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नारायण दत्त – नवनीत हिंदी http://www.navneethindi.com समय... साहित्य... संस्कृति... Thu, 23 Apr 2015 06:10:55 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0.2 http://www.navneethindi.com/wp-content/uploads/2022/05/cropped-navneet-logo1-32x32.png नारायण दत्त – नवनीत हिंदी http://www.navneethindi.com 32 32 सप्तपर्ण उर्फ़ छतिवन http://www.navneethindi.com/?p=1779 http://www.navneethindi.com/?p=1779#respond Thu, 23 Apr 2015 06:10:55 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=1779 Read more →

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♦  नारायण दत्त    >

डॉ. परशुराम शुक्ल ने अपने लेख ‘पश्चिम बंगाल का राज्य वृक्ष सप्तपर्ण, (फरवरी अंक) में यह ठीक कहा है कि सप्तपर्ण की फुनगी में सदा सात ही पत्ते नहीं होते. मैंने कितनी ही फुनगियों में चार से आठ-नौ तक पत्ते पाये हैं. फिर भी सात (सप्त) की संख्या को शायद इस सुंदर वृक्ष से विशेष प्यार है, जैसा कि ‘सप्तपत्र’, ‘सप्तच्छद’ जैसे इसके संस्कृत पयार्यवाची सूचित करते हैं. वैसे संस्कृत- सरस्वती नाम बांटने के मामले में बेहद उदार है, उसने सप्तपर्ण को और भी बहुत से नाम दे डाले हैं- विशालत्वक, शारदी, विष्णुच्छद (अमर कोश), शारद, देववृक्ष, दानगंधि, शिरोरुजा, ग्रहनाश, शूतिपर्ण, गृहाशी, ग्रहनाशन (शब्द रत्नावली कोश).

इस वृक्ष का हिंदी नाम ‘छतिवन’ है और बांग्ला में इसे ‘छातिम’ कहते हैं. कई दशक पहले मुंबई के किसी अंग्रेज़ी दैनिक में इस वृक्ष के बारे में एक विस्तृत और जानकारी भरा लेख छपा था. उसमें बताया गया था, कि ‘छतिवन’ शब्द असावधान लोगों की कृपा से ‘शैतान’ में बदल गया है और उससे कई जगह यह अंधविश्वास फैला है कि इस वृक्ष पर शैतान निवास करता है. सचमुच अंधविश्वासी मन बड़ा उर्वर होता है मगर अभी यह पत्र लिखने की तैयारी करते हुए मैंने मुंबई की प्रतिष्ठित विज्ञान-संस्था बॉम्बे नैचुरल हिस्टरी सोसायटी के समर्थन से छपी और श्री.के.सी. साहनी की लिखी ‘द बुक ऑफ़ इंडियन ट्रीज़’ पलटी तो पाया कि उसमें इसका परिचय ‘स्कॉलर्स ट्री’, ‘इ डेविल्स ट्री’ शीर्षक से दिया गया है. यही नहीं, वहां इसका हिंदी नाम ‘शैतान की झुर’ बताया गया है- बेशक नाम रोमन लिपि में छापा गया है. यह ‘झुर’ क्या बला है, मैं नहीं समझ पाया.

हां, श्री साहनी की पुस्तक में सप्तपर्ण की फली, पत्ती और फूल का सुंदर रेखांकन छपा है रेखांकन पी.एन. शर्मा का है.

यह बात निश्चित है कि बंगाली मानस ‘सप्तपर्ण’ को शैतान से हर्गिज़ नहीं जोड़ता. वरना वह उसे राज्यवृक्ष का गौरवपूर्ण दर्जा न देता. बंगाल की सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक शांतिनिकेतन ने तो एक तरह से इसे मांगलिक वृक्ष माना है. प्रतिवर्ष अपने दीक्षांत समारोह में शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय प्रत्येक नवस्नातक को उपाधि पत्र के साथ सप्तपर्ण की एक फुनगी आशीर्वाद के रूप में प्रदान करता है.

