अकथ कथा शिकार की

♦ तुषारकांति घोष      

लोग अपनी शिकार की सफलता की कहानियां लिखते हैं, मैं आज अपनी शिकार की विफलताओं की बात लिखूंगा- इस आशा से कि शायद इससे शौकिया शिकार खेलने वाले यह जान सकेंगे कि उन्हें क्या-क्या नहीं करना चाहिए.

एक बार मैं कार से इलाहाबाद से बांदा वाले रास्ते जा रहा था. ऊंचा-नीचा पहाड़ी रास्ता था, जो जंगल के बीच से जाता था. हठात एक मोर रास्ता काटकर निकल गया. उसकी चकित दृष्टि और परेशानी स्पष्ट ही बताती थी कि वह कुछ डरा हुआ-सा है.

थोड़ी देर बाद एक भारी-भरकम गीदड़ मोर वाले रास्ते से आकर बीच में खड़ा हो गया. इसी भय से मोर भाग रहा था. कार रोक दी गयी. गीदड़ वहां से कोई पंद्रह हाथ दूर था.

हम लोग बातें करने लगे कि इतना बड़ा गीदड़ तो कभी नहीं देखा. किसी ने कहा-मारो! किसी और ने कहा- गीदड़ मार-कर क्या होगा? इसी तरह दो-तीन मिनिट बहस-मुबाहसे में निकल गये.

वह जानवर एक टीले के पास एक झुर-मुट की ओट में सिर ऊंचा किये खड़ा था. हम लोग उसे देख रहे थे, वह हमें देख रहा था. हठात उसने जम्हाई-सी लते हुए मुंह खोला, तो दो दांत चमक उठे. उन बड़े-बड़े दांतों को देखकर हम लोग चौंक गये. यह गीदड़ नहीं, यह तो भेड़िया है! उन दिनों लखनऊ और इलाहाबाद में भेड़िये छोटे-छोटे बच्चों को उठा ले जा रहे थे, शायद यह भी उनमें से एक था. यह बात मन में आते ही मुझे बड़ी उत्तेजना हुई और मैं शिकार के सब नियम-कानून भूल गया.

पक्षियों को जोड़ा मारने की बात थी, सो उस समय मेरी बंदूक बी.बी. शाट से भरी थी. यह बात मेरी अक्ल में आनी चाहिए थी कि बी.बी. शाट से इतना बड़ा जानवर नहीं मारा जाता. वैसे मैं इस आशा से कि शायद कोई हिरन मिल जाये, अपने साथ एल.जी. शाट भी लाया था. मुझे चाहिए था कि तुरंत बंदूक में एल.जी. शाट भर लेता. मगर इतना बड़ा भेड़िया देखकर मेरी सारी अक्ल गुम हो गयी.

भेड़िये ने धीरे-धीरे चलना शुरू कर दिया. मैं धैर्य खो बैठा. बंदूक उठाकर धमाके के साथ बी.बी. शाट चला दिया. परिणामस्वरूप उस दिन जो कष्ट उठाना पड़ा, बताने की बात नहीं.

गोली की आवाज के साथ ही भेड़िया जमीन पर तो गिरा, मगर फौरन ही उठा और भागने लगा. देखा कि उसका आगे का एक पैर बिलकुल बेकार  हो गया है और वह लंगड़ाता हुआ तीन टांगों से चल रहा है.

मेरे साथ मेरे दो ममेरे भाई भोलानाथ और शिबू थे, पत्नी भी थी. हम तीनों पुरुष सोचने लगे कि वह बेटा तो हाथ में आ गया, कितनी दूर तीन टांग की दौड़ दौड़ेगा, बस हाथ में आया ही समझो. हम बंदूक लेकर गाड़ी से उतर पड़े और उसका पीछा करने को उद्यत हुए.

पत्नी बोली- ‘मत जाओ. इस पहाड़ी जंगल में वह मिलेगा नहीं. सिर्फ परेशान होंगे.’ हम लोगों ने नहीं  सुनी, और यही बात हमारा काल बन गयी.

