उड़ान भरती आकांक्षाओं का सच – रामशरण जोशी

आवरण-कथा

हैदराबाद के केंद्रीय विश्व-विद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या से उत्पन्न राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध के क्षणों में 43 बरस पुरानी याद मन-मस्तिष्क पर दस्तक दे रही है. यह याद 1973 के दलित पैंथर आंदोलन से जुड़ी हुई है. मैं और मेरे कुछ साथी इस आंदोलन में भाग लेने के लिए दिल्ली से मुम्बई गये थे. मैं अपने दोस्त और चर्चित मराठी नाटक ‘थैंक यू मिस्टर ग्लाड’ के लेखक अनिल बर्वे के साथ रुका था. वे मराठी के मशहूर लोकगायक शाही अमरशेख के दामाद थे. वे अपनी पत्नी प्रेरणा, सलेज मल्लिका और सास के साथ रह रहे थे. महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन के पास स्थित अमरशेख का मकान दलित आंदोलनकारियों का एक तरह से छोटा-मोटा अड्डा बना हुआ था. इसकी एक वजह  यह भी थी कि पैंथर आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के नेता नामदेव ढसाल का अनिल बर्वे के यहां अक्सर आना-जाना लगा रहता था. बर्वे और उनका साप्ताहिक पत्र- ‘रणांगन’ दलित आंदोलन के समर्थक थे. वे इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे. अनुचित बातों को लेकर वे इसके नेतृत्त्व की आलोचना भी किया करते थे. मूलत पुणेवासी बर्वे नक्सल आंदोलन से निकले थे, जेल भी हो आये थे. समाजवादी नेता हमीद दलवाई के साथ भी उनकी अच्छी दोस्ती थी.

जब भी हम तीनों (मैं, नामदेव और अनिल बर्वे) एक साथ बैठते थे, आंदोलन की दशा-दिशा को लेकर काफी गरम बहसें हुआ करती थीं. मेरा और बर्वे का मत था कि आंदोलन अपने निश्चित मार्ग से भटकने लगा है. यह स्पष्ट विचारधारा से लैस नहीं है. यह कांग्रेस के एक गुट के हाथों में खेल रहा है. इसके निचले स्तर पर लुम्पन तत्त्व हावी होते जा रहे हैं. नामदेव के साथ-साथ इसके अन्य कतिपय नेताओं की जीवन शैली खर्चीली प्रतीत होती है. स्वयं नामदेव को मदिरा की लत थी. मेरा मानना था कि जब तक नेतृत्त्व की जीवन शैली में सादगी और स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य नहीं होंगे, तब तक आंदोलन भटकता रहेगा. दलितों को वास्तविक मुक्ति नहीं दिला सकेगा. वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण नहीं कर सकेगा. ज़रूरी यह भी है कि इस आंदोलन
का व्यापक जनाधार तैयार किया जाये. समाज के दूसरे वर्गों का भी समर्थन प्राप्त किया जाये.

हम दोनों के साथ नामदेव ढसाल की असहमति के अपने कुछ ठोस सामाजिक और ऐतिहासिक कारण भी हुआ करते थे. ढसाल का पहला हमला हम दोनों की जाति को लेकर होता. वे कहते हम दोनों सवर्ण हैं, ब्राह्मण हैं, दलितों के संसार को समझ ही नहीं सकते क्योंकि सवर्णों ने उनका सदियों से शोषण-उत्पीड़न किया है. रामायण काल से ही उन्हें ज्ञान व कौशल से वंचित रखा है. शम्बूक-वध इसका उदाहरण है. पिछड़ी जाति के एकलव्य को धनुर्विद्या व कौशल से वंचित किया गया. सवर्ण बौद्धिक वर्गों ने बाबा साहब आंबेडकर को वांछित आदर-सम्मान नहीं दिया. उनके योगदान की परोक्ष रूप से उपेक्षा ही की गयी. दूसरा हमला यह होता कि महात्मा गांधी ने दलितों को ‘हरिजन’ की संज्ञा देकर उनके प्रति ‘दया भाव’ पैदा करने की कोशिश की है, न कि उनके लिए समता व गरिमा का भाव पैदा किया है. गांधी जी ने आमरण अनशन करके बाबा साहब को ‘पूना पैक्ट’ के लिए मजबूर किया. इससे दलित समाज का कोई ठोस हित नहीं हुआ. उनका यह हमला भी कम वज़नी नहीं रहता कि आप दोनों मार्क्सवादी दलितों के जीवन संघर्षों, त्रासदियों को समझ ही नहीं सकते क्योंकि मार्क्सवादियों का दर्शन वर्ग-चेतना एवं वर्ग संघर्ष के पार देखता ही नहीं है. यद्यपि आप लोग हमारे सहयात्री हैं, लेकिन आप लोगों के नेतृत्त्व में दलित समाज की ‘जेनुइन आज़ादी’ सम्भव नहीं है. भारत में जाति-संरचना और इसकी प्रभावी भूमिका को नज़रंदाज़ करना गलत होगा.

