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रमेशचंद्र शाह – नवनीत हिंदी http://www.navneethindi.com समय... साहित्य... संस्कृति... Fri, 23 Sep 2016 10:43:08 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 http://www.navneethindi.com/wp-content/uploads/2022/05/cropped-navneet-logo1-32x32.png रमेशचंद्र शाह – नवनीत हिंदी http://www.navneethindi.com 32 32 जनवरी 2011 http://www.navneethindi.com/?p=863 Fri, 26 Sep 2014 05:40:34 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=863 Read more →

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Jan 2011 Coverइस बार हम आपके लिए हिंदी की उन कथाओं का गुलदस्ता लेकर उपस्थित हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के काल में हमारे कथा-साहित्य के बगीचे को महकाया है. ‘नवनीत’ का यह विशेषांक ऐसी ग्यारह कहानियों का संकलन है, जिन्होंने हमारे कथा-साहित्य को नयी दिशाएं दी हैं. इन कहानियों का चयन भी हिंदी के वरिष्ठ कथाकारों ने किया है. विशेषता यह है कि वे कुछ कथाओं को मील का पत्थर सिद्ध करने वाले अपने चयन का आधार भी बता रहे हैं. ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ यही कहानियां हमारी पिछले पचास-साठ साल की कथा-यात्रा का मील का पत्थर हैं, यह तो सिर्फ़ एक बानगी है उन कथाओं की जो इस यात्रा में मोड़ बनने या मोड़ लाने का कारण बनी हैं.

शब्द-यात्रा

श्रीगणेश करें या बिस्मिल्लाह
आनंद गहलोत

पहली सीढ़ी

नूतन वर्षाभिनंदन
रेणु

आवरण-कथा

मील का पत्थर
सम्पादकीय
हिंदी कहानी की आधी सदी
स्वयं प्रकाश
यथार्थ और उससे आगे भी
कमलेश्वर
कालजयी साहित्य की पहचान
रमेशचंद्र शाह
नयी पीढ़ी और समकालीन सच
विनोद तिवारी

मंतव्य

छलकते मानवीय सरोकार का कुरुक्षेत्र
गिरिराज किशोर
सच्चे मोतियों की आब है इसमें
अचला नागर
अकेला थरथराता पीला पत्ता
प्रभु जोशी
और समूचा भारतीयपन आलोकित हो गया
गंगा प्रसाद विमल
घटना की ओट में छिपी कहानी
ध्रुव शुक्ल
अपने समय की विशेष बोल्ड रचना
सुधा अरोड़ा
फैंटेसी और यथार्थ की सीमाएं धुंधलाती कहानियां
विष्णु नागर
सचमुच फ़र्क पैदा करनेवाली कहानी
रमेश उपाध्याय
व्यवस्था और मोहभंग का त्रास
ओमा शर्मा
कई कई भेद खोलता है  छप्पन तोले का करधन
मधुसूदन आनंद
अविस्मरणीय बनने की सामर्थ्य
अखिलेश

कहानी

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे
फणीश्वरनाथ रेणु
मौकापरस्त
भीष्म साहनी
बीच बहस में
निर्मल वर्मा
जॉर्ज पंचम की नाक
कमलेश्वर
एक जीता-जागता व्यक्ति
रघुवीर सहाय
यही सच है
सुधा अरोड़ा
शाह आलम कैम्प की रूहें
असगर वजाहत
फ़र्क
इसराइल
अपराध
संजीव
छप्पन तोले का करधन
उदय प्रकाश
परिंदे का इंतज़ार-सा कुछ…
नीलाक्षी सिंह

आवरण-चित्र

चरन शर्मा

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अगस्त 2012 http://www.navneethindi.com/?p=742 Wed, 17 Sep 2014 09:28:01 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=742 Read more →

