तिब्बत में हमारे खोजियों के पराक्रम

♦  नरगिस दलाल     

      ‘किसी भी मुगल, हिंदुस्तानी, पठान या फिरंगी को तिब्बत में न आने दिया जाये’ -चीनी सम्राट की आज्ञा थी. सजा थी- मौत.

    सन 1861 से 1864 के बीच कश्मीर से और लद्दाख के ऊंचे पर्वतों से बाकायदा सर्वेक्षण किये गये थे. मगर ब्रिटिश भारत की सीमा के पार चीनी और तिब्बती सीमा रक्षकों का सख्त पहरा था और अंग्रेज सर्वेक्षणकर्ता उसे नहीं लांघ सकते थे.

    तब अंग्रेजों ने युक्ति सोची कि सीमावर्ती क्षेत्र के चतुर आदमियों को छद्म व्यापारियों और तीर्थ यात्रियों के रूप में तिब्बत, मंगोलिया, नेपाल और हिमालय प्रदेशों में भेजा जाये. ऐसे लोगों को जो ट्रेनिंग दी जाती थी, वह अत्यल्पकालीन और आरंभिक किस्म की होती. फिर भी इन्होंने बहुत मूल्यवान और रोचक जानकारी लाकर दी.

    सेक्सेटेंट और कंपास के उपयोग करना और तारों को पहचानना व पानी उबालने के द्वारा पहाड़ी स्थानों की ऊंचाई का हिसाब लगाना सीखे हुए ये आरंभिक खोजी जिस उत्साह और बेफिक्री से इन लम्बी और खतरों-भरी यात्राओं पर निकल पड़ते थे, वह अचरज की चीज है.

    उस समय तिब्बत और मध्य एशिया के जो नक्शे उपलब्ध थे, वे आरंभिक यात्रियों के किस्सों और इने-गिने चीनी मानचित्रों पर आधारित थे. भारत की तरफ से तो हिमालय की चोटियों का स्थान, ऊंचाई आदि बिलकुल ठीक जाने जा चुके थे, मगर उनके पार विशाल अज्ञात प्रदेश था, जिसके नक्शे लगभग खाली थे.

    सीमा पार का विशाल क्षेत्र बाकी दुनिया से कारवानों के जरिये जुड़ा हुआ था. ये कारवान साल-भर या उससे भी ज्यादा समय के अंतर से सीमावर्ती दूर-दराज के कस्बों में प्रकट हुआ करते. सभ्यता की मुख्य धारा से कटी हुई, उस पार की दुनिया महज एक सुनी-सुनायी चीज थी, खतरे और चुप्पी से भरपूर.

    महान त्सांग-पो नदी का मार्ग और ल्हासा की भौगोलिक स्थिति दोनों अटकल के विषय थे. समूचा प्रदेश रहस्य और रूमानियत में आवृत था.

    सन 1963 में पहले खोजी भरती किये गये. ये थे पंडित नैनसिंह और उनका भाई. ऊपरी कुमाऊं के जोहर भोट इलाके के सीमा क्षेत्र के पहाड़ी थे ये. पंडित नैनसिंह जो ‘पंडित’ नाम से मशहूर हुए, अपने गांव के सरकारी स्कूल के हेड मास्टर थे. वे श्लाजेंटवेट-बंधुओं के साथ काम कर चुके थे और इस काम के लिए अत्यंत उपयुक्त थे.

    उनका अपना गांव 14,000 फुट की ऊंचाई पर हिमनदों के बीच बसा हुआ था और केवल गर्मियों में लोग वहां रहते थे. वह तिब्बती व्यापार की बड़ी मंडी थी और नैनसिंह का तिब्बतियों से सदा सम्पर्क रहता था और वे उनकी भाषा और रस्मों-रिवाजों से परिचित थे.

    उन्हें 1865 में देहरादून से रवाना किया गया. उद्देश्य था- गारतोक से ल्हासा की सड़क का सर्वेक्षण करना, पवित्र मान सरोवर के समीप त्सांग-पो उद्गम से लेकर उस नदी का प्रवाह-मार्ग देखना और ल्हासा की भौगोलिक स्थिति निर्धारित करना.

