क्या-क्या गुम नहीं हो रहा है? – गोपाल चतुर्वेदी

व्यंग्य

 

हमारी मानसिकता भी अजीब है. छोटी चीज़ें खोयें तो हम आसमान सिर पर उठा लेते हैं. वहीं कुछ बड़ा खो जाये तो अहसास तक नहीं होता है. कल ही हमने उसका त्रासद नज़ारा देखा. हमारे पड़ोसी वर्मा जी के घर में जैसे तांडव का आयोजन था. एक बच्चे के रोने-चिल्लाने की चीख गूंज रही थी और वर्मा जी का क्रोsधित स्वर. यह कर्ण-भेदी कोहराम कुछ समय तक चला. उसके बाद यकायक उनका नाबालिग सहायक घर के दरवाज़े से बाहर फेंकी गठरी के समान सड़क पर पड़ा नज़र आया. हमने वर्मा जी से इस शोर का सबब पूछा तो उन्होंने बताया कि पर्स खो गया है और उन्हें शक है कि इस हरकत का ज़िम्मेदार यही नाकारा बालक है. हमने उन्हें सुझाया कि स्वयं सज़ा देने के स्थान पर उसे पुलिस को सौंप देना उचित था तो उन्होंने उत्तर दिया कि पुलिस उल्टे उन्हें कानून पढ़ाती. हमने तो निराश्रित को शरण दी थी. क्या कहें होम करते हाथ जल गये. बाद में हमारे नन्हें जासूस पप्पू ने खबर दी कि वर्मा जी का पर्स उन्हीं की पतलून में बरामद हुआ है. हमें दुख हुआ. एक निरपराध की व्यर्थ में पिटाई ही नहीं हुई उसकी नौकरी भी चली गयी.

फिर हमें खयाल आया कि कमज़ोर निरपराध होते ही पिटाई के लिए हैं. यही दुनिया का दस्तूर है.

हम कौन-से दूध के धुले हैं? एक बार बाथरूम में घड़ी उतारकर हम पत्नी और पप्पू के खोजू दल के साथ पूरे घर में उसे ढूंढ़ चुके हैं. इसी को कहते हैं ‘बगल में छोरा शहर में ढिंढोरा’. कुल जमा तीन प्राणियों के घर में कोई चौथा था ही नहीं जो संदेह का शिकार हो पाता! पत्नी ने ‘मियां का जूता मियां का सिर’ की तर्ज पर हमें ही दोषी ठहराया- ‘कोई भरोसा नहीं कि नगर-बस में घड़ी गिरा आये कि दफ्तर में! कई बार टोका है कि हाथ हिला-हिला कर मत बोला करो, पर सुनो तब न! स्ट्रैप ढीला था तो पूरी सम्भावना है कि घड़ी कहीं न कहीं टपक पड़ी होगी. खुद का तो रखना नहीं है, घड़ी का क्या होश रखोगे?’

हमें विश्वास हो चला है कि दुनिया में समझदारों ने विवाह की संस्था इसीलिए ईजाद की है कि एक छत के तले रहने वाले एक दूसरे को हर प्रकार का ऊल-जुलूल दोषारोपण करके भी साथ-साथ निर्वाह कर सकें. इस सतत घरेलू अभ्यास के बाद बाहर भी गुज़र आसान हो जाती है. खुद गलती कर किसी अन्य को ज़िम्मेदार ठहराना संसार में सुखी रहने का सबसे कारगर तरीका है. अपना निजी अनुभव है कि दावतों में अकाल-पीड़ित अंदाज़ में खाने पर टूट पड़कर यदि पेट पिराया तो हम मिलावटी खाद्य सामग्री और प्रदूषित जल आपूर्ति को ही कोसते हैं. कुछ हमसे भी आगे हैं. उनका कहना है कि दावत में वह नादीदों की तरह खाने पर हमला कभी न बोलते यदि इतनी अधिक महंगाई न होती. घर में पूड़ी-कचौड़ी, सब्जी, दहीबड़ा, खीर, रस मलाई की कल्पना भी कठिन है तो बेचारे करते क्या? विवश होकर पेट की सीमा का अतिक्रमण हो ही गया. गुनहगार महंगाई है और सज़ा वह भोग रहे हैं. ज़ाहिर है कि कीमतों में अनाप-शनाप उछाल सरकार की कारगुजारी है. वह निश्चय करते हैं कि अगली बार वोट के इम्तहान में वह उसे फेल करके रहेंगे.

