हेलन की आत्मकथा (भाग – 3)

अंततः तात आचार्य के ग्रंथ अर्थशास्त्र के लोकार्पण का दिन आ गया. राजप्रासाद के बाहर एक विराट पट-मंडप निर्मित किया गया. राज-परिवार के बैठने के लिए आसन इस प्रकार लगाए गए कि उनका पृष्ठ भाग प्रासाद की ओर हो. ऐसा सुरक्षा की दृष्टि से किया गया.

समारोह स्थल पुष्पहारों तथा पताकाओं से सुसज्जित था. पदानुकूल सबके आसन निर्दिष्ट थे. विशाल मंच पर महाराजा और मेरे लिए अलंकृत नृपासनों की, तात आचार्य के लिए भद्रासन की, राजकुमार बिंदुसार के लिए राज्यासन की व्यवस्था थी. इस मंच के निकट एक छोटा मंच और था जिस पर समूहगाह प्रस्तुत किया जाना था.

राज्य के अष्टादश तीर्थाध्यक्ष (विभागाध्यक्ष), सेनापति, नागरिक (नगर के मुख्य अधिकारी), स्थानिक (प्रांत के अधिकारी), गोप (अनेक ग्रामों के अधिकारी), ग्रामिणी (ग्राम का अधिकारी), विद्यार्थी, गृहस्थ (पुरोहित और आचार्य), प्रामाणिक (स्वतंत्र विचारधारा के विद्वान), नगर समिति के सदस्य, विदेश-जन तथा पाटिलपुत्र नगर के विशिष्ट जन आमंत्रित किए गए थे.

महाराज के सिंहासन के सम्मुख से द्वार तक दर्शक-दीर्घा के मध्य में रिक्त स्थान रखा गया था जो एक पट्टिका की भांति दिखाई देता था. उस पर विविध वर्ण के पुष्प बिछाए गए थे जिनमें अरुणिम पुष्पों का आधिक्य था. इससे वह पूरी पट्टिका ऐसी प्रतीत होती थी जैसे वहां रक्त वर्ण का कोमल वस्त्र बिछा दिया गया हो.

तूर्यनाद के साथ महाराज ने पदार्पण किया. सभी उनके सम्मान में उठकर खड़े हो गए. सम्राट अपनी पारंपरिक वेशभूषा में बड़े आकर्षक लग रहे थे. सम्राट के अति निकट माने जाने वाले राजदूत मैगस्थनीज उनके वाम पार्श्व और प्रधान आमात्य दक्षिण पार्श्व की ओर चल रहे थे. सम्राट के मंच पर आरूढ़ होते ही शंख-ध्वनि से उनका स्वागत किया गया. मुझे भी महाराज के वाम पार्श्व में स्थान दिया गया.

तत्पश्चात चौबीस अलंकृत हाथियों ने सम्राट के समक्ष क्रम से आकर नमन किया. इस मध्य मृदंग, तुरही, नगाड़े आदि वाद्य अपनी सम्मिलित ध्वनि से संगीत की वर्षा करते रहे. सभी तीर्थाध्यक्षों ने सम्राट को मानसूचक नीलकमल के पुष्पहार भेंट किए जिन्हें महाराज ने कर-स्पर्श से स्वीकार किया.

औपचारिकताएं समाप्त होने के बाद तात आचार्य ने कार्यक्रम के संचालन का सूत्र संभालते हुए कहा, “इस समारोह में वे अपना सद्यःरचित ग्रंथ सम्राट चंद्रगुप्त को समर्पित करना चाहते हैं. प्राचीन आचार्यों ने पृथ्वी को विजित करने और उसका पालन करने के उपाय निर्देशित करने के लिए जितने अर्थशास्त्र प्रणीत किए हैं, उनका सार लेकर मैंने इस अर्थशास्त्र की रचना की है. इसमें कहा गया है कि राजा-पुरोहित उसे निर्धारित कर्तव्य-पालन करने हेतु विवश कर सकते हैं. राज्य में अनुशासन-स्थापना के नियम, प्रजापीड़कों से प्रजा की रक्षा के उपाय, राज-कर्मचारियों पर नियंत्रण की व्यवस्था, राज्य-सत्ता के विभिन्न अंगों का वर्णन, विजय-यात्रा तथा सेना व्यवस्था, शत्रु-नाश के उपायों का वर्णन इस ग्रंथ में किया गया है.”