भेड़िया तब तक कोई सौ हाथ दूर निकल गया था. हम लोग उस पर नजर रखते हुए पीछे-पीछे चलने लगे. वह बीच-बीच में रुक जाता और हम कुछ और पास हो जाते. मगर वह बंदूक के दायरे में न आता था कि मैं गोली मार सकूं. मैंने एल.जी.शाट भर लिये थे. वह थोड़ा रुकता, फिर निकलता और फिर हम काफी पीछे रह जाते. इस तरह टेढ़े-मेढ़े रास्ते से पहाड़ जंगल के बीच चलते-चलते हम तीन-चार मील निकल गये, मगर वह हाथ नहीं लगा.

उस उत्तेजना में यह भी पता न चला कि संध्या कब उतर आयी. शाम के उस घुप-घुपे में भेड़िया भी हाथ से निकल गया. हम स्तंभित खड़े रहे, फिर गाड़ी की ओर चलने लगे. मगर गाड़ी कहां है, रास्ता कौन-सा है- कुछ समझ में नहीं आया.

फिर ध्यान आया कि जंगल में गाड़ी के भीतर पत्नी अकेली हैं, सिर्फ बूढ़ा ड्राइवर साथ है. याद आया कि वह आना नहीं चाहती थी (जीव-हत्या उसे पसंद नहीं), मगर मैं ही यह लोभ देकर लिवा लाया था कि जंगल में सिर्फ चाय-पानी करेंगे. उस समय की मानसिक अवस्था वर्णन करने लायक नहीं.

रास्ते में एक नाला पड़ा. जाते समय तो पड़ा नहीं था. कांटे, जंगल, ऊंची-नीची जमीन इन सबकी की परवाह किये बिना पागल की तरह हम चलते रहे. बहुत देर चलने के बाद काफी दूर से एक आवाज सुनाई पड़ी. गाड़ी के हार्न की आवाज है क्या? रोशनी भी तो दिखाई दे रही है. हां लछमन ड्राईवर स्पष्ट लाइट फेंक रहा है. अरे, हम लोग तो विपरीत दिशा में जा रहे थे. मोटर का पता पाकर जो मन में खुशी और तसल्ली हुई, वह बता नहीं सकता. पागलों की तरह हम लोग उसी ओर बढ़ने लगे. गाड़ी अब भी लगभग मील-भर दूर थी. मगर अब जब पता चल गया, तो डर क्या?

सभी कष्टों का अंत होता है. हम लोग गाड़ी के पास पहुंचे. पत्नी भय व दुश्ंिचता के मारे अधमरी हो गयी थी, हमें देखकर उसे जैसे प्राण मिल गये. लछमन बोला- ‘मांजी बहुत देर से हार्न बजाने और रोशनी दिखाने के लिए कह रही थीं. मैंने वैसा किया भी, मगर आप लोगों ने देखा ही नहीं.’

देखते कैसे?इतनी दूर से हार्न भी नहीं सुना और उस घने जंगल में रोशनी भी दिखाई नहीं दी. उस दिन जंगल में कैसा चाय-पानी हुआ, न बताना ही ठीक है.

घर  पहुंचने के बाद मैं अस्वस्थ हो गया. बाद में पत्नी ने बताया कि उसे अपने से ज्यादा हम लोगों की चिंता थी. उसने सोचा था कि भेड़िया निश्चय ही अपनी गुफा की ओर जायेगा और वहां और  भी भेड़िये हो सकते हैं. वे सब यदि दल बनाकर हम पर आक्रमण कर दें, तो क्या होगा? पत्नी की यह चिंता एकदम बेतुकी भी नहीं कही जा सकती थी.

अगर मैं ज़रा धैर्य रखता और बी.बी. के बदले एल.जी. गोली बंदूक में भरकर भेड़िये को मारता, तो वह वहीं मर जाता और यह सब न होता. मेरी उस जरा-सी भूल से उस दिन क्या नहीं हो सकता था!

और एक बार हम लोग सुंदरबन की पंचमुखी नहर से होकर जा रहे थे. बहुत से लोग थे- मेरा लड़का तरुणकांति, भतीजे अनिलकांति, असितकांति और शची विलास, ममेरे भाई भोला और तुलसी तथा दो-एक अन्य इष्ट-मित्र.

