किस्सा तब का है, जब दलाई लामा भारत आये

♦  कुलदीप नायर       

 दलाई लामा के तिब्बत से पलायन तथा भारत आगमन की कहानी गत बारह वर्षों में अनेक बार कही गयी है. लेकिन इस कहानी के पीछे कहानी- अर्थात इस घटना का संवाद भेजने वाले पत्रकारों के बीच कैसी अप्रिय घटनाएं घटीं, उनसे कैसी मजेदार गड़बड़ियां हुई और उनमें परस्पर कैसी गलाकाट प्रतिस्पर्धा चली, यह अधिकांश लोग नहीं जानते हैं.

     दलाई लामा के भारत-आगमन के समाचार देना पुराने और अनुभवी पत्रकारों के लिए भी बड़ा दुष्कर कार्य था. पाठकों को संतुष्ट करने के लिए पत्रों के सम्पादक संवादाताओं को लगातार समाचार देने का निर्देश दे रहे थे. परिणामतः अनेक संवाददाताओं ने विस्तृत समाचार भेजने के लिए अपनी उर्वर कल्पना-शक्ति का भरपूर आसरा लिया.

     सन 1959 ई. में, जब ल्हासा में हुए विद्रोह का समाचार किसी प्रकार दिल्ली पहुंचा, तो हममें से किसी का भी हिमालय के उस पार तिब्बत जा पाना सम्भव नहीं था और हिमालय के इस ओर रहकर उधर के समाचार प्राप्त करना कोई आसान काम न था. ल्हासा में अभी भारत का महावाणिज्य दूतावास था और तिब्बत की राजधानी में होने वाली गड़बड़ का प्रथम समाचार वहां से बेतार द्वारा गंगटोक स्थित भारतीय राजनीतिक कार्यालय को मिला था. उसके बाद समाचार कार्यालय को मिला था. उसके बाद समाचार आया कि दलाई लामा गायब हो गये हैं और चीनी बड़ी सरगर्मी से उनकी तलाश कर रहे हैं.

     कोई नहीं जानता था कि दलाईद लामा इस समय कहां हैं, लेकिन सभी का अनुमान था कि वे भारत की ओर बढ़ रहे हैं. अतः जिन लोगों को उनके भारत आगमन का समाचार भेजने के लिए नियुक्त किया गया था, वे सीधे कलिंपोंग पहुंचे. यही तिब्बती सीमा से सबसे निकटवर्ती नगर था, जहां पत्रकारों का प्रवेश सम्भव था. हमने ‘हिमालय होटल’ को अपना मुख्यालय बनाया. तीन विधवाएं यह होटल चलाती थीं, और यह सब सुविधाओं से युक्त था.

     जो पत्रकार सबसे पहले कलिंपोंग पहुंचे, उनमें एसोसियों के दो संवाददाता थे. कुछ ही दिनों में लंदन, नयी दिल्ली, कराची तथा अफ्रीकी देशों की राजधानियों से आने वाले संवाददाताओं से होटल भर गया.

     लेकिन किसी को इस बात का लेशमात्र आभास नहीं था कि हिमालय के दूसरी ओर क्या हो रहा है. सभी लोग पर्वतशिखरों पर अपनी नज़र दौड़ाते रहते थे कि शायद कहीं पर्वत पार करते हुए दलाई लामा का दल दिखाई दे जाये.

     लेकिन इसका मतलब यह नहीं हैं कि प्रतिदिन हम कोई कम समाचार भेजते थे. हममें जो संवाददाता अधिक विवेकी तथा ईमानदार थे, वे दलाई लामा की प्रगति के विषय में यथासम्भव जानकारी एकत्रित करने के लिए प्रतिदिन कलिंपोंग से 48 मील दूर गंगटोक जाया करते थे, शेष अपने सम्पादकों को संतुष्ट रखने के लिए अपनी कल्पना का सहारा लेते थे.