प्रखर दलित कवि स्वर्गीय नामदेव ढसाल के इन प्रहारों को खारिज करना गलत रहेगा. आज के विवादों के संदर्भ में ये गम्भीर पुनरावलोकन की मांग करते हैं. भूमंडलीकरण और सुपर टेक्नोलॉजी के परिप्रेक्ष्य में दलित बनाम शेष समाज व दलित बनाम राष्ट्र राज्य पर नये सिरे से एक ताज़ा विमर्श की ज़रूरत है. रोहित-प्रकरण से वे ज़ख्म फिर से ताज़ा होने लगे हैं जो कि समझ लिये गये थे कि ये भर चुके हैं, या इनके दर्द ठंडे पड़ गये हैं. सच, रोहित विवाद ने राष्ट्र राज्य को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है, संसद के भीतर और बाहर, दोनों ही क्षेत्रों में लगभग सभी राजनीतिक दल इससे कम-अधिक प्रभावित दिखाई देते हैं. इसका एक ठोस कारण भी है- 2017 तक कई प्रदेशों में चुनाव होंगे. इसलिए सभी को 18-19 प्रतिशत दलितों का वोट-जखीरा नज़र आ रहा है. इसलिए कोई भी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दल जोखिम नहीं लेना चाहता. यद्यपि, इस प्रकरण को लेकर सिविल सोसाइटी तथा अन्य समाजकर्मियों की चिंताएं वाजिब भी हैं. यह संयोग भी विचित्र है कि रोहित प्रकरण और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कन्हैया कुमार- विवाद परस्पर पूरक बन गये हैं, हालांकि दोनों की संदर्भ पृष्ठभूमियां भिन्न हैं. लेकिन ये दोनों ही बृहत् विद्यार्थी समाज, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और परिवर्तित राजनीति में राज्य की कार्यशैली से टकराते हुए लग रह हैं. दलितों में यह धारण उभरने लगी है कि दिल्ली का वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान वर्चस्ववादी व सवर्णवादी है. पिछड़ा वर्ग को सवर्ण व्यवस्था ने डकार लिया है, उसका ब्राह्मणवादी व्यवस्था में आत्मसातीकरण हो चुका है इसलिए वह परोक्षरूप से दलित विरोधी है. ग्रामीण भारत, विशेषरूप से हिंदी पट्टी, में पिछड़ों और दलितों के मध्य सामाजिक-सांस्कृतिक टकराव उभर रहे हैं. क्योंकि पारम्परिक सवर्ण नेतृत्त्व अपने अवसान दौर में है. इससे पैदा हो रही नेतृत्त्व रिक्तता को कौन-सी सामाजिक-आर्थिक शक्तियां भरें, इसे लेकर दलितों और पिछड़ों में नेतृत्त्व प्रतिस्पर्धा भी लगी हुई है. निस्संदेह, 1990 में सामाजिक न्यायवादी आंदोलन और मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के पश्चात देश के पिछड़ा वर्ग की जातियों में गुणात्मक परिवर्तन आया है. लेकिन, सामाजिक स्तर पर कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आये. दलितों के प्रति ऊंची व मझोली जातियों का सोच या माइंड सेट मध्ययुगीन या सामंती ही रहा.

