आधे रास्ते (दूसरी क़िस्त)

काशीराम काका के पुत्र नवनिधिराम भी वकील थे. वे टीला छोड़कर पास ही के मुहल्ले में एक हवेली में जा रहे थे. वेस्वभाव से सतोगुणी और संतोषी थे. अनूपराम मुन्शी के दो पुत्र हवेली में ही. रहते थे. वे अलग थे, पर जायदाद का बंटवारा नहीं हुआ था. बड़े लड़के जमियतराम सबसे बड़े थे. जब से मैंने उन्हें देखा था, अपंगु-से ही थे. वे दिन-भर छज्जे में बैठते, पान चबाते और समय-समय पर अपनी पिचकारी से नीचे जानेवाले त्री-पुरुषों को रंगा करते. उनको लोग ‘छज्जे के मुन्शी’ के नाम से पहचानते थे.

उनके छोटे भाई हरदेवराम (1834-1903) का चित्रण भाई नरसिंह राव ने ‘स्मरण मुकुर’ में किया है. वे गत समय के गुजरात की एक विशिष्टता थे. वे उन्नीसवीं शताब्दी के उतराई की प्रतिष्ठामूर्तियों का दर्शन कराते थे. उनका ठाट-बाट, उनके दोष और उनके संस्कार उनके समय से बाहर नहीं मिल सकते. वे 1834 में पैदा हुए और एलफिन्स्टन कालिज में पढ़े. मैंने यह बात सुनी थी कि वे खेड़ा में मास्टर थे और मणिभाई जशमाई उनके शिष्य थे. बाद में उन्होंने परीक्षा पास करके अहमदाबाद में वकालत शुरू की थी. भोलानाथ साराभाई, हरिलाल सीतलवाड़, नरभेराम ठाकुर, देसाईभाई देसाई, कृष्ण मुखराज महता और कांकरोली के गोस्वामीजी महाराज उनके मित्र थे. बाद में वे मुंसिफ हुए और उस पद से पेन्शन लेकर वे बहुत साल तक ठाकुरजी के मंदिर के ‘रिसीवर’ रहे.

जहां तक मुझे याद है, हरदेवराम मुन्शी को सारा जगत पीछे ‘अधुभाई साहब’ और सामने ‘सरकार’ कहने के अतिरिक्त और किसी नाम से सम्बोधन नहीं करता था. कद में वे मुन्शियों की अपेक्षा कुछ लम्बे और सुंदर थे.

हरदेवराम रणछोड़रामजी के परम भक्त थे और जब ‘रिसीवर’ थे तब अपने गोमतीवाले घर से संध्या करके नित्य रणछोड़जी की पूजा करने के लिए मंदिर में जाते थे. बुढ़ापे में भी उनका कसरती और सुडौल शरीर दृढ़ रहा था. श्वेत रेशमी वत्र की सफ़ाई से मारी हुई पटली कमर से पैरों तक छटा विकीर्ण करती लटकती थी. उनका रंग अत्यंत गोरा और गुलाबी था. संध्या के गुलाबी आकाश में शशिरेखा के समान जनेऊ लटकता था. मुंह पर बुढ़ापे की झलक थी, पर वह सुदंर था. गले में एक रुद्राक्ष की माला रहती थी. नाक नुकीली और आंखें सुंदर और तेजपूर्ण; सफेद और सुहावनी मूंछें, और चोटी; और सबको भव्यता देता हुआ मस्तक पर चंदन का लम्बा त्रिपुंड. हाथ में चांदी का पात्र और आचमनी लेकर, चांदी के पत्तर पर मढ़ी खड़ाऊं वाले दूध-जैसे पैरों से धीमे-धीमे गर्व और गौरवपूर्ण डग भरते हुए वे घर से बाहर निकलते. आगे एक सिपाही चलता और पीछे नौकर सफेद शाल और पुजापा लेकर आता. गोमती के किनारे नहाकर खड़े हुए और नहाते हुए यात्री उनके पैर छूकर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते और ‘सरकार’ तनिक हंसकर, हाथ बढ़ाकर आशीर्वाद देते हुए ठाकुरजी के चरण पखारने चले जाते.

मैंने बहुत से सुंदर वृद्ध देखे हैं, बहुत-से ज्वलंत व्यक्तित्व देखे हैं, परंतु आज मेरी आंखों के सामने बचपन में अधुमाई काका का किया हुआ यह दर्शन खड़ा हो जाता है और मुझे लगता है कि संस्कारी ब्राह्मणत्व की ऐसी तेजस्वी, सुंदर, कलात्मक और ज्वलंत प्रतिभा देखने का सौभाग्य मुझे फिर कभी नहीं मिला.

अधुमाई काका जीवन के रसिया और कलाकार थे. उनका ठाट ही और था. कोदर रसोइया और मोरार नौकर- लम्बे, चौड़े, हृष्टपुष्ट और मस्त, लेकिन नमकहलाल- उनके जीवन के स्तम्भ थे. सरकार उठते कि तापने के लिए अंगीठी तैयार; गर्म पानी तैयार; दोपट्टे और मंजन, जीभी तथा राख प्रदर्शन की भांति सजायी हुई हाज़िर. सरकार के नहाने से पहले ही पहनने की धोती पर एक बड़ा शंख घिस-घिसकर लांग और पटली की तहें बराबर और पतली की जातीं; आज भी धोबी की इत्री तो उसके मुकाबले ठहर ही नहीं सकती. सरकार नहाकर जब संध्या करते तो कोई ज़ोर से नहीं बोलता. सरकार का भोजन अलग. दो पतली चपातियां घी में तैरती रहतीं- वे तर रोटियां सरकार के लिए ही, बचा हुआ घी कोदर पी जाता. भोजन के समय सरकार के लिए तीन पट्टे- सहारा लेने के लिए, बैठने के लिए और थाली रखने के लिए; खास मित्रों अथवा पिताजी जैसों के लिए दो- थाली का नहीं, दूसरों के लिए एक ही- बैठने के लिए. रोज़ रंगों से सांतिये पूरे जाते और अगरबत्तियां जलाई जातीं. सरकार कभी अकेले भोजन न करते; दो-चार मित्र और दो-चार सम्बंधी साथ अवश्य होते. खाते-खाते बातें की जातीं, गप्पें मारी जातीं और आशु कविता भी होती.

सरकार भोजन करके उठते तो शीघ्र सोने चले जाते. नयी चादर बिछा हुआ बिस्तर होता. गरमी हो तो खस की टट्टियां डाली जातीं और घंटे-घंटे-भर बाद उन पर पानी छिड़का जाता. दोपहरी ढलने पर घर का पंडित या मास्टर योगवशिष्ट या महाभारत पढ़ता. उसे सरकार उठकर सुनते और जो वहां हाज़िर होते उन्हें वह रुचि से सुनना पड़ता.

