आंध्र प्रदेश की राजकीय मछली : कोर्रा मत्ता  –   डॉ. परशुराम शुक्ल

राज-मछलियां

ताज़े पानी की विलक्षण मछली सर्पशीश को अंग्रेज़ी में स्नेक हेड कहते हैं. इसका सिर बड़ा और सांप की तरह होता है, अतः इसे यह नाम दिया गया है.

पुरानी दुनिया की यह मछली एशिया और अफ्रीका के बहुत बड़े भाग में पायी जाती है. इसे एशिया में भारत और श्रीलंका से लेकर दक्षिणी चीन तक तथा पूर्वी एशिया और फिलीपीन्स तक देखा जा सकता है. सर्पशीश मछली नदियों में ऐसे स्थानों पर रहना पसंद करती है, जहां पानी की गति अधिक न हो अथवा पानी रुका हुआ हो. यह तालाबों के कीचड़वाले और कम ऑक्सीजनवाले पानी में भी सरलता से रह सकती है. यह समय-समय पर पानी की सतह पर आती है और ताज़ी हवा लेकर वापस पानी के भीतर लौट जाती है. इसके शरीर में सांस लेने के कुछ अतिरिक्त अंग होते हैं, अतः यह पानी के बाहर ज़मीन पर भी लम्बे समय तक जीवित रह सकती है. सर्पशीश मछली अपनी छाती के मीनपंखों की सहायता से लहराकर रेंगती हुई चलती है. जैसे कोई विचित्र सांप रेंग रहा है.

सर्पशीश मछली की अनेक जातियां पायी जाती हैं. कोरा मत्ता भी सर्पशीश मछली की एक जाति है. कोरा मत्ता के शरीर पर धारियां होती हैं. इसलिए इसे धारीदार सर्पशीश मछली भी कहते हैं. इसका वैज्ञानिक नाम चन्ना स्ट्रिएटस है. अंग्रेज़ी में इसे कामन स्नेकहेड, बैन्डेड स्नेकहेड, स्ट्रिप्ड स्नेकहेड, स्नेकहेड मुरेल आदि नामों से जाना जाता है. आंध्र प्रदेश में इसे कोरा मत्ता कहते हैं. कुछ स्थानों पर इसे कोर्रा मीनू भी कहा जाता है.

कोर्रा मत्ता का मूल स्थान दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया है. यह एशिया में भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका तथा दक्षिण-पूर्व के कुछ भागों में पायी जाती है. उपयोगिता को देखते हुए इसे इन्डोनेशिया, फिलीपीन्स और मॉरीशस ले जाया गया. इन देशों में यह अच्छी तरह फल-फूल रही है. इस सफलता के बाद इसे मेडागास्कर और हवाई ले जाया गया यहां पर भी यह पूरी तरह सफल रही. हवाई के मत्स्य पालन केंद्रों की तो यह सर्वाधिक सफल मछलियों में गिनी जाती है. भारत में कोर्रा मत्ता को केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के साथ ही बंगाल, असम, मणिपुर आदि राज्यों में भी देखा जा सकता है.

ताज़े पानी की मछली कोर्रा मत्ता विभिन्न प्रकार के जलस्रोतों के ऐसे भागों में रहना अधिक पसंद करती है, जहां घने जलीय पौधे हों. यह नमीवाले भागों, तालाबों और दलदलवाले भागों में सरलता से रह सकती है. यह छोटे-छोटे प्रवास करती है. अपने मूल स्रोत के सूख जाने पर, यह नदियों और झीलों के पास के बाढ़ से बने जलस्रोतों में आ जाती है और शुष्क मौसम में इनके सूख जाने पर पुनः अपने मूल जलस्रोत में लौट आती है.

कोर्रा मत्ता ग्रीष्मकालीन-निद्रा लेनेवाली मछली है. यह गर्मियों के मौसम में नदियों और तालाबों के सूख जाने पर रेत अथवा कीचड़वाले तल में लगभग 60 सेंटीमीटर गहरा गड्ढा तैयार करके उसके भीतर चली जाती है और लम्बी ग्रीष्मकालीन निद्रा लेती है तथा पानी बरसने के बाद बाहर निकलती है. इस दौरान यह बहुत दुबली-पतली और कमज़ोर हो जाती है, किंतु वर्षा के बाद शीघ्र ही पहले की तरह चुस्त और तेज़ हो जाती है.