वैज्ञानिक चिंतन से लैस देश के मार्क्सवादी भी जाति संरचना की गतिकी (डायनामिक्स) को ठीक प्रकार से समझ नहीं सके- देश के शिखर मार्क्सवादी नेता- इंद्रजीत गुप्ता और ज्योति बसु ने अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले पाक्षिक ‘फ्रंट लाइन’ को दिये गये अपने साक्षात्कारों में स्वीकार किया है कि हम मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष पर अधिक ज़ोर देते रहे, लेकिन भारत में जाति संरचना और इसकी भूमिका पर फोकस नहीं कर सके. यह हमारी बड़ी भूल थी. इसी तरह समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ‘अगड़े-पिछड़ों’ की तो बात करते हैं लेकिन दलितों पर ज़रूरी ध्यान नहीं दे पाते. आम्बेडकरवादियों की दृष्टि भी एकांगी रही है. देश में स्वाधीनता आंदोलन के दौर से ही साम्यवादियों, समाजवादियों और आम्बेडकरवादियों का कोई राष्ट्रीय स्तर का गठबंधन रहता तो ये तीनों शक्तियां सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तन के लिए साझा आंदोलन करतीं. देश के बहुआयामी संरचनात्मक परिवर्तन की दृष्टि से क्या यह महागठबंधन प्रभावशाली सिद्ध नहीं होता? बाबा साहेब का यह चिंतन सही है कि दलितों को राजनीतिक आज़ादी के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक आज़ादी भी चाहिए. पंद्रह अगस्त 1947 को वे राजनीतिक रूप से ज़रूर स्वाधीन हुए लेकिन सामाजिक रूप से वे परतंत्र ही रहे हैं. अस्पृश्यता उन्मूलन कानून के बावजूद दलितों को सवर्णवादी भारतीय समाज में गरिमामय स्थान कहां मिला है? बहुत पुरानी बात नहीं है. जनता पार्टी सरकार (1977-79) के उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम जब वाराणसी गये और पंडित मदनमोहन मालवीय की मूर्ति को माल्यार्पण किया तो काशी के पंडितों ने इसका घोर विरोध भी किया. क्योंकि बाबूजी दलित पृष्ठभूमि से हैं इसलिए मालवीय जी की मूर्ति अपवित्र हो गयी है. यहां तक कि माल्यार्पण के बाद इन तथाकथित पवित्र पंडितों ने मूर्ति को गंगाजल व दूध से धोकर उसका पवित्रीकरण किया था. प्रकांड विद्वान बाबा साहेब को बड़ौदा में सवर्णों ने घर देने से मना कर दिया था. जब बाबा साहेब, बाबूजी जैसे शिखर नेताओं के साथ ऐसा घट सकता है तब आम दलितों के प्रति भारतीय समाज का कैसा व्यवहार रहता होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. मेरे कतिपय दलित मित्रों व विद्यार्थियों की शिकायत रहती है कि उन्हें सवर्ण बाहुल्य बस्तियों व अपार्टमेंटों में आसानी से किराये पर घर नहीं दिये जाते हैं. एक विश्वविद्यालय में मेरी एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने अपनी दलित पहचान इसलिए छुपा कर रखी क्योंकि उसे भय था कि यदि उसकी जाति का पता चल गया तो वह अपने स्टाफ की नज़रों में गिर जायेगी. उसके साथी व विद्यार्थी उसे वांछित आदर-सम्मान नहीं देंगे. लोकतांत्रिक भारत में दलित नागरिक की यह कैसी दारुण दशा है!

रोहित के साथी विजय कुमार, उमा महेश्वर, रामजी चिंतागाडा, सेशैह चेदमुदागुन्ता जैसे विद्यार्थी बंधक व खेतिहर श्रमिक परिवारों से हैं. इससे स्पष्ट है कि ग्रामीण भारत की खेतिहर श्रमिक शक्ति का मुख्य आधार आज भी दलित व आदिवासी हैं. 1978 में राष्ट्रीय श्रम संस्थान व गांधी शांति प्रतिष्ठान ने मिलकर राष्ट्रीय बंधक श्रमिक सर्वेक्षण किया था. मैं इसकी केंद्रीय टीम का सदस्य था. सर्वेक्षण का निष्कर्ष था कि अधिकांश बंधक श्रमिक दलित परिवारों से हैं. तेलंगाना क्षेत्र की स्थिति सबसे चिंताजनक थी. मैंने स्वयं मेढक, महबूबनगर, जैसे जिलों में अध्ययन किया और दलितों को अर्द्ध गुलाम अवस्था में पाया. ये सभी दलित थे. यही स्थिति कर्नाटक के मांड्या जिले में देखी. गांव की मुख्यधारा से बाहर एक छोर पर दलितों की बस्तियां हुआ करती थीं. तमिलनाडु में आज भी दलित, गांव में बहिष्कृत रहते हैं. उन्हें प्रताड़ित किया जाता है. उत्तर भारत के दलितों का परिदृश्य भी इससे अलहदा कहां है. बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा के गांव में आज भी दलित घोड़ी पर बैठ कर बारात नहीं निकाल सकते. वे सवर्णों की भांति उत्सव नहीं मना सकते. दाह संस्कार नहीं कर सकते. उनकी श्मशानभूमि अलग होती है. गंगा घाटों पर पण्डे भी आसानी से दलितों के पिंडदान के लिए तैयार नहीं होते हैं. दलितों के साथ वैवाहिक सम्बंध तो ‘दिवास्वप्न’ है ही यह मेरा अनुभवजन्य अवलोकन है. क्या भारत जैसे गणतांत्रिक-लोकतांत्रिक भारत के लिए ऐसे दृश्य शर्मनाक नहीं हैं?