उसके बाद मित्र आते और वार्तालाप चलता कोई साहब या अंग्रेज़ी पढ़ा-लिखा आता तो सरकार बातें करते और थोड़ी-थोड़ी देर में अंग्रेज़ी काव्यों की पंक्तियां कह डालते; कोई विद्वान आता तो संस्कृत साहित्य के चुने हुए सूत्र बोलते; और दक्षिणी होता तो मराठी अभंग सुनाते. सामान्यतः गुजराती और हिंदी सुभाषितों की वर्षा-सी होती रहती और मिलने आने वाला इस प्रखर विद्वत्ता पर बलिहार हो जाता- परंतु एक-दो बार आया हो तो ही. मुझे पहले तो बड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन प्रतिदिन पास बैठने और बढ़ते हुए अध्ययन के कारण इस विद्वत्ता का रहस्य समझ में आ गया. यह विद्वत्ता नहीं थी, कला थी- केवल गिने-चुने सुभाषितों को भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के सामने भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रयोग करने की हथोड़ी थी. उनके वार्तालाप के दो बड़े मौलिक नियम थे. 1-बात करनेवाले को केवल जवाब देने का अधिकार था. 2-सरकार जो कुछ कहें उसका विरोध वह नहीं कर सकता था. इन नियमों का उल्लंघन होते ही बात करनेवाले का मिठास, मेहरबानी और सभ्यता का अधिकार तक्षण छिन जाता और सरकार की उग्रता उसे दुत्कार देती.

रोज़ दिया-बत्ती के समय घर के लोग, पड़ोसी और मित्र इकट्ठे होते और में मराठी भजन करवाते. भजन ‘शांताकारं भुजगशयनं’ से शुरू होता. बीच में मराठी कीर्तन आता- ‘सोपान मुक्ताबाई’ सदैव आता. ‘अच्युतं केशवं’ होता और ‘रघुपति राघव राजाराम’ से भजन पूरा होता. बहुत बार मैंने इस ‘सोपान मुक्ताबाई’ का विचार किया– सोपान का अर्थ है सीढ़ी; मुक्ताबाई सीढ़ी पर चढ़ी  कि उस पर से गिर गयी? …लेकिन यह मुक्ताबाई कौन? बड़ा हुआ तब मैंने इसे महाराष्ट्रीय संत के रूप में पहचाना.

घर में हमेशा वेतन पानेवाला गवैया और तबलची रहता और रोज़ शाम से देर रात तक महफिल जमती. सरकार स्वयं तम्बूरा बजाते और ऊंचे संस्कारी स्वर में शात्रीय संगीत छोड़ते. कहा जाता था कि उन्होंने कांकरोली के किसी गोस्वामी महाराज के साथ संगीत सीखा था- कहां और कब इसका पता नहीं.

उनकी बड़ी लड़की की लड़की छोटी उम्र में विधवा हो गयी. घर में शोक छा गया. सबको भयंकर आघात लगा. इस दुःखद घटना को पांच-सात दिन हुए होंगे. सरकार चबूतरे पर बैठे दातुन कर रहे थे. स्टेशन से एक उत्तरी भारत की वेश्या तबलची और सारंगीवाले के साथ टीले पर आयी.

“अधुभाई सरकार का घर कहां है?”

“क्या है? क्या है? यह क्या?”

सरकार को सलाम करके वेश्या ने हंसकर कहा- “मैं गयी थी कांकरोली. महाराजजी ने कहा है कि यहां तक आयी है तो अधुभाई सरकार का गान सुनकर जा. इसीलिए मैं शीघ्र आयी हूं.’

“अरे उस बाबाजी को क्या फ़िक्र है? हमारे तो घर में आग लग गयी है,” अधुभाई काका दुखी होकर बोले.

“ठीक है, सरकार!” वेश्या ने नम्रता से कहा. “सुना तो मैंने भी है. कैसी आफत है! अल्ला-ताला आप जैसे नामी आदमी को क्यों सताता है? लेकिन सरकार! मैं न पैसे के लिए आयी हूं, न महफिल के लिए. सिर्फ़ एक गाना सुनूंगी और एक सुना दूंगी. बस, कल चली जाऊंगी.”

उत्तरी भारत की वेश्या सरकार का गाना सुनने आती है और दोहती विधवा होती है! इन दो धर्म-संकटों के बीच फंसे सरकार ने क्षण-भर विचार किया और आवाज़ लगायी- “ओछव! मुरार!”

“जी, जी सरकार.”

“यह बला कहां से आ पहुंची? ले जाओ इसको. धर्मशाला में ठहराओ और खाने-पीने का सामान भेज दो. क्या यह हमारा गाना सुनने का वक्त है? हर, हर, हर.” भगवान की ओर देखकर, “क्या वक्त है? प्रभु! रण-छोड़रामजी! अकेले तेरा ही भरोसा है.” इतना फिर से कहकर बाद में धीरे-से बोले, “और ओछव! आयी है सुनने के लिए तो क्या बिना सुनाये कहीं चल सकता है? देख, रात के दो बजे तबले की अटारी में बैठक जमाना. चारों ओर घास के ढेर लगा देना, जिससे कि दुष्ट लोग न सुन सकें.”

सबेरे जब वेश्या विदा हुई तब उन्होंने जी-भर कर सुना था और सुनाया था.

लेकिन उसका संगीत मुझे बहुत ही अरुचिकर लगता था. एक बार बुढ़ापे से शिथिल हुए गले से अधुभाई काका गा रहे थे. मैं चबूतरे पर खेल रहा था. उनका अलाप ‘आ-आ-आ’ के बदले ‘आ-आ-य-आ-आ-य-आ-आ-य’ निकल रहा था.

बाहर मैं उसकी नकल कर बैठा- “हा आय-हा आय-हा आय!”

उन्होंने सुन लिया. “कौन बदमाश है? मोरार पकड़ तो सही. यह है कौन?” वे गरजे.

मोरार के आने से पहले ही मैं नौ-दो-ग्यारह हो गया. लेकिन उसके बाद ‘सरकार’ गाने बैठते कि मैं चुपचाप नकल
करने लगता.

इस पाप के परिणाम स्वरूप मेरे संगीत के संस्कार अविकसित रह गये. आज भी मुझे इसका पश्चाताप होता है.

उन्होंने जीवन को एक नाटक माना था. उसका एक अनाड़ी बाल-नट मैं न्यायासन पर बैठने की धृष्ठता क्यों करूं? अधुभाई काका के जीवन की भी एक विशेषता थी- प्रत्येक कार्य को ठाट के साथ, लोगों को आश्चर्यचकित करनेवाले ढंग से करना. यह विशेषता उनके युग की प्रवृत्ति पर आधारित थी. दूसरे युग को उसे असंगत बताने का क्या अधिकार है!