तत्पश्चात तात ने स्वर्ण-पात्र में रखे और पीत कौशांबर से आवृत्त अपना ग्रंथ अर्थशात्र सम्राट को समर्पित किया.

सम्राट ने ग्रंथ स्वीकार करते हुए अपने गुरुवर के प्रति आभार व्यक्त किया. उन्होंने कहा, “राजा के कर्तव्य ही प्रजा के अधिकार हैं. जन-जन को अपने अधिकारों का ज्ञान होना चाहिए. अतः इस ग्रंथ की अतिरिक्त प्रतियां निर्मित कर, पाटलिपुत्र तथा अन्य प्रादेशिक राजधानियों में उपलब्ध कराई जाएं.”

सम्राट की उद्घोषणा से सभा-स्थान करतल ध्वनि से भर उठा.

महाराज के पुनः आसन ग्रहण करने पर तात चाणक्य ने उपस्थित जनों को संबोधित करते हुए कहा, “हमारे देश में ग्रंथों के लोकार्पण की परंपरा नहीं है. इस कार्यक्रम की परिकल्पना परम विदुषी पट्टमहिषी सुश्री हेलन के उर्वर मस्तिष्क की उपज है. उन्हीं के निर्देश पर एक यूनानी समूहगान हमारी भाषा में प्रस्तुत किया जाएगा.”

श्रोताओं की करतल ध्वनि से सभा-स्थल देर तक गूंजता रहा. करतल ध्वनि करने वालों की दृष्टि मेरी ओर स्थिर थी. मैं इतने आतुर, उत्साहपूर्ण, प्रशंसापूरित नेत्रों का सामना न कर सकी, नववधू की भांति मेरा सिर लज्जा से नत हो गया. मैंने नेत्र कोर से महाराज को देखा. उन्होंने मेरी दृष्टि पकड़ ली और अपनी दृष्टि से मुझे अभिनंदित कर दिया.

समीप मंच पर पांच कन्याएं प्रकट हुईं. पारंपरिक भारतीय शृंगार से युक्त वे सब पीत परिधान धारण किए थीं. सारा और चंद्रिका मध्य में थीं, शेष उनके पार्श्व में आकर पंक्तिबद्ध हो गईं. उनके पृष्ठ-भाग में उपस्थित कन्याओं के हाथ में संगीत-वाद्य थे. वाद्यों पर अभ्यस्त हाथों के संचालन से संगीत की सुमधुर ध्वनि वातावरण में व्याप्त हो गई. गीत प्रारंभ हुआ और स्वरों की मधुरिमा, लोकगीत का उल्लास सभा को सहज सात्विक सरसता के आप्लावित करने लगा. गीत का जन्म दूर-देश यूनान में अवश्य हुआ था पर भारत-भूमि पर स्वयं को सहोदर-सा प्रकट कर रहा था.

गीत के भाव कुछ इस प्रकार थे, “इस जगत में एक-से-एक महती शक्तियां विद्यमान हैं पर उनमें से मानव-शक्ति के समान कोई नहीं. विक्षुब्ध जलधि को लांघकर, झंझा या तूफान से लड़ता हुआ मानव अविजेय आगे बढ़ता है. उसने भाषा और वाणी का सृजन किया है. वह चिंतन करता है. अनुसंधान करता है और विधि-विधान का निर्माण करता है. पूजा के लिए देवस्थान बनाता है. शीत, ग्रीष्म और वर्षा से त्राण पाने के उपाय खोजता है. उसे रोगों से, व्याधियों से भय नहीं लगता. इतना प्रज्ञावान है कि भविष्य में झांक सकता है. न्याय और सत्य का अनुपालन करने वाला राजा सदा अविजित रहता है.”

गीत समाप्त होते ही सभा-मंडप करतल ध्वनि से गूंज उठा. महाराज के मुख पर आश्वस्ति के भाव थे. तात का तो मेरे प्रति जैसे वात्सल्य उमड़ पड़ रहा था. बिंदु का दर्पयुक्त आनन रक्तवर्णी हो उठा था.

सभा में उपस्थित जनों की आंखों में मेरे प्रति कृतज्ञता के भाव दृष्टिगोचर हो रहे थे. सारा और चंद्रिका अन्य कन्याओं के साथ मंच पर करबद्ध होकर अभिनंदन स्वीकार करने के पश्चात विदा ले चुकी थीं.