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August 2012 Cover 1 & 4आज़ादी की लड़ाई के दौरान भारतमाता की जय का नारा लगाने वाले युवाओं से जवाहरलाल नेहरू ने एक बार पूछा था, यह भारतमाता है क्या? फिर स्वयं ही इसका उत्तर भी दिया था उन्होंने- इस देश की करोड़ों-करोड़ें जनता ही भारतमाता है, इसलिए भारतमाता की जय का अर्थ इस जनता की जय है. फिर उन्होंने जनता की जय का अर्थ भी समझाया था- जनता की जय का मतलब होता है, जनता के सपनें, आशाओं, आकांक्षाओं की पूर्ति. मुझे लगता है जो कुछ नेहरू ने भारतमाता के संदर्भ में कहा था, वही सब भारत पर भी लागू होता है. आसेतु हिमालय और असम से राजस्थान तक फैला भू-भाग भारत का ही नक्शा बनाता है, लेकिन इस नक्शे में यदि देश की जनता का रंग नहीं भरा गया तो निष्प्राण रहेगा यह नक्शा. देश की जनता की आशाओं-आकांक्षाओं, सपनों-संकल्पों के रंग ही इसे एक जीवंत राष्ट्र बनाते हैं. देश की 120 करोड़ जनता ही इस देश की परिभाषा है.

देश का इतिहास, देश की भाषाएं, देश की संस्कृति, देश का अतीत, देश के आदर्श और मूल्य, इन सबका महत्त्व अपनी जगह है. उसे नकारना या कम आंकना गलत होता. लेकिन हमारा वर्तमान और उसके आधार पर बनने वाला भविष्य ही हमारे होने को अर्थ देगा, हमारी परिभाषा को सार्थक बनायेगा.

 

कुलपति उवाच

ईश्वरपद तक चढ़ना होगा
के. एम. मुनशी

शब्द-यात्रा

 ‘पात्र’ बर्तन से लेकर रंगमंच तक
आनंद गहलोत

पहली सीढ़ी

यह नहीं मेरी विनय
रवींद्रनाथ ठाकुर

आवरण-कथा

सम्पादकीय
मर-मर कर जीता है मेरा देश
रमेश नैयर
भारत की शक्ति का अमृत स्रोत
कैलाशचंद्र पंत
हम समझना ही नहीं चाहते
विष्णु नागर
एक व्यापक सांस्कृतिक इकाई
सच्चिदानंद जोशी
कैरियर या राष्ट्र
प्रेम जनमेजय
कुमारस्वामी का भारत चिंतन
विद्यानिवास मिश्र
मेरी पहली कहानी
उसका आकाश
राजी सेठ

60 साल पहले

आप भाग्य पर नाराज़ क्यों हैं?
सुधीर माणिक्य

आलेख

भूमंडलीय यथार्थ और साहित्यकार की प्रतिबद्घता
रमेश उपाध्याय
‘मेरी कविता को बात करने का समय दें’
भगवत रावत
इस अगाध में होऊं मैं बस बढ़ते ही जाने का बंदी
रमेशचंद्र शाह
सौ साल पहले हुई थी ‘भारत-भारती’ की रचना
मैथिलीशरण गुप्त
शिक्षा का अधिकार
होमी दस्तूर
राजस्थान का राज्यवृक्ष- खेजड़ी
डॉ परशुराम शुक्ल
‘कृष्ण’ होने का अर्थ
डॉ दुर्गादत्त पाण्डेय
हिरोशिमा का दर्द
तोमोको किकुचि
किताबें
महाभारत जारी है
आदि विद्रोही
प्रभाकर श्रोत्रिय

व्यंग्य

भारत की उलटबांसी
यज्ञ शर्मा

धारावाहिक उपन्यास

कंथा (छब्बीसवीं किस्त)
श्याम बिहारी श्यामल

कविताएं

भारतवर्ष
इब्बार रब्बी
प्रकृति
विशाल त्रिवेदी
दो गीत
नंद चतुर्वेदी
दो ग़ज़लें
सूर्यभानु गुप्त

कहानियां

कसक
विमला मल्होत्रा
सार्थकता (बोधकथा)
बालकृष्ण गुप्ता ‘गुरु’

समाचार

भवन समाचार
संस्कृति समाचार

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अप्रैल 2012 http://www.navneethindi.com/?p=661 Wed, 03 Sep 2014 08:57:15 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=661 Read more →

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कुलपति उवाच

सच्चा विजेता
कनैयालाल माणिकलाल मुनशी

शब्द-यात्रा

मंदिर का घर
आनंद गहलोत

पहली सीढ़ी

आरम्भ
खलील जिब्रान

आवरण-कथा

सम्पादकीय
प्रपंच में रमते राम
दुर्गादत्त पाण्डेय
रामत्व पाये बिना राम नहीं मिलते
कैलाशचंद्र पंत
कुछ ऐसे पढ़ें राम-कथा
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन
स्वयं तुममें राम बनने की सामर्थ्य है
नरेंद्र कोहली
मैं मनुष्यत्व का नाटय़ खेलने आया
मैथिलीशरण गुप्त