(मार्च 2014)

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अंतिम प्रणाम http://www.navneethindi.com/?p=1502 http://www.navneethindi.com/?p=1502#comments Thu, 26 Feb 2015 10:24:03 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=1502 Read more →

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♦  नारायण दत्त  >  
Girijashankar Trivedi

श्री गिरिजाशंकर त्रिवेदी

अभावों और असुविधाओं से जूझते हुए अपने व्यक्तित्व को अपने हाथों गढ़ना और जीवन-पथ पर अविचल भाव से आगे बढ़ते जाना आदमी के आत्मबल को सूचित करता है. मेरे मित्रों और सहकर्मियों में श्री गिरिजाशंकर त्रिवेदी आत्मबल के मामले में असंदिग्ध रूप से धनी थे. किशोरावस्था से निकलने के साथ ही पढ़ाई बंद करके जीविकोपार्जन में जुट जाना उनके लिए ज़रूरी हो गया था. परिवार के बड़े बेटे के रूप में अपने कंधों पर आ पड़े कर्तव्यों को उन्होंने धीरता के साथ निभाया. साथ ही अपनी महत्त्वाकांक्षा और उसे पूरा करने के संकल्प को भी उन्होंने जिलाये रखा, जो कि शायद कम आत्मबल वाले व्यक्ति के लिए सम्भव न होता.

कई जगह काम करने के बाद 1960 में वे हमारे सम्पादक श्री सत्यकाम विद्यालंकार के निजी सहायक के रूप में ‘नवनीत’ के स्टाफ में शामिल हुए. उनकी क्षमताओं को देखकर एक-डेढ़ साल बाद उन्हें सम्पादकीय विभाग में स्थान दिया गया. क्रमेण पदवृद्धि पाते हुए अंततः वे सम्पादक के पद पर पहुंचे और दीर्घकाल तक उस पर आसीन रहे. विशेष बात यह भी कि दफ़्तर के कामकाज और पत्नी एवं पांच बच्चों के परिवार के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने प्राइवेट विद्यार्थी के तौर पर इंटरमीडिएट, बी.ए. और अंततः एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की, जो कि कम आत्मबल वाले व्यक्ति के बूते की बात नहीं थी. स्वभाव से श्री त्रिवेदी स्थिरचित्त थे. काम का बोझ उन्हें कभी उद्विग्न नहीं करता था. वे भरोसेमंद साथी और सहृदय सहकर्मी थे. इन खूबियों ने उन्हें नवनीत-कार्यालय का एक सुदृढ़ स्तम्भ बना दिया था.

साथ ही वे एक सार्वजनिक व्यक्ति भी थे. मुम्बई के हिंदी भाषी जगत में उनका अपना विशिष्ट स्थान था. वे हिंदी कविता के रसिक थे और स्वयं कवि थे. मुम्बई में बचपन से पलने के कारण मराठी और गुजराती अच्छी तरह जानते थे. उनका मित्र-वृंद विशाल था. यह सोचकर दुःख होता है कि दृढ़ काया और नियमित दिनचर्या वाले श्री त्रिवेदी को जीवन के अंतिम दौर में जिगर के कैन्सर से जूझना पड़ा. योग्य चिकित्सकों के इलाज और अच्छी सुश्रुषा के बावजूद 87 वर्ष की उम्र में उनका देहावसान हो गया. उनकी पत्नी श्रीमती विद्यादेवी कुछ वर्ष पहले ही चल बसी थीं.

(जनवरी 2014)

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मई 2008 http://www.navneethindi.com/?p=1401 http://www.navneethindi.com/?p=1401#respond Wed, 25 Feb 2015 06:53:02 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=1401 Read more →

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May Cover-08 (front-back Positive)

शब्द-यात्रा

तपिश दिल की बुझा लेना
आनंद गहलोत

पहली सीढ़ी 

चल अकेला रे…
रवींद्रनाथ ठाकुर

आवरण-कथा

आगे बढ़ना है तो चलना ही पड़ेगा
डॉ. कन्हैयालाल नंदन
सभ्यता में पहिया
अनूप सेठी
साइकिल-चिंतन
विजय कुमार
तब जीवन का छंद कविता बनता है
नारायण दत्त

मेरी पहली कहानी

अपना घर
अचला नागर

आलेख

अर्द्ध-पर्व का पूर्ण सत्य
हिमांशु जोशी
चले आते हैं, जाने कहां-कहां से
डॉ. देवव्रत जोशी
कालीन बनवाने से अच्छा है जूते ही खरीद लें
सीताराम गुप्त
तारकशी का तराना
जय कुमार पाठक
सिक्किम का राज्य पक्षी –  चिलमे
डॉ. परशुराम शुक्ल
एक बच्चे की आखिरी ख्वाहिश
शकील अहमद
स्वर्ग से सुंदर है घर
ओमप्रकाश पोरवाल
मूवी कैमरा मेरी तीसरी आंख था
राधू करमाकर
क्योंकि वह मां है
लाजपतराय सभरवाल
अपने प्रयोजन से भटकी हुई शिक्षा
नंदकिशोर आचार्य
अदम्य संघर्ष की अनूठी दास्तान
डॉ. मंगला अनुजा
किताबें
अंतर्कथा एक आरती की
राधारमण त्रिपाठी
संजीवनी का सच क्या है?
डॉ. ओ.पी. जोशी व डॉ. जयश्री सिक्का