    पंडित ने अपने साथ सेक्स्टेंट, प्रिज्माकार और जेवी कंपास, तापमापक और अक्षांश-देशांतर-मापक जेब घड़ी व सादी घड़ी लेकर प्रस्थान किया बशहरी व्यापारी का भेस बनाकर. उन्होंने 1,200 मील मार्ग का सर्वेंक्षण किया, उद्गम से लेकर ल्हासा नदी के संगम तक, त्सांग-पो का मार्ग नक्शे पर अंकित किया और 31 स्थानों की भौगोलिक स्थिति तथा 33 स्थलों की ऊंचाई निर्धारित की.

    धर्मप्राण तिब्बतियों की तरह पंडित नैनसिंह सदा जपमाला और प्रार्थना-चक्र साथ रखते. प्रार्थना-चक्र एक दस्ती में खोंसा हुआ खोखला बेलनाकार डब्बा होता है. इसे एक बार घुमाना एक बार ‘ओंमणिपद्मेहुं’ मंत्र को जपने के बराबर होता है. पंडित जो भी नक्शे आदि बनाते, इसमें ठूंस लेते. चुंगी-अफसर प्रार्थना-चक्र की कभी तलाशी नहीं लेते थे और प्रार्थना-चक्र घुमाते समय कोई टोकता भी नहीं था. इस तरह वे अपने कदम निरंतर गिनते रहते और अपने दस्तावेज भी सुरक्षित रखते.

    पंडित की जपमाला में 108 के बजाय 100 ही मनके थे. प्रत्येक दसवां मनका बाकी से काफी बड़ा था. पंडित हर सौ कदम पर एक मनका गिराते और प्रत्येक बड़ा मनका 1,000 कदमों का सूचक होता. इस तरह बड़ी शुद्ध नाप होती दूरियों की. उन्होंने यात्रा-डायरी भी रखी, जिसमें वे वहां की भूमि और निवासियों का विविरण लिखा करते थे.

    उन्होंने लिखा है कि ट्राशिन-इहुन-पो मठ में उन्होंने सोने, चांदी और रत्नों से मढ़ी हुई मूर्तियां देखी. वहां के बड़े लामा सारे तिब्बत में दैवीय अवतार माने जाते थे. कहा जाता था कि वे दूसरे के मन के विचारों को जान लेते हैं. पंडित नैनसिंह को इससे चिंता हुई कि कहीं विनोद के साथ लिखा है कि यह भय व्यर्थ सिद्ध हुआ. 11 वर्षीय रूपवान बालक बड़े लामा ने तीन रस्मी सवाल पूछे- ‘आपके राजा सकुशल हैं? आपका देश खुशहाल है? आप स्वस्थ हैं?’ और फिर आशीर्वाद दे दिया.

    पंडित नैनसिंह की पहली यात्रा की सफलता ने सारी दुनिया के भूगोलज्ञों का ध्यान आकृष्ट किया और इस प्रकार हमारी उत्तर सीमा से परे के अज्ञात इलाकों की छान-बीन का दौर शुरू हुआ. ब्रिटेन की रायल ज्योग्राफिकल सोसायटी ने सम्मान के प्रतीक के रूप में उन्हें सोने की एक घड़ी भेंट की.

    इसके बाद पंडित नैनसिंह हिमालय के आर-पार के प्रदेश की जांच में लगे. अंग्रेज़ों ने तिब्बत की सोने की खानों के बारे में सुना था और वे ज्यादा जानकारी प्राप्त करना चाहते थे.

    पंडित नैनसिंह 11 आदमी, 12 गधे और एक खच्चर लेकर मसूरी से चले और बदरीनाथ पहुंचे. मगर उन्होंने पाया कि दर्रा बंद पड़ा है. अंत में उन्होंने 18,570 फुट ऊंचे दर्रे से हिमालय को पार किया और एक अद्भुत झूला-पुल से सतलज नदी को पार करके तोतलिंग पहुंचे. पुल सिकंदर का बनवाया हुआ बताया जाता था और उसकी लोहे की जंजीर को मारेचे से मुक्त रखने के लिए उस पर खूब मक्खन मला जाता था.