60 साल पहले

मनुष्य वृक्षों का ऋणी है
जान रास

मेरी पहली कहानी

ट्रेड अप्रेंटिस
रमेशचंद्र शाह

आलेख

हम सांस्कृतिक शून्यता की स्थिति में जी रहे हैं
विजय शंकर
मजाज़ की ‘आवारा’ नज्म
अली अहमद फातमी
जातीय घृणा आम्बेडकर का दर्शन नहीं था
कृष्णदत्त पालीवाल
जीवन और शिक्षा की सरगम
नारायणभाई देसाई
जो कुछ था सोई भया
डॉ नरेश
उन्होंने कैमरे से इतिहास लिखा
डॉ राजेश कुमार व्यास
स्टेच्यू
अनिल जोशी
सांताक्लॉज के गांव में
स्मिता दात्ये
किताबें

धारावाहिक उपन्यास

कंथा (बाइसवीं किस्त)
श्याम बिहारी श्यामल

कविताएं

चार कविताएं
इब्बार रब्बी
उसकी प्रकृति
उद्भ्रांत

कहानियां

लतीफा
डॉ रमाकांत शर्मा
हराम
डॉ मुहम्मद ख्वाजा
मां
अशोक गौतम

समाचार

संस्कृति समाचार
भवन समाचार
 
 

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जनवरी 2012 http://www.navneethindi.com/?p=648 Wed, 03 Sep 2014 06:22:16 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=648 Read more →

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स्वर्गीय श्रीगोपाल नेवटिया ने जनवरी 1952 में हिंदी का यह डाइजेस्ट देश को समर्पित किया था. उन्होंने पत्रिका के पहले सम्पादकीय में लिखा था- “नवनीत ज्ञान-विज्ञान और उनके सत्साहित्य की चुनी हुई जलधाराओं के अंशों को अपने घट में भरेगा… बहुतों की ज्ञान-सुधा तृप्त करने में समर्थ होगा’. पिछले साठ वर्ष की ‘नवनीत’ की कहानी हिंदी के पाठकों की ज्ञान-क्षुधा तृप्त करने की कोशिशों की ही कहानी है. स्वतंत्र भारत की साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रकारिता को ‘नवनीत’ के माध्यम से एक नयी पहचान मिली थी, और स्वतंत्र देश को एक सांस्कृतिक घोषणापत्र. सुधी समाज ने इसे हाथों-हाथ लिया. देश के वरिष्ठ रचनाकारों ने इसे एक ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण पहल के रूप में स्वीकारा. वरेण्य साहित्यकार जैनेंद्र कुमार ने ‘नवनीत’ को ‘दुनिया के उन्नत पत्रों के समकक्ष’ रखते हुए इसे हिंदी के लिए गौरव का विषय बताया था. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को यह ‘अंतरंग और बहिरंग दोनों दृष्टियों से चित्ताकर्षक और अद्वितीय’ लगा था. रामवृक्ष बेनीपुरी मानते थे कि ‘नवनीत’ ने ‘हिंदी के एक बड़े अभाव की पूर्ति की है और इसे लेकर हम संसार के किसी भी डाइजेस्ट के रूबरू खड़े हो सकते हैं’. डॉ. हरदेव बाहरी इसे ‘हिंदी की अपने ढंग की अद्वितीय पत्रिका’ मानते थे.

एक बहुत बड़ा सपना था जो ‘नवनीत’ के प्रकाशकों-सम्पादकों ने देखा था. ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, संस्कृति को समेटे एक ऐसे मासिक का सपना जो नव-स्वतंत्र राष्ट्र की बौद्धिक आवश्यकताओं को भी पूरा करे और एक सांस्कृतिक परिवेश को सिरजने की भूमिका भी बनायें. इस सपने को पूरा करना एक चुनौतीपूर्ण दायित्व था, जिसे निभाने की ईमानदार कोशिश हमेशा होती रही. नेवटियाजी के निधन के बाद भारतीय विद्या भवन ने इस दायित्व को सम्भाला. साठ वर्ष तक लगातार पाठकों की कसौटी पर खरा उतरना किसी भी पत्रिका के लिए संतोष की तो बात है ही, गर्व की भी बात है. इस साठवें वर्ष में नवनीत इस संतोष और गर्व का अनुभव कर रहा है. संतोष इस बात का कि पत्रिका जिन उद्देश्यों से प्रारम्भ की गयी थी, उन्हें पूरा करने के लिए ईमानदार प्रयास करती रही, और गर्व इस बात का कि देश के पाठकवर्ग ने इस प्रयास को समझा-सराहा.