कोर्रा मत्ता का मुंह बड़ा और चौड़ा होता है तथा इसे सांप की तरह काफी फैलाया जा सकता है. इससे इसे शिकार पकड़ने और उसे निगलने में सुविधा रहती है. इसके मुंह में बहुत से छोटे-छोटे दांत होते हैं. ये भी शिकार करने में इसे सहयोग करते हैं. इसके दो जोड़े नथुने होते हैं. इनमें से एक जोड़ा नथुना सामान्य नथुनों की तरह काम करता है. इसके प्रत्येक नथुने के आगेवाले भाग में एक-एक अतिरिक्त नथुना, ट्यूब के आकार का होता है. इसकी उपयोगिता की प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है.

कोर्रा मत्ता के शरीर में कुछ अतिरिक्त श्वसन अंग विकसित हो गये हैं. इसके गलफड़ा कक्षों (गिलचेम्बर्स) में छोटी-छोटी थैलियां होती हैं तथा इन थैलियों में बहुत-सी रक्त नलिकाएं होती हैं. ये एक फेफड़े की तरह कार्य करती हैं तथा इनकी सहायता से यह मछली पानी की सतह पर आकर सीधे हवा से सांस ले सकती है. यही कारण है कि कोर्रा मत्ता को कम ऑक्सीजनवाले तथा कीचड़ और दलदलवाले स्थानों पर भी रहने में कोई असुविधा नहीं होती है.

इसके शरीर की लम्बाई 80 सेंटीमीटर से लेकर 100 सेंटीमीटर तक होती है, किंतु कभी-कभी 130 सेंटीमीटर तक लम्बी मछलियां देखने को मिल जाती हैं. इसके शरीर का ऊपरवाला भाग गहरे भूरे रंग का होता है तथा नीचेवाले भाग का रंग हल्का होता है. कोर्रा मत्ता के पूरे शरीर पर काले रंग के पट्टे और चित्तियां होती हैं. ये ऊपरवाले भाग में स़ाफ दिखाई नहीं देते, किंतु नीचेवाले भाग पर स्पष्ट दिखते हैं. इसके शरीर के रंगों और डिजाइनों में कामाफ्लास बहुत होता है. यही कारण है कि कीचड़ और दलदल में अथवा जलीय पौधे के पास पड़ी कोर्रा मत्ता दिखाई नहीं देती है.

कोर्रा मत्ता के शरीर के मीनपंख भी, ताज़े पानी की सामान्य मछलियों से पूरी तरह भिन्न होते हैं. इसकी पीठ का मीनपंख लम्बा होता है. यह सिर के पास से आरम्भ होता है और पूंछ तक चलता जाता है. इसके पीठ के मीनपंख में छोटी-छोटी कोमल फिनरेज होती हैं. इसका नितम्ब का मीनपंख भी लम्बा और कोमल फिनरेजवाला होता है.

यह शानदार शिकारी मछली अपना अधिकांश समय कीचड़, दलदल अथवा जलीय पौधों के मध्य व्यतीत करती है और केवल भोजन के समय सक्रिय होती है. इसका प्रमुख भोजन ताज़े पानी की छोटी-छोटी मछलियां हैं. इसका शिकार करने का ढंग बड़ा रोचक होता है. शिकार की खोज़ करके धीरे-धीरे उसका पीछा करते हुए उसके आगे आ जाती है. अब यह अचानक पीछे की ओर मुड़ती है और बिजली की तेज़ी से शिकार पर झपटती है तथा उसे अपने बड़े-बड़े मज़बूत जबड़ों से दबोच लेती है. इसकी पकड़ इतनी मज़बूत होती है कि एक बार जो भी शिकार इसकी पकड़ में आ जाता है, वह छूट नहीं पाता. शिकार को पकड़ने के बाद यह उसे जीवित निगल जाती है. कोर्रा मत्ता बड़ी पेटू होती है. इसके बच्चे तो ताज़े पानी के छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े, पानी का खटमल, मेंढक आदि खा लेते हैं, किंतु वयस्क अर्थात बड़ी कोर्रा मत्ता केवल मछलियां ही खाती है. यह कभी-कभी पानी के सांपों का भी शिकार करती है और इन्हें खा जाती है. कोर्रा मत्ता बड़ी आक्रामक प्रकृति की होती है. यह अपने से बड़े जीवों पर भी आक्रमण कर देती है.