    यह टोली गारतोक के पूर्व में पहाड़ों पर चढ़ी और 19,500 फुट ऊंचे दर्रे गियुग्ती को पार करके एक वीरान पठार में पहुंची, जिसका नाम ‘हिरन मैदान’ रखा गया था. बर्फ गिर रही थी अक्मुख्य खदान थोक जुलुंग पहुंचने में टोली को बहुत समय लगा.

    नैनसिंह लोगों को पटाने में बहुत कुशल थे. शीघ्र थोक-जलुंग के सरदार से उनकी अंतरंग मैत्री हो गयी. सरदार उन्हें अक्सर बुलवा भेजता और चाय और तम्बाकू के दौर के बीच पहाड़ों के इस पार के बारे में दोनों में बातचीत हुआ करती.

    पंडित नैनसिंह ने दोने की खानों का बारीकी से निरीक्षण किया और इसका ब्योरा लिखा कि वहां खुदाई किस ढंग से होती है. सोने का भाव 30 रुपया तोला से जरा कम था.

    सन 1874 में नैनसिंह अपनी आखिरी यात्रा पर निकले, जो उनकी सबसे प्रसिद्ध यात्रा भी रही. अब तक बे बहुत प्रसिद्ध हो गये थे और अपनी असलियत छिपाये रखना उनके लिए जरा कठिन था. फिर भी तिब्बती लामा का भेस बनाकर वे लद्दाख से प्रसिद्ध उत्तरी पथ से ल्हासा तक चले गये.

    इस यात्रा में उन्होंने अनेक झीलों और कई नदियों का पता लगाया. त्सांग-पो (ब्रह्मपुत्र) के उत्तर में उसके समानांतर स्थित विशाल पर्वत-शृंखला का पता महान नदी के साथ-साथ यात्रा करके उसके मार्ग का पता लगाया. अब केवल तीस मील जितनी दूरी अज्ञात रह गयी.

    मगर जैसे नैनसिंह की सारी शक्ति इस यात्रा में निचुड़ गयी. उनका स्वास्थय एकदम गिर गया, वे अपने नेत्रों की ज्योति भी गंवा बैठे. उन्हें पेंशन देकर सेवा से निवृत्त होने की छुट्टी दी गयी. यूरोप की प्रमुख भूगोल परिषदों ने उन्हें पदकों और प्रशस्तियों से लाद दिया. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सी.आइ.ई. की उपाधि दी.

    पंडित नैनसिंह अन्वेषणकर्ताओं के सिरताज थे- अथक, साहसी अर अदम्य जिज्ञासा से भरे. कोई मुश्किल या विफलता उनके कुतूहल को ठंडा नहीं कर सकती थी. मठ-मंदिर, युद्ध और फसाद, हाट-बाजार, भाषा-बोली, धर्म, रस्म-रिवाज, खदानें आदि सभी के विषय में जो भी जानकारी मिले, उसे मन में भर लेते और अपनी यात्रापोथी में विस्तार से दर्ज करते.

    पंडित नैनसिंह जितने ही विख्यात एक और खोजी थे उनके रिश्ते के भाई किशन सिंह, जो ‘ए-के’ नाम से प्रसिद्ध थे. वे और उनकी टोली के सदस्य तीर्थयात्रियों का भेस बनाकर कुमाऊं से रवाना हुए. साथ में गुजारे के लिए उन्होंने कुछ रसद भी ले ली थी. उन्होंने बेड़े से ब्रह्मपुत्र को पार किया और नदी के बायें तट पर पड़ाव डाला. उनका इरादा बड़े तिब्बत में स्थित ‘नाम’ या ‘तेंग्री नोर’ झील की शीनाख्त करने का था.

    यहां किशनसिंह ने चांदी के भारतीय सिक्के देकर सोना लिया. सिक्के वे अपनी खोखली वाकिंग स्टिक में रखते थे, जो इसी काम के लिए उन्होंने विशेष रूप से बनवायी थी. उन्हें पता चला कि झील तक नियमित रास्ता है, जिस पर काफी आवागमन होता है.