तात ने समारोह-विसर्जन की घोषणा की. सभी अपने-अपने स्थान पर खड़े हो गए. सम्राट और राष्ट्र की जय-उद्घोषणा के मध्य मैं, महाराज के साथ सभा से, उसी संकुल मध्य-मार्ग से होती हुई राजप्रासाद की ओर
अग्रसर हुई.

मेरे पितृदेश से आए संदेशवाहकों के साथ फ्रेजिया नाम की एक कन्या भी आई थी. बाबा के प्रासाद में सारा के स्थान पर उसे रखा गया था ताकि अयाचित पुत्री बिछोहजन्य मां का दुःख वह बांट सके. मुझसे मिलने के लिए उसे प्रतीक्षा करनी पड़ी.

मेरे प्रकोष्ठ में वह सारा के साथ आई. सारा तो इतनी प्रसन्न थी जैसे उसे अपना ही कोई निकट संबंधी मिल गया हो. फ्रेजिया भी यूनान की थी. मेरे सम्मुख आकर उसने यूनानी शैली में मुझे अभिवादन किया.

मैंने पहले फ्रेजिया की फिर उसके परिवार तथा साथ आए संदेशवाहकों की कुशलक्षेम ज्ञात की. इस अपनत्व से उसका संकोच समाप्त हो गया.

बाबा के विषय में पूछने पर उसने बताया, “सम्राट तो योद्धा हैं. आपके वियोग में अपने दुःखी मन को पक्का कर लिया है उन्होंने पर मां, उनका हाल अच्छा नहीं है. आपका नाम लेकर निशि-दिन अश्रुपात करती रहती हैं. सम्राट उन्हें समझाते तो रहते हैं कि पुत्री के सुख को अपना सुख मानो पर मातृत्व सुख का नहीं, ममता का भूखा होता है. सदा अवसन्न, हताश और भग्नहृदया-सी बनी
रहती हैं.”

माता-पिता की पीड़ा से मैं दुःखी हो उठी. दुःखी मां को संभालने वाली फ्रेजिया ने मुझे भी संभाल लिया. उसने बताया कि मां और बाबा ने मेरे और महाराज के लिए जरदोजी के वत्र, सूखे अंजीर और कांच के पात्र भेजे हैं. मुझे प्रसन्नता हुई कि दूर देश में बैठे माता-पिता ने अपनी पुत्री को विस्मृत नहीं किया है. उनके उपहारों में
उनका प्रेम, उनका स्नेह झलकता है.

बाबा को देने के लिए मैंने फ्रेजिया को एक पत्र दिया. पत्र मैंने तभी लिख लिया था जब महाराज ने संदेशवाहकों के आने की सूचना दी थी. पत्र देकर मुझे संतोष नहीं हुआ. फ्रेजिया से कहा, “कुछ समय बाद राजकुमार बिंदुसार का विवाह संपन्न होगा. बाबा से कह देना कि इस अवसर के अनुकूल जरी के वत्र, सुगंध के लिए लोवान, सूखे अंजीर, मीठी मदिरा और इसके अतिरिक्त जो भी उचित समझें, भेजने की व्यवस्था करें. बाबा को निमंत्रण जाएगा. मां आ सकें तो मैं स्वयं को धन्य मानूंगी. हां, फ्रेजिया, तुम मां को आश्वस्त कर देना कि उनकी पुत्री संसार की परम सुखी
त्री है.”

फ्रेजिया मेरे चारों ओर बिखरा वैभव देखकर चकित हो रही थी. सारा ने उसे पूरा राजप्रासाद दिखाया था. दूर से महाराज के दर्शन भी करा दिए थे. विदा के समय मैंने फ्रेजिया को बहुमूल्य उपहार दिए. वह कृतार्थ हो गई.

मैं फ्रेजिया को विदा करती, इसके पूर्व ही चंद्रिका आ गई. मैंने फ्रेजिया से उसका परिचय सम्राट की प्रिय भगिनी तथा अपनी सखी के रूप में कराया. फ्रेजिया ने चंद्रिका का विनम्र अभिवादन किया. चंद्रिका ने प्रेम से उसका हाथ पकड़कर अपनी विशाल हृदयता का परिचय दिया. इस सम्मान से अभिभूत फ्रेजिया ने कहा, “सैंड्राकोटस बासिलियस बासिलियन !”

