‘तेंदुआ गुर्राता है, तुम मशाल जलाओ’

♦   अच्युतानंद मिश्र   >

भारतीय तत्त्व चिंतन में भाषा, संस्कृति और धर्म को हमारी अस्मिता के अनिवार्य और अविभाज्य अंग के रूप में स्वीकार किया गया है. भाषा से संस्कृति और संस्कृति से राष्ट्र की पहचान होती है. मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में भाषा सभ्यताओं का निर्माण और संस्कृतियों को प्रवहमान बनाती है. जिस तरह भाषा शब्दों, अर्थों, वाक्यों, ध्वनियों की सम्प्रेषण क्षमता और व्याकरण के अनुशासन से ऊपर उठकर प्रकृति के रहस्यों को उद्घाटित कर मनुष्य और प्रकृति को जोड़ती है, उसी तरह संस्कृति भी एक ऐसी शक्तिशाली और समावेशी अभिव्यक्ति है जो मनुष्य की सभी सर्जनात्मक क्षमताओं को हृदय से जोड़ती है. वह हमारी कल्पनाओं और वास्तविकताओं, मूल्यों, अनुभूतियों और अभिव्यक्ति के सभी रूपों को न केवल आत्मसात करती है, बल्कि उसके प्रकटीकरण के सभी माध्यमों को आत्मनिर्भरता भी प्रदान करती है. साहित्य, संगीत, शिक्षा और समस्त रूपंकर कलाओं को एक अंतरानुशासन से बांधती हैं. मानव जीवन को यांत्रिकता से बचाकर एक उद्देश्य की ओर प्रेरित करती है. समाज, देश और मानवता के लिए जीने का अर्थ देती है. एक खिला हुआ सुंदर फूल, किसी मधुर कंठ से निकली एक रागिनी, कविता की एक पंक्ति में उभरा कोई बिम्ब या किसी चित्र और मूर्ति की मुस्कराहट देखकर जब मनुष्य मुग्ध हो जाता है, तन्मय होकर उसमें डूब जाता है, शायद उसी क्षण उसके सर्जक को सार्थकता मिल जाती है. उसका प्रभामंडल और प्रभावमंडल विस्तृत हो जाता है. उसका रचना संसार अचानक संवेदनाओं को मुखरित करने लगता है. एक प्रेम गीत रचने वाला कवि और व्यवस्था के विरुद्ध क्रांति को स्वर देने वाला कवि दर्द और संवेदना के एक ही धरातल पर होते हैं. माखनलाल चतुर्वेदी की एक अमर कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ पढ़कर अज्ञेय जी को जो प्रेरणा मिली थी, उसी प्रेरक शक्ति ने भगत सिंह और उनके अनगिनत साथियों को फांसी के फंदें पर झूल जाने वाला देश प्रेम भी अदा किया था. महात्मा गांधी के आह्वान पर शराब की दुकानों के सामने धरना देने वाली हज़ारों ग्रामीण महिलाओं अथवा चिपको आंदोलन के दौर में उत्तराखंड के पेड़ों से लिपट कर वन रक्षा करने वाली त्रियों को सरकार तथा जंगल माफियाओं के विरुद्ध तन कर खड़े होने का नैतिक साहस कहां से मिला था?

भारतीय समाज में प्रकृति के वैविध्य के अनुरूप ही साहित्य, संस्कृति और शिक्षा की तरह दर्शन, धर्म, कला और शिल्प की परम्पराओं में भी भरपूर विविधताएं मौजूद हैं. यही हमारी संस्कृति को हर चुनौती का सामना करने की आंतरिक शक्ति प्रदान करती है. विदेशी सभ्यताओं, संस्कृतियों और भाषाओं के हर हमले का कठोर प्रतिरोध अब तक इसी शक्ति ने किया है. जिन अंचलों में छोटे-छोटे राजनीतिक प्रतिरोध आपसी फूट और निजी महत्त्वाकांक्षाओं के कारण असफल होते रहे हैं, इन अंचलों ने भी विदेशी संस्कृति के वर्चस्व को नकार दिया था. ब्रिटिश सत्ता ने बड़ी चतुराई से इन मतभेदों का अध्ययन किया था. इसीलिए शिक्षा और संस्कृति के हमारे पारम्परिक केंद्रों की उपेक्षा करते हुए उन्होंने यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान, भाषा और संस्कृति के नये केंद्र विकसित किये थे. पुणे, ढाका, कांचीपुरम और काशी की जगह मद्रास, मुम्बई, कोल-कता और इलाहाबाद आधुनिक उद्योग, विज्ञान, शिक्षा, न्याय और प्रशासन के नये केंद्र के रूप में स्थापित किये गये.