कभी पर्स गुमता है, कभी घड़ी, कभी पेट में दर्द होता है, कभी सिर में! इनकी चिंता एक दो दिन रहती है और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है. बढ़ती कीमतें सीमित आय के साधनों को प्रभावित कर ज़रूर सताती हैं पर निरंतर तिरोहित होते जीवन मूल्यों की ओर ध्यान देने की फुरसत किसके पास है? लगता है कि नैतिकता का पखेरू जैसे फुर्र से उड़कर पलायन कर गया है. किशोर वय के बालक जघन्य अपराध कर गुज़रते हैं, कभी हत्या, कभी बलात्कार! कानून सिर धुनता रह जाता है. संस्कार देने का समय न मां-बाप के पास है न शिक्षण संस्थाओं के पास! यों भी संस्कार न कपड़ा-लत्ता है न खेल-खिलौना कि बाज़ार से खरीदा और बच्चे को दे दिया. यदि ऐसा होता तो दिक्कत ही क्या थी? कोई न कोई योग गुरु संस्कार का महंगा पेय बाज़ार में ले आता और संस्कार विहीनता के शर्तिया इलाज का दावा कर लोगों को ठगता.

दुखद है कि बच्चे संस्कार बड़ों को देखकर और उनके जीवन मूल्यों के अनुकरण से सीखते हैं. यह कैसे सम्भव है जब दुनियादारी के नाम पर बड़े लोग झूठ के रोज़मर्रा प्रयोग में माहिर हों. कोई फोन आता है तो निर्देश है कि साहब या तो दफ्तर में हैं या मंत्री जी के साथ मीटिंग में. यह सुनकर बच्चा भौचक्का होकर मां से पूछता है कि ‘मम्मी, पर पापा तो घर पर ही हैं?’

‘क्या करें बेटा, लोग किसी न किसी काम के वास्ते तुम्हारे पापा की जान खाते रहते हैं, इसीलिए उनसे कुछ न कुछ बहाना तो बनाना ही पड़ता है.’

‘तो उनसे मिलकर मना क्यों नहीं कर देते कि उनका काम नहीं हो सकता है?’ बच्चा अभी भी मां के तर्क से पूरी तरह आश्वस्त नहीं है. मां उसे समझाती है कि वह अभी छोटा है जब बड़ा होगा तो जानेगा कि यही व्यवहार-कुशलता है. ऐसी ही सुविधाजनक लचीली नैतिकता की नींव पर जब भविष्य की इमारत खड़ी होगी तो उसमें सफलता की शर्त कहीं न कहीं सच की सीमेंट का गुम होना ही है.

ऐसे में ईमानदारी की अपेक्षा करना आसमान में बहती हवा में गांठ बांधने जैसा है. भ्रष्टाचार मिटाने का मुखर अभिनय सब करते हैं. सुनकर और छोटे पर्दे पर देखकर यही भ्रम होता हैं कि यह गांठ बांध कर ही रहेंगे. पर कुछ ही समय में पता लगता है कि कामयाबी का लक्ष्य पाना तो दूर यह तो उस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़े हैं. वक्त के साथ हमारा शासकीय ढांचा ऐसा तिजारती बन गया है कि उसका मूल आधार ही अब ‘इस हाथ दे उस हाथ ले’ का लोकप्रिय बाज़ारू उसूल है.

कुछ दिनों की बात है. हमारे एक मित्र बहुत प्रफुल्लित नज़र आये. उन्होंने मिलते ही हमें चाय की दावत दी. हमारी जिज्ञासा ने ज़ोर मारा. हमने इस खुशी का कारण जानना चाहा. उन्होंने बताया कि विभागीय सचिव से एक बाबू के घूस मांगने के शिकायती पत्र की स्वीकृति उन्हें आज ही मिली है. अपनी इस उपलब्धि को उन्होंने तत्काल जेब से निकाल कर दिखाया भी. उसमें उनके पत्र की पावती थी और उचित कार्यवाही का आश्वासन. किसी पत्र की पावती ही ऐसी उल्लेखनीय उपलब्धि है तो कुछ कार्यवाही हो गयी तो वह शायद मिठाई बांटेंगे! आज इस महत्त्वपूर्ण घटना या दुर्घटना को दो ढाई साल बीत चुके हैं पर मिठाई बांटने की नौबत नहीं आयी है. कौन कहे, कभी आये भी कि नहीं?