चंद्रिका को आश्चर्यचकित छोड़कर, फ्रेजिया पुनः अभिवादन कर सारा के साथ चली गई.

चंद्रिका मेरे पीछे पड़ गई, “बताइए, फ्रेजिया ने यूनानी भाषा में क्या कहा ?”

“सैंड्राकोटस बासिलियस बासिलियन !”

“यह तो मैंने भी सुना, पर इसका अर्थ क्या है महारानी ?”, चंद्रिका ने सभी अंगों से जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा.

“इसका अर्थ है – चंद्रगुप्त राजाओं के महान राजा हैं.”

“धन्य हो, धन्य हो !!”

“इस धन्यता का अर्थ ?”

“अर्थ यह कि आपके मुख से सम्राट की प्रशंसा तो निकली, भले ही शब्द किसी अन्य के हों.”

“ठहर दुष्टे !” मैं कृत्रिम क्रोध से चंद्रिका की ओर लपकी.

मेरे काल्पनिक आघात से बचने का नाटक करते हुए उसने अपने दोनों हाथ मुख के आगे कर लिए और क्षीण कटि से ऊपर का उत्तुंग प्रदेश पीछे झुका लिया. उसकी यह मनोहारी मुद्रा देखकर मैं अपने स्थान पर जड़ गई
हो गई.

स्वाभाविक मुद्रा में आते हुए उसने कहा, “महारानी जी, यदि आप मुझ पर आघात करेंगी तो मैं आपको शुभ संवाद दिए बिना ही यहां से पलायन कर जाऊंगी.”

“कौन-सा शुभ संवाद ?” मेरी
जिज्ञासा उमड़ी.

“वही जो मैं लेकर यहां आई हूं.”

मेरा मौन ही चंद्रिका को परास्त करता है. अतः मैंने मौन धारण कर लिया.

चंद्रिका मेरे निकट आकर बोली, “गत सात दिनों से उपक्रम हो रहा है.”

“……”

“आज पूर्ण हो गया.”

“……”

“महाराज के साथ आपको भी कल
जाना है.”

“……”

“मौन धारण कर मुझे जितनी पीड़ा दे सकती हैं, दीजिए पर मैं बिना बताए नहीं रह सकती महारानी जी !”

“……”

“धन्य हो यूनानी बाला ! कल आप वन-विहार को जा रही हैं.”

अब मौन रहने का नाटक करने का मेरा धैर्य समाप्त हो चुका था. उत्सुकता से पूछा, “क्या कह रही हो ?”

“जी हां, बिल्कुल सत्य !”

यह बहुप्रतीक्षित सूचना देने के लिए पुरस्कार स्वरूप मैंने चंद्रिका को आलिंगन में भर लिया.

आलिंगन में बंधे हुए उस दुष्टा ने कहा, “चलो अच्छा हुआ, यह संवाद आपको द्वारपाल ने नहीं दिया. सम्राट को कितना बुरा लगता.”

यह सुनते ही मैंने उसे हल्का-सा धक्का दिया और आलिंगनमुक्त हो गई. कभी-कभी चंद्रिका का परिहास वीभत्स हो जाता है.

अपनी शंका प्रकट करते हुए मैंने कहा, “यह समाचार मुझे महाराज ने क्यों नहीं
दिया ?”

“पाटलिपुत्र में रात्रि के समय मृगया की चर्चा करना वर्जित है. हां, अपने भवन में कोई किसी का आखेट हो जाए या कर दे, इसका निषेध नहीं है.”

तभी महाराज के आने का संदेश मिला. चंद्रिका पलायन कर गई.

आज प्रातः ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सूर्योदय में विलंब हो रहा है. वन-विहार हेतु सारी व्यवस्थाएं पूर्ण हो चुकी थीं. मैं तैयार थी. महाराज ने सारा और चंद्रिका को भी साथ चलने की अनुमति दे दी थी. तात्पर्य यह कि हमारे और महाराज के वाहन भिन्न-भिन्न होंगे. बाद में चंद्रिका ने बताया कि यह नियम राजा की सुरक्षा के लिए बनाया गया है. गज या रथ पर आरूढ़ राजा सदैव सशत्र यवन त्रियों से घिरा रहता है.