2016 में 1973 के सवालों का उठना कहीं यह त्रासद संदेश देता है कि दलितों के लिए वक्त ठहर तो नहीं गया है? कहीं इक्कीसवीं सदी बीसवीं सदी का विस्तार मात्र तो नहीं है? बेशक, संविधान ने अनुसूचित जाति की परिभाषा से दलितों को नयी शासकीय पहचान दे दी है. इससे संसद-विधानसभाओं और सरकारी क्षेत्रों में इस वर्ग के लिए स्थान-पद सुरक्षित हो गये हैं, इससे इनकार नहीं है. लेकिन क्या सांविधानिक प्रावधान दलितों की ज़िंदगियों में आधारभूत परिवर्तन ला सके हैं? अनेक पंचवर्षीय योजनाओं, संचार क्रांति, कॉरपोरेटी पूंजीवाद के बावजूद दलितों को ‘निम्न मनुष्य ‘क्यों समझा जाता है? सवर्ण उपचेतना में उन्हें ‘मंद अक्ल’ का माना जाता है. इतने करीब होते हुए भी दलितों को दहलीज पर ही रोक दिया जाता है! दलितों के ‘अस्मिता उभार’ का स्वागत करने के बजाय उनको निरुत्साहित व प्रताड़ित करने के नाना उपक्रम रचे जाते हैं. इसके चंद ठोस समाजशास्त्राrय कारण हैं. औपनिवेशिक काल में दलितों की कोई संवैधानिक हैसियत नहीं थी. उन्हें निरीह प्राणी समझा जाता था. लेकिन उत्तर औपनिवेशिक काल में उनकी राजनीतिक हैसियत तो बनी है. पहले उनका अस्तित्व संघर्ष का दौर था. इसके बाद स्वतंत्र पहचान का दौर शुरू हुआ. आज ‘दलित अस्मिता’ का काल है. इस दौर में दलित भारतीय अपने सभी प्रकार के बंधनों से आज़ाद होना चाहता है. उसे अपनी सम्पूर्ण अस्मिता की स्वीकृति चाहिए. वह जीवन के हर क्षेत्र में उन तमाम अवरोधों से टकराना चाहता है जो अबतक उसे सभ्य मनुष्य का दर्ज़ा देने से इनकार करते रहे हैं. रोहित का अंतिम पत्र दलित के आंतरिक व बाह्य संघर्षों की ही तो अभिव्यक्ति है. गैर दलितों को यह अस्मिता संघर्ष रास नहीं आ रहा है. वे उसके इस नव प्रस्फुटित ऊर्जा और अस्मिता संघर्ष को निर्णायक रूप से दबा देना चाहते हैं. गैर दलित जानते हैं कि अब दलितों की आकाक्षाएं उड़ने लगी हैं. वे महत्त्वाकांक्षी बनने लगे हैं. आज ‘दलित पूंजीवाद’ का नारा लगाया जा रहा है. देश में दलित उद्यमी चैम्बर स्थापित हो गया है. दलित पूंजीपति अस्तित्व में आने लगे हैं. दलितेतर वर्गों को यह आक्रामक अस्मिता पच नहीं पा रही है. यह महज़ इत्त़ेफाक नहीं है कि हैदराबाद विश्वविद्यालय में विगत कुछ सालों में खुदकुशी करनेवाले विद्यार्थियों में अधिकांश दलित समाज से हैं. विभिन्न अध्ययन बतलाते हैं कि गांव में दलित छात्र-छात्राओं को पढ़ाई से निरुत्साहित किया जाता है. उनके साथ भेद-भाव किया जाता है. इस विषम स्थिति में दलित विद्यार्थी स्कूल छोड़ देते हैं. जब स्वतंत्र भारत में ऐसे परिवेश की निर्मिति की जाती है तब वे इतने पास होते हुए भी उतनी दूर क्यों न जाएं? जब तक दलितों का यह ‘आंतरिक उपनिवेश’ रहेगा, इसका अंत नहीं किया जायेगा, तब तक हमारा लोकतंत्र-गणतंत्र आधा-अधूरा रहेगा. 

अप्रैल 2016

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