शब्द-यात्रा

कमर-कथा
आनंद गहलोत

पहली सीढ़ी

किंतु मेरे नये साल में…
अनिकेत

कहानियां

नीले बुद्ध की वापसी
लुडविग कोच-आसइनबर्ग
सन्नाटा ही सन्नाटा
मालती जोशी
पादुका पुराण
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
खाबीदा हुसीना
अमृता प्रीतम

साक्षात्कार

मोपासां
पुरानी पत्ती
वि.स. खांडेकर
नगमे की मौत
करतारसिंह दुग्गल

व्यंग्य

मक्खीबेध-महायज्ञ
गगनबिहारी एल. मेहता
आत्महत्या वाली पहली किताब
के.पी. सक्सेना
हमारा ज़माना फिर भी अच्छा है    
विष्णु नागर
आओ, भाषा को कुर्सी बनायें
यज्ञ शर्मा

आलेख

सम्पादकीय
परम्परा और इतिहासबोध
निर्मल वर्मा
धर्म : अर्थ : काम : मोक्ष
डॉ. सम्पूर्णानंद
हिंदी स्वामिनी नहीं, सखी बनकर रहे
कुसुमाग्रज
महल और झोंपड़े
के.एम. पणिक्कर
कवि का यशगान : एक आधुनिक विडम्बना के समक्ष
धर्मवीर भारती
समष्टि ही आराध्य है
दीनदयाल उपाध्याय
सोम का कलश
डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल
हीनता बोध
रमेशचंद्र शाह
मैं पुजारी होकर कभी देवता का प्रसाद चुराऊंगा नहीं
विमल मित्र
इंद्रनाथ
शरत् चंद्र
ज़हराब उगाता है जिसे
सरदार जाफरी
मेरा जीवन दर्शन                       
अल्बर्ट आइंस्टीन
आधे के हिस्सेदार
रामधारी सिंह ‘दिनकर’
करुणा साहित्य की जननी
रतनलाल जोशी
जीवन-शक्ति के स्रोत का नाम है धर्म
इकेदा-टॉयन्बी
मुझे मर्दों पर रहम आता है
इस्मत चुगताई
साहित्य का जनतंत्र
दूधनाथ सिंह
सवाल है बच्चों की सही तालीम का
फ्रिट्ज काप्रा
अहमदनगर के किले में
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
सेवामूर्ति सूझी
बाबा आमटे
सावित्री और द्रौपदी के आदर्श के बहाने नारी के आदर्श की खोज
नारायण दत्त
बुढ़ापा यों बितायें
बर्ट्रैंड रसेल
रौंदें के मूर्ति मंदिर में
स्टीफन ज्वाइग
हमने धर्म की कट्टरताएं पाल रखी हैं
आचार्य महाप्रज्ञ
कविता सुमित्रानंदन पंत के जीने का सहारा थी
पी.डी. टंडन
ताकि हम मनुष्य बनकर जी सकें
न्यायमूर्ति चंद्रशेखर धर्माधिकारी
बौनों के द्वीप में
एडवर्ड ए. सालिसबरी
आनंद भवन की एक सांझ
महावीर त्यागी
अणुयुगी मानव का अधिकारपत्र
नार्मन कजिंस
ऊंची सोच वाले इनसान थे मेरे बाबूजी
अमिताभ बच्चन
कवि और शब्द
उमाशंकर जोशी
एक वह अमृता
कन्हैयालाल नंदन
कविता का प्रथम उन्मेष
पाब्लो नेरूदा
कैमरे से देखी जब मैंने काशी
सत्यजित राय
साल का पहला दिन
फ्रांस्वा मोरियेक
‘मुनशीजी एक राजयोगी थे’
एस. रामकृष्णन
‘विश्वास का साहसिक अभियान’