राजप्रासाद में तूर्यनाद होने लगा. इसका अर्थ है महाराज ने ‘मंगलद्वार’ की ओर प्रस्थान कर दिया है. परिचारिकाओं ने आकर निवेदन किया कि प्रस्थान का समय हो चुका है. चंद्रिका और सारा तत्काल मुझे लेकर मुख्य द्वार की ओर चल दीं. मैं और महाराज लगभग एक ही समय पर ‘मंगलद्वार’ पर पहुंचे. पुरोहितों ने स्वस्तिवाचन किया और यात्रा मंगलमय होने की कामना की. वातावरण में शंखध्वनि व्याप्त हो गई.

मुझे यूनानी धर्म के अनुसार पूजा, आराधना तथा धार्मिक कर्मकांड निष्पन्न करने की स्वतंत्रता मिली हुई थी. प्रतिदिन भोजन के पश्चात वृक्ष पर जल चढ़ाने की यूनानी-रीति तात को प्रभावित कर गई थी. इसे चंद्रिका सहित प्रासाद में कई लोगों ने अपना लिया था.

मेरे संकेत पर एक पात्र में मुझे जल दिया गया. मैंने वन देवता सटीरोस को अर्घ्य दिया. महाराज मुग्ध-भाव से देखते रहे. तत्पश्चात हम प्रासाद से बाहर आए. वहां भारी संख्या में परिचर, सैनिक, यवन त्रियां उपस्थित थीं. दो सुसज्जित राजकीय गज सामने लाए गए. गजों के ऊपर चित्रकारी की गई थी. उन पर सुंदर कामदार झूलें पड़ी थीं. उनकी पीठ पर स्वर्ण अम्मारियां रखी थीं. एक गज को बिठाया गया. एक छोटे-से सोपान का प्रश्रय लेकर चंद्रिका और सारा के साथ मैं अम्मारी में बैठ गई.

महाराज जिस गज पर आरूढ़ हुए, उसकी ग्रीवा में स्वर्ण-घंटिका लटक रही थी. उनके साथ कई सशत्र यवन कन्याएं सन्नद्ध बैठी थीं. मुझे उनके भाग्य पर ईर्ष्या हुई.

राजप्रासाद-परिसर पार कर हम लोग राजपथ पर आ गए. राजपथ के दोनों ओर रज्जु-बंधन था और राजा के स्वागत को आए नगरवासी रज्जु के पीछे खड़े होकर, अपने सम्राट का जयघोष तथा शंखध्वनि कर रहे थे. चंद्रिका ने बताया कि यदि असावधानी से भी कोई नगरवासी रज्जु का उल्लंघन कर राजपथ पर आ जाए तो उसके लिए मृत्युदंड निश्चित है. हमारे साथ समारोहपूर्वक चलनेवाले और सबसे आगे चल रहे वादक-वृंद राजकीय गुप्तचर हैं. विभिन्न वेश में सहस्रों गुप्तचर वन में भी फैले होंगे. कुछ गुप्तचर तो तपस्वियों का रूप धारण कर सदैव वन में ही स्थाई रूप से रहते हैं.

विशद गुप्तचरी नियोजन और कठोर सुरक्षा व्यवस्था मेरे मन में खटक रही थी. मैंने चंद्रिका से पूछा, “क्या अपने राज्य में नृप स्वतंत्र होकर विचरण नहीं कर सकता ? जनता से मिलकर उनके सुख-दुःख नहीं जान सकता ?”

“नहीं, महारानी जी, सम्राट ऐसा नहीं कर सकते. उनके प्राणों का संकट सदैव बना रहता है. कई षड्यंत्र गुरुदेव ने विफल किए हैं. इसी कारण महाराज की सुरक्षा की वेदी पर नागरिक स्वतंत्रता की बलि चढ़ा दी गई है. गुप्तचरों का संजाल बिछा है. उन्हें लोगों के व्यक्तिगत जीवन तक में झांकने का अधिकार दिया गया है. पर आप इन नागरिकों के मुखों की ओर देखें. क्या वे किसी प्रकार आपको दुःखी दिखाई दे रहे हैं ?”

“यहां उपस्थित आबाल-वृद्ध सभी प्रसन्न दिखाई दे रहे हैं. प्रतीत होता है कि ये लोग धन-धान्य से पूर्ण हैं और इन्हें अपने शासक से कोई असंतोष नहीं है.”

“वह सामने देखिए महारानी जी, वन की सीमा प्रारंभ होने वाली है.”

“वहां भारी समागमन है. कौन हैं वे
लेग ?”

