अहिंसा की आग

♦  प्रदिप पंत    >

एक बालक ने अपने दादाजी से पूछा, “साधु-संन्यासी-बाबा लोग कहां रहते हैं?”

दादाजी बूढ़े हो चुके थे. अपने ज़माने में खोये हुए बोले, “देह पर भभूत लगाये, ज़मीन पर त्रिशूल गाड़े, जटा-जूट धारी वे एकांत-शांत में, वनों-उपत्यकाओं में, नदी निर्झर के किनारे साधना-लीन रहते हैं. कोई-कोई बाबा हिमालय में जाकर साधना करते हैं.”

बालक संतुष्ट नहीं हुआ, पर चुप ही रहा. बेचारे दादा जी को पता नहीं था कि आज के बाबा फाइव-स्टार हैं. वे अपने आश्रमों को फाइव-स्टार होटल बना कर उनमें सुख चैन से रहते हैं. फाइव-स्टार होटलों में कैबरे डांस होता है तो उनके आश्रमों में रास-लीला. फाइव-स्टार होटलों में भांति-भांति की स्कॉच का आनंद उठाया जाता है तो बाबाओं के आश्रमों में सोमरस-पान की प्राचीन परम्परा को जीवित रखना अनिवार्य माना जाता है. दादाजी के समय के बाबाओं की भांति आज के बाबा हाथ में कमंडल लिये सवेरे से शाम तक पैदल नहीं चलते. वे स्वयं अपने विमानों में उड़ते हैं, अपनी इम्पोर्टेड कारों में शहर-दर-शहर प्रवचन देने जाते हैं. वे चैनल-प्रिय हैं, चैनलों पर अनुबंध कर अततरित होते हैं. जितना पहुंचा हुआ बाबा, उतनी ही मोटी  रकम का उसका अनुबंध, उतनी ही बढ़ती हुई चैनल की टी. आर. पी. शीर्ष तक पहुंचे हुए कुछ बाबा स्वयं अपने चैनल चलाते और लम्बी रकम कमाते हैं. उनके धाराप्रवाह प्रवचनों के बीच-बीच में क्रीम, लिपस्टिक, शैम्पू आदि की मार्केटिंग करने वाली मॉडल्स चैनल की स्क्रीन पर अवतरित होकर अपनी कंपनियों के उत्पादों की बिक्री बढ़ाने में योगदान करती हैं तो लगे हाथ बाबा की तिजोरी भी भरती चली जाती है. आज के बाबा मार्केट के अर्थशात्र को जानते-पहचानते हैं. वे अपने प्रवचनों से चैनलों पर चमत्कार दिखाते हैं, भक्तजन अभिभूत होते हैं. उनके भक्तों में अल्पबुद्धि भले ही कम हों, पर बुद्धिजीवी भारी संख्या में होते हैं. बच्चे के बेचारे दादाजी को यह सब भी पता नहीं. उन्हें यह भी पता नहीं कि जिस माया को वे आजीवन महाठगिनी मानते आये हैं, उसे महाशक्ति मानने वाले फाइव-स्टार बाबाओं की भृकुटि कभी-कभी तन भी जाती है, विशेषतः तब, जब सत्ता उनसे टकराने का दुस्साहस करती है. वे संहार की मुद्रा में उतर आते हैं और भक्तगण, खासतौर बाबाओं के ‘पेड बुद्धिजीवी’ रौद्र रूप धारण कर लेते हैं. आजकल जैसे अखबारों और समाचार चैनलों के ‘पेड न्यूजवाले’ होते हैं, वैसे ही बाबाओं के सामान्य भक्तों के अलावा चंद ‘पेड बुद्धिजीवी’ भी होते हैं.

सत्ता ने एक फाइव-स्टार बाबा पर आयकर मामले में शिकंजा कसा तो बाबा संहारात्मक रूप दिखाने पर उतर आये. ‘पेड बुद्धिजीवियों’ ने बाबा के पक्ष में माहौल बनाया तो भक्तजन सड़कों पर आ गये. सड़कों पर उतरना प्रदर्शन कहलाता है. बाबा ने प्रदर्शनकारियों के समक्ष सत्ता को ललकारते हुए स्पष्ट किया, “हम इस अन्यायी व्यवस्था के विरुद्ध अहिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं.”

प्रदर्शन में सम्मिलित एक बुद्धिजीवी ने दूसरे बुद्धिजीवी से कहा, “अब से पहले अहिंसा पर विश्वास करने वालों का ऐसा विशाल-विराट और विकराल जुलूस कभी देखा न था.’

दूसरा वाला फाइव-स्टार बाबा का ‘पेड बुद्धिजीवी’ था. वह तत्काल बोला, “यह जुलूस क्या, अहिंसा की आग है, जो देखते-देखते पूरे देश में फैल जाएगी.”

पहले बुद्धिजीवी ने उछलते हुए कहा, “वाह क्या बात है! कोटेबल कोट. अहिंसा की आग. अहिंसा में भी आग हो सकती है, ऐसा तो मैंने कभी सोचा ही न था.”

उत्साहित ‘पेड बुद्धिजीवी’ को लगा, उसने सचमुच महत्त्वपूर्ण बात कह दी है. तुरंत अपने एक पत्रकार मित्र से सम्पर्क कर उसने अहिंसा और आग के रिश्ते के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा, “इस पर कुछ लिखो, यार!”

पत्रकार हंसते हुए अपने स्मार्ट फोन पर बोला, “लिख दूंगा, औरों से भी लिखवा दूंगा, पर क्या दिलाओगे?”