     हम सब वह खबर पाने की कोशिश में थे, जिसे दलाई लामा के भारत पहुंच जाने का सर्वप्रथम समाचार कहा जा सके. सभी संगोपनशील थे और बाज की तरह एक दूसरे पर नजर रखते थे. हमपेशा होने के कारण होटल की भोजन की मेज पर ऊपरी निकटता तो निभायी जाती थी, मगर उसके पीछे तनाव की एक अंतर्धारा भी रहती थी. इसलिए जब लंदन के एक प्रमुख दैनिक पत्र का प्रसिद्ध विदेशी संवाददाता वहां पहुंचा, तो ‘हिमालय होटल’ में स्थित अधिकांश लोग चौकन्ने हो गये. नवागंतुक अपने तिब्बती सम्पर्कों तथा सबसे पहले खबर निकाल लाने के लिए प्रसिद्ध था. उस पर निरंतर निगरानी रखी जाने लगी.

     परंतु उसके संपर्कों को जान पाने की हमारी आशा शीघ्र ही धूल में मिल गयी. वह कुछ देर सोने के बाद टेनिस खेलने चला गया और वहां से लौटकर तुरंत अपना टाइप-राइटर खटखटाने लगा. कुछ देर बाद वह कमरे से एक लम्बा प्रेस-तार लिये निकला और उसे तारघर में दे आया. पर निगरानी रखने के लिए हमने जो व्यक्ति नियुक्त किये थे, वे उस पर कड़ीं नजर रखे रहे.

     उसी रात लंदन से उसके सम्पादक का टेलिफोन आया. काफी कोशिश करने पर पता चला कि सम्पादक ने उसके भेजे हुए समाचार की प्रशंसा की है.

     चार दिन बाद इस प्रशंसित समाचार की विषय-वस्तु का पता हमें चला. हमारे साथी ने इसका विस्तृत विवरण भेजा था कि दलाई लामा किस प्रकार चीनियों की आंखों में धूल झोंककर ल्हासा से बच निकले.

     इसके भी कई दिन बाद हमें ज्ञात हो पाया कि उस विस्तृत समचार का स्रोत थी, सर चार्ल्स बेल की एक पुस्तक जो सन 1905 ई. में एक अन्य दलाई लामा के ल्हासा से भागने से सम्बंधित थी. बाद के समाचारों से वह सारा विवरण बिलकुल असत्य सिद्ध हो गया, मगर तब तक अधिकांश लोग उसे भूल चुके थे.

     कलिंपोंग में जुटे हुए प्रेस-दल में व्याप्त तनाव का एक और उदाहरण देखिए. चार संवाददाता समाचारों की खोज में गंगटोक गये हुए थे. जब उन्हें पता चला कि दिल्ली में बैठे उनके एक साथी ने ल्हासा स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास को तार भेजकर तिब्बती विद्रोह का आंखों देखा विवरण व फोटोग्राफ मांगे हैं, तो वे खूब झुंझलाये.

     उन्होंने सोचा कि हम तो ईमानदारी से अपना कार्य करने के लिए पहाड़ों में मारे-मारे फिर रहे हैं, और हमारा यह साथी होटल के वातानुकूलित कमरे में आराम से बैठकर हमें मात देने की कोशिश कर रहा है. उन्होंने निश्चय किया कि उसके इस अनुचित प्रयत्न की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए. तुरंत एक काल्पनिक तिब्बती के नाम से एक तार दिल्ली भेजा गया. इसमें खासे मोटे पारिश्रमिक के एवज में, आंखों देखा हाल तथा फोटोग्राफ भेजने का प्रस्ताव था.

     किंतु तार बेकार गया. दो दिन बाद उस संवाददाता की समाचार-एजेंसी का कराची-स्थित संवाददाता कलिंपोंग आया और उस काल्पनिक तिब्बती की खोज करने लगा. कई दिन के प्रयत्न के बाद उसे पता चला कि यह सब धोखा था.

     अंत में पीकिंग रेडियो ने दलाई लामा के भारत पहुंचने का समाचार प्रसारित कर संवाददाताओं की उस विशिष्ट मंडली को मात दे दी. पीकिंग रेडियो पर यह समाचार सायंकाल को आया था. उसके कुछ ही क्षणों बाद होटल के एकमात्र टेलिफोन पर विश्व के विभिन्न भागों से विशेषतः लंदन, न्यूयार्क और भारत के अनेक भागों से आने वाले टेलिफोनों का ताता लग गया.