    रास्ते में उन्होंने गर्म पानी के कई चश्मे देखे. दो में से पानी 60-60 फुट ऊंचा उछलता था. पानी नीचे आते-आते ठंडा हो जाता और जमकर बर्फ के खोखले खम्भों का आकार धारण कर लेता था. खौलते जलकुंडों के चौगिर्द ऐसे अनेक खोखले बर्फ के खम्भे थे.

    जब वे झील पर पहुंचे, झील जमकर बर्फ की चादर बन चुकी थी, जो 50 मील लम्बी और 16 से 25 मील चौड़ी थी. बर्फ की एक विशाल अखंड चादर.

    किशनसिंह ने झील और उसके आस-पास के प्रदेश और झील के दक्षिण में स्थित विशाल और भव्य हिमनद का सही-सही ब्यौरेवार वर्णन दर्ज किया.

    दुर्भाग्य से, डाकुओं ने उन पर आक्रमण किया और उनका सब कुछ लूट लिया- यहां तक कि तम्बू भी छीन लिये. टोली को कई रातें खुलीं बर्फ पर भयानक ठंड में गुजारनी पड़ीं. जैसे-तैसे वे लोग जीवित ल्हासा पहुंच पाये. किशनसिंह ने सर्वथा अज्ञात इलाके में 320 मील लम्बे मार्ग का सर्वेक्षण कर डाला था.

    उनकी दूसरी यात्रा यारकंद और काशगर की थी. गुबोलिन्क से नोन के बीच 240 मील के मार्ग का सर्वेक्षण करते समय एक भी आदमी से उनका आमना-सामना नहीं हुआ.

    किशनसिंह की आखिरी यात्रा बाहरी तिब्बत और मंगोलिया की थी और उसने उन्हें विश्व भर में प्रसिद्ध कर दिया. अप्रैल 1878 में दार्जिलिंग से चलकर सीधे तिब्बती पठार और क्युनलुन पर्वतमाला को पार करते हुए वे गोवी मरुस्थल के किनारे तक जा पहुंचे.

    उन्हें बड़ी कठिनाइयां झेलनी पड़ीं. एक बार फिर बटमारों ने लूट लिया और वे बिलकुल अकिंचन हो गये. फिर भी उन्होंने अपने हिस्से का काम अंजाम दिया.

    रास्ते में एक कबीला उन्हें मिला, जिसमें उनकी इस बात पर खिल्ली उड़ायी गयी कि वे पैदल चलते हैं. उन्हें लाचार होकर घोड़े की सवारी करनी पड़ी. मगर उन्हें तो रास्ते की लम्बाई भी नापनी थी. घोड़ा आगे का दायां पैर कितनी बार उठाता-रखता है इसकी गिनती रखकर उन्होंने 230 मील का हिसाब लगा ही लिया. दस्तावेजों में इसका उल्लेख करते हुए विनोदपूर्वक लिखा गया है- ‘इसमें खोजी की सूझबूझ और घोड़ों के कदमों की एक रूपता दोनों को बराबर-बराबर श्रेय है.’

    ल्हासा में किशनसिंह ने देखा कि जम्बा देवता की भीमकाय मूर्ति मंदिर के तलमंजले से आरम्भ करके पहली, दूसरी और तीसरी मंजिल तक उठती चली गयी है और ऊपर उसके सिर पर रत्नजड़ित टोपी है. चक्करदार सीढ़िया इस प्रकार बनायी गयी थीं कि यात्रियों को तीन बार मूर्ति की परिक्रमा करनी पड़ती थी- एक बार पैरों की दूसरी बार छाती की और तीसरी बार सिर की.