सरकार के शौक की सीमा नहीं थी. मस्ती, उदारता और आतिथ्य में उन्होंने निरभेराम मुन्शी की कीर्ति को उज्ज्वल रखा था. पर्वों और उत्सवों पर सरकार दावतें देते थे; उनमें मित्र भी सम्मिलित होते थे और अपने तथा मित्रों के बच्चे भी. हम सब बैलगाड़ी में बैठकर गांव के बाहर किसी बगीचे में जाते और लड्डू, खीर तथा पोंक खाते. संगीत और हंसी-मज़ाक में सारा दिन बीत जाता. ऐसे समय उनकी प्रिय मंडली में थे धीरज राम पुराणी-समस्त गुजरात के धीरज काका और देशभक्त छोटुभाई बालकृष्ण पुराणी के काका. ये पिताजी के भी मित्र थे. धीरज काका घर आते कि ऊंघता हुआ घर जाग जाता.

“माकु भाई! ऐ रायसाहब! आऊं क्या?” दरवाज़े में घुसते हुए वे इतना कहते और पिताजी खिड़की में से जवाब भी नहीं दे पाते कि वे रसोईघर में पहुंच जाते. “तापी भाभी! आज मैं खाना खाऊंगा. अरे, लेकिन वह कनु भाई कहां गया?” कहकर मुझे उठाते और हृदय से लगा लेते. मुझे यह अच्छा नहीं लगता था इसलिए और भी ज़ोर से चिपटा कर कहते खाय- तेरे बाप की तरह; और जो न पढ़े पुस्तक सो दुपड़ी हाथ में ले- मेरी तरह. समझा? चुपड़ी-चुपड़ी खाय का अर्थ है जो तापी भाभी बनाती है वह और दुपड़ी का अर्थ चक्की.”

यह सुनकर पिताजी ऊपर से कहते- “धीरज काका, देखना लड़के को कुछ बुरी बात न सिखाना.” काका की जीभ पर वीभत्स बात थोड़ी-थोड़ी देर में आती.

“अरे माकुभाई! जीभ को क्या रुकावट होती है? जो आ जाय सो सही. फिर मैं नहीं सिखाऊंगा तो क्या कोई इसे सिखाये
बिना रहेगा?”

“धीरज काका! ऐसा क्यों कहते हो?” मेरी मां कहतीं.

वे बात बदलते- “चल दोस्त, सिखाऊंगा. बोल-

“सबसे बढ़कर अन्न पानी, कहते धीरज काका वाणी.”

जब भी वे आते ऐसी कविता की एक दो पंक्तियां सिखाकर ही जाते.

धीरज काका जैसा मज़ाक करनेवाला मैंने गुजरात में नहीं देखा. यह अफसोस की बात है कि किसी ने उनकी मज़ाक की बातों का संग्रह नहीं किया.

एकछत्र राज्य करते हुए नरभेराम मुन्शी स्वर्ग गये (1869) और इस राज्य में खलबली मचाता हुआ महाविग्रह स्वरूप मैं पृथ्वी पर आया (1887). इन दो घटनाओं के बीच के शांत समय में टीले पर बड़े काका का शासन चलता था. जब बाप मरे तब बड़े काका फरसराम मुन्शी (1837-1901) बत्तीस वर्ष के थे. इन्होंने 1852-53 में भड़ौच के बंदरगाह से नाव में बैठकर, बम्बई पहुंचकर एलफिन्स्टन इंस्टीट्यूट में शिक्षा प्राप्त की थी. वे नर्मद के सहपाठी अवश्य थे, परंतु ऐसा नहीं जान पड़ता था कि बुद्धिवर्द्धक वायु का स्पर्श उन्हें हुआ हो. बाद में ये वकील हुए और 1860 से इन्होंने वकालत शुरू की.

मुझे याद है कि एक बार उन्होंने मेरे सामने यह बात बतायी थी कि वे वकील कैसे हुए. वकील बनने के चालीस वर्ष बाद कही हुई बात में कल्पना के अनेक रंग होंगे, लेकिन वह बात उस समय का चित्र अवश्य प्रस्तुत करती है. घर के पढ़ने वाले लड़कों की ओर तिरस्कार से हाथ लम्बा करके उन्होंने कहा था-

“हम क्या खाक परीक्षा देते? हमने तो एक बहली ली. उसमें मुनीम बैठा और हम घोड़े पर सवार हुए. भाई (नरभेराम मुन्शी) ने गांव-गांव में आदमी भेजकर मेरे लिए तैयारी करायी थी. इसलिए हम लोगों के लिए सर्वत्र ठहरने का प्रबंध हो गया था; जहां पहुंचे वहीं लड्डू-जलेबी तैयार! बीस दिन में धीरे-धीरे हम बम्बई पहुंचे और धीरजलाल भाई के यहां ठहरे. नहीं समझे? धीरजलाल मथुरादास होईकोर्ट के सरकारी वकील भाई के बड़े मित्र थे. बाद में धीरजलाल भाई ने सबकी कुशल पूछी, मेरी मेहमाननवाजी की और कहा- “देख, लड़के फरसु, मैं कल तुझे चीफ जस्टिस के पास ले जाऊंगा. जवाब तो तपाक से देगा न?”

मैंने कहा, “अरे काका अवश्य जवाब दूंगा. जवाब देने में भी कुछ लगता है. लेकिन काका, कानून ठीक तरह से नहीं पढ़ा.”

“झख मारता है,” काका ने कहा.

‘दूसरे दिन धीरजलाल भाई पालकी में और मैं घोड़े पर बैठ हाईकोर्ट पहुंचे. कुछ देर में उन्होंने मुझे बुलाया. बड़ी कुरसी पर चोगा पहने हुए चीफ जस्टिस बैठे थे. हमने जाकर सलाम बजाया. धीरजलाल भाई ने अंग्रेज़ी में कुछ बातें कीं. बाद में चीफ जस्टिम ने अंग्रेज़ी में कहा, “Ask the boy, does he know the law of mortgage.”

धीरजलाल मेरी ओर मुड़े और गुजराती में पूछा, “फरसराम! तेरा विवाह हो गया या नहीं?”

“जी हां,” मैंने कहा.

“धीरजलाल भाई ने अंग्रेज़ी में उत्तर दिया- “yes.

माननीय ने दूसरा प्रश्न पूछा,What is equity of redemption?”

धीरजलाल भाई मेरी ओर मुड़े, “तेरे विवाह के समय कितने आदमियों को निमंत्रण दिया गया था और उसमें क्या-क्या चीज़ खिलायी गयी थी?”

‘मैंने तुरंत उत्तर दिया- “तीन साहब, एक कंसार की, दूसरी बरफी चूरमा की और तीसरी मोतीचूर के लड्डू और मठा की. हर एक के साथ पांच साग, दो रायते और अरबी के पत्तों की पकौड़ियां भी थीं.”