     उस रात हममें से कोई क्षण-भर को भी सो नहीं सका. हर एक इस प्रयत्न में था कि जैसे भी हो, मैं अपने साथियों को पछाड़कर सबसे पहले दलाई लामा से भेंट कर लूं. अब तक यह ज्ञात हो चुका था कि दलाई लामा तेजपुर कि ओर बढ़ रहे हैं और उनके पास पहुंचने को सबको शिलांग जाना होगा.

     ब्रिटेन के तीन प्रतिद्वंद्वी पत्रों से सम्बंधित तीन उत्साही संवाददाताओं ने शेष सबसे पहले वहां पहुचने के लिए अपनी प्रतिस्पार्धा को भुलाकर पास के ही एक ब्रिटिश चायबागान से एक छोटा हवाई जहाज भाड़े पर ले लिया. उनकी योजना थी कि दलाई लामा के यात्रा-मार्ग पर उड़ान भरकर उनके दल को स्वयं देखें और सारी घटना का विस्तृत विवरण भेजें. लेकिन उनमें एक जरा ज्यादा चालाक था. उसने हवाई जहाज में सवार होने से पहले ही नेफा पर अपनी भावी नाटकीय उड़ान का काल्पनिक वर्णन लिखकर अपने पत्र को भेज दिया.

     किंतु दुर्भाग्य से, सबसे पहले समाचार भेजने का उसका यह प्रयत्न बेकार हुआ. जब उनका हवाईजहाज तेजपुर हवाई अड्डे पर पहुंचा, तो अधिकारियों ने उन्हें दलाई लामा के यात्रा-मार्ग पर उड़ने की अनुमति नहीं दी. उधर, उस समय तक लंदन का वह दैनिक पत्र अपने संवाददाता की नाटकीय उड़ान के समाचार छाप चुका था.

     शेष संवाददाताओं का दल हवाई जहाज से गौहाटी पहुंचा. उसे शिलांग के ‘पाइनवुड होटल’ में ठहराया गया. उस समय तक कुछ और संवाददाता भी वहां पहुंच चुके थे. लंदन के अनेक बड़े पत्र अपने संवाददाताओं को बार-बार टेलिफोन पर निर्देश दे रहे थे कि दलाई लामा की यात्रा की प्रगति के और भी रोचक समाचार भेजो.

     समाचारों के लिए अत्यंत व्यग्रतापूर्वक प्रयत्न करते हुए कुछ संवाददाताओं के हाथ डॉ. वेरियर एलविन की नेफा विषयक एक पुस्तक हाथ लगी. पुस्तक में नेफा के तावांग विहार पर एक पूरा अध्याय था, और दलाई लामा के एक दिन उस विहार में विश्राम करने सम्भवाना थी.

     हमारे साथियों ने पुस्तक के इस अध्याय से बिना किसी झिझक के सामग्री ली और तावांग विहार के लामाओं द्वारा दलाई लामा के भव्य स्वागत, विहार की चिमनी से (जिसका अस्तित्व ही नहीं था) निकलते धुएं और मधुर स्वर में बजते हुए अनेक वाद्यों का आंखों देखा और बड़ा ही रंगीन (कल्पित) विवरण अपने-अपने पत्रों को भेजा.

     जब दलाई लामा तेजपुर के पास पहुंचे तो संवाददाताओं का दल भी नगर में पहुंच गया और वहां उसने बागान-मालिकों के, क्लब की इमारत पर लगभग अधिकार-सा कर लिया. तब तक हमारी संख्या 100 के लगभग पहुंच चुकी थी. कुछ संवाददाताओं ने अपने समाचार तथा छायाचित्र दूसरों से पहले कलकत्ता पहुंचाने के लिए किराये पर जो हवाई जहाज लिये थे, उनसे तेजपुर का हवाई अड्डा भरा पड़ा था.

