थोड़ा लिखा बहुत समझना

बाबू राजेंद्र प्रसाद ने जून 1928 में लंदन प्रवास के दौरान अपनी पत्नी को पत्र लिखकर वह रास्ता सुझाया जिससे वे अपना जीवन सार्थक कर सकें.

 

(धर्मपत्नी श्रीमती राजवंशी देवी उर्फ़ ‘नन्हकू की मां’ को यह पत्र भोजपुरी में लिखा गया था)

 

नन्हकू की मां,

पत्र आया, समाचार मिला. वहां आश्रम में खाने में कोई दोष नहीं है. अपने मन से इस अभिमान को निकाल देना चाहिए कि हम शुद्ध हैं और दूसरे लोग अशुद्ध हैं. नन्हकू की यहां आने की बहुत इच्छा है. उनसे वहां इस विषय में राय-बात कर लेनी चाहिए. मैं शायद क्वार तक वापस आऊंगा. यहां सब अच्छा है, तबीयत ठीक है, चिंता की बात नहीं है.

मेरी यह इच्छा है कि नन्हकू के चले जाने के बाद भी कुछ दिनों के लिए तुम लोग अकेले वहां रहो, जिससे अकेले रहने और स्वयं पर भरोसा करने की योग्यता आ जाये. यहां मैं देखता हूं कि महिलाएं बहुत काम करती हैं. बड़े-बड़े ऑ]िफस हैं, जिनका सारा प्रबंध महिलाएं करती हैं. घर का भी सारा प्रबंध महिलाएं ही करती हैं. हमारे यहां भी ऐसा होना चाहिए. घर में बंद रहकर काम करने से शक्ति क्षीण हो जाती है. कोई काम हो, कहीं अकेले जाना हो, हमारी महिलाएं नहीं कर सकतीं. इन सबको दूर करके, स्वावलंबी होना चाहिए. आश्रम में यह पाठ सीखकर वापस घर जाना होगा, क्योंकि मैं लिख चुका हूं कि मेरी इच्छा है कि वापस जाकर देश-सेवा का कार्य करो. वहां का और समाचार लिखना. प्रभावती और दुलहिन को मेरा आशीर्वाद. उन लोगों को भी यह पत्र दिखा देना, उन्हें भी यही कार्य करना चाहिए.

इति शुभ

राजेंद्र

(दुलहिन यानी पुत्रवधू और प्रभावती यानी लोकनायक जयप्रकाश नारायण की धर्मपत्नी जो विद्यावती की छोटी बहन थीं)

(पुत्र श्री मृत्युंजय प्रसाद उर्फ़ नन्हकू को जून 1928 में लिखा गया पत्र)

म़ार्फत थॉमस कुक ऐंड सन,
बर्कले स्ट्रीट, पिकाडिली, लंदन डब्ल्यू, 1

चि. नन्हकू,
आशीर्वाद

तुम्हारा पत्र मिला. जर्मन पुस्तकों के लिए मैं कल ऑर्डर देने गया था. पर वह दुकान वहां से उठकर कहीं चली गयी है. आज फिर तलाश करूंगा. यदि इस मेल से पुस्तकें नहीं गयीं तो अगले मेल से ज़रूर जायेंगी.

मेरी तबीयत कुछ खराब हो गयी थी. अब बिल्कुल सही हूं. अब काम भी कर रहा हूं और बाहर आता-जाता भी हूं. यहां की कुछ ऐसी कै]िफयत है कि कभी धूप, कभी बदली, कभी गरमी, कभी सरदी, कभी पानी, कभी ओले- यह सब बहुत पड़ता रहता है, जिससे बहुत बचकर रहना होता है. उधर खूब सरदी थी- उसके बाद खूब गरमी थी- जैसी गरमी अपने यहां चैत के अंत में रहती है. फिर आज से हवा ज़ोर से चल रही है और बदली है. दिन भी कुछ ठंडा है. मैं ऑटोवैक्सीन का इंजेक्शन ले रहा हूं. देखूं, इसका क्या फल होता है.

मुझे यह पसंद है कि तुम्हारी गैरहाज़िरी में भी तुम्हारी मां, दुलहिन और प्रभावती आश्रम में रहें. मैं चाहता हूं कि वे सभी कुछ स्वावलम्बी हो जाएं और कुछ लोक-सेवा की शक्ति और योग्यता प्राप्त कर लेवें. इसके लिए चरखे का सभी काम और यदि हो सके तो कुछ सुश्रूषा (नर्सिंग) का काम सीख लें- तो बहुत अच्छा होगा. कुछ अक्षर-ज्ञान भी अधिक हो जाये तो बहुत सुंदर. यदि एक साल वहां रह जायें और यह समझकर रह जायें कि यह सब उनको सीखना है तो बहुत उन्नति कर सकेंगी इसलिए पूज्य बापू का यह विचार मुझे पसंद है. मैंने इसके पहले कई पत्रों में लिखा है कि बिहार में परदा छोड़ने के आंदोलन में तुम्हारी मां को शरीक होना चाहिए. यदि उसका काम अभी आरम्भ होता हो तो उसमें उनको ज़रूर जाना चाहिए पर साथ ही वहां जाकर वे कुछ कर सकें, इसका निश्चय कर लेना. ऐसा न हो कि आश्रम से भी गयीं और उस काम में भी न लगकर घर पर गयीं और फिर पुरानी नीति-रीति बरतने लगीं, तो इससे कोई फल नहीं होगा.

मैंने जर्मनी की आयी हुई करिक्यूलम आदि की पुस्तकें भेज दी हैं. यदि अक्टूबर के सेशन में शुरू करना है तो सितंबर से पहले आना चाहिए. मैं शायद सितंबर में यहां से वापस जाऊं. अभी निश्चित नहीं है, पर आशा है.

राजेंद्र

 (जनवरी 2016)

 

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