“बहुत हो गया,” धीरजलाल भाई ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा-

My lord, the anwer is correct. It must be correct. He comes from a lawyers’ family; father is a lawyer; grandfather was a lawyer. They suck the law with their mother’s milk.

न्यायाधीश हंसे. पास ही सनद पड़ी थी, उस पर बिल्ली का चित्र बनाया. हमने कोर्निस बजायी.

धीरजलाल भाई ने कंसार खिलायी. हम घोड़े पर सवार हुए और सनद लेकर लड्डू-जलेबी खाते वापस आये.

किसके बाप की ताकत है कि सनद को छीन ले? माणका भाई इस लड़के को पढ़ा-पढ़ाकर मार डालोगे तब भी हमने जो कुछ किया है वह यह नहीं कर सकता.’

मैं यह बात सुनता रहा मां के दूध के साथ कानून पीने के दिन चले गए, इसलिए उस समय मैंने आह भरी थी या नहीं, यह मुझे याद नहीं.

उन्होंने थोड़े दिन वकालत की और सूझ-बूझ तथा होशियारी के लिए नाम भी कमाया. पीछे बहरे हो जाने के कारण उन्होंने यह काम छोड़ दिया. उन्होंने अपने बाप के जीवनकाल में ही जाति और कुटुम्ब के व्यवहार का भार ले लिया था. निरभेराम के मरने पर दोनों पर एकछत्र राज्य करने लगे थे. जब से मैंने उन्हें देखा, वे ही कुटुम्ब के मालिक थे. उनके पास क्या था, इसका किसी को पता नहीं था. चौंतीस वर्ष तक अपने आप काम करते हुए उन्होंने किसी को चूं तक नहीं करने दी थी.

सवेरे दातुन करके वे अपने चबूतरे पर ही मुखियागीरी करते थे. कमर रह जाने के कारण बिना कांछ लगाते धोती लपेटकर वे नये मंदिर के चबूतरे पर एक कुरसी पर बैठते थे. वे आम सड़क पर जानेवाले लोगों के नमस्कार लेते थे, उनकी बातें सुनते थे और उनको खिलाते हुए दो घंटे निकाल
देते थे.

‘फरसु मुंशी’ से सभी घबराते थे. ये बड़े पुराने बुजुर्ग थे. ये हर एक को पहचानते थे और इस बात को ये अच्छी तरह जानते थे कि किसी समय किसे छेड़ना है, किसे हंसाना है, किसी रुलाना. चाहे जैसा संकट का समय हो, इनकी दृष्टि अपनी सचेष्टता नहीं खोती थी.

इनकी वाकपटुता का अद्भुत प्रभाव मेरे मन पर रह गया है. ये लड़कों को कहानियां और उपाख्यान सुनाते. त्रियों के साथ उनके जैसी ही बातें करते. जैसा आदमी उसके साथ वैसी ही बातें; चुटकुले कहते, गाली देते, डराते, हंसाते और ज़रूरत पड़ती तो रुलाते. जब प्रेम से बात करते तो सब पीछे रह जाते थे. जब ये अपने सिंह-जैसे मुंह और हुंकार का उपयोग करते तो सारी जाति थर-थर कांपती.

जिस झूले पर बैठकर ये लगभग सारा दिन गुज़ारते थे उसके सामने की दीवार पर इन्होंने यह सूत्र लिखा- ‘रोटी खाओ शक्कर से और दुनिया जीतो मक्कर से.’ इनकी नकल बनाने वाली मज़ाक में इनके पीछे से कुछ फेरफार करके ‘दुनिया जीतो डक्कर से’ कहते. इन्हें कहावतें बड़ी प्रिय थीं. ये हमेशा कहते- “लड़के, मर्द बनना है तो लड़के का पालना मत हिलाना, और हाथ में दोहनी लेकर छाछ लेने न जाना!” इस सलाह का तीसरा चरण कहने योग्य नहीं.

जवानी में इन्होंने खूब अनुभव प्राप्त किये थे. जब हमारी जायदाद का बंटवारा हुआ तब तबेला हमारे हिस्से में आया. पिताजी ने उसकी मरम्मत करायी. एक बार मज़दूर टोकरों में खोदी हुई मिट्टी ले जा रहे थे. बड़े काका अपने चबूतरे पर बैठे थे. मेरी मां और मैं अपने चबूतरे पर खड़े थे. मज़दूरों के टोकरों में जितनी मिट्टी थी उतनी ही टूटी-फूटी बोतलें और कांच थे. “लड़के, वे कांच देखे?” बड़े काका ने कहा. “यह सब मेरी जवानी का पश्चाताप. मैं पहले इस ‘पश्चाताप’ को नहीं समझा. उस समय मुझे यह भान नहीं था कि जब सुधारों की पौ फटी तब बड़े काका की जवानी थी और जब मेरे छोटे-से मस्तिष्क में इस पश्चाताप का अर्थ आया तब मेरे हृदय में बड़े काका के लिए क्रोध की ज्वाला प्रज्वलित होने लगी.

जब से मैंने होश सम्भाला तब से बड़े काका को मैंने अपने चार लड़कों और दो लड़कियों के परिवार के साथ टीले पर बड़ी  हवेली के सामने के एक सुविधापूर्ण घर में रहते हुए देखा था.

बिजकोर काकी बिलकुल पुराने ज़माने की थीं. नये ज़माने के प्रति उनके क्रोध की सीमा न थी. ‘हमारे ज़माने में तो सोने के कड़े मेरे सासरे या पीहर में पहने जाते थे, ‘लेकिन अब तो रां…ड़े… घर-घर पहनती हैं!’

बहुत वर्षों के बाद जब मैंने त्री शिक्षा का झंडा उठाया उस समय उनकी कही हुई बात मुझे याद आ रही है- ‘तुम सबको हुआ क्या है? जितना पढ़ाओगे उतनी रांड होंगी.’

फिर एक और प्रसंग पर उन्होंने कहा- ‘हम नहीं पढ़े हैं तो हमें अधिक लकड़ियों की ज़रूरत पड़ेगी क्या? हमें भी चौदह मन चाहिए और पढ़ी हुई लड़कियों को भी चौदह मन चाहिए.’ कोई लड़की सासरे जाने के लिए अधीर होती तो वे हमेशा कहतीं- “चुप! चुप! क्या तू ही अकेली ससुराल जा रही है? हम क्या कहीं और गये थे?”

अस्सी वर्ष पहले की सुशील सुंदरी के इन वाक्यों से इस बात का अच्छी तरह पता लग जाता है कि हमारे ज़माने में तब से क्या अंतर हो गया है.