“वहां आटविक और उसके सहचर हैं.”

“आटविक ?”

“वन-विभाग का अध्यक्ष आटविक कहलाता है. आखेट, भोजन, मनोरंजन, विश्राम और सुरक्षा का भार उसी पर रहता है. कहीं भी चूक होने पर गुरुवर के कोप का भागी बनना होता है.”

वन-सीमा पर पहुंचते ही आटविक के संकेत पर दोनों गज रोक दिए गए. उसने हमारा स्वागत किया और सौहार्द्र के रूप में पुष्प-गुच्छ भेंट में दिए. उसके साथ आए लोगों ने प्रभूत पुष्प-वर्षा की.

वन के भीतर काफी दूर तक प्रवेश करने के बाद महाराज का गज रोककर बिठाया गया. गज से विलग हो महाराज हमारे निकट आए. हमारा गज भी बैठ चुका था. उनके संकेत से मैं अकेली गज से उतरकर उनके निकट पहुंची. मेरा मन भीत आशंकाओं से भर उठा.

“मेरे साथ पदाति चल पाएंगी देवी ?” मंद्र स्वर में महाराज ने पूछा.

मैं कहना चाहता थी कि आपके साथ तो अग्निपथ को भी पादाक्रांत कर सकती हूं, पर अन्य लोगों की उपस्थिति में लज्जावश कह न पाई. मात्र यही कह पाई, “जैसी आज्ञा देव !”

हम अग्रसर हुए. अंगरक्षक हमारे चारों ओर घेरा डालकर चलने लगे. महाराज ने संकेत से उन्हें कुछ दूर हटने के लिए कहा कि ताकि हमारी वार्ता उनके कानों तक न पहुंचे.

“प्राकृतिक निधियां और आध्यात्मिक उपलब्धियां दोनों के दर्शन यहां लभ्य हैं,” महाराज ने बिना किसी भूमिका के कहा.

“आध्यात्मिक उपलब्धियां ?”

“हां, यहां तपस्वीगण तप-निरत हैं. हम दोनों उनका आशीर्वाद प्राप्त करेंगे.”

“महाराज, आप नागरिकों से, अधीनस्थ राजाओं से कर लेते हैं पर मन और इंद्रियों की एकाग्रता में संलग्न इन तपस्वियों को भी कर देने के लिए बाध्य करते हैं,” मैं जानती थी, मेरा कथन प्रश्न उठाएगा.

कुछ क्षण सोचने के बाद महाराज ने पूछा, “आपका तात्पर्य ?”

“महाराज, जब तपस्वी हमें आशीर्वाद देंगे तो उनकी तपोशक्ति का एक अंश स्वतः ही हमें मिल जाएगा. उनका तप क्षीण होगा और हमारे क्षेम में वृद्धि होगी,” अपने तर्क का प्रभाव जांचने के लिए मैंने महाराज के मुख की ओर देखा.

उनके आनन पर एक स्मित-रेखा उभरी और शीघ्रता से चली गई. मेरी ओर दृष्टि-भर देखते हुए बोले, “धन्य हो देवी ! तुम्हारे तर्कों के समक्ष मैं असहाय-सा हो जाता हूं.”

महाराज ने अपनी भुजा उठाकर आगे की ओर संकेत किया, जहां आश्रम बने हुए थे. आश्रम के समक्ष, वृक्षों के नीचे तपस्वी साधनारत थे. वहां मुझे अशोक वृक्षों की पंक्तियां दिखाई दीं.

“देवी ! उन वृक्षों और उनके पुष्पों के संबंध में मुझे ज्ञान-लाभ देंगी ?”

“महाराज, कदाचित आप मेरा उपहास कर रहे हैं. मैंने सर्वज्ञ होने का भ्रम तो कभी नहीं पाला.”

“आप अन्यथा न लें. इन वृक्षों और उनके पुष्पों के विषय में मेरा ज्ञान वास्तव में शून्य है. आपको रुचिकर न हो तो यह प्रसंग समाप्त समझें.”

