कहां गयी प्यारी गौरेया  –  चंद्रशेखर के. श्रीनिवासन

कविता इधर–उधर उड़ती–फिरती तुम आती आंगन में, तिरती तुम, पीसा था जो आटा मां ने बिखरे जो गेहूं के दाने, वह सब चुन–चुन खाने आती, मिनटों में तुम सब चुग जाती मां गाती थी मैं था बच्चा सुनता तेरा गाना…

पिता  –  व्योर्नस्तयेर्ने व्योर्न्सन

नोबेल–कथा   8 दिसम्बर, 1832 को नार्वे में जन्मे व्योर्न्सन की ख्याति आधुनिक नार्वेजियन साहित्य के जन्मदाता के रूप में है. कवि, उपन्यासकार, आलोचक, नाटककार के अलावा वे अपने समय के एक प्रखर नैतिक एवं राजनीतिक नेता भी रहे. सन्…

‘भारत माता की जय’  –  आशुतोष भारद्वाज

आवरण–कथा आधुनिक भारतीय कला के इतिहास में सिर्फ दो बड़े कलाकार ऐसे हुए हैं, जिन्होंने भारत माता को अपने केनवास पर सजाया है. पहला चित्र बंगाली पुनर्जागरण काल के अवनींद्रनाथ ने बनाया था, जिसमें उन्होंने भारत राष्ट्र को मां के…

क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं?  –  प्रेमचंद

धरोहर भारत के राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में राष्ट्रवाद की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण और निर्णायक रही है. लेकिन उस दौर में राष्ट्रवाद की कई किस्में मौजूद थीं. प्रभावशाली धारा वह थी जो राष्ट्रवाद के नाम पर अपने समाज में मौजूद भेदभाव,…

एकात्मता के प्रेम-पाश में बद्ध होता है राष्ट्र  –  सुनीलकुमार पाठक

आवरण–कथा राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद–वर्तमान में विमर्श का एक प्रमुख विषय है. ‘राज्’ धातु में ‘ष्ट्रन्’ प्रत्यय के योग से ‘राष्ट्र’ शब्द की निष्पत्ति हुई है, जिसका अर्थ है– राज्य, देश, साम्राज्य, जनपद, प्रदेश, मंडल आदि. भारतीय संविधान की ‘उद्देशिका’…

एक राष्ट्र, एक संस्कृति  –  एम.जी. वैद्य

आवरण–कथा कभी–कभी कुछ बुरी लगने वाली बातों से कुछ अच्छा निकल आता है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय काण्ड भले ही दुर्भाग्यपूर्ण था, पर उससे एक बहस तो शुरू हुई कि राष्ट्र क्या होता है. भ्रम की जो स्थिति बनी है, उसका…