दूसरे, रामभाई काका (1848-1903) कुछ दिन स्टेशनमास्टरी करके, वकील होकर, वकालत करने लगे थे. ये और इनकी त्री दोनों बड़े महारथी थे. दोनों बिना किसी कारण के किसी के भी साथ लड़ सकते और सबसे अलग रहते थे. ये निस्संतान थे और हवेली के पीछे तीसरी मंजिल पर इनका निवास था. दोपहर के ग्यारह बजे के करीब दोनों उठते. रामभाई काका मुंह धोकर कोर्ट में जाते और काकी पीहर जातीं. शाम को दोनों घर आते, तीसरी मंजिल पर चढ़ जाते और थोड़ी देर सोते. रात के दस बजे दोनों उठते-

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जाग्रति संयमी।

दस बजे दोनों दातुन करते. उसके बाद काका स्नान-संध्या करते और काकी खाना बनाने बैठतीं. आधी रात के समय भांग पी जाती. दो बजे दोनों खाते. बहुत बार जब ये सोने जाते तो सवेरा हो जाता-

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।

भड़ौंच के नवाबी खानदान के एक रिश्तेदार फैज़ामियां फौज़दार इनके अच्छे मित्र थे. वे इनके यहां खाते और ये उनके यहां सब समय बिताते. फैज़ामियां काका बड़े दयालु थे और मुझे प्रेम से बुलाते थे. कभी-कभी जब फैज़ामियां रामभाई काका को खाने के लिए बुलाते तब अपने बाड़े में जगह को लिपा-पुताकर साफ़ कराते, गांव में से ब्राह्मण बुलाकर वहां खाना बनवाते और अपने ब्राह्मण मित्र को खिलाते.

पिताजी तीसरे भाई थे. चौथे भाई चंदा काका बहुत छोटे थे. लेकिन भाइयों में भाई से भी सवाई बूआ रुखी थी. रुखी बाल्यवस्था में विधवा हुई थी, इसलिए सास-ससुर का कुछ सहा नहीं था. मां-बाप ने लाड़ लड़ाया था और भाइयों ने सदा मान दिया था. बाल-वैधव्य मनुष्य के हृदय के झरने को सुखा डालता है. वह या तो विधवा को कुचल देता है या हिंसक पशु बना देता है; उसका कोई नहीं, वह किसी की नहीं. जिस प्रकार नगर की सीमा पर कोई भयंकर वनराज अपनी एकांत गुफा में रहता है, उसी प्रकार रुखी हवेली के पिछले कोठे में
रहती थी.

जब करसनदास मुन्शी वकालत में पैसा पैदा करके मुन्शी का टीला बसा रहे थे तब रूपबाई तुलजाराम कानूनगो का छोटा-सा संसार चला रही थीं. वे सुंदर, समझदार और चतुर थीं. वे बेहद किफायत करतीं, हाथ से ही सारा काम करतीं, सीतीं-पिरोतीं, और इस प्रकार पैसा बचातीं. ये लोग किराये के मकान में रहते थे. रूपबाई गोरी और पतली थीं पर अपने पतिव्रत में कभी नहीं चूकती थीं. बड़ी उम्र में उनके केशर नाम की लड़की हुई. उसका विवाह नंनदलाल मुंशी- जो दिल्ली से आते हुए लुटे थे- के वंशज चिमनलाल के साथ हुआ था. इतने में रूपबाई विधवा हो गयी. निर्धनता में भी कर्ज़ लेकर पति की काज-क्रिया करके वे जैसे-तैसे दिन बिताने लगीं. केशर का वर विद्यार्थी था. केशर को साल-भर में दो धोती और दो चोलियां ससुराल से मिलतीं और पीहर गरीब था, इसलिए इतनी ही वहां से मिलतीं.

संवत् 1911-सन् 1855 के श्रावण के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को केशर के लड़की हुई- ‘भरे हुए शरीर की, मां के जैसी गोरी; नुकीली नाक वाली और बाप के जैसी आंखों वाली.’ उसका नाम तापी रखा गया. तापी साढ़े चार महीने की हुई कि मां मर गयी. बिना मां की लड़की के पालन-पोषण का भार रूपबाई के सर पर पड़ा.

रूपबाई रोज़ लड़की के नाम को रोती. केशर के जेठ मूलचंद भाई ने तापी के लिए एक धाय रख दी. उसे महीने में चार रुपया तनख्वाह मिलती और खाती वह रूपबाई के यहां. वह जब-कभी रूठ जाती तो रूपबाई चम्मच से तापी को दूध पिलाती. पहले के लोग भावनाशील थे, इसलिए रूपबाई के सभी सम्बंधी तापी को खिलाने ले जाते.

इस विभाग में आगे दिये हुए उद्धरण और अभी-अभी पीछे आने वाले उद्धरण मेरी मां तापी बाई द्वारा सन् 1897 की लिखी हुई आत्मकथा से लिये गये हैं. यद्यपि यह कृति अशुद्ध भाषा में लिखी हुई है तथापि सामाजिक दृष्टि से देखने से यह पुराने ज़माने का हूबहू चित्र देती है. संयुक्ताक्षरों को मैंने ठीक किया है और विराम चिह्न लगा दिये हैं.

इस आत्मकथा में लिखा है-

“तापी दो वर्ष की हुई, धाय को छुट्टी दी गयी और वह खाना सीखी. कुछ चलना आया और कुछ बोलना भी. वह तुतला कर बोलती और रूपबाई लड़की की याद करके रो उठती. उस समय तापी पूछती. “मां, क्यों रोती है?” बुढ़िया जवाब देती, “तू अभागी पैदा हुई है. मेरी बेटी को खा गयी.” लेकिन तापी को इन शब्दों का ज्ञान न था.

तापी की धीरे-धीरे समझ आने लगी और रूपबाई का स्नेह उसके जीवन को स्वर्ण-तंतु से लपेटने लगा. धेवती रूपबाई बुढ़िया का चित्र देना नहीं भूली.

“बुढ़िया का जीवन गरीबी में बीता, इसलिए बेचारी घर में ज्वार रखती और उसकी रोटियां खाती, परंतु कर्ज़ नहीं करती; रोटियां तेल से चुपड़ती और कढ़ी से खाती. तापी के लिए दूध बंधा हुआ था, इसलिए उसे उसमें खिलाती. लड़का भी हाथ से कुर्ता सी लेता. बुढ़िया कसीदा काढ़ती और सीती. कच्चे धानों को हाथ से कूटती और पीसती. सारे घर में एक ही दीपक जलाती. अचार के बदले फसल में सस्ती हरी मिरचें लेकर सुखा लेती और नमक के साथ खाती. घर में बक्सा नहीं था, इसलिए रेशमी कपड़े कुठीले में रखे जाते थे, कोई त्योहार आता तो शाक लाती और गेहूं का उपयोग करती. …उसके द्वार पर न कोई उगाही करने वाला आता न वह किसी को ब्याज देती. मोटा झोटा पहनने पर भी फटा न पहनती.