त्रासद तथ्य यह है कि प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनता से सम्बंधित अधिकतर गतिविधियां सरकार या उससे जुड़ी संस्थाओं पर ही निर्भर हैं. हमारे घर के सामने बनी नयी सड़क में अभी से भ्रष्टाचार के चौड़े गड्ढे हैं. हमें यकीन है की अगली बरसात तक यह जनसंख्या घटाने का कारगर साधन बनने वाले हैं. पर इस विषय से कोई चिंतित नहीं है. दुर्भाग्य से सड़क सार्वजनिक सम्पत्ति है? न किसी का बटुआ है, न अपनी घड़ी. लोग इस वारदात से प्रसन्न हैं कि कभी कुछ कल्याणकारी कार्य सम्पन्न तो हुआ. हम किसी को गड्ढे दिखायें भी तो वह हमारा मज़ाक उड़ाने की मुद्रा में फरमाता है- ‘यार तुम्हें तो हर गिलास खाली देखने की आदत है, अभी नयी सड़क का भरा है धीरे-धीरे गड्ढों का भी भर जायेगा. हमें न जाने क्यों संदेह है कि एक दो बारिश हुई नहीं कि इस सड़क के भी गुम जाने का सम्भावित खतरा है. उसके बाद यह केवल शासन के कागज़ी कीर्तिमानों में दर्ज होगी. कोई शिकायत करेगा और तो यदि पायेगा तो यही उत्तर पायेगा, ‘आपकी शिकायत पर की गयी जांच में पाया गया है कि जिसके न होने का आपने जिक्र किया है, वह सड़क पिछले पांच वर्षो से अस्तित्व में है.’

यह निहायत निर्मूल आरोप है कि हम प्रकृति से दूर हो गये हैं. इससे उलट आज की सच्चाई यह है कि प्रकृति हमारे पास आयी है. बच्चे संस्कार भले न सीखें, प्रकृति ने आदमी से गुम होने की कला ज़रूर सीख ली है. सब जानते हैं कि बजट के पूर्व कुछ आवश्यक वस्तुएं बाज़ार से उड़नछू होती हैं. वह बाज़ार में बजट के बाद बढ़ी कीमतों के साथ ही लौटती हैं. कुदरत के ऋतुचक्र ने भी यही इंसानी पाठ पढ़ लिया है. जाने कुदरत का बजट है भी कि नहीं, फिर भी बारिश के मौसम में प्रकृति अतिशय कंजूसी बरतती है. बूंदें ऐसी नकचढ़ी हो गयी हैं कि बाज़ार के भाव की तरह गिरती ही नहीं हैं. यदि गिरीं भी तो मन का सावन कहीं खो गया है. बड़े बुर्जुग बताते हैं कि कभी सावन में झूला झूला जाता था. इतना ही नहीं, झूला-गीत और कजरी के स्वर भी गूंजते थे. हमें यह सब अतीत का यथार्थ न होकर कोरी अफवाहें लगती हैं. जब कभी बरसात इनायत भी करती है तो नगरवासी नाली से नदी बनी वैतरणी को पार करने के संशय में झूलते हैं और ग्राम-वासी बाढ़ के संकट से फसल को बचाने के चक्कर में! जब पानी सिर के ऊपर आ जाता है तो बंदरिया भी बच्चे को छोड़ देती है. तो इंसान सूखे या बाढ़ के वातावरण में झूले या गीत-संगीत से कैसे चिपका रहे?