    चांगतांग के विशाल एवं बियाबान प्रदेश में किशनसिंह ने जंगली सुरागायें देखीं, जो इन मनुष्यों की उपस्थिति से बिलकुल भी घबराये बिना आराम से घास चरती रहीं. यहां तक कि एक सुंदर और दृढ़काय नर तो टोली के एकदम पास चला आया. उसकी आंखों में शैतानी थी और उसके लम्बे बाल जमीन पर घिसट रहे थे. आते ही उसने खूर पटके मानो पूछ रहा हो कि यहां तुम लोग क्या कर रहे हो. टोली जल्दी-जल्दी वहां से खिसक गयी.

    किशनसिंह ने लौटने के लिए अधिक पूर्वी रास्ता चुना. तिब्बत का पठार पार करके वे पूर्व में चीन की ओर मुड़े और असम के पूर्वोत्तर काने के पास भारत की सीमा से तीस ही मील रह गये, मिशिमि जातियों की शत्रुता के कारण उन्हें घोर निराशा हुई. वे अपने इलाके में कदम रखने वाले घुसपैठियों की तरह किशनसिंह और उनके साथियों को मार ही डालते.

    इस कारण उन्हें ल्हासा की ओर मुड़कर लम्बा रास्ता तै करना पड़ा और भारत से प्रस्थान करने के चार वर्ष बाद वे वापस स्वेदश लौटे. यहां तो उनके लौटने की आशा ही छोड़ दी गयी थी. उनका परिवार टूट चुका था. उनके एकमात्र पुत्र का देहांत हो गया था. खुद उनका स्वास्थ्य भी जवाब दे चुका था.

    मगर वे फिर स्वस्थ्य हो गये और 36 वर्ष तक उन्होंने सरकारी पेंशन का उपयोग किया. समय के गुजरने और अन्य सर्वेक्षकों के काम के साथ किशनसिंह की प्रतिष्ठा बढ़ती ही गयी, घटी नहीं.

    पंडित कल्याणसिंह और हरिजन ने भी हिमालय पार की खोज में महत्त्वपूर्ण काम किया. कल्याणसिंह ने अपनी डायरी में लिखा है- ‘विशाल और जनभरित नगर में पहुंचे, जो चीन की विशाल दीवार के साथ बसा हुआ है और जिसके दरवाजे में से गुजरकर भारतीय व्यापारी कैथे या चीन में प्रेवश करते हैं.’ यह शहर था सिलिंग, जहां उन दिनों भी जरी, रेशम, गलीचे और अन्य पदार्थ तैयार किये जाते थे.

    हरिराम ने तीन सर्वेक्षण किये. पहले में उन्होंने बताया कि केरुन शड्र के उत्तर-पश्चिम और उत्तर में ब्रह्मपुत्र या त्सांग-पो तक हिमालयी जल-विभाजक का पानी किस तरह बहता है. बाकी यात्राओं में से एक में वे कुमाऊं से त्रादोम जाकर वापस लौटे, दूसरी दग्मारा से दूधकोसी नदी की राह, तिब्बत में तिंग-री तक थी.

    वे वैद्य का रूप धारण करके निकलते थे और उनके साथ अनेक यूरोपीय और देशी दवाइयां रहती थीं. उन्होंने 420 मील जितनी नयी राहें नापीं.

    सर्वे आफ इंडिया ने कुछ लामाओं को भी खोज-कार्य व सड़क-सर्वेक्षण के लिए भेजा था. मंगोलियन लामा सेराप ग्यात्सो ने ज्यादातर मठों, तीर्थस्थानों और वन्य पशुओं आदि के विवरण दिये हैं.

    उग्येन ग्यात्सो नामक एक और लामा ने बहुत महत्त्वपूर्ण सर्वेंक्षण किये. उसने मूल्यवान भौगोलिक सामग्री एकत्र की, जिसके साथ उसने तिब्बतियों के सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों का विवरण भी दिया है. अपना वृत्तांत उसने अंग्रेजी में लिखा है.

        उसने यामद्रोकत्सो झील-समूह की छान-बीन की. वहां उसने एक महीना बिताया. हालांकि उन दिनों वहां गहरी धुंध छायी हुई थी और वर्षा हो रही थी. जिस भी गांव में वह जाता उसका सत्कार होता, मगर ‘विशाल तिब्बती कुत्तों के खतरनाक स्वागत का सामना कर लेने के बाद.’