“प्रसंग समाप्त नहीं होगा महाराज. आपका प्रकृति-प्रेम मैं कुंठित नहीं होने दूंगी. अवलोकन करें उस ओर, जहां अशोक वृक्ष-पंक्ति एक साथ विकसित हो गई प्रतीत होती है. इनके सान्निध्य में निवास करने वालों के लिए शोक कहां ? इनके चटक कुसुंभी वर्ण के पुष्प कदाचित ही कहीं अन्यत्र उपलब्ध हों. प्रगाढ़ दांपत्य-प्रेम का प्रतीक कुसुंभी दांपत्य का वर्ण है – पवित्र पीत और अनुराग-लालिमा का मिश्रण ! अशोक वृक्षों से आवृत्त अरण्य का यह भाग सद्यः विवाहित वधुओं के सम्मेलन जैसा लग रहा है.”

महाराज मेरी बातों से अभिभूत हो, कहीं ऐसे खो गए कि ज्ञात ही नहीं हुआ कि हम तपस्वियों के आश्रम के अति निकट कैसे पहुंच गए.

हम दोनों ने तपस्वियों के चरणों में शीश नवाए. उनका आशीर्वाद प्राप्त किया. मुझे बाबा का कथन स्मरण हो आया. उन्होंने बताया था कि सिकंदर ने भी भारतीय तपस्वियों से आशीर्वाद प्राप्त किया था. कई तपस्वियों ने हमें फल उपहार में दिए.

तापस-आश्रम से विदा होकर आगे हम दोनों एक गज पर आरूढ़ हो गए. यद्यपि यह नियमों के विपरीत था परंतु राजा की इच्छा तो सर्वोपरि होती है. हमारे चारों ओर सुरक्षा-सैनिक घेरा बनाए चल रहे थे. वे इतनी दूरी बनाए हुए थे कि न तो हम उन्हें भली-भांति देख पा रहे थे और न वे ही हमारा वार्तालाप सुन पा रहे थे.

वन-विहार तो एक बहाना था. मुझे तो प्रकृति की गोद में पति-सान्निध्य चाहिए था. वह सुलभ हो गया.

वन में पिप्पल, आम्र, पाटल, शाल, सप्तपर्ण, मधूक के ऊंचे और घने पत्तों वाले वृक्षों का परिचय, जो वसंत ऋतु के आभूषण पहन प्राप्त-यौवन सुंदरी की देहयष्टि के समान लहरा रहे थे, महाराज ने स्वयं दिया जो कुछ समय पूर्व तक वनस्पतियों से अपनी अनभिज्ञता का नाटक कर रहे थे.

“ये वृक्ष हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं.” महाराज की वाणी मुखर हो उठी, “वह देखिए औदुंबर का वृक्ष है, पूरा यज्ञिय है. इसके फल समिधा में प्रयुक्त होते हैं. इसी के काष्ठ से निर्मित भद्रासन पर बैठाकर मेरा राज्याभिषेक हुआ था. अभी इसके फलने की ऋतु नहीं है. इसके छोटे-छोटे फल पकने पर टप-टप ध्वनि के साथ नीचे गिरते हैं.

“उधर देखिए, कुरबक के ताजे पुष्प सुंदरियों की वेणी में गुंथे जाने को आतुर हैं. और वह है कदंब ! पूर्वकाल में भगवान श्रीकृष्ण के सान्निध्य में रहकर कदाचित पूरा वृक्ष ही सौंदर्य की जीवंत मूर्ति बन गया है. वर्षा ऋतु आकर इनमें पीतवर्णी पुष्प
खिलाती है.”

एक वृक्ष के नीचे जाकर महाराज खड़े हो गए, “देवी, क्या आप कल्पना कर सकती हैं कि मदार जाति के ये वृक्ष विवाहित होते हैं, और वह भी पुरुषों के साथ ?”

“वृक्ष का विवाह
और वह भी पुरुष
के साथ ?”, मैंने
साश्चर्य कहा.

“हां ! तीसरा विवाह करनेवाले पुरुष पहले मदार से विवाह करते हैं, जो ‘अक्र’ विवाह कहलाता है, उनकी तीसरी पत्नी चौथी कहलाती है. तीन की संख्या अशुभ जो मानी जाती है.”

तभी एक मैना चीत्कार कर उठी. मैंने घबरा कर महाराज की भुजा थाम ली.

आश्वस्ति भरा हाथ मेरे हाथ पर रखते हुए महाराज ने कहा, “आपको लगता है कि किसी कारण से यह मैना व्यक्ति होकर चीत्कार कर रही है. पर नहीं, यह चीत्कार इसकी प्रसन्नता का प्रदर्शन है. यहीं कहीं आस-पास इसने भुजंग देख लिया होगा. एकांत मिलते ही यह उसे नोच-नोचकर खा जाएगी.”

