अवैज्ञानिकता का बढ़ता हुआ कचरा

♦   प्रियदर्शन     >

अंग्रेज़ी के महत्त्वपूर्ण लेखक थॉमस ब्राउन ने करीब 500 साल पुरानी अपनी प्रसिद्ध कृति ‘रिलीजियो मेडिसी’ में तर्क और आस्था के बीच का द्वंद्व बड़े दिलचस्प ढंग से रेखांकित किया है और दोनों के बीच समन्वय के सूत्र खोजने की कोशिश की है. दरअसल बीते एक हज़ार साल से विज्ञान और धर्म के बीच जैसे एक सतत संग्राम जारी है. विज्ञान ने धर्म की बहुत सारी ज़मीन छीन ली है. 12वीं सदी में आग, हवा, पानी- सबकुछ पर ईश्वर का नियंत्रण था. वही तूफ़ान लाता था और वही बारिश करवाता था. लेकिन विज्ञान ने धीरे-धीरे उसे अपदस्थ करना शुरू किया. इंद्र से हमने बारिश का विशेषाधिकार छीन लिया, वरुण से अग्नि के राज़ छीन लिये, ईश्वर की जगह धीरे-धीरे सिमटती गयी. औद्योगिक क्रांति का दौर आते-आते ईश्वर की बनायी व्यवस्था बहुत कुछ छिन्न-भिन्न हो चली थी- बिजली और इंजन के आविष्कार ने रही-सही कसर पूरी कर दी. आदमी अब बिल्कुल आत्मनिर्भर और प्रकृति का नियंता हो गया. उसने कारखाने बनाये, उसने पानी और हवा को रफ़्तार के साथ चीरने वाले जहाज़ बनाये, बीसवीं सदी का उत्तरार्ध आते-आते वह अंतरिक्ष की सैर कर आया, चांद पर पांव रख आया, अब मंगल और शनि तक की शिनाख्त में लगा है.

अब तो विज्ञान की वे सारी महागाथाएं भी पुरानी पड़ चली हैं. आज की तारीख में हमारी ज़िंदगी जैसे विज्ञान के बूते ही चलती है. सुबह से शाम तक, सोते-जागते, बल्कि अपनी नींद में भी, हम उन उपकरणों की मदद लेते हैं जो विज्ञान के बिना मुमकिन नहीं होते. इस ढंग से देखें तो लगता है कि विज्ञान ने धर्म पर अंतिम जीत हासिल कर ली है. ईश्वर मन की किन्हीं कंदराओं में जा छुपा है और धर्म राजनीति या कर्मकांड का स्थूल उपकरण बन कर रह गया है.

लेकिन क्या यह सच है?

वाकई विज्ञान ने धर्म को बेदखल करने में कामयाबी हासिल की है?

सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करें तो हम पाते हैं कि हमारे चारों तरफ वैज्ञानिक साधन चाहे जितने बढ़ गये हों, वैज्ञानिक सोच जैसे सिकुड़ता जा रहा है. धर्म भी जैसे विज्ञान के साधनों से अपने पांव फैला रहा है. लाउडस्पीकर बने तो उससे राजनीतिक भाषणों और गीतों की तरह धार्मिक भजन और जगरातों के गीत भी गूंजने लगे. कंप्यूटर आया तो उसके साथ कुंडली गणना का सॉफ्टवेयर भी चला आया. टीवी चैनल आये तो आस्था और संस्कार को आवाज़ देने वाले धार्मिक चैनल चले आये. समाचार चैनलों पर भी सितारे बताने का चलन चल पड़ा है. ये सिलसिला सूचना क्रांति के साथ आयी मोबाइल क्रांति तक चला आया है.

