उज्ज्वल भोर की आंखों का अश्रुपूरित कोर

♦   गौतम सान्याल   >

मैं सदैव से कहता आया हूं कि व्यंग्य मेरे लिए मात्र विद्रूप का प्रतिभाष्य या जीवन की विसंगतियों का चिह्नीकरण नहीं है, इसी तरह मात्र वह प्रतिघात का माध्यम भी नहीं है. वह मेरे लिए साहित्य की विधा या चेतना (बकलम परसाई) नहीं है… व्यंग्य मेरे लिए वह उत्तुंग और तीक्ष्ण हिमानी चोटी है जो साहित्य की निस्सीम उड़ान के नीलाकाश में खुभी हुई दिखाई देती है. कहने का आशय यही है कि साहित्य को जब भी मैंने उसके उच्चतम शीर्ष पर पहुंचे हुए पाया है, उस प्रकर्ष पर मैंने व्यंग्य को चमकते देखा है.

अतएव मेरे लिए कबीर-भारतेंदु-बालमुकुंद गुप्त की शब्दताई से लेकर ‘राग दरबारी’ के साथ-साथ, ‘गोदान’ और ‘मैला आंचल’ भी व्यंग्य है. इसीलिए अपना महाभारत, होमर का ‘इलियड’, वर्जिन के ‘एनीड’ से लेकर शेक्सपीयर का ‘मैकबेथ’, और सर्वेंतीस के ‘डॉन क्विग्जोट’ के साथ-साथ मारक्वेज का ‘वन हंड्रेड इयर ऑफ़ सालिच्युड’, जोसे सरमागो का ‘क्यों’, कामू का ‘अजनबी’, काफ्का का ‘द कैसिल’, चिनुआ अचेबे का ‘थिंग्स फाल एपार्ट’ भी मेरे लिए व्यंग्य ही है, बाद में ये चाहे उपन्यास, नाटक, महाकाव्य हो, तो हो.

कहना तो यही चाहता हूं कि जिन भू-राजनीतिक संदर्भों में ‘राग दरबारी’ मेरे तई व्यंग्य है… बिल्कुल उन्हीं उपलक्ष्यों के कारण ‘मैला आंचल’ भी मेरे लिए व्यंग्य है. मानव की जिस विध्वंसकामिता के लिए कामायनी का चिंता सर्ग मेरे लिए व्यंग्य है, बिल्कुल उसी भावभूमि पर जेम्स कैमेरून की फिल्म ‘अवतार’ या पुराण का भस्मासुर प्रसंग मेरे लिए व्यंग्य है.

व्यंग्य तो मेरे लिए हिग्स बोसेन कण की तरह है जो पदार्थ के प्रत्येक कण को वजन, स्थिरता और रूपाकार देता है. उच्चतर साहित्य के प्रत्येक कण को पद और अर्थ देता है.

इस सृष्टि में ईश्वर क्यों नहीं दिखाई देता? क्यों वह मनुष्य से भागा-भागा मुंह छिपाये फिरता है? सीधा-सा उत्तर है कि जबसे मनुष्यों ने हंसने और व्यंग्य करने की क्षमता को स्वयं में विकसित कर लिया है, तबसे वह उसकी दुनिया से ही दुम दबाये भाग खड़ा हुआ है– कहीं मनुष्य उसके पाखंड, उसकी सृष्टि की विसंगति पर, उसके व्यर्थ और अर्थहीन होने पर फिच्च् से हंस न दे, कोई फिकरा कस न दें! इस सूत्र की तनिक व्याख्या अपेक्षित है.

दार्शनिक अरि बर्गसां ने अपनी पुस्तक   ‘ला रियरे’ में लिखा है, ‘किसी प्राकृतिक परिदृश्य व नैसर्गिक परिघटना को गौर से देखिए… वह स्वयं में सुंदर या कुरूप, भव्य या कुत्सित, साधारण या विलक्षण, आकर्षक या अनाकर्षक, मनोहर या विडिम्बित, स्निग्ध या भीषण (अर्थात ‘मेघदूत’ हो या आतंकित करता अशनिपात), तुच्छ, या महिमामंडित… कुछ भी हो सकता है, मगर वह किसी भी स्तर पर हास्यकर या हास्यास्पद (व्यंग्यपूर्ण या व्यंग्यास्पद) नहीं होता या नहीं हो सकता.’ कहने का आशय यही है कि हास्य-व्यंग्य का उपबोध आद्यंत मानविकी भाव है और मनुष्य ने ही स्वयमेव इसका आविष्कार किया है. यह मनुष्य की स्व-अर्जित उपलब्धि है. कदाचित् हास्य-व्यंग्य ही वह मानविकी भाव है जिसकी सृष्टि में ईश्वर का कोई हाथ नहीं है. व्यंग्य मानव सभ्यता और समाज की विसंगति से उपजता है सभ्यता और समाज ही उसका उत्स है, उसका उपजीव्य है, उसका गंतव्य है.

