उत्तरित प्रश्न

♦    आचार्य रजनीश       

प्रश्न- धार्मिक व्यक्ति का व्यावहारिक जीवन किस प्रकार का होता है?

उत्तर- पहली बात तो यह है कि धार्मिक व्यक्ति के जीवन में व्यावहारिक और पारमार्थिक ऐसे खंड नहीं होते हैं. धार्मिक जीवन अखंड जीवन है. जहां खंड है, वहां धर्म नहीं है. खंडित चित्त ही तो रोग है. वही तो अधर्म है.

     दूसरी बात यह है कि धार्मिक व्यक्ति का स्वयं का जीवन भी नहीं होता, क्योंकि ‘स्व’ के मिटने से ही तो वह धर्म को उपलब्ध होता है. धार्मिक व्यक्ति स्वयं नहीं जीता, उसमें से तो प्रभु ही जीता है. धार्मिक व्यक्ति बन जाता है बस माध्यम. बांसुरी ही रह जाता है वह. स्वर और संगीत उसमें से बहते हैं, लेकिन वे उसके नहीं होते.

     तीसरी बात यह है कि धार्मिक जीवन के प्रकार नहीं होते हैं. जैसे सागर का पानी सब जगह खारा है, ऐसे ही धार्मिक जीवन का स्वाद भी सब जगहों और सब कामों में एक जैसा ही है. धर्म की अंतरात्मा सदा-सर्वदा एक है, एकरस है.

     चौंथी बात यह है कि आपका सवाल बाहर से पूछा गया सवाल है. धर्म में प्रवेश करते ही ऐसे सवाल तत्काल गिर जाते हैं. धर्म अनुभूति में अद्वैत है. लेकिन बुद्धि अपनी सीमा में प्रत्येक विषय को अनिवार्यतः खंड-खंड कर देती है. क्योंकि विचार की प्रक्रिया ही विश्लेषण है. अनुभूति है सदा संश्लिष्ट और विचार का कहीं भी मिलन नहीं होता है.

     अनुभूति, परमार्थ और व्यवहार एक हैं, ब्रह्मा और माया एक है. परमात्मा और पदार्थ एक हैं. मुक्ति और बंधन एक हैं. लेकिन, बीच में जरा-सा विचार आया कि सब ‘एक’ तत्काल दो हो जाते हैं. और विचार जिन्हें भी तोड़ता है, उनके बीच अलंघ्य खाई रह जाती है. फिर विचार उन्हें जोड़ने की कोशिश में भी पड़ता है. लेकिन वह काम व्यर्थ है, क्योंकि विचार ही तो खाई है. विचार जोड़ नहीं सकता, वह तो केवल तोड़ ही सकता है. विचार का जहां अभाव है, वहां जोड़ है. वस्तुतः वहां कभी कुछ टूटा ही नहीं है.

     बचने की तरकरीब है. सोचना है सदा तट पर और जीवन है सदा सागर की गहराइयों में. छोड़ें तट और कूदें. कितने जन्मों-जन्मों से तो आप सोच रहे हैं? मैं कब से आपको तट पर ही देख रहा हूं? अब बहुत हुआ. अब तो कूंदें. देखें-सुनें, कबीर क्या कर रहे हैं. ‘जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ. मैं बौरी डूबन डरी, रही किनारे बैठ.’

प्रश्नः कहीं-कहीं पर धर्म और व्यवहार में विरोध खड़ा हो जाता है, ऐसी परिस्थिति में सही मार्ग क्या है?

उत्तरः पहली बात तो यह है कि धर्म और व्यवहार में कभी भी विरोध खड़ा नहीं होता है. वह असम्भव है. जैसे प्रकाश और अंधकार में कभी भी विरोध खड़ा नहीं होता है. ऐसे ही जहां प्रकाश है, वहां अंधकार है ही नहीं. तब विरोध खड़ा हो ही कैसे सकता है? उपस्थित प्रकाश और अनुपस्थित अंधकार में तो विरोध असम्भव ही है न? विरोध के लिए कम-से-कम दोनों की उपस्थिति तो एक ही साथ होनी चाहिए न? और ऐसा भी नहीं होता है. जहां प्रकाश है, वहां अधंकार नहीं है. जहां प्रकाश नहीं है, वहां अंधकार है.