यों भी ऋतुओं को कुछ हो गया है. जीवन की स्लेट से बरसात ही नहीं मिटी है, यही बदहाली ग्रीष्म की भी है. जेठ की लू में बस लोगों के प्राण गंवाने की ही खबरें आती हैं. कहीं भी मुज़फ़्फ़रपुर की शाही लीची या लखनऊ के दशहरी आम और महाराष्ट्र के अलफांजो की कोई बात भी नहीं करता है. गर्मियों का सुख कुछ समृद्धों तक सीमित है जो वातानुकूलित वातावरण में फलों का लुत्फ लेते हैं या फिर विदेशों की सैर को निकलते हैं अथवा देशी हिल स्टेशनों की. कुदरत ने भी जैसे मानवीय आतंकवादियों से सांठ-गांठ कर ली है. वह कुछ ही ऐसे अपवाद हैं जिन्होंने भौतिकवाद के उत्तर आधुनिक काल में मौसम को धन में कैद कर लिया है. उनके पास पैसे की इफरात है और वह जब जी चाहे मन माफिक मौसम के सृजन में समर्थ है. उन्हें न होली से फर्क पड़ता है, न दिवाली से. मौसम की मार के शिकार सिर्फ झुग्गी-झोपड़ी के रहने वाले हैं. कभी वहां समय का निर्मम आतंकी आग लगाता है, कभी शीतलहर से उनके प्राण हरता है.

एक जानकार ने बताया है कि शीत की ठिठुरन और गर्मी की तपन के मध्य में एक मोहक और मादक अंतराल है जिसे वसंत के नाम से जाना जाता है. हमें विश्वास नहीं हुआ. हमने उनसे पूछ ही लिया कि कहीं यह शोले की बसंती का भाई तो नहीं है? शहरी बहुमंजिली आवासीय इमारतों के दो कमरों के दड़बे में रहने वालों ने फूलों के नाम भर सुने हैं. जानकार ने हिकारत से हमें देखा ‘क्या आप को कभी शहर में पब्लिक पार्क में जाने का अवसर नहीं मिला है जो आपने प्रकृति के सर्वदृष्ट और आकर्षक मोड़ को फिल्म की नायिका का भाई बना डाला है?’

उन्हें इतने से ही चैन नहीं पड़ा. उन्होंने हमारी अज्ञानी नाक को ज़मीन में रगड़ने का निश्चय किया- ‘आपने गुलाब, चम्पा, चमेली, जैसे सुगंधित फूलों को देखा भी है कि नहीं?’ हमने गर्व से उन्हें सूचित किया, ‘क्यों नहीं! गुलाब की बेल तो हमारे पड़ोसी ने गमले में लगा रखी है. हम कभी कभार उसकी आंख बचाकर एक दो फूल तोड़ भी लेते हैं’. हमने उनसे वादा किया कि इस बार वसंत के अवसर पर हम अवश्य शहर के बगीचे में जाकर इन फूलों का दिलकश नज़ारा देखेंगे.

फिर हमने जिज्ञासा जतायी, ‘कुदरत का यह जादू-टोना होता कब है?’ अब उन्होंने खीजकर सिर पकड़ लिया. हम पर जैसे तरस खाकर बोले, ‘लगभग जनवरी के अंत से फरवरी के मध्य तक.’ हमें जैसे यकायक ज्ञान का बोध हुआ- ‘अरे! तभी तो हमारा’ वैलेन्टाइन डे पड़ता है.’ हमारी इस जानकारी से वह प्रभावित नहीं हुए. उन्होंने खिन्नता का भाव अपनाते हुए हमें सुनाया- ‘ताज्जुब है कि आप वैलेन्टाइन डे से परिचित हैं पर मदनोत्सव से अनजान हैं. आपको गर्मी, जाड़े, बरसात की खबर है पर आप वसंत जो प्राकृतिक सम्पदा को पुनर्जन्म का समय भी है, उससे अनभिज्ञ हैं’

इतना कहकर वह ऐसे विदा हुए जैसे हमसे बात करना उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है. तब से हम अपनी कमअक्ली की सोच रहे हैं. संसार में ज्ञान का विशाल भंडार है. उसमें कोई ज़रा-सा गोता भी लगाये तो धन्य हो जाये. यही क्या कम है के हमें वैलेन्टाइन डे का पता है. कौन कहे, इतने मौसम गुम हो रहे हैं, वसंत भी खो गया हो. यह भी मुमकिन है कि वसंत अपने नियमित समय से पधारता हो पर किसे नोन, तेल, लकड़ी, के मुसल्सल संघर्ष से फुरसत है, उसका सौष्ठव और सौंदर्य निहारने-निखारने की!

फरवरी 2016

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