व्यंग्य इस दुनिया को ईश्वर के आतंक से मुक्त कर देता है. सवाल है कि इस दुनिया को हिटलर के आतंक से किसने मुक्त किया? हिटलर के आतंक से इस दुनिया को मुक्त किया एंटी-फासिस्ट लेखन ने और इस दुनिया को हिटलर की दहशत ने मुक्त किया चार्ली चैपलिन ने. दि ग्रेट डिक्टेटर उसने फिल्म बना दी और हिटलर को हास्यास्पद बना दिया, उसने साबित कर दिया  कि हिटलर आतंकित होने की चीज़ नहीं है बल्कि हंसने की चीज़ है. 

कहना यही है कि व्यंग्य इस दुनिया को ईश्वर की गुलामी के आतंक से ही मुक्त नहीं करता, वह ईश्वर को ही आतंकित कर देता है!

राज्याश्रय हो धर्माश्रय, व्यंग्य आश्रय में कभी नहीं पलता है. वह अन्य और वन्य प्राणी है जो आलतू-फालतू-पालतू कभी नहीं होता. वह सत्ता की छांह में कभी नहीं फलता, क्योंकि फल ही नहीं सकता.

सभी जानते हैं कि पिंजड़े का पंछी कभी अंडे नहीं देता. अंडों के लिए उन्मुक्त उड़ान और एक घोंसला चाहिए, खुला हुआ आकाश, निर्बाध प्रकृति और बेशुमार आज़ादी चाहिए.

स्वाधीनता तो आंख की कनिनिका (रेटिना) है, जो गिर जाये तो लेखक अंधा हो जाता है. यह व्यंग्य ही है जो लेखक से कह सकता है, कह पाता है… कचरा तुम्हारी आंखों में है और तुम बार-बार अपने चश्मा साफ़ कर रहे हो!

व्यंग्य विसंगतियों व बेढब का मात्र चिह्नीकरणा नहीं है, वह दुनियादारी में एक सुचिंतित, तर्कपूर्ण और सक्रिय हस्तक्षेप भी है. व्यंग्य मात्र विरोध नहीं बल्कि वह प्रतिरोध भी है. व्यंग्य विपक्ष का स्वर, प्रतिपक्ष का बेफीस वकील, सत्य का गुमाश्ता और टकराव का पेशकार है.

रचना की दुनिया अंततः (मिखाइल बख्तिन) बातों की दुनिया ही है. बातों की इस दुनिया में होता यह है कि अक्सर वितर्क जंगल हो जाता है जहां सोच राह भूल जाती  हैं. तब व्यंग्य की चाबुक की फटकार ही दिग्भ्रमित सोच को राह पर ले आती है.

सम्भ्रांत और संस्कार, व्यंग्य के ये दो शत्रु हैं. व्यंग्य असभ्यता है. व्यंग्य एक ऐसा असभ्य दर्पण है जिसमें शालीनता और सभ्यता अपना चेहरा देखकर थर्रा जाती है.

मौलिकता और सम्भाव्यता व्यंग्य के ये दो डैने हैं. ये छांट दिये जायें तो व्यंग्य और एक गिरगिट में कोई अंतर नहीं रह जाता. व्यंग्य कल्पना का सीमांत है, अनुमान का प्रत्यंत है, सम्भाव्य का विस्तीर्ण है. व्यंग्य कथ्य का महज पहनावा नहीं बल्कि ‘अकथ’ की देह में प्रवाहित लहूधार है. संक्षेप में, व्यंग्य असम्भव का कथ्य है. अन्य साहित्य रूपों में जिसे कहना सम्भव नहीं, व्यंग्य में उसे अनायास ही कह दिया जा सकता है.

सबसे बड़ा प्रश्न है कि व्यंग्य लिखने का अधिकारी कौन है? किसके पास व्यंग्य की अथॉरिटी है कि वह व्यंग्य लिखे? व्यंग्य लिखने की हकदारी किसके पास है?

जो दलाल है, समझौतापरस्त है, पराधीन है, छलिया है, भयग्रस्त है, तथा व्यवस्था व सत्ता के पिछले दरवाजे के टोहिया हैं.. वे व्यंग्य लिखने के हकदार नहीं हैं. जो विध्वंस में निर्माण नहीं कर सकते, वे व्यंग्यकार नहीं हो सकते.

जिनके हाथ पत्थरों के नीचे दबे होते हैं, वे व्यंग्य लिखने के अधिकारी हैं. जो अपना घर जलाकर मुहल्ले में रोशनी करना चाहते हैं, वे व्यंग्य लिखने के अधिकारी हैं, जो योद्धा हैं, उन्मादी हैं, सती हैं, सूरां हैं… वे व्यंग्य लिखें. संत और कंत (प्रेमी) व्यंग्य लिखें.

