा था कि वे इस पीड़ा के ‘शमन’ में कुछ मदद करेंगे. राजशेखर व्यास ने हमारे लिए ये पत्र उपलब्ध कराया है.

14-8-53                                                   चौधरी टोला, पटना – 8

प्रिय भाई, तुमने व्यासजी को जो पत्र लिखा, उसे उन्होंने कृपापूर्वक मेरे पास भेज  दिया. आज ही वह पत्र मुझे मिला है. मुझे हैरत होती है कि तुम्हारे मन में क्या-क्या बातें उठा करती हैं और क्यों उठा करती हैं? तुम्हें पुस्तकें भिजवाने का विचार मुझमें उठा था और पुस्तकें मैंने खुद भेजी थीं. मैं नहीं जानता के इस सम्बंध में तुमने किस बिहारी अफसर से क्या कहा? मुझे तुमसे मिलनेवाले किसी भी आदमी ने कभी भी कोई संदेश नहीं कहा.

यहां गांधीजी की मृत्यु के बाद मैंने तुम्हें पत्र सिर्फ पर साल लिखा था, जिसका उत्तर तुमने फौरन दिया. उसी के बाद किताबें भी भेजी थीं. दोनों पत्रों के बीच वाले समय में एक पत्र मैंने तुम्हें और लिखा था, जब मैंने प्रचार-विभाग छोड़कर कॉलेज में प्रवेश किया था. वह पत्र लौट आया और अब भी कहीं पड़ा है.

बिहार की राजनीति को तुम भी जानते हो और मैं भी जानता हूं. फर्क यह है कि अमेरिका में रहकर तुम उससे सर्वथा तटस्थ हो और मैं यहां तटस्थ रहकर भी तटस्थ होने का सुयश नहीं पा सकता. तभी तो तुमने यह मान लिया है कि तुम्हारे और मेरे बीच बिहार की राजनीति की दीवार खड़ी है. कौन है वह मनुष्य जो मुझे तुमसे मिलने नहीं देता, तुम्हें पत्र नहीं लिखने देता, तुम्हें किताबें नहीं भेजने देता? बता सकते हो? कोई हो, तब तो बताओ और इतना भयंकर कोलाहल  भी व्यर्थ है. ज़रूरत होने पर किताबों के लिए तुम सीधे मुझी को क्यों नहीं लिखते? विश्वास रखो कि तुम्हारे किसी पत्र का उत्तर मेरे यहां बाकी नहीं है. पत्र सीधे लिखोगे, उतर सीधे जाएगा. पत्र दूसरों को लिखोगे तो उत्तर संदिग्ध होगा ही.

पिछली बार तुम्हें कौन-सी पुस्तकें भेजी थीं, ठीक याद नहीं है. ‘रश्मिरथी’ की प्रति अवश्य थी. पता लगाकर बाकी पुस्तकें भी भिजवा रहा हूं. अब तो मुज़प़मफरपुर से उठकर पटना चला आया हूं और मेरा जो स्थायी पता है वह ऊपर लिखा है. वैसे 20 अगस्त से लगभग 15 सितम्बर तक दिल्ली रहूंगा. पता होगा- ‘200, कॉन्स्टीट्यूशन हाउस, नयी दिल्ली’. पुस्तकों का बंडल दिल्ली लेता जाऊंगा. वहीं ऑफिस को दे दूंगा.

अब कुछ मेरी भी कथा सुनो. इस साल अगहन से लेकर आषाढ़ तक दो भतीजियों की शादी की झंझट में रहा. पहले वर खोजने में, पीछे ब्याह की तैयारी में. नौकरी छोड़कर संसद में आया, आमदनी जाती रही. इस बीच गंगाजी ने भी कृपा की और 15 बीघे ज़मीन कट गयी. यह ज़मीन सबसे अच्छी थी. अब तीनों भाइयों के बीच पच्चीस बीघे रहे होंगे. छोटे साहब की स्त्राr ने इतना कुहराम मचाया कि तीन साल पहले मेरी अनुपस्थिति में ही घर पर बंटवारा हो गया और मज़ा यह कि दोनों भाइयों ने एक-एक बेटा पढ़ाने के लिए मेरे मत्थे फेंक दिया और बेटियों के ब्याह भी. ब्याह में छोटे भाई ने कुछ रुपये दिये. तेरह-चौदह हज़ार का प्रबंध मुझे करना पड़ा. ज़िंदगी में पहले-पहल कर्जदार होना पड़ा है, कर्ज पाप है और उससे प्रतिभा कुंठित हो जाती है.