“तापी अब मुहल्ले में घूमने जाने लगी, परंतु कमज़ोर बहुत थी. कोई हाथ पकड़े कि उतर जाय. सब खिझते- “हाथ पकडूं क्या?” यह सुनते ही वह भाग जाती. सारे मुहल्ले को यह देखकर आनंद आता.

जब तापी छः वर्ष की हुई तो उसके विवाह का प्रश्न रूपबाई को परेशान करने लगा. दो बुढ़ियों ने इस काम का बोझ उठा लिया और नरभेराम मुन्शी के तीसरे पुत्र माणिकलाल को पसंद किया. लेकिन यह काम कठिन था. नरभेराम मुंशी टीले के गद्दीधारी थे. तापी के बड़े काका (मूलचंद) भाई मुशी भी बड़ौदे में अच्छा कमाते थे. दोनों के बीच अनबन थी.

बूढ़ियों ने नरभेराम मुंशी से बातें कीं-“लड़की सुंदर है, अच्छे कुल की है.” नरभेराम ने कहा- “तुम्हारा मूलचंद उसे क्या देगा? टीले पर आता है तो मेरी ओर देखता भी नहीं, इतना मिजाज़ रखता है.”

मूलचंद भाई जब बड़ौंदे से आये तो बुढ़िया उनके पास पहुंची. वे भी बड़े आदमी थे. वे नरभेराम मुन्शी से मिले. दोनों ज्योतिष जानते थे. जन्मपत्रियां देखीं तो वे मिल गयीं. मूलचंद भाई ने धीरे-से अपनी हवेली मुंशियों के ढंग की बनाने की इच्छा प्रकट की. विवाह की बात से घरबार की बात आयी और पुराना वैर भुला दिया गया.

नरभेराम ने अपनी त्री से बातें की.

“मुझे तापी नहीं लेनी”, दयाकुंवर बोली- “इस बिना मां की लड़की की मांग-चोटी मैं कहां करती फिरूंगी?”

“उंह, क्या यही बात है?” नरभेराम मुंशी ने कहा- “तू वह मत करना, लेकिन विवाह वहीं होगा.”

सन् 1860 ई. में जब नौ वर्ष के माणिकलाल का जनेऊ हुआ तब वे घोड़ी पर पीछे बिठाकर छः वर्ष की तापी को भी ले आये.

सन् 1863 में माणिकलाल और तापी का विवाह हुआ. दोनों मुन्शी कुलों ने उत्सव मनाया. ज्योनारें हुई; आतिशबाजी छूटीं; पहरामनियां हुई और नाचरंग का समा बंधा.

भड़ौंच में लड़कियों की सबसे पहली पाठशाला लड़कों की पाठशाला के एक हिस्से में खोली गयी थी. लड़कियों को स्लेट-पेंसिल भी पाठशाला से मिलती थीं. वहां तापी तीसरे दर्जे तक पढ़ी. विवाह के बाद जब वह दाहोद अपने बाप के घर गयी तब भी उसने पढ़ना जारी रखा. बाप कचहरी से आकर रात को पढ़ाते और समझाते. उसके बाद तापी अपनी सौतेली मां को पढ़ाती.

अकेली तापी मूलचंद भाई की लड़की रुक्मणी के साथ भड़ौंच रहने लगी. एक तो बाप से अधिक स्नेह नहीं, दूसरे वह सौतेली मां के साथ परदेश में रहते थे. दयालु मूलचंद काका- उन्हें तापी ‘बापा’ कहती थी- नवसारी में नौकरी करते थे. केवल बूआ ही उसकी देखभाल करती थी.

जब तापी ग्यारह वर्ष की हुई तो बूआ पर गयी. ‘अब तापी बाई के लिए लाड़ सपना हो गया और उसे यह समझने का अवसर मिला कि कौन उसका है.’ आत्मकथा में लिखा है कि मातृहीना और पिता के संरक्षण से रहित निराधार तापी मूलचंद भाई की लड़की रुक्मणी के क्रूर आश्रय में रही. जब सब लोग अम्बाजी की यात्रा को गये तब वहां भी तापी का स्थान एक आश्रित का ही था. भड़ौंच में किसी की मृत्यु होती या कोई संकट आता तो बड़ों की मदद के लिए सबसे पहले उसकी ज़रूरत पड़ती. काकी की लड़कियों के प्रसव-प्रसंग में तो उसे उपस्थित रहना अनिवार्य ही था.

“आसाढ़ सुदी एकादशी बड़ी कहलाती है. उस दिन तापी ने उपवास किया और रात को जागरण किया. इससे तापी को बुखार आ गया. वह बुखार उतरा नहीं. कारण, दवा कौन करता? बुखार बना रहा और श्रावण मास आया. रोज़ ही काका की लड़कियां बाहर खाने जातीं थीं. अष्टमी को सब जाने को तैयार हुए. तापी को उस समय तेज़ बुखार था इसलिए वह कहां जाती? सब ने सोचा कि द्वार खुला छोड़ा जाएगा तो कोई घुस बैठेगा, इसलिए ताला बंद कर दिया जाए और ताली पड़ौसी को दे दी जाए.

“इस निश्चय के अनुसार ताली पड़ोस की बुढ़िया को दी और अब चल दिये. तापी घर में अकेली रह गयी. जब उसका बुखार कम हुआ तो बूआ और मां को याद करके रोने लगी- ‘हे प्रभु, यदि मेरे मां, बहन या बूआ होतीं तो मुझे इतने बुखार में छोड़कर नहीं जातीं; एक-न-एक मेरे पास अवश्य बैठतीं और यदि जातीं भी तो नम्बर से. लेकिन मेरी किसे चिंता है? हाय, बूआ के मरने से मुझे यह सबसे पहला दुःख हुआ. हाय! कोई ऐसा भी न रहा, जिससे दुःख कहा जा सकता.’ ऐसे कहती जाती और रोती जाती, पर सुनता कौन!

सन् 1867 की बात है. बारह वर्ष की तापी ससुराल आयी. मां की दी हुई धोती और चोली, कुछ थोड़ी-सी चीज़ें और मूलचंद भाई द्वारा दिया हुआ ट्रंक- ये उसकी सारी दौलत थी.

माणिकलाल मुन्शी पंद्रह वर्ष के थे और अंग्रेज़ी पढ़ते थे. भड़ौंच में मैट्रिक का क्लास न था, इसलिए अहमदाबाद जाकर पढ़ने का निश्चय किया-

“जेठ सुदी पूनम को जिस गाड़ी में माणिकलाल-तापी का स्वामी- जा रहा था उसी गाड़ी में तापी, उसकी सौतेली मां और उसके दो लड़के गोधरा जा रहे थे. इसलिए अनायास ही तापी तथा माणिकलाल दोनों का दृष्टि-मिलन हो गया. इससे दोनों को संतोष हुआ. इसका प्रमाण यह है कि दोनों एक-दूसरे को रह-रहकर देखते थे. बड़ौदे के स्टेशन पर तापी और उसकी सौतेली मां उतर पड़ीं और ट्रेन के चले जाने तक वे एक-दूसरे को देखते रहे.”