दुनिया भर के लिए दुआ मांगने वाले हाथ व्यंग्य लिखें. जिनके पास चील की दृष्टि और नीलकंठ की सहनशीलता हो, वे व्यंग्य लिखें. जो सच को सच की तरह देख पाते हों, सुन पाते हों, बोल पाते हों, वे व्यंग्य लिखें.

भाषा के स्तर पर व्यंग्य स्वयं में अंतिम फैलसा ही है. यानी कि एक अंतर्वस्तु, उसके अनुकूल एकमात्र भाषा और एक ही कलम. भाषा के स्तर पर व्यंग्य की पुनरावृत्ति सम्भव नहीं. उच्चतर व्यंग्य के कलमकार की कलमें, किसी न्यायाधीश की वह कलम होती है  जिसके निब को प्रतिबार यह लिखकर तोड़ देना पड़ता है. एक ही कलम से दो श्रेष्ठ व्यंग्य की रचना सम्भव नहीं. जिस कलम से ‘मैला आंचल’ लिखा गया था, उसी कलम से ‘परती-परिकथा’ लिखने का हश्र क्या हुआ, इसे सभी जानते हैं.

व्यंग्य की भाषा अंततः हमसे यही कहती है कि भाषा को बचाने का एकमात्र उपाय यही है कि भाषा पर निरंतर आक्रमण करो, धावा बोलो पीलियाये शब्दों पर, निस्तेज बिम्बों और घिस गये प्रतीकों पर, अलंकृत-मसृण- सम्भ्रांत शब्दावली की जड़ें उखाड़कर उसमें मट्ठे भर दो, अभिजात छंद-बंध के ताजमहल देखते ही गुलेल साध लो संक्षेप में, कबीर की भाषा, परसाई की भाषा हमसे यही कहती है.

ध्यातव्य है कि इस दुर्धर्ष समर में वह स्वयं बिखर जाती है. कहना न होगा कि व्यंग्य जीवन की विसंगतियों का सीधा साक्षात्कार है, अतएव निरंतर जूझते हुए वह स्वयं टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती है. व्यंग्य के शब्द उस साफ्ट-नोज्ड बुलेट की भांति होते हैं जो टारगेट पर लगते ही स्वयं छितरा जाते हैं.

व्यंग्य शाब्दिक अनुभव का चूड़ांत है. व्यंग्य के शब्दों का कोई पर्यायवाची नहीं होता कोई विकल्प नहीं होता. वह एकल और अंतिम शब्द होता है. व्यंग्य के शब्द क्युबिक नहीं होते बल्कि क्रिस्टल (मणिम) होते हैं.

व्यंग्यकार रचना की दुनिया की सर्वाधिक हताहत मानविकी- स्थिति होता है. पारावार अंधियाले में डूबा हुआ… बार-बार हारा हुआ एक तनहा सिपाही  जो बार-बार पराजित तो होता है मगर पराभूत कभी नहीं होता, बार-बार पस्त तो होता है मगर ‘निरस्त’ कभी नहीं होता. यह फिनिक्स की तरह बार-बार भस्म से उठ खड़ा होता है.

रचना की दुनिया में व्यंग्यकार सबसे अधिक रोता है और अपने घाव धोता है, ताकि यह ताज़ा रहे, हरा रहे, टीसते रहे हरदम. व्यंग्यकार, जख्मों की रोशनी में रचना करता है!

मार्क ट्वेन ने नर्क में जाने की सलाह इसीलिए दी है कि स्वर्ग में हास्य नहीं है. हास्य का रहस्यमय स्रोत खुशी नहीं पीड़ा है. स्वर्ग में हास्य नहीं है. नीत्शे का कहना है कि मनुष्य इस विश्व में इतने उत्पीड़न में इतने यंत्रणादायक ढंग से रहता है कि उसे हास्य की खोज करने के लिए बाध्य होना पड़ा.

कहना यही है कि व्यंग्य और करुणा में गहरा घालमेल है, सूक्ष्म अंतर्बंध है, गहरा याराना है. कदाचित करुणा के रिसाव से ही ‘वरुणा’ है जो संत्रास की ‘अस्सी’ पीड़ा के साथ मिलकर साहित्य का तीर्थ बन जाता है– तीरथ वाराणसी! व्यंग्य उज्ज्वल भोर की आंखों का अश्रुपूरित कोर है जिसमें भीषण यातनामयी बीती रात की शबनम झिलमिलाती है. व्यंग्य तो…

तुम तो सूरज हो, खबर है कि तुम्हें पाने के लिए

ज़िंदगी कितने अंधेरों से निकलकर आयी!

(मार्च 2014)

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