“पहले भी तो दिलाया है अच्छा-खासा. डिटेल में बाबा से बात करने के बाद!” ‘पेड बुद्धिजीवी’ ने ‘पेड पत्रकार’ से कहा, “और हां, खबरिया चैनलों पर धांसू, चार-पांच दिन चौबीसों घंटे कवरेज कराने का ठेका भी तुम्हारे ही हाथ. समझ लो कि तीन बेडरूम वाला एक अपार्टमेंट खरीदने भर की रकम तो मिल ही जाएगी तुम्हें.”

“ठीक है.” पत्रकार ने कहा.

दूसरे दिन के अखबारों में पहले पन्ने पर पांच कॉलम की पहली खबर का फड़कता हुआ शीर्षक था- ‘बाबा का जुलूस अहिंसा की आग का अद्भुत प्रतीक.’ अखबारों के शीर्षक और खबरों में बस थोड़ा-थोड़ा हेर-फेर. चैनलों में और भी उत्तेजक- “बाबा की ललकार, हिल उठी सरकार,” “जला दी साधु ने क्रांति की मशाल, सत्ता हुई बेहाल”, “बाबा हर दिल में, सरकार छिपी बिल में” आदि-आदि.

यह अद्भुत, अजब-अनोखा समय है. ऐसा समय जब अहिंसा भी आग बन जाती है. महात्मा गांधी यानी गांधी बाबा. बाबा पिछड़ी सदी के आदमी थे, क्योंकि पिछली सदी कुल मिलाकर पिछड़ी सदी ही थी. इस पिछड़ी सदी में गांधी बाबा पहले दक्षिण अफ्रीका में गोरों से पिटे, यहां लौटे तो गोरों ने उन्हें यहां भी नहीं छोड़ा. कई बार पीटा. पीट-पीट कर जेल में डाला. पर गांधी बाबा नहीं माने. बोले- जितना चाहो पीटो, जब चाहे जेल में डालो, हम हाथ नहीं उठाएंगे, क्योंकि हम अहिंसा में विश्वास करते हैं. गांधी बाबा ने देखते-देखते देश में अहिंसा की लहर फैला दी.

आज के फाइव-स्टार बाबा और उनके समर्थक बुद्धिजीवी देश में अहिंसा की आग फैलाते हैं. एक सीधी-सादी धोती पहनने वाले गांधी के समय में लाखों लोग अहिंसक सत्याग्रही बने. आज के युग में फाइव-स्टार बाबाओं की ललकार पर उनके भक्तगण हिंसा, लूटपाट, मारधाड़, आगजनी में तन-मन-प्रण से जुट जाते हैं. बाबाओं की दहाड़ वाली सभा खत्म होती है और सभा-स्थल से निकलते हुए भक्तगण खोंचे वालों को लूटते हैं, पनवाड़ी की दुकान से पान-सिगरेट वगैरह ले उड़ते हैं, चाट वालों की चाट खाकर पैसा देना भूल जाते हैं. यही आज का युग-सत्य है. बाबा समर्थक ‘पेड बुद्धिजीवी’ ने इस युग-सत्य को पकड़ लिया है. उसने सत्य के मर्म को जान लिया है. वह अहिंसा की लहर नहीं फैलाना चाहता. वह अहिंसा की आग को फैलाने में विश्वास करता है. इसमें थ्रिल है. इस थ्रिल के बीच उसके सामने लपलपाती आग की लपटों का मनोहारी बिम्ब उभरता है. इस आग की लहर बालीवुड की मारधाड़ वाली फिल्मों सरीखी है, जिनमें खलनायक तेल के पीपों, ड्रमों में आग लगा देता है. आग लपलपाती-सी आगे की ओर बढ़ती चली जाती है- लहर की भांति.

लहर समुद्र की भी होती है. समुद्र किनारे खड़े लोग पानी को लहर को उछालें मारते, आगे बढ़ते, फैलते हुए देखते हैं. लहर उनके पांपों को छूती है और पीछे चली जाती है. वह फिर आती है और फिर उनके पांवों को छूती है. उससे तन को ही नहीं मन को भी शांति का एहसास होता है. मन कहता है कि लहर इसी तरह उछालें मारती आती रहे, ऐसे ही पांवों का स्पर्श करती रहे. पर कोई नहीं कहता कि आग फैलती रहे. फिर भी आग अक्सर फैलती है. यह आग अराजक नेताओं ही नहीं, आज के फाइव-स्टार बाबाओं के पास भी होती है. उनकी बाबाई एक प्रोडक्ट है. प्रोडक्ट यानी कमाई का जरिया. जब उनके कमाई के जरिये को कोई चुनौती देते हैं तो बदले में वे इस आग को फैला देते हैं. उनके ‘पेड बुद्धिजीवी’ कहते हैं कि यह कोई ऐसी-वैसी, साधारण आग नहीं, अहिंसा की आग है. उनके साथ खड़ा बुद्धिजीवी कहता नज़र आता है, “देखिए, कितनी आकर्षक है ये आग. आखिर अहिंसा की आग है न! जो कोई हमारे बाबा को चुनौती देगा, वह इस आग में भस्म हो जाएगा.”

कैसा अनोखा और अद्भुत समय है यह. इस समय में हिंसा को अहिंसा मान लिया गया है. इस अनोखे-अद्भुत समय में शब्दों के नये-नये प्रयोग ही बुद्धिजीवी भी हिंसा को अहिंसा घोषित कर दे. ऐसी अहिंसा जिसमें आग है. आखिर यह फाइव-स्टार बाबाओं वाला युग है न, गांधी बाबा वाला नहीं. गांधी बाबा वाले युग के लोग अतीतजीवी हैं, बूढ़े हो चुके दादाजी की भांति.

(मार्च 2014)

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