     असल में अंधकार का अर्थ ही है, प्रकाश का न होना. उसकी अपनी कोई सत्ता नहीं है. वह तो बस अभाव है किसी का, अनुपस्थिति है किसी की. ऐसा ही व्यवहार है. ऐसा ही संसार है. ऐसा ही अज्ञात है. ऐसा ही अधर्म है. वे सब धर्म की अनुपस्थिति के भिन्न-भिन्न भाग हैं. जब धर्म आता है, तब वे सब चुपचाप हो जाते हैं. धर्म नहीं है, तभी तक वे हैं.

     दूसरी बात यह है कि उधार, सुने हुए धर्म को हम धर्म मान लेते हैं. इससे ही कठिनाई खड़ी होती है. साधारणतः हमारे लिए व्यवहार तो सत्य है और धर्म है कोरा शब्द, इसलिए ही दोनों में विरोध खड़ा होता है. और ध्यान रहे कि यह कहीं-कहीं नहीं, कभी-कभी नहीं, वरन हर कहीं और हर पल खड़ा होता है. यही स्वाभाविक है. यह होगा ही, क्योंकि अंधकार है वास्तविक और प्रकाश है केवल विश्वास. विश्वास अंधकार को तो मिटाता ही नहीं, उलटे हमें और अंधा कर जाता है.

     प्रकाश चाहिए, प्रकाश का विश्वास नहीं. प्रकाश के विश्वास से अधंकार नहीं मिटता है. धर्म चाहिए, धर्म का विश्वास नहीं. धर्म से व्यवहार रूपांतरित होता है और परमार्थ और व्यवहार एक ही हो जाते हैं. या ऐसा कहें तो भी ठीक है कि व्यवहार ही रह जाता है. और जो शेष रह जाता है, उसमें कोई द्वंद्व नहीं है, इसलिए कोई दुविधा भी नहीं है.

     तीसरी बात यह है कि अलग-अलग परिस्थिति में अलग-अलग मार्ग नहीं हैं और न ही अलग-अलग सहीपन है. मार्ग तो एक ही है और जो सही है, वह भी एक ही है. और उस एक का नाम ही धर्म है. उसे जानते ही सभी परिस्थितियां मूलतः समान हो जाती हैं. आकार तो उनके भिन्न रहते हैं, लेकिन आत्मा भिन्न नहीं रह जाती है. जैसे अंधा आदमी सोच सकता है कि अलग-अलग अंधकारों में अलग-अलग प्रकाश आवश्यक होते होंगे, या अलग-अलग आंखें होती होंगी, ऐसा ही हमारा यह सोचना भी है.

     चौंथी बात यह है कि धर्म को खोजें. धर्म और व्यवहार में सामंजस्य हो नहीं. जैसे सामंजस्य की खोज ही बताती है कि धर्म का अभी पता नहीं है. धर्म के आगमन पर तो कभी-कभी सामंजस्य खोजना पड़ता है. क्योंकि सामंजस्य के लिए भी वैसा ही द्वैत आवश्यक है, जैसा कि संघर्ष के लिए. और धर्म का आगमन अद्वैत का है. फिर तो जो है, वही परमार्थ है और वही व्यवहार है. धर्म का आगमन अविरोध का आगमन है. इसलिए  फिर न विरोध है किसी से, न सामंजस्य ही.

     पांचवी बात यह है कि धर्म को स्वयं को छोड़ और कहीं न खोजें, क्योंकि और कहीं से भी मिले धर्म से आपकी समस्या नहीं मिट सकती है.

     वस्तुतः तो और कहीं से मिले धर्म से ही तो वह समस्या पैदा हुई है. उधार धर्म अनिवार्यतः समस्या है, ऐसी समस्या जिसका कि कोई भी समाधान नहीं है, क्योंकि उधार धर्म स्वयं को समाधान मान लेता है, जो कि वह नहीं है और ऐसी समस्या का कोई भी समाधान नहीं है, जो कि स्वयं को ही समाधान मानती है, ऐसी बीमारी का इलाज ही क्या हो सकता है, जो कि स्वयं को स्वास्थ्य समझती है?

     लेकिन स्वयं धर्म निश्चय ही समाधान है. पर वह मिलता है समाधि से. समाधि के अतिरिक्त समाधान और कहीं से मिल भी कैसे सकता है? धर्म को खोजें अर्थात समाधि को खोजें. शास्त्र से बचें, शब्द से बचें, विचार से बचें. निर्विचार ही द्वार है. शून्य में ही सत्य है. वही है धर्म. उसे जानकर कुछ भी जानने को शेष नहीं रहता.          

(अप्रैल 1971)

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