इतिहास देखने का चश्मा

  ♦   डॉ. बुद्धप्रकाश         

      इतिहास एक तथ्यात्मक विद्या है. साक्ष्य के आधार पर एकत्रित तथ्य इसके मेरुदंड है. इन तथ्यों को यथासम्भव ठीक उसी रूप में प्रस्तुत करना, जिसमें वे घटित हुए हों, इतिहास का सबसे पहला कर्तव्य है. उन्हें किसी भी प्रकार तोड़ना-मरोड़ना इतिहास के वास्तविक स्वरूप के एकदम प्रतिकूल है. साथ ही उसे किसी प्रकार के प्रचार का उपकरण बनाना, उसकी हत्या करना है.

     किंतु एकपक्षीय दृष्टिकोण को त्यागकर जीवन के सर्वांगीण परिप्रेक्ष्य को उपस्थित करना भी इतिहास का प्रमुख दायित्व है, जिससे पाठक उसके अच्छे-बुरे सभी पक्षों के प्रति सजग और सचेत हो सके.

     इस दृष्टि से भारतीय इतिहास को देखने पर पता लगता है कि उसके अध्ययन-अध्यापन में बहुत कमियां हैं.

     भारतीय इतिहास को राजाओं, ययोद्धाओं और सेनापतियों ही का इतिवृत्त मानकर राज्याभिषेकों, युद्धों और जय-पराजयों का तिथिक्रम मात्र समझा जाता है. इससे विरोध, वैमनस्य, क्षेत्रीयता और संकीर्णता के चित्र दृष्टिपथ को घेर लेते हैं और अपार जनता का शांत, स्निग्ध, सहयोगपूर्ण और एकतापरक जीवन एकदम ओझल हो जाता है.

     हम राजवंशों के संघर्ष से यह समझ बैठते हैं कि देश के विभिन्न भागों के लोग सदा से लड़ते-झगड़ते रहे हैं और इस बात को भूल जाते हैं कि प्रत्येक युग में व्यापारी, कारीगर, किसान, शिल्पी, साहित्यकार, पर्यटक, तीर्थयात्री, धर्म-प्रचार आदि समाज के अधिकांश वर्ग आपस में मेल-मिलाप, सहयोग और सद्भाव से हर प्रांत और प्रदेश में रहते और काम करते रहे हैं.

     उदाहरण के लिए, संस्कृत भाषा के प्रसिद्ध वैयाकरण पाणिनी सिंधु नदी पर दंड के निकट शलातुर के निवासी थे, तो दूसरे महान आचार्य कात्यायन दक्षिण के रहने वाले थे, और तीसरे महान शब्दशास्त्राr पंतजलि का कार्यक्षेत्र पूर्व में पाटलिपुत्र था.

     रत्नागिरी जिले के विजयदुर्ग के एक विद्यालय में लाट, कर्णाटक, मालवा, कन्नौज, गोदावरी प्रदेश, महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, हरियाणा और सिंध आदि के विद्यार्थी पढ़ते और आपस में मिल-जुलकर रहते और खेलते-कूदते थे.

     इनके लिए सारा देश और समाज एक था और स्थानीय राजनीतिक संघर्ष कोई विशेष अर्थ नहीं रखते थे. इस बात को समुचित महत्त्व देना इतिहासकार का कर्तव्य है.

     भारतीय इतिहास के लेखन और अध्यापन की दूसरी बड़ी कमी यह है कि इसके प्रमुख पक्षों को साप्रदायिक रंग दे दिया जाता है. इसमें शक नहीं कि राजनीतिक व्यक्तियों ने अपने हितों के लिए बहुधा धर्मों और सप्रदायों का प्रयोग अथवा दुरुपयोग किया, किंतु यह भी सत्य है कि उनका वास्तविक लक्ष्य अपनी शक्ति बढ़ाना, अपनी सत्ता दृढ़ करना और अपने राज्यों का विस्तार करना था.

     इस वर्ग में जो शक्ति-संचय की नीति और उसके फलस्वरूप विजय-पराजय के क्रम और विद्रोह-दमन के वृत्त या स्थानीय स्वायत्तता और केंद्रीय आधिपत्य के द्वंद्व चलते थे, वे अक्सर धर्म का कलेवर धारण कर लेते थे, लेकिन उनके लक्ष्य और उद्देश्य उससे कोसों दूर थे. उनके सहचरों और पिछलग्गुओं का विभाजन भी धर्म के आधार पर नहीं था. जैसे, औरंगजेब के साथ जयसिंह और जसवंतसिंह थे, तो मराठों के तोपखाने का अध्यक्ष इब्राहीम खां गर्दी था, जो पानीपत के तीसरे युद्ध में प्राणपण से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ.

     इन लोगों के अलावा संत-महात्माओं का एक दल था, जो सब संप्रदायों के सह-अस्तित्व पर बल देता और सबकी भलाई की कामना करता था. उदाहरण के लिए शाहजहां के समकालीन शेख मुहीवुल्लाह इलाहाबादी ने घोषणा की थी कि धर्म हिंदू और मुसलमानों में भेद करने की अनुमति नहीं देता और शेख सरमद ने भगवान के सर्वव्यापी प्रेम रूप का निरूपण किया.

     इन बातों से स्पष्ट है कि भारतीय इतिहास में भावनात्मक एकता को दृढ़ करने वाले अनेक तत्त्व हैं, जिन्हें सामने लाना इतिहासकार का कर्तव्य है.

(मार्च 1971)

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