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से बीसवीं शताब्दी के मध्य तक स्वाधीनता आंदोलन की प्रखर चेतना से आप्लावित हिंदी भाषी समाज को विदेशी प्रशासन तंत्र ने न केवल भौतिक विकास की दौड़ से काट दिया, बल्कि अकल्पनीय अत्याचारों का निशाना भी बनाया था. स्वाधीनता संग्राम के सभी अग्रणी नेता इस तथ्य को अच्छी तरह जानते थे. स्वामी दयानंद और स्वामी विवेकानंद भारतीय संस्कृति को जिस खतरे से आगाह कर रहे थे, वही चेतावनी लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ ठाकुर और अरविंद के सांस्कृतिक आंदोलनों में भी थी. 1905 में बंगाल के विभाजन का षड़यंत्र सफल होने के बाद भी ब्रिटिश सत्ता को झुकाकर उसी बंगाल को पुनः अखंड कर देने की शक्ति ‘वंदे मातरम’ गीत से उत्पन्न सांस्कृतिक चेतना के कारण ही हुई थी. सफल या विफल उस दौर के सभी राजनीतिक आंदोलनों के पीछे यही चेतना नैतिक शक्ति के रूप में थी. रोटी और कमल जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों ने 1857 में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्रथम विद्रोह को संगठित किया था. वही प्रेरणा बैसाखी, गणेशोत्सव, पोंगल, दुर्गापूजा, सरस्वती पूजन से होती हुई, महात्मा गांधी के स्वदेशी, चरखा आंदोलन और स्वामी सहजानंद के किसान आंदोलन तक पहुंची थी. सभी छोटे-बड़े राजनीतिक अभियानों के पीछे नैतिक शक्ति के रूप में सांस्कृतिक अनुष्ठान ही रहे हैं.

स्वाधीनता संग्राम के दौर के अधिकतर धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक नेताओं को यह भी पता था कि यूरोपीय विद्वानों का भारतीय समाज, शिक्षा, संस्कृति, भाषा, धर्म और इतिहास की कथित वैज्ञानिक खोजों और नयी व्याख्याओं के पीछे का अंतर्निहित उद्देश्य क्या था. मैकाले, मार्क्स, मैक्समूलर और जॉर्ज ग्रियर्सन की स्थापनाओं तथा आर्यों को विदेशी आक्रमणकारी और ‘भारोपीय’ भाषा परिवार जैसी निष्पत्तियों का सत्य क्या है? उस दौर के कितने और किस श्रेणी के भारतीय विद्वानों ने इन स्थापनाओं को विरासत के रूप में भारत की नयी पीढ़ी को सौंपा था. इसी दुरभिसंधि के तहत स्वाधीन भारत को एक नया देश, भारतवर्ष को इंडिया और इंग्लिश को विश्व के नये वैज्ञानिक, औद्योगिक और सांस्कृतिक ज्ञान-विज्ञान की खिड़की के रूप में प्रतिष्ठित किया गया था. संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और उसके पुरस्कर्ता माने जाने वाले डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर की पीड़ा क्या थी? क्यों उन्हें 1935 में अंग्रेज़ों के बनाये ‘इंडिया एक्ट’ की धाराओं को स्वीकार करना पड़ा? अध्यक्ष के रूप में संविधान सभा के सामने अपने अंतिम सम्बोधन में   स्वाधीन भारत का संविधान एक विदेशी भाषा में लिखे जाने के लिए जिस दर्द और अपराध-बोध का भाव डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने अभिव्यक्त किया था, वह न जाने कब का लुप्त हो चुका है. जिस अंग्रेज़ी सभ्यता और भाषा को बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में ही महात्मा गांधी ने शैतानी और केवल देह-सुख ढूंढ़ने वाली सभ्यता घोषित किया था, वही 21 वीं शताब्दी के पहले दशक में भारत की आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक विमर्श में आधुनिकता और आदर्श के रूप में प्रस्थापित हो गयी है. जिस हिंदी को स्वाधीनता संग्राम के संघर्ष और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में न केवल महात्मा गांधी, बल्कि उनके पूर्व और पश्चात के भी सैकड़ों अहिंदी भाषी विद्वानों  ने स्वीकार किया था, जिसके लिए ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ जैसी अनेक संस्थाओं से जुड़े हिंदी सेवकों की फौज ने जेल यात्राएं की थीं, उसे राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार करने से तो संविधान सभा ने ही इनकार कर दिया था. लेकिन सम्पर्क भाषा के रूप में जो कुछ संविधान की पोथी में मौजूद है, उसे जितना तिरस्कृत हमारी राजनीति, शिक्षा, प्रशासन न्याय व्यवस्था तथा संस्कृति के विद्वानों ने किया है, उसके हम सभी साक्षी भी हैं और भुक्तभोगी भी. इसे सांस्कृतिक अवमूल्य और मानसिक गुलामी के अतिरिक्त और कौन-सी संज्ञा दी जा सकती है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के विद्वान बुद्धिजीवियों के परिवारों में ही मातृभाषाएं तिरस्कृत और बहिष्कृत हो रही हैं.

