इतिहास अर्थात जो हुआ था, वह. लेकिन जो हुआ था का नाम ही इतिहास नहीं है. इसी तरह इतिहास को समझने का मतलब अतीत को समझना मात्र ही नहीं होता. सच पूछा जाए तो इतिहास की समझ
हमें वर्तमान को जीने और भविष्य को संवारने का अवसर देती है. पर यह समझ किसी पेंच से कम नहीं. अक्सर हम इतिहास को अपनी समझ के रंगीन चश्मे में से देखते हैं और अक्सर धोखा खा जाते हैं. तब इतिहास बोझ बन जाता है. हांफने लगते हैं हम उस बोझ को लादकर चलते हुए. यह थकान तन पर तो असर डालती ही है, मन-मस्तिष्क को भी थका देती है. दृष्टि धुंधला जाती है, दृष्टिकोण भ्रष्ट हो जाता है, गड़बड़ा जाता है वह कुतुबनुमा जिसके सहारे चलने और कहीं पहुंचने की उम्मीद करते हैं हम. ऐसे दृष्टिभ्रम के ढेरों उदाहरण हैं, जब हमने इतिहास से शिक्षा लेने के बजाये इतिहास को सीमित और स्वार्थपूर्ण आकांक्षाओं को पूरा करने का साधन बना लिया. इस प्रक्रिया में हमने यह याद रखना भी ज़रूरी नहीं समझा कि इतिहास का दुरुपयोग सिर्फ रास्ते रोकता ही नहीं, गलत रास्तों पर भी ले जाता है. ऐसी स्थिति में, जिन्हें हम उपलब्धियां समझ रहे होते हैं, वे वस्तुतः हमारी पराजय का उदाहरण
होती हैं.
शब्द-यात्रा
कुछ याद रहा, कुछ भूल गये
आनंद गहलोत
पहली सीढ़ी
साथ जियें प्यारे दोस्त
अराम्बम ओंबी मेमचौबी देवी
आवरण-कथा
जब कुतुबनुमा गड़बड़ा जाता है
सम्पादकीय
प्रतिशोध का पटाक्षेप नहीं होता…
रामशरण जोशी
इतिहास आगे की राहों का पाथेय बने
विष्णु नागर
आओ, उगते सूरज का स्वागत करें
जवाहरलाल नेहरू
इतिहास का उपयोग और दुरुपयोग
फ्रेड्रिक नीत्शे
मेरी पहली कहानी
प्रतिबिम्ब
तेजेंद्र शर्मा
आलेख
वे थे वही जो नहीं थे वे
राजेंद्र मोहन भटनागर
जब बाबा सलकिया गये
सुरेंद्र तिवारी
अज्ञेय-स्मृति की परतें
प्रयाग शुक्ल
शिखरों को छूता शेखर
निर्मला डोसी
कविता के स्थायी सरोकार कम बदलते हैं
कुंवर नारायण
मणिपुर का राज्यपुष्प – शिरॉय लिली
डॉ. परशुराम शुक्ल
प्रेमचंद ने बेटी को पढ़ाया क्यों नहीं?
कमल किशोर गेयनका
कर्मयोगी का कर्म ही जप है
विनोबा भावे
व्यंग्य
इतिहास का पोथा– बोध है या बोझा
यज्ञ शर्मा
एकलव्य और द्रोणाचार्य
शशिकांत सिंह ‘शशि’
धारावाहिक उपन्यास
कंथा (आठवीं किस्त)
श्याम बिहारी श्यामल
कहानी
अंतिम इच्छा
कृष्णा अग्निहोत्री
कविताएं
दो कविताएं
गुलज़ार
तीनों बंदर बापू के
नागार्जुन
ठंड की हर धूप में
अशोक विश्वकर्मा
कुहरे का कर्फ्यू
नरेंद्र तिवारी
समाचार
संस्कृति समाचार
भवन समाचार
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कहते हैं कि ‘गंगा’ शब्द का एक अर्थ ‘नदी’ भी होता है. मतलब यह कि सारी नदियां गंगा हैं – जीवनदायनी हैं, जीवन-रक्षक हैं. जब हम गंगा को बचाने की बात करते हैं तो वस्तुतः हम सब नदियों को बचाकर स्वयं अपने को बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं. इसलिए आज प्रदूषण के संदर्भ में गंगा को बचाने का अभियान चलाया जा रहा है, तो कुल मिलाकर यह अभियान एक प्रदूषण-मुक्त जीवन की कामना को साकार करने की कोशिश ही है. गंगोत्री से लेकर बंगाल की खाड़ी तक की गंगा-यात्रा जहां एक ओर इस समूचे भू-भाग को जीवन-यापन की सुविधाएं देने का एक माध्यम है, वहीं इस यात्रा में हमारे कथित विकास के अपवित्र अवशिष्ठ गंगा को अपवित्र भी बना रहे हैं. यह विडम्बना ही है कि मनुष्य के सारे पाप धोनेवाली गंगा स्वयं मैली हो रही है. इसलिए आज स्वयं को बचाने के लिए गंगा को बचाना ज़रूरी हो गया है. गंगा को, अर्थात हर नदी को. और इस बचाने का मतलब है, नदियों के जल को प्रदूषण-मुक्त करना. इसके साथ तो नदियों में घटते जल का सवाल भी जुड़ा है. इस कार्य को एक आवश्यक अभियान के रूप में चलाना होगा. इस कार्य में सरकार की भूमिका भी है, लेकिन समाज की भूमिका कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है. एक जागरूक एवं अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए समर्पित समाज ही जीवन को सुरक्षित एवं बेहतर बनाने के लिए व्यवस्था को कुछ करने के लिए, बाध्य कर सकता है.
