एक अपराधी, एक लेखक, एक संत – – सुनील गंगोपाध्याय

न्यूड स्टडी फ्रांसीसी कला से अंतरंग भाव से जुड़ी हुई है. कविता-उपन्यास में कैसा ही वर्णन हो, किसी भी शब्द को वह अश्लील नहीं मानती है. उन दिनों फ्रांसीसी साहित्य में जां-जेने को लेकर खूब चख-चख मची हुई थी. जेने एक जन्मजात अपराधी था, सारा जीवन उसने चोरी और गुंडागीरी की थी, नशेड़ी-व्यभिचारी और खूनी लोगों से ही वह घुलता-मिलता था. किसी अपराध में जेने को आजीवन कारावास की सज़ा मिली थी. उस वक्त तक उसका किसी ने नाम तक नहीं सुना था. जेलखाने में बैठे-बैठे इस दागी कैदी ने एक पुस्तक लिखनी शुरू की. दो सौ एक पन्ने लिख डाले, उसके बाद जेलखाने के एक झाड़ूवाले ने एक दिन उस पूरी पांडुलिपि को झाड़ू से बाहर फेंक दिया. जेने फिर उसको लिखने बैठ गया, दिन-पर-दिन अपने मन से वह पूरी पुस्तक को लिखता रहा. बाद में किसी समय वह सम्पूर्ण पांडुलिपि जेल से बाहर पहुंची. किसी प्रकाशक के उसे प्रकाशित करने के बाद उस पुस्तक ने अकस्मात् फ्रांसीसी साहित्य में एक अभूतपूर्व हलचल मचा दी. उस पुस्तक- ‘अवरलेडी आफ दी फ्लावर्स’ का स्वाद भी अनास्वादित पूर्व था, बहुत से लेखकों, शिल्पियों, बुद्धिजीवियों ने फ्रांसीसी सरकार को एक आवेदन दिया, जिसके कारण जेने को कारागार से मुक्त कर दिया गया.

ज्यॉ पॉल सार्त्र ने इसी जेने के सम्बंध में एक पूरी पुस्तक लिखी है. उस पुस्तक का नाम है ‘संत जेने’. सार्त्र ने एक प्रश्न उठाया था, यह एक ऐसा व्यक्ति है, जिसके जेल से छूटने की कोई सम्भावना नहीं थी, जिसे ख्याति का भी कोई मोह नहीं था. पुस्तक लिखकर अर्थोपार्जन का भी कोई प्रश्न नहीं था, साहित्यिक कीर्ति स्थापित करने की बात तो वह जानता ही नहीं था, फिर भी वह लिखता क्यों रहा? क्या इसी को दैवी प्रेरणा कहते हैं. यह प्रेरणा जिसे मिल जाए, वह तो संत है.

जेने के इस उपन्यास की भाषा पागलों की तरह असंबद्ध थी, फिर भी उसे ही एक नयी भाषा माना गया है. उसने जब-तब गाली-गलौज और चोर-डकैत, वेश्याओं, समलैंगिकों द्वारा प्रयुक्त अश्लील शब्दों को भी मिला दिया था, फिर भी उस भाषा ने उसमें एक मौलिक सुगंध ला दी थी.

मई 2016

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