व्यंग्य

सबसे बड़ी खबर
राधेश्याम

धर्म

आपने आध्यात्मिक परिवार बनाया है?
आचार्य महाप्रज्ञ
भीजै दास कबीर
रामविलास जांगिड़
विनाश का आह्वान
देवेश सिंगी

यात्रा-कथा

कृतज्ञ हूं, यमुनोत्तरी का दरस-परस हुआ
कृष्णनाथ

अनुभूति

दुनिया आज भी सुंदर है…जीने योग्य!
मन्नू भंडारी

कहानियां

और कितनी दूर
शीला इंद्र
राजा का प्रश्न (लघुकथा)
ज़हीर कुरेशी
नन्ही बुलबुल
कमलेश बख्शी
आनंद (लघुकथा)
कमला प्रसाद चौरसिया
मातमपुरसी
अभिमन्यु अनत
अपराधी (लघुकथा)
सतीश उपाध्याय
ईश्वरनीति (लघुकथा)
ज्ञानदेव मुकेश
ज्ञान क्या है ?(बोधकथा)
नीरज भारद्वाज

कविताएं

देखना, एक दिन
शम्भु गुप्त
शब्द
वेद राही
कुछ दोहे ग्रीष्म के
इसाक ‘अश्क’
पारदर्शियों वाले दिन
नईम
चिड़िया
रामकुमार आत्रेय

समाचार

संस्कृति – समाचार
भवन के समाचार

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मार्च 2008 http://www.navneethindi.com/?p=1396 http://www.navneethindi.com/?p=1396#respond Wed, 25 Feb 2015 06:29:56 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=1396 Read more →

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Mar-08 Cover

शब्द-यात्रा

घड़ी-घड़ी मेरा दिल धड़के
आनंद गहलोत

पहली सीढ़ी 

मर-मर क्या जीना
हरीश भादानी

आवरण-कथा

व्यंग्य के साथ भी हंसी आती है, पर वह ऐसी नहीं होती
हरिशंकर परसाई
मगर इंसान हंसता क्यों है?
कृश्न चंदर

मेरा व्यंग्य

सवालों के जवाब खोजता हूं
ज्ञान चतुर्वेदी
मेरी औकात बतानेवाला आईना
सूर्यबाला

व्यंग्य

विज्ञापन-युग
मोहन राकेश
पानवाला
पु.ल. देशपांडे
मुर्गी जान से गयी
डॉ. आबिद माइज़
एक नेता का जन्म
डॉ. रमेश तिवारी
अकाल पर लिख रहा हूं
पूरन सरमा
बर्फ़ानी दर्पण
सलावोडीर मरोज़ेक

यात्रा-कथा

एक अनचाहामनचाहा सफ़र
सुभाष काबरा

व्यक्तित्त्व

आम आदमी के खास कार्टून
यज्ञ शर्मा

आत्मकथ्य

मैं प्रतीक्षा में हूं !
शरद जोशी

मेरी पहली कहानी

अठन्नी का घिसता वृत्त
गिरिराज किशोर

आलेख

‘मतवाला’ का होली अंक
डॉ. बरसानेलाल चतुर्वेदी
भारत का राष्टीय पशु – बाघ
डॉ. परशुराम शुक्ल
ताकि त्री-विद्रोह दिशाहीन आंधी न बने
महादेवी वर्मा
एक सार्थक संघर्ष के सौ साल
सुधा अरोड़ा
हिंदुत्व को एक हाथ का समझने-समझाने की सहूलियत
प्रभु जोशी
मूल्यहीनता का सबसे बेहतर समय
संजय द्विवेदी
ईस्टर, मधुमय ईस्टर
कुबेरनाथ राय
इसलिए शुरू हुआ था ‘उदंत मार्तंड’
नारायण दत्त
अबे, अंग्रेज़ के नाती, अब तो कुछ सीख
उदभ्रांत
किताबें

समाचार

संस्कृति समाचार
भवन के समाचार

कहानियां

ज़हरबाद
हृदयेश
हमला
सुशांत सुप्रिय

फागुन आयो रे !