उस दिन सुबह मैंने एक हिरन मारा था, मन आनंद से भरा हुआ था. तीन हिरन दिख गये. मैंने राइफल चलायी, एक हिरन उसी क्षण गिर पड़ा. उसे मारकर बहुत कुछ अहंकार हो गया. अब अहंकार दूर होने की बात बताता हूं.

उस समय तीन बजे थे. हमारी कश्ती नहर में होकर जा रही थी. हठात केउ-केउ की आवाज़ आयी. उस किनारे वह कौन है? मगर? लेकिन मगर तो इतना बड़ा नहीं होता. हमने कश्ती उसी तरफ बढ़ायी अरे, यह तो वाकई एक भीमकाय मगर है. चौदह-पंद्रह हाथ लम्बा और उसी हिसाब से मोटा. इतना बड़ा मगर तो कभी नहीं देखा था. वह पूंछ जल की ओर किये हुए पड़ा था.

मेरे हाथ में 355 मोजर राइफल थी. कोई 50-60 गज दूर से उसकी गर्दन में गोली मार दी. गोली गर्दन में ही लगी और वह चौंक गया. देखा कि उसकी गर्दन से खून बह रहा है, लेकिन वह बिना हिले-डुले पड़ा हुआ है.

‘बस, काम हो गया’ कहकर मैं कूद पड़ा. भोला बोला- ‘अभी एक गोली और मारिये.’ मैंने कहा- ‘अब कोई आवश्यकता नहीं. देखते नहीं, बेटा चुप पड़ा है. भागने लायक होता, तो क्या यों पड़ा रहता?’ भोला बोला- ‘आप जानते नहीं मगर एक गोली से कभी नहीं मरता. हां, बहुत बड़ी राइफल लेकर मारें, तो मर सकता है. आप फिर गोली छोड़िये.’

मैंने उसकी बात नहीं सुनी. मेरी धारणा थी कि मगर मर गया है, और यदि न भी मरा हो, तो भी कोई चिंता नहीं. कारण, वह इस तरह घायल हुआ है कि भाग नहीं सकता.

लेकिन भोला की बात सच निकली. कुछ देर पड़े रहने के बाद वह धीरे-धीरे हिलने लगा और नहर की ओर चलने लगा. वह सिर्फ अपना विराट सिर और आगे के दो पैर ही हिला रहा था, निचला भाग एकदम अवश था. वह धीरे-धीरे पानी की ओर घिसटने लगा. तब भी मेरा यही विश्वास था कि वह पानी तक नहीं पहुंच पायेगा.

लेकिन असम्भव सम्भव हो गया.

इधर देखा कि असित अपनी राइफल से दनादन गोली दाग रहा है, लेकिन कोई लग नहीं रही है. मुझे जाने क्या हो गया था. अब मुझे ज्ञात हुआ. मगर का सिर लगभग जल तक पहुंच गया था. मैंने भोला के हाथ से राइफल लेकर दो-तीन गोलियां चलायीं. लेकिन उत्तेजना के कारण एक भी गोली न लगी. मगर पानी में उतर गया और गायब हो गया.

उस समय मेरे मन की जो अवस्था हुई, बता नहीं सकता. इतना बड़ा मगर अपनी बेवकूफी के कारण हाथ से खो दिया. बड़ा पछतावा हुआ. भोला की बात क्यों नहीं सुनी? मगर ने तो हमें काफी समय दिया था. चाहता तो मैं उसे गोली मार-मारकर छली कर सकता था.

मल्लाहों ने भी कहा कि इतना बड़ा मगर उन्होंने कभी नहीं देखा. इस बेटे ने कितने आदमी खाये होंगे, कौन जाने!

इलाहाबाद अंचल में और भरतपुर में मैंने पहले भी हिरन मारे हैं, मगर इस सुंदरबन वाले हिरन का स्वाद बहुत अच्छा था. मेरे साथियों ने उसे बड़े आनंद के साथ खाया, लेकिन मैं मगर के शोक में ऐसा सुस्वाद खाद्य पदार्थ भी न भोग सका.

– फरवरी  1971 

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