ज़ाहिर है, थॉमस ब्राउन को याद करते हुए हमें धर्म और विज्ञान को एक दूसरे के विलोम की तरह पेश नहीं करना चाहिए. धर्म आस्था और अध्यात्म का मामला होते हुए भी असंदिग्ध तौर पर अवैज्ञानिक हो, यह ज़रूरी नहीं. गांधी धार्मिक थे, मगर अवैज्ञानिक नहीं. उनकी आस्था उन्हें रास्ता दिखाती थी, लेकिन उनका विवेक उस रास्ते की परीक्षा करता था. मगर हमारी और हमारे समय की मुश्किल दूसरी है. हमसे न धर्म निभ रहा है, न विज्ञान सध रहा है. हमारे भीतर ऐसी आस्था नहीं बची है जो विज्ञान के नियमों के बीच भी विचरण करती हुई बनी रहे. और हमारे भीतर ऐसा गहरा तर्कवाद भी नहीं है जो हमें धर्म या ईश्वर को बिल्कुल खारिज करने का साहस दे. तो सच्चाई यह है कि हमारा लालच हमें विज्ञान की तरफ ले जाता है, हमारा डर हमें धर्म की तरफ ले जाता है. विज्ञान हमारे लिए वैज्ञानिक सोच या अवधारणा का मामला नहीं, बस उपभोक्ता सामग्री का सहारा भर रह गया है- कंप्यूटरों और स्मार्टफोन की जादुई दुनिया से हमारा वास्ता सिर्फ़ इतना ही है कि हम उनसे बात कर लेते हैं, संदेश भेज लेते हैं, इंटरनेट के ज़रिये बहुत कुछ बड़ी आसानी से हासिल कर लेते हैं. विज्ञान ने जो एक सर्वसुलभता दी है, उसने हमें एक अघाया हुआ उपभोक्ता भर बनाकर छोड़ दिया है. हम यह जानने-समझने की परवाह नहीं करते कि जो नये साधन हमारे जीवन में आये हैं, उनसे हमारा जीवन कैसे बदल सकता है या बेहतर हो सकता है. वह हमारे लिए बस तकनीक है जिससे जीवन की पुरानी जड़ताओं को हम नयी गति दे रहे हैं. कर्मकांड अब नयी ताकत हासिल कर रहे हैं, अंधविश्वास को नयी मदद मिल रही है और अविचार को नये सहारे मिल रहे हैं. इसका खामियाजा काफी कुछ विज्ञान को भी भुगतना पड़ रहा है जहां सिद्घांतों के क्षेत्र में नये काम नहीं हो रहे, विज्ञान का व्यावसायिक इस्तेमाल और दोहन हो रहा है. हर रोज़ एक उपभोक्ता सामग्री पुरानी पड़ती जाती है और हर रोज़ एक नया सामान जुड़ता जाता है.

शायद इसी का नतीजा है कि इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में हमारे पास एक तरफ वैज्ञानिक-व्यावसायिक उपकरणों का- जिन्हें हम अंग्रेज़ी में गैजट्स बोलने के आदी हैं- कबाड़ है तो दूसरी तरफ उस अवैज्ञानिक सोच का कचरा जो हमारी पूरी जीवनशैली में एक हिंसक अराजकता पैदा कर रहा है जो धीरे-धीरे आत्महंता साबित हो रही है. इस अवैज्ञानिक सोच का वास्ता सिर्फ उन स्थूल अंधविश्वासों और कर्मकांडों भर से नहीं है जिन्हें हम बिना जाने-समझे दुहराते रहते हैं, बल्कि उन सूक्ष्म प्रक्रियाओं से भी है जो हमारी निजी और सार्वजनिक चेतना को कई स्तरों पर नियोजित और नियंत्रित कर रही है.

यही वजह है कि विचारों और सामानों से लदी-फदी जो नयी सदी है, वह अपने-आप में एक विराट कबाड़खाने के बीच घट रही त्रासदी है. तकनीक के जंगल में हम अकेले हैं और सामूहिकता की तलाश में भी तकनीक पर निर्भर. संगीत-कला-साहित्य-विचार की ऐसी विराट सर्वसुलभता किसी ज़माने में नहीं रही, लेकिन इतनी घनघोर उपेक्षा भी पहले कभी नहीं दिखी. पूरी नयी सभ्यता जैसे विवेकविहीन बुद्घि और आस्थाविहीन भक्ति के चाक पर गढ़ी जा रही है. स्मृति, संवेदना, धीरज, अनुभव, आश्चर्य सब जैसे किन्हीं बीते ज़मानों की चीज़ हैं. बहुत ही संकरे अर्थों में मापी जाने वाली सफलता इस सभ्यता का उपजीव्य है जो सिर्फ पैसे से बनती है, विचार से नहीं. इस स्मृतिशिथिल, संवेदनक्षीण समय में इस अवैज्ञानिकता से मुठभेड़ कैसे करें, यह शायद हमारे आने वाले दिनों का एक ज्वलंत प्रश्न है.

प्रश्न भले ही आनेवाले समय का हो लेकिन इसकी आहट आज गूंज रही है, इसलिए इसे अनसुना नहीं किया जा सकता. इस आहट का सीधा रिश्ता हमारे अस्तित्व की सार्थकता से है. इसे सुन-समझकर ही हम उन उत्तरों की तलाश प्रारम्भ कर सकते हैं जो हमारे आज की समस्याओं को तो सुलझाएंगे ही आनेवाले कल के लिए भी हमारा मार्ग प्रशस्त करेंगे. सवाल सिर्फ अंधविश्वासों और कर्मकाण्डों तक ही सीमित नहीं है, जिनके चलते हमारी आधुनिकता और वैज्ञानिकता, दोनों पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं. त्रासदी तो यह है कि हमारी चेतना भी कहीं न कहीं, उस अवैज्ञानिक सोच से संचालित अथवा नियंत्रित हो रही है जिसने मनुष्य की प्रगति की अवधारणा को संकुचित बना दिया है. अवैज्ञानिक सोच के कचरे को साफ़ करना वस्तुतः वैज्ञानिक सोच को विस्तार देना है. मनुष्य का वास्तविक विकास इसी विस्तारित राह से आयेगा.

(फ़रवरी, 2014)

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