कुलपति उवाच
पार्थ, उठ, कीर्ति को प्राप्त कर!
कनैयालाल माणिकलाल मुनशी
शब्द-यात्रा
पालकी पर सवार
आनंद गहलोत
पहली सीढ़ी
दो मुझे…
अथर्ववेद
आवरण-कथा
सम्पादकीय
आओ, अपनी गंगा बचाएं
रवि चोपड़ा
खुद को बचाना है तो…
सुमंत मिश्र
प्रदूषण से कराह रही है पतितपावनी
राजेंद्र सिंह
दिव्यता की भव्य नदी
रमेश दवे
गंगा का शाप कब उतरेगा?
विद्यानिवास मिश्र
उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा
जवाहरलाल नेहरू
जय गंगे, आनंद तरंगे, कलरवे
अरविंद मिश्र
विज्ञान की कसौटी पर
डॉ. महाराज नारायण मेहरोत्रा
गं-गं गच्छति गंगा
कुबेरनाथ राय
साल पहले
आप अपना व्यक्तित्व लिखते हैं
मेरी पहली कहानी
छोटी आंखों के बड़े दायरे
प्रदीप पंत
आलेख
तृष्णा तू न मरी मेरे मन से
प्रभाकर श्रोत्रिय
ऐसा है सआदत हसन
मंटो
बस सौ साल और है मनुष्य का जीवन!
मधुसूदन आनंद
स्पष्ट और सही अवलोकन
जे. कृष्णमूर्ति
प्रशांत महासागर पर आरती का थाल
संतोष श्रीवास्तव
वैज्ञानिकों ने ढूंढ़ लिया है वैदिक ‘सरस्वती’ जल-मार्ग
कृपाशंकर सिंह
दस लाख साल पहले पकाने की शुरुआत!
वतन की खुशबू
सुधा
किताबें
व्यंग्य
ये दुनिया अगर जल भी जाए तो…
रवि श्रीवास्तव
धारावाहिक उपन्यास
कंथा (चौबीसवीं किस्त)
श्याम बिहारी श्यामल
कविताएं
लौट आओ
बुद्धिनाथ मिश्र
कुछ अप्रकाशित कविताएं
अज्ञेय
दुख
हूबनाथ
…सिखाकर छोड़ेगा मौसम
नेहा वैद
बोलना ज़रूरी है
गुंटर ग्रास
तीन कविताएं-
सुखबीर
कहानियां
गुफ्तगू-
डॉ. नताशा अरोड़ा
काली ऊंची दीवारें
वर्षा अडालजा
समाचार
संस्कृति समाचार
भवन समाचार
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कुलपति उवाच
सच्चा विजेता
कनैयालाल माणिकलाल मुनशी
शब्द-यात्रा
मंदिर का घर
आनंद गहलोत
पहली सीढ़ी
आरम्भ
खलील जिब्रान
आवरण-कथा
सम्पादकीय
प्रपंच में रमते राम
दुर्गादत्त पाण्डेय
रामत्व पाये बिना राम नहीं मिलते
कैलाशचंद्र पंत
कुछ ऐसे पढ़ें राम-कथा
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन
स्वयं तुममें राम बनने की सामर्थ्य है
नरेंद्र कोहली
मैं मनुष्यत्व का नाटय़ खेलने आया
मैथिलीशरण गुप्त
60 साल पहले
मनुष्य वृक्षों का ऋणी है
जान रास
मेरी पहली कहानी
ट्रेड अप्रेंटिस
रमेशचंद्र शाह
आलेख
हम सांस्कृतिक शून्यता की स्थिति में जी रहे हैं
विजय शंकर
मजाज़ की ‘आवारा’ नज्म
अली अहमद फातमी
जातीय घृणा आम्बेडकर का दर्शन नहीं था
कृष्णदत्त पालीवाल
जीवन और शिक्षा की सरगम
नारायणभाई देसाई
जो कुछ था सोई भया
डॉ नरेश
उन्होंने कैमरे से इतिहास लिखा
डॉ राजेश कुमार व्यास
स्टेच्यू
अनिल जोशी
सांताक्लॉज के गांव में
स्मिता दात्ये
किताबें
धारावाहिक उपन्यास
कंथा (बाइसवीं किस्त)
श्याम बिहारी श्यामल
कविताएं
चार कविताएं
इब्बार रब्बी
उसकी प्रकृति
उद्भ्रांत
कहानियां
लतीफा
डॉ रमाकांत शर्मा
हराम
डॉ मुहम्मद ख्वाजा
मां
अशोक गौतम
समाचार
संस्कृति समाचार
भवन समाचार