यह तो संयम और मर्यादा का युग था!

माणिकलाल को अहमदाबाद का पानी अनुकूल नहीं पड़ा, इसलिए बीमार होकर घर आये. इतने में नरभेराम मुन्शी बीमार पड़े. माणिकलाल ने पढ़ना छोड़ दिया था, इसलिए बीमार बाप की सेवा में जुट गये. तापी भी उस समय की प्रथानुसार थोड़े दिन ससुराल और थोड़े दिन पीहर में रहती थीं.

दयामा गिर पड़ीं और बीमार हो गयीं तो ससुराल का कार्य-भार उग्र रुखीबा के हाथ में आया. पीहर में तो अभी मूलचंद भाई की लड़की रुखी की चलती ही थी.

तापी को दो रुक्मणियों के बीच तीखे वचन, क्रोध, अपमान और जी-तोड़ परिश्रम का कटु अनुभव होने लगा. बहुत दिनों तक गुजरात में ऐसा नियम था कि बहू रोज़ रात को पीहर में खाती थी, ससुराल में नहीं. तापी को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा. रात को ससुराल में खावे तो बाप की इज्ज़त जाय. पीहर खाने जाय तो वहां भी रुखी को खाना बनाकर खिलाना पड़े, इसलिए वह कटु और तीखे वचनों से तापी को जलावे. अंत में तापी इस अत्याचार से थक गयी. वह पीहर की रुखी से कहती कि मैं ससुराल में खाउंगी. उसके बाद दोनों मौसियों के यहां मिलने जाती और अपने आप कोई दे देती तो खा लेती, नहीं तो भूखी रह जाती. रात को ससुराल जाती और सास खाने के लिए कहती तो वह कहती कि मैं पीहर खाकर आयी हूं.

इस प्रकार एक वर्ष के बाद केवल एक ही वक्त खाकर बाप की इज्ज़त को बचाकर तापी चौदह वर्ष की हुई.

जाति में एक धनवान के यहां शादी थी. उसमें रुखी के लड़के को सदा की भांति ले जाने के लिए वह पीहर गयी.

रुखी घर से निकलकर चबूतरे पर बैठी थी. तापी ने रोज़ की देखी जगह से लड़के के कपड़े और पहराये और उसे चलने के लिए कहा. इसे देखकर चबूतरे पर बैठी हुई रुखी भूत की तरह बोली- “मेरे लड़के को मत ले जाना.”

तापी ने कहा, “क्यों, जब रोज़ ले जाती हूं तब आज क्यों मना करती हो?”

वह बोली, “मुझे भेजना नहीं है. चाहे जिसके साथ भेज दूंगी. न होगा तो घर खा लेगा.” तापी ने कहा- “रोज ले जाती हूं और आज मना करती हो.” ऐसा कहकर वह चलने को होती है कि रुखी तापी की अंगुली पकड़े हुए खड़े बच्चे को ले लेती है और सबको धमकाती है.

तापी नम्र होकर बोली- “तुझे मेरी कसम जो न भेजे.”

वह बोली- “मुझे अपने सर की कसम जो मैं भेजूं. तुझे जाना हो तो जा. मेरे लड़के की अपेक्षा तो तू ही बढ़कर है!”

यह सुनकर तापी की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी और वह वहां से चल दी. रास्ते में ईश्वर को याद करती, मौत मांगती, मां को याद करती… वहां पहुंची जहां कि ज्योनार थी. वह आंसुओं को रोकती पर वे न रुकते.

व्याकुल तापी ने छोटी ननद तुलना के पास बैठकर खाया. सदा के नियम को तोड़कर ससुराल आकर कपड़े बदले और चतुर ननद को आश्वासन देकर तापी अपने कमरे में गयी.

“माणिकलाल ने जब उसे रोते हुए देखा तो आग्रह के साथ पूछा कि क्या हुआ. यह सुनकर तापी बोली- “मेरे दुःख को क्या कोई मिटा सकता है?”

बाद में सारी बात कह सुनायी. माणिकलाल ने अपने पास जो कुछ खाने को था उसे आग्रह के साथ खिलाया, पानी पिलाया और कहा– “तुझे किसीसे सरोकार रखने की ज़रूरत नहीं है. और जो कुछ हो सो मुझसे कह. यह समझ कि मैं ही तेरी मां हूं और मैं ही तेरी बहन.” इस प्रकार जब समझाया-बुझाया तब कुछ शांति हुई और दुःख घटा. दूसरे दिन तुलजा ने सारी घटना मां को कह सुनायी. वे गुस्सा हो गयी और निश्चय किया कि तापी ससुराल में ही खायेगी.

मुन्शियों का कुटुम्ब बड़ा था, इसलिए तीन आदमियों का सवेरे का खाना बड़े लड़कों की बहुएं बनावें और तापी परसे. शाम को बहुएं पीहर चली जातीं तो रुखीबा के बदले तापी बनाती. लेकिन रुखीबा के नखरे तो सहने ही पड़ते.

थोड़े दिन बाद दयामा मर गयीं. दो महीने बाद माह वदी द्वादशी को नरभेराम मुन्शी भी चल बसे. इस समय माणिकलाल मुन्शी लायबेरी में जाकर पढ़ते थे और पत्नी के पढ़ने के लिए पुस्तकें लाते थे.

पिताजी की इस समय की पुस्तकों में से Blair’s Belle Letters, Chamber’s Elocution, Chamber’s Cyclopaedia of English Literature, Locke’s Essay on Human Understanding, Whateley’s Rhetoric, Milton’s Poems, Longfellow’s Poems, The Holy Bible और Webster’s Dictionary मुझे विरासत में मिली थीं. उनमें उनके द्वारा दिये हुए नोट उनके अध्ययन का आभास कराते हैं.

इसके बाद तापी रुखीबा की सृष्टि में आयी. इतना होने पर भी सच्चे-झूठे और कहने-सुनने के बावजूद जैसे-तैसे करके वह अपने सीधे रास्ते पर चलती रही. वह घर का काम करती, लुक-छिपकर गुजराती पुस्तकें पढ़ती, सीती-पिरोती और कसीदा काढ़ती और ‘पतिव्रत धर्म का पालन करती.’ एक बार पति-पत्नी के बीच झगड़ा हुआ. पति की इच्छा के विरुद्ध तापी ने मांग भरी. पति ने रात को अटारी का दरवाज़ा बंद कर दिया. अब न तो आवाज़ देकर माणिकलाल बुला सके और न नीचे जाकर तापी ननदों से कह सके. तापी ने कितने ही दिन बंद दरवाज़े के आगे पृथ्वी पर काटे. अंत में माणिकलाल को दया आयी, दरवाज़ा खोला और पत्नी को अंदर लिया.