     पीकिंग रेडियो दलाई लामा के भारत पहुंचने का समाचार देकर हमें पहले ही मात दे चुका था. अतः अब सभी दलाई लामा के पलायन की घटना का वास्तिवक विवरण प्राप्त करना चाहते थे. लंदन के एक पत्र ने तो जर्मन लेखक हाइनरिश हेरेर को भेजा था, जो अपना सात वर्ष के तिब्बत प्रवास में दलाई लामा से काफी परिचित हो चुके थे. लेकिन कड़े सुरक्षा प्रबंध के कारण अन्य संवाददाताओं की तरह वे भी दलाई लामा के पास तक नहीं जा सके.

     एक प्रमुख भारतीय दैनिक समाचारपत्र का संवाददाता भी काफी होशियार था. वह कलिंपोंग से एक तिब्बती को अपने साथ तेजपुर लाया. जब दलाई लामा गिरिपीठ (पहाड़ी ढाल के अंतिम भाग) में पहुंचे, और पत्रकारों तथा अधिकारियों ने वहां उनका स्वागत किया, इस तिब्बती को उनके दल में प्रविष्ट करा लिया गया, ताकि वह तिब्बती भाषा में बातचीत कर उनके पलायन का विस्तृत विवरण प्राप्त कर सके.

     अधिकारियों ने उसे दलाई लामा दल का सदस्य समझकर बढ़िया भोजन कराया, मगर वह पलायन का जो विवरण लेकर लौटा, बाद में वह बहुत ही गलत सिद्ध हुआ.

     सबसे अधिक रोचक घटना दलाई लामा के फोटोग्राफ के सम्बंध में घटी. दो अमरीकी समाचार एजेंसियों ने दलाई लामा के गिरिपीठ में आने पर वहां सर्वप्रथम लिये गये फोटोग्राफ रेडियो द्वारा भेजने का विशेष प्रबंध किया था. उनमें से एक ने तो इंडियन एयर लाइन्स से एक हवाई जहाज किराये पर लेकर उसके अंदर अस्थायी स्टूडियो बना लिया था और उसमें डेवलपिंग की पूरी व्यवस्था कर ली थी.

     पर हवाई अड्डे के अधिकारियों ने किसी भी विमान को उड़ने की अनुमति नहीं दी और दलाई लामा के तेजपुर में सार्वजनिक रूप से प्रकट होने के बाद ही यह निषेधाज्ञा हटायी गयी. इस विलंब के बावजूद एजेंसी का संवाददाता अपने प्रतिद्वंद्वी से पहले ही कलकत्ते पहुंचने में सफल हो गया. कहा जाता है कि उसने विमान-चालक को नियम तोड़कर पूर्वी पाकिस्तान पर उड़ने के लिए राजी कर लिया और वे पाकिस्तानी राडार की पकड़ में आने इस तरह बच गये कि उन्होंने हवाई जहाज खूब नीचे उड़ाया.

     दमदम हवाई अड्डे से उन फोटोग्राफों को नगर के मुख्य तार-कार्यालय तक ले जाने के लिए मोटर साइकल सहित एक संदेश-वाहक तैयार था. लेकिन उतावली के कारण चित्रों के शीर्षकों में गड़बड़ हो गयी. दूसरे दिन प्रातःकाल पत्रों में जो फोटो दलाइ लामा के नाम से प्रकाशित हुआ, वह दलाई लामा का नहीं, बल्कि उनके दल के एक अन्य सदस्य का था.

     इन सब अप्रिय घटनाओं के बावजूद दलाई लामा के भारत आगमान की घटना ने पत्रकारों को एक ऐसा विशिष्ट अवसर प्रदान किया, जब उन्हें इस शताब्दी के सर्वाधिक नाटकीय पलायन की इस घटना के प्रत्येक चरण के विवरण से अपने पाठकों को अवगत रखने के लिए अपनी कल्पना-शक्ति, विदग्धता और योग्यता पर ही निर्भर रहना पड़ा. समाचार देने वाला कोई जनसम्पर्क अधिकारी तो था नहीं. और कुल मिलाकर उन्होंने अपना यह कार्य बहुत अच्छी तरह किया.

(मार्च 1971)

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