इस पर विचार करना होगा कि अगर भाषा और संस्कृति के राष्ट्रीय क्षरण के बीच भी तमिल, मलयालम, मराठी, बांग्ला, गुजराती या पंजाबी भाषा-भाषी समाज के बुद्धिजीवी देश और पूरी दुनिया में घूमते हुए भी अपने सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक पर्वों और मातृभाषाओं के साथ गर्व से जुड़े हुए हैं, तो यह चेतना हिंदी भाषी और समाज के बौद्धिकों में उसी भाव के साथ क्यों दिखाई नहीं देती है? बांग्ला भाषा और संस्कृति को धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर विभाजित करने की अंग्रेज़ी सत्ता की जिस साजिश को 1907 के बंगाल ने विफल कर दिया था, उसी बांग्ला भाषा ने 1971 में एक बार फिर मुस्लिम लीग और पाकिस्तान के षड़यंत्र को ध्वस्त करते हुए स्वतंत्र बांग्लादेश का निर्माण कर लिया. तमिल भाषायों ने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जो संघर्ष और बलिदान श्रीलंका में दिया है, उसके प्रति तमिलनाडु ही नहीं, पूरी दुनिया में बसे तमिलों में गर्व का भाव है. इतिहास ने इसे बार-बार प्रमाणित किया है कि हमारी संस्कृति, हमारी आस्था अथवा हमारी मातृभाषा का सत्य हमारी आत्मा का सत्य होता है. राष्ट्रीय जीवन को वह सुसंस्कृत ही नहीं, समृद्ध भी करता है. हमारे मनीषियों, चिंतकों और साधकों के शब्द चाहे जिस भाषा में व्यक्त हुए हों, लेकिन हमारी जातीय चेतना, संस्कार, शिक्षा धर्म, साहित्य और राजनीति को जादू की तरह प्रभावित करते रहे हैं.

रामायण और महाभारत युद्धों के महाकाव्य हैं, लेकिन आज भी वे हमारे जीवन के महाकाव्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं. किसी भाषा और संस्कृति के सामर्थ्य का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि रामचरित मानस ने अक्षर ज्ञान से रहित लाखों लोगों के जीवन में राम को आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया है. रामायण मेला के संस्थापक डॉक्टर राममनोहर लोहिया, जो शायद स्वाधीन भारत के पहले सांस्कृतिक राजनेता थे, स्वयं को नास्तिक घोषित करते हुए भी यह मानते थे कि भाषा, भूषा, भोजन, भजन और भवन की विविधताओं ने क्षेत्र और काल के हस्तक्षेप के बावजूद भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया है. इस एकता की पृष्ठभूमि में लोक भाषाओं, लोक संगीत और लोग संस्कृति की भूमिका निर्विवाद रही है. अपनी लोक भाषाओं, परम्पराओं, संस्कृति और पुरुषार्थ के बल पर जिस समाज ने मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम जैसे अनेक देशों में राजनीतिक वर्चस्व तक कायम किया है, उसी समाज की स्वदेश में सांस्कृतिक चेतना क्यों धूमिल पड़ती जा रही है? 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से 1942 के ‘भारत छोड़ो’ तक संघर्षों, बलिदानों की अटूट शृंखला शायद इसी समाज में सबसे अधिक रही है.

1975 में आपातकाल के दौरान दोनों परिदृश्य दिखाई दे रहे थे. जहां पूरा हिंदी समाज एक तानाशाही तंत्र के विरुद्ध संघर्ष कर रहा था, वहीं मुट्ठी भर कथित बुद्धिजीवी, सत्ता के सामने गुलामों की तरह बिकाऊ और आत्मसमर्पण की मुद्रा में खड़े थे. 1977 में जहां इस अंचल की आम जनता ने पंजाब से बंगाल तक की राजसत्ता को ध्वस्त कर दिया, वहीं बुद्धिजीवियों के बड़े वर्ग की मनोवृत्ति में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं हुआ. अत्यंत पीड़ा के साथ मैं यह कहना चाहता हूं कि आज का बुद्धिजीवी अपने इतिहास और समय, अपनी संस्कृति और भाषा के सबसे सुंदर और पवित्र शब्दों, जैसे, अस्मिता, संस्कृति, लोकतंत्र, जीवन-मूल्य, संसद, विमर्श को दोहराते हुए भी खोखले हो गये हैं. क्योंकि कथनी और करनी के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है, शब्दों के पीछे संकल्प और कर्म की शक्ति नहीं रह गयी है. हम गुलाम बनाने वाली अर्थनीति, भाषानीति या राजनीति की बदनीयती और कुरूपता का प्रतिरोध करने वाले विचारों  से भी घबराने लगे हैं. सशक्त विचारों से भयभीत बुद्धिजीवी जब किसी विचारधारा का नकली आवरण ओढ़ लेता है तो समाज के लिए अधिक खतरनाक हो जाता है. हम अपने वास्तविक सांस्कृतिक परिवेश से कटते जा रहे हैं. अगर हमें यह लगता है कि हिंदी समाज का परिदृश्य अन्य भाषाओं की अपेक्षा अधिक भयावह हो रहा है, तो इसके लिए हमें अपनी जड़ों की ओर ही लौटना पड़ेगा. स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक पंक्ति आज मुझे बिल्कुल मौजूं लग रही है–

तेन्दुआ गुर्राता है, तुम मशाल जलाओ.
क्योंकि तेन्दुआ गुर्रा सकता है, मशाल नहीं जला सकता.

(फ़रवरी, 2014)

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