दो नवगीत
यश मालवीय
दो फागुनी गीत
अनिरुद्ध नीरव
फगवा
कैलाश सेंगर
रामलाल का फगवा
कैलाश गौतम
फागुन उत्सव प्रीत का
दिनेश शुक्ल

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जनवरी 2010 http://www.navneethindi.com/?p=792 Mon, 22 Sep 2014 05:35:00 +0000 http://www.navneethindi.com/?p=792 Read more →

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JAN Cover-10 (Final Positive)महाकवि जयशंकर प्रसाद की कविता थी- ‘छोटे-से जीवन की कैसे बड़ी कथाएं आज कहूं/ क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूं’. यूं तो लेखक की हर रचना में कहीं न कहीं अपनी बात होती ही है लेकिन पाठक की यह जिज्ञासा कि जिसे मैं पढ़ रहा हूं, वह कैसा है, कौन है, क्यों लिखता है, उसका आस-पास कैसा है, अक्सर बनी रहती है. शायद यही कारण है कि दुनिया भर में लेखकों तथा अन्यों की भी आत्मकथाएं बड़ी उत्सुकता और चाव से पढ़ी जाती हैं. पाठक लेखक के छोटे-से जीवन की बड़ी कथाओं में रुचि रखता है और यह भी चाहता है कि लेखक मौन न रहे. अपने बारे में और अपनों के बारे में भी वह सब बतलाए जो उसके सोच और चिंतन का हिस्सा बनता है. लेखकों के संस्मरण तथा आत्मकथाएं पाठक को लेखक के नज़दीक ही नहीं लाते, उसके लेखन को समझने में भी सहायक होते हैं. हमारा यह नववर्षांक लेखक और पाठक के बीच की दूरी को कम करने की एक कोशिश है.

 

शब्द-यात्रा

‘तुम’ से ज्यादा दिलचस्प कहानी
आनंद गहलोत

पहली सीढ़ी 

आत्मबोध
कन्हैयालाल नंदन

आवरण-कथा

छोटे-से जीवन की बड़ी कथाएं
सम्पादकीय
आत्मकथा की भारतीय परम्परा यानी भोगा हुआ यथार्थ
राजकुमार
कसौटी पर हिंदी का प्रथम आत्म-चरित
बनारसीदास चतुर्वेदी
अपने समय-समाज की बोलती तस्वीर
नारायण दत्त
ताकि औरों की मुश्किलें आसान हो सकें
हूबनाथ
समय की खबर लेती ‘अपनी खबर’
डॉ. रत्नाकर पाण्डेय
आत्मकथ्यों के कंठहार और चूड़ामणि
अजित कुमार
एक बड़ी लेखिका की निर्भीक कहानी
मधुसूदन आनंद
वाह! व्यास, बढ़िया कटी
गोपाल चतुर्वेदी
दलित-वेदना का समाजशात्र
कृष्णदत्त पालीवाल
भीगी आंखों और उन्मुक्त हंसी का तरल कोलाज
यश मालवीय
एम.एफ. हुसेन के भीतर एक छोटा-सा मक़बूल
मनमोहन सरल
ज़िंदगी के अखाड़े में बने रहने के लिए
सोहन शर्मा
मनुष्यत्व को अर्जित और समृद्ध करने की कथा
सूर्यबाला
जस की तस धर दीन्ही चदरिया
संतोष श्रीवास्तव
झूठ के बवंडर में पिंजरे की मैना
सुधा अरोड़ा
एक त्री के बनने की कथा
राजकिशोर

आत्मकथा-अंश

अर्ध कथानक
बनारसीदास जैन
मेरी सहधर्मिणी
स्वामी श्रद्धानंद
…और अशफाक मेरा सच्चा मित्र बन गया
रामप्रसाद बिस्मिल
किसी भी नाम से बेटा जिये तो
पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’
हलो सफरिंग, हलो ज्वाय…!
डॉ. हरिवंशराय बच्चन
काश! मेरी यह किताब उनके हाथों में न जाये…
अमृता प्रीतम
मेरा पशु-काव्य
गोपाल प्रसाद व्यास
लगा जैसे हर घर कब्र बन गया है
मोहनदास नैमिशराय
फ़ायदा तू भी उठा ले कालिया…
रवींद्र कालिया
 बेटा, जाओ ज़िंदगी को रंगों से भर दो
एम.एफ. हुसेन
उस चुप्पी को मैं पहले भी सुन चुका था
भीष्म साहनी
ऐसे लिखा गया था ‘आवारा मसीहा’
विष्णु प्रभाकर
लेखन ही सारे संकटों में मुझे थामे रहा
मन्नू भंडारी
पति, पत्नी और सम्पादक
चंद्रकिरण सौनरेक्सा
उस प्रेमपत्र ने लेखिका बना दिया
पुष्पा मैत्रेयी

धारावाहिक उपन्यास

अनुकथा (भाग-4)
सुधा

समाचार

जब भवन ने बच्चन-संध्या मनायी
कैलाश सेंगर

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