संसद जाने से मेरी मुसीबतें बढ़ी हैं, इसका ज्ञान मुझे ही है. तब भी यह ठीक है कि आर्थिक संकटों का अनुमान मुझे पहले से ही था और ये संकट उतने ही हैं जितने कि नौकरी छोड़ने के पूर्व अनुमानतः दिखलाई पड़े थे मगर कुछ और संकट भी हैं, जिनका कभी भी अनुमान नहीं था और वह यह कि लोग समझते हैं कि मैं मंत्री बनने को ही नौकरी छोड़कर दिल्ली आया हूं, और इस प्रवाद को फैलाने में सर्वाधिक हाथ पितृवत्पूज्य, परम श्रद्धेय राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरणजी को है. वे संसद में आ गये, यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार था, मैं गरीब क्यों आया, इसका उन्हें क्रोध है. सच कहता हूं, जन्म भर गुप्तजी पर श्रद्धा सच्चे मन से करता रहा हूं, हृदय को चीरकर देखता हूं तब भी यह दिखलाई नहीं पड़ता कि उनका मैंने रंचभर भी अहित किया हो. स्तुति में लेख लिखा, विद्वानों के बीच उनकी ओर से लड़ा, एक कांड को लेकर ब्रजशंकर जैसे निश्छल मित्र से रुष्टता मोल ली, यूनिवर्सिटी में उनकी किताबें कोर्स में लगवाता रहा, अभी-अभी एक किताब कोर्स में लगवा दी, दिल्ली में भी कम सेवा नहीं की है, मगर फिर भी यह देवता कुपित है और इतना कुपित है कि छिप-छिपकर वह मुझे सभी भले आदमियों की आंख से गिरा रहा है. मेरे एक पत्रकार मित्र का यह कहना है कि प्रबंध-काव्य लिखकर तुम गुप्तजी के मित्र नहीं रह सकते क्योंकि इससे उनके व्यापार पर धक्का आता है. अस्तु!

बेनीपुरी भी नाराज थे क्योंकि वे खेत चरना चाहते थे और मुझसे यह उम्मीद करते थे कि मैं लाठी लेकर बाड़ पर घूमता रहूं जिससे कोई खेतवाला भैंस को खेत से बाहर नहीं करे? और भी दो-एक मित्र अकारण रुष्ट हैं और यहां की विद्वान मंडली तो पहले जाति पूछती है. सबसे दूर, सबसे अलग, आजकल सिमटकर अपने घर में घुस गया हूं. बिहार नष्ट हो गया, इसका सांस्कृतिक जीवन भी अब विषाक्त है, अब तुम जाति की सुविधा के बिना यहां न तो कहीं कोई दोस्त पा सकते हो, न प्रेमी, प्रशंसक और मददगार. जय हो, यहां की राजनीति की! और सुधार कौन करे? जो खड़ा होगा उस पर एक अलग किस्म की बौछार होगी. मेरा पक्का विश्वास है कि बुद्ध यहां नहीं आये थे, महावीर का जन्म यहां नहीं हुआ था. यह सारा इतिहास गलत है. साहित्य का क्षेत्र यहां बिल्कुल गंदा हो गया है. ‘पंडित सोइ जो गाल बजावा’ भी नहीं, यहां का साहित्यकार अब वह है जो ‘टैक्स्ट-बुक’ लिखता है. बेनीपुरी रुपये कमाते-कमाते भी थक गया, आजकल मूर्च्छा से पीड़ित रहता है. चारों ओर का वातावरण देखकर मैं भयभीत हो गया हूं. चारों ओर रेगिस्तान है, चारों ओर ‘कैक्टस लैंड’ का प्रसार है. अब फिर घर का हाल सुनो. रामसेवक इस वर्ष एम.ए. देनेवाले थे मगर ऐन परीक्षा के दिन ‘नर्वस’ होकर बीमार हो गये. उनमें पराक्रम अब तक नहीं जगा.

श्रीमती आधी जान की हो रही हैं और जो पतोहू आयी है उससे काम नहीं लेकर खुद मरी जा रही हैं. लाख सुधारना चाहा मगर घर की हालत सुधरती नहीं. भगवान अब मुझे उठा ले तो अच्छा है. कष्ट, अर्थाभाव का भी है और हर एक के मिजाज के कड़ा होने का भी. लोग विनाश की ढलान पर खड़े हैं. जो रास्ता है उस पर कोई चलना नहीं चाहता. मेरी हड्डी-पसली चबाकर खा जाना चाहता है और ऐसी अवस्था में मैंने नौकरी छोड़ने की गलती की. गलती की तो क्या करें? नौकरी तो प्रचार विभाग में ही छोड़ दी थी. जब सरकार ने शिक्षा-विभाग का ऑफर भेजा, दोस्तों ने सलाह दी, ‘देखो, इसमें शायद, जी लग जाए’ लेकिन कॉलेज में तबीयत लगकर भी नहीं लगी. वहां भी जातिवादियों का जाल था, वहां भी अपमानजनक बातें सुनने में आयी, वहां भी ईर्ष्या-द्वेष और मलिनता का सामना करना पड़ा. साथ ही. यह भी भासित होता रहा कि कविता की सबसे अच्छी कब्र कॉलेज ही है. कविता को बचाने के लिए वहां से भागने को तो पहले ही तैयार था. जब कांग्रेस का ऑफर आया, मैं नौकरी छोड़कर ‘संसद’ में आ गया. अब ‘मैथिलीशरण’ और ‘अर्थाभाव’, ये दो संकट झेल रहा हूं और बाहर तो लोग अब भी काफी अमीर समझते हैं. खुद घरवाले सोचते हैं कि अभी इस बिल में और नहीं तो पच्चीस-पचास हजार तो ज़रूर होंगे.

साहित्य के नाम पर तो इधर कुछ लिखा नहीं. गद्य में एक पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति’ पर चल रही है. शेष कुशल है.

दिनकर

 (जनवरी 2016)

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