कविताएं

चल सखि…
माखनलाल चतुर्वेदी
हम्पी
गुलज़ार
थके चरण मेरे हों
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
एक अकेली एक चेतना
हरीश भादानी
दो कविताएं
अनंत कुमार पाषाण
शाश्वत-यात्रा
भारत भूषण
दो नवगीत
नरेश सक्सेना
दो गज़लें
शीन काफ़ निज़ाम
दो कविताएं
हरिवंशराय बच्चन
बसंत की एक लहर
कुंवर नारायण
बसंती गीत
केदारनाथ सिंह
देखो परम सपने भी
भवानीप्रसाद मिश्र
कहानी कहते कहते
नरेंद्र शर्मा
दो कविताएं
नारायण सुर्वे

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मई 2014 http://www.navneethindi.com/?p=566 http://www.navneethindi.com/?p=566#respond Fri, 22 Aug 2014 11:55:03 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=566 Read more →

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MAY l 2014 Cover - 1-4 FNL‘भारत मेरा देश है, इस देश में रहने वाले सब मेरे भाई-बहन हैं…‘ यह शब्द उस ‘प्रतिज्ञा’ का अंश हैं जो महाराष्ट्र के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पाठ्य-पुस्तकों में छापी जाती है और विद्यार्थी रोज़ इसका सामूहिक वाचन भी करते हैं. लेकिन जीवन में इस भाव को स्वीकारने, व्यवहार में लाने की जब बात आती है तो क्या सचमुच हम उसे जी पाते हैं? इसके साथ ही सवाल यह भी उठता है कि देश को हम समझते क्या हैं? क्या देश उस नक्शे का नाम होता है जो एक भू-भाग की सीमाओं को दरसाता है? अथवा क्या देश वह नदियां, जंगल, पहाड़ हैं जो इस भू-भाग को आकार देते हैं? या फिर क्या देश का मतलब वे सब हैं जिन्हें उपर्युक्त प्रतिज्ञा में ‘मेरे भाई-बहन कहा गया है?’ आखिरी प्रश्न का उत्तर हमें उस भाव से जोड़ता है जिसे राष्ट्र कहा जाता है. और यह भाव तब जाकर पूरा होता है, जब हम भूगोल की सीमाओं को लांघकर मानवता की परिभाषा को एक व्यापक आकार देते हैं.

कुलपति उवाच

व्यक्ति और समाज
के.एम. मुनशी

शब्द यात्रा

पसंद की चाह
आनंद गहलोत

पहली सीढ़ी

तपाते रहते हो तुम मुझे
रवींद्रनाथ ठाकुर

आवरण-कथा

सम्पादकीय
क्या राष्ट्रवाद मानववाद के विरुद्ध है?
कैलाशचंद्र पंत
क्या हम अपने देश को पहचानते हैं?
प्रियदर्शन
राष्ट्रीयता के कुतर्क
राजकिशोर
राष्ट्र और राष्ट्रवाद के सीमांत
विजय किशोर मानव
रवींद्रनाथ और राष्ट्रवाद
आलोक भट्टाचार्य
राष्ट्रीयता और मानवता एक ही चीज़ है
महात्मा गांधी
संस्कृति बनाम राष्ट्रवाद
खालिद अहमद

धारावाहिक आत्मकथा

सीधी चढ़ान (सोलहवीं किस्त)
कनैयालाल माणिकलाल मुनशी

व्यंग्य

भूतपूर्वजी!
विनोद शंकर शुक्ल

मेरी पहली कहानी

तलाश
आबिद सुरती

आलेख

उसी कमरे में गीतांजलि रची गयी थी
चंद्रगुप्त विद्यालंकार
त्रिपुरा ने किया था विश्वकवि का पहला अभिनंदन
सांवरमल सांगानेरिया
पहेलीनुमा चीज़ है बोधकथा
रमेशचंद्र शाह
परोपकार का नया धंधा
पीटर बफेट
शैलेंद्र और रेणु की तीसरी कसम
भारत यायावर
लक्ष्यद्वीप का राजवृक्ष ः ब्रेडफ्रूट
डॉ. परशुराम शुक्ल
समय और समाज की पटरी का वह लाइटमैन
सुरेश द्वादशीवार
अपनी तरफ देखता हूं तो…
खुशवंत सिंह
…जो जाने पर पीर
वियोगी हरि
नेहरू की पचासवीं बरसी पर
नंद चतुर्वेदी
किताबें

कहानियां

स्थायी पता
कमलेश बख्शी
इंसानियत (बोधकथा)

कविताएं

दो कविताएं
नरेंद्र मोहन
तू और जीवन
विंदा करंदीकर

समाचार

भवन समाचार
संस्कृति समाचार

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