कोर्रा मत्ता का प्रजनन ताज़े पानी की सामान्य मछलियों की तरह होता है. इनमें प्रजनन काल में सर्वप्रथम नर कोर्रा मत्ता मादा की खोज़ करता है और प्रजनन की इच्छुक मादा के मिल जाने पर उसके साथ रहना और तैरना आरम्भ कर देता है. इस मध्य नर विभिन्न प्रकार की प्रणय लीलाएं भी करता है. इसके बाद नर और मादा दोनों किसी जलीय पौधे के निकट आ जाते हैं. यहीं पर कोर्रा मत्ता बड़े अव्यवस्थित ढंग से अण्डे देती है और नर उन्हें अपने शुक्राणुओं से निषेचित करता है. अर्थात कोर्रा मत्ता में बाह्य निषेचन पाया जाता है.

सर्पशीश मछली की अधिकांश जातियां अपने अंडों-बच्चों की सुरक्षा नहीं करती हैं, किंतु कोर्रा मत्ता नर और मादा अपने अण्डों और बच्चों की सुरक्षा करते हैं. इनमें नर और मादा बारी-बारी से अण्डों की सुरक्षा करते हैं. ये अपने मीनपंखों को अण्डों के ऊपर लहराते हैं, जिससे अण्डों पर मिट्टी की पर्त न जमने पाये तथा अण्डों को निरंतर ऑक्सीजन पानी मिलता रहे.

अण्डों और बच्चों की सुरक्षा करनेवाले नर और मादा कोर्रा मत्ता बड़े आक्रामक हो जाते हैं.

कोर्रा मत्ता के नवजात बच्चे, जन्म देनेवाले नर-मादा से पूरी तरह भिन्न होते हैं. इनका रंग नारंगी होता है. लगभग 5-6 सेंटीमीटर का हो जाने पर इनका रंग बदलता है और नारंगी से हरापन लिए हुए हल्का भूरा हो जाता है. अब ये जन्म देनेवाले और सुरक्षा करनेवाले नर-मादा से अलग हो जाते हैं और अपना स्वतंत्र जीवन आरम्भ कर देते हैं.

कोर्रा मत्ता के बच्चे बहुत छोटी आयु से पानी की सतह पर आना और हवा से सीधे सांस लेना आरम्भ कर देते हैं. ये जिस समय पानी की सतह पर झुण्ड बनाकर आते हैं, उस समय ऐसा लगता है मानों पूरा का पूरा पानी रंगीन हो गया है. इन बच्चों में पानी के पौधों के मध्य छिपने की आदत होती है. इससे ये अपने शत्रुओं से बचे रहते हैं. ये लगभग एक वर्ष में वयस्क हो जाते हैं और प्रजनन आरम्भ कर देते हैं.

इसकी जानकारी लोगों को प्राचीनकाल से है तथा इसे लम्बे समय से पकड़ा जा रहा है और भोजन के रूप में उपयोग में लाया जा रहा है. कोर्रा मत्ता दक्षिण-पूर्व एशिया की भोजन की महत्त्वपूर्ण मछली है. इसे कुछ समय पूर्व संयुक्त राज्य अमेरिका ले जाया गया है, जहां यह अच्छी तरह फल-फूल रही है. कोर्रा मत्ता पानी के बाहर भी लम्बे समय तक जीवित रहती है, अतः पकड़े जाने के बाद लम्बे समय तक ताज़ी बनी रहती है. यह पानी के बाहर हवा से सांस लेती है तथा अपने शरीर की चर्बी से पोषण प्राप्त करती है, अतः कई सप्ताह तक पानी के बाहर जीवित रह सकती है.

कोर्रा मत्ता एक्वेरियम की शानदार मछली है, किंतु इसे पालनेवालों की इसके निकट जाते समय पूरी तरह सावधान रहना चाहिए. यह बहुत अच्छी लम्बी और ऊंची कूद लगा सकती है और असावधान व्यक्ति को चोट पहुंचा सकती है.

फरवरी 2016

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