    ल्हाखंगजोंग में उस पर भेदिये होने का आरोप लगाकर उसे गिरफ्तार कर लिया गया. उसके उपकरण, वानस्पतिक नमूने, पुस्तकें और नक्शे जब्त कर लिये गये. और वहां के नक्शे बनाने पर बहुत सख्त पाबंदी हाल में लगायी थी. शायद वह जीवन-भर कैदखाने में पड़ा रहता, मगर ‘उचित घूस’ ने उसे कठिनाइयों से पार पाने में सहायता दी.

    उग्येन ग्यात्सो ऐसे मजेदार अनुभवों के किस्से लेकर लौटा कि एक ब्रिटिश अफसर ने लिखा है कि उसके दस्तावेज अरेबियन नाइट्स जैसे लगते हैं.

    एक और खोजी था तिन्जिन निमूग्यिल. उसे यह पता लगाने के लिए सिक्किम, भूटान और तिब्बत भेजा गया था कि त्सांग-पो ब्रह्मपुत्र की उपरी धारा है या इरावदी की. उसने भूटान का बहुत बढ़िया स्केचनक्शा बनाया.

    किंथुप बड़ा विलक्षण खोजी था. वास्तव में वह निरा अपढ़ और प्रशिक्षणहीन नौकर था एक चीनी लामा का, इस लामा को सर्वे आफ इंडिया ने प्रशिक्षण देकर तिब्बत भेजा था.   

    लामा से कहा गया था कि त्सांग-पो के साथ-साथ बहाव की दिशा में चलता आये, फिर खास किस्म के निशान किये हुए लट्ठे उसमें बहाये. असम में नियुक्त पहरेदार उन लठ्ठों के आने का इंतजार करते. मगर चीनी लाम यह सब काम करने के बजाय किंथुप को बेचकर चंपत हो गया.

    किंथुप किसी तरह बचकर निकल भागा. मगर जल्दी-से-जल्दी सुरक्षित भारत आ पहुंचने के बजाय, उसने यथाशक्ति वह काम करने का निश्चय किया, जो उसके मालिक के जिम्मे सौंपा गया था. अपढ़ होने के कारण वह न नोट्स ले सकता था, न नक्शे या स्केच बना सकता था. मगर जहां-जहां से भी गुजरा, उसने उन स्थानों के नाम और विवरण कंठस्थ कर लिये.

    वह त्सांग-पो के साथ-साथ चलता रहा और भारत के मैदान से साठ मील की दूरी तक पहुंच गया. यहां से उसने निशान किये लट्ठे नदी में बहाये. मगर तब तक लट्ठों पर नजर रखना बंद कर दिया गया था. वह दार्जिलिंग वापस आ पहुंचा. उसने ओलोन तक त्सांग-पो का मार्ग खोजा था- दूसरे खोजी जहां तक आ पाये थे उससे पूरे सौ मील आगे तक. अपने साथ वह 14 स्थलों का विवरण, बीच की अनुमानित दूरी और मठों, फस्लों, पहाड़ों, दर्रों आदि के बारे में अत्यंत मूल्यवान जानकारी लाया.

    जंगल में सोते और गांवों में भीख मांगकर पेट भरते हुए उसने यात्रा की थी. कभी-कभी वह मजदूरी भी कर लेता, मगर अपने ढंग से निरंतर सर्वेक्षण भी करता रहा.

    सर्वे आफ इंडिया ने तो किंथुप के विवरणों का विश्वास किया और इसे निर्विवाद रूप से सिद्ध माना कि त्सांग-पो ही ब्रह्मपुत्र है. मगर भूगोलज्ञ इस पर संदेह करते रहे.

    परंतु किंथुप की मृत्यु से पूर्व उसकी लायी हुई जानकारी की शुद्धता पूरी तरह प्रमाणित हो गयी. सर्वेयर जनरल ने उसे शिमला बुलाकर वहां उसकी तीस साल पहले की महान सेवाओं के लिए सम्मनित और पुस्कृत किया.

(मई  2071)

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