“किसी को इस बात का पता नहीं. कुछ ही दिन बीते थे कि माणिकलाल को सन्निपात हो गया- इतना तीव्र कि स्वयं हाथ-पैर और गरदन तक न हिला सकें. यह सब तापी करती. वह तनिक भी उसके आगे से न हटती और उसकी मरजी के मुताबिक सब सुविधाएं जुटाती. इससे वह भी प्रसन्न रहता और उसकी व्याधि का दुःख, भी कम होता. इस घटना से दोनों की प्रीति में भारी वृद्धि हुई. कारण, अब दोनों यह समझने लगे कि हम दोनों एक हैं और एक-दूसरे के दुख-सुख के साथी है. …धीरे-धीरे प्रेम और प्रगाढ़ हो गया और दोनों को घड़ी-भर भी अलग रहना अच्छा न लगता.”

तापी को ससुराल का काम करना पड़ता और पीहर में प्रसव-प्रसंगों में उपस्थित रहना पड़ता. बच्चों के पालन-पोषण का काम तो चलता ही रहता.

रुखीबा के विवेकहीन क्रोध से तुलजा बीमार पड़ी और प्रसव के समय मृत्यु का प्रास बनी. तापी ने एक सच्ची सखी खो दी.

“तुलना के मरने से तापी को बड़ा दुःख हुआ क्योंकि वह उसकी सहेली थी; साथ बैठतीं, साथ गीत गातीं, साथ भगवान के दर्शनों को जातीं, साथ खातीं, साथ नहातीं, साथ व्रत करतीं, साथ दावतों में जातीं और अधिकांश समय साथ ही बितातीं. परंतु तापी के भाग में यही लिखा है.”

23 फ़रवरी सन् 1873 को पिताजी बीस रुपया, कुछ बर्तन, बिस्तर और ब्राह्मण रसोइया लेकर अहमदाबाद के कलक्टर के आफिस में पंद्रह रुपया की मुन्शीगीरी करने गये. कुछ दिन बाद मेरी बड़ी बहन तारा आयी और पिताजी पच्चीस रुपये मासिक पर गोधरा के सब-रजिस्ट्रार हो गये.

इसके बाद इस आत्मकथा में सम्वत् 1914 की पूस सुदी पूनम का वर्णन है. प्रत्येक विवरण मां की स्मृति में खुदा हुआ है. दोपहर के बारह बजे मेरा जन्म हुआ.

इतने वर्ष के बाद दोनों की आशा पूरी हुई. मां उल्लास में आकर लिखती है–

“तापी ने नीति के पथ पर चलते हुए प्रभु का भरोसा रखा था, इसलिए प्रभु ने उसे विश्वास और पातिव्रत धर्म का फल आज दिया. यह देखकर उसे प्रसन्नता हो तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं. कारण, वह तो अहर्निश चिंतन करती– ‘हे प्रभु! मेरे स्वामजी ने अपने कर्त्तव्य का पालन किया. त्री का भरण-पोषण करके उसकी रक्षा करने का जो कार्य है, वह उसने किया. पातिव्रत धारण करके अपने पति की सेवा करना त्री का धर्म है. यदि उसके पुत्र उत्पन्न हो तो त्री से होनेवाले पुत्र से पिता पितृऋण से मुक्त होता है. मैं ईश्वर की कृपा से सब कुछ करती हूं, पर मैं अपने स्वामी को पुत्र नहीं दे सकी, इसलिए मैं समझती हूं कि मेरे भीतर यह जो कमी है उसका कारण मेरे भाग्य का दोष है. वह कमी दूर हुई. अब अभाव कैसा? इसलिए वह बार-बार प्रभु का उपकार मानने लगी.”

मेरे जन्म के थोड़े ही दिन बाद पिताजी को मांडवी तालुके की तहसीलदारी मिली. श्रीकृष्ण के बाल्यवस्था के आनंद को देखकर यशोदा को होनेवाले हर्ष का कवियों ने जो वर्णन किया है उसका ठीक-ठीक आभास होता,’ मां लिखती है.

1892 में मेरी बड़ी बहन विधवा हुई. थोड़े दिनों में दूसरी बहन विधवा हुई. दुःख के बादल घिरने लगे.

पिताजी सारा समय अपने कार्य में व्यस्त रहते और नौकरी में प्रगति करते जाते.

उनकी विशिष्टताओं में टीले की मस्ती का अभाव और चारित्रिक दृढ़ता दो प्रमुख हैं. अफवाह सुनी थी कि जवानी में उन्हें एक ब्रह्मक्षत्रिय मित्र के यहां शराब पीने की आदत पड़ गयी थी. लेकिन मां ने कसम दिलायी और उन्होंने जीवन-भर उस वचन का पालन किया. उन्हें गाना-बजाना तो आता था– उतना जितना कि टीले के वारिस को आना चाहिए. लेकिन घर या बाहर उन्हें खेल-तमाशा या महफिल कतई नापसंद थे. उनको आनंद के लिए दो बातों की आवश्यकता थी– अंग्रेज़ी उपन्यास और मां के साथ वार्तालाप.

पिताजी और माताजी के बीच अद्भुत ऐक्य था– अर्वाचीन और आदर्शमय. दोनों एक-दूसरों से कुछ भी नहीं छिपाते थे– एक को छोड़कर दूसरे के लिए कोई दूसरा मित्र भी नहीं था. पिताजी उग्र होकर जब कभी नाराज़ भी हो जाते थे, पर यह तो टीले का स्वभाव ठहरा. मां ने इस उग्रता को सहने की कला सीख ली थी. पिताजी को मां की व्यावहारिकता में श्रद्धा थी, इसलिए उसकी सलाह के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था. लेकिन पिताजी अपने स्वभाववश, उदारता के कारण अथवा भोलेपन में चाहे जो कर आवें, मां को उसके कारण कभी घबराहट नहीं होती थी. टीले के मुन्शियों को प्रसन्न रखने का कार्य उनकी मां-बहुओं को सदा से कठिन लगता रहा है, लेकिन मां ने इस कला को सरलता से सीख लिया था. उस समय एक पत्नीव्रत निभाने की चिंता शायद ही किसी को रहती हो, लेकिन पिताजी इस व्रत से टले हों, यह किसी के जानने में नहीं आया. किसी से यह भी सुनने में नहीं आया कि वे गृह-कलह के विकट प्रसंगों में उलझे हों. बड़े भाई और रुखीबा पिताजी के लिए अत्यंत घृणा प्रकट करते हुए कहते– “यह कौन नहीं जानता कि वह घोर शत्रु है.”

(क्रमशः)

मार्च  2013 

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