मधुरकंठी मैना की निष्ठुरता पर मैं
सिहर उठी.

मेरी मनोदशा उत्फुल्ल करने के लिए आकाश की ओर इंगित करते हुए महाराज ने कहा, “देखो, वह कारंडव पक्षी कितनी तीव्र गति से पंख फड़फड़ा रहा है. इसका तात्पर्य यह है कि सरिता निकट ही बह रही होगी, जिसकी सतह पर इसने झपट्टा मारा है और उड़ान भरकर पंख सुखा रहा है. इस सरिता के किनारे इनका संगीत-सम्मेलन जमा होगा. कितने ही कारंडव मधुर गीत गाते मिल जाएंगे. नदी-तट पर ही हमारे शिविर होंगे, जहां आप लावण्यमयी साक्षात प्रकृति के दर्शन कर पाएंगी.”

दूर क्षितिज से आई हुई स्पर्श-सुखमयी बासंती वायु तृणों पर प्रेम-पत्र लिखकर पुष्पों को अपनी बांहों में भरकर मौखिक प्रेम-संदेश दे रही थी. एक कुंज पर उड़ते हुए नन्हे-नन्हे पक्षी मंगल सहगान-सा गाते प्रतीत हो रहे थे मानो कुंज-परिवार में नए पादप ने जन्म
लिया हो. कुंज तृण कितने सजीव लग रहे थे जैसे अभी बोल पड़ेंगे. वायु के अनवरत
स्पर्श से पृथ्वी का सर्वांग पुलकित हो
गया था.

कोकिल की कूक सुनकर मेरे नेत्र आसपास के वृक्षों पर भटककर उसे चारों ओर खोजने लगे.

इस स्थिति से मुझे त्राण दिलाते हुए महाराज ने कहा, “देवी ! कोकिल की स्वरलहरी सुनकर भावाभिभूत मत हो जाना. ये कोकिल मादा कौओं के घोंसलों में पले होते हैं.”

“यदि ऐसा है तो कोकिलों की उपस्थिति से कौओं के घोसले पावन हो जाते होंगे.”

मेरे इस कथन से महाराज इतने अभिभूत हो गए कि उन्होंने अपने नेत्र मेरे सर्वांग पर टिका दिए. प्रतीत हो रहा था जैसे उनकी निष्काम, निर्मल और निश्छल प्रेम-भावना नेत्रों से प्रकट होना चाहती हो.

उनका ध्यान विकर्षित करने के लिए मैंने छोटे-छोटे पत्थरों के समूह की ओर इंगित किया, जिनके बीच से एक पादप निकल रहा था.

महाराज ने अपनी दृष्टि उधर फेरी. कुछ पल विचारमग्न रहने के बाद बोले, “पाषाण को उद्भिन्न कर, आकाश में अपना अंकुरित सिर उठाने वाला वृक्ष एक महान आश्चर्य होता है. देखिए, अभी-अभी पवन ने इस पादप के महाकृत्य की प्रशंसा में उसे थपथपाया है. पादप गर्व से झूम रहा है.”

“साधु ! महाराज, साधु !! आपमें अप्रतिम काव्य-शक्ति है. राजदंड बिंदुसार को सौंपकर एकांत में संसार के सौंदर्य और करुणा का काव्यमय चिंतन कीजिए.”

“काव्य-साधना की तो नहीं कह सकता पर एक दिन एकांतवास अवश्य करूंगा.”

महाराज के इस कथन को मैंने उस समय परिहास समझा.

उद्दंड बालक की भांति सूर्य जब ऊपर चढ़ आया, हम शिविर में थे. शिविर क्या था, जैसे राजप्रासाद का एक प्रकोष्ठ ही वहां लाकर स्थापित कर दिया गया हो. अल्प विश्राम के बाद हम भोजन को प्रस्तुत हुए.

भोजन में सबसे पहले मालढोक पक्षी के सुस्वादु मांस का सूप दिया गया. मोर, हरिण के शूल्य एवं भुने मांस तथा लटवाक पक्षी का मधुर मांस तो था ही, मधु, दही, नवनीत, छेना, शराब और रोटी भी थी. अंगूर, अंजीर और किशमिश भी भोजन में सम्मिलित थे.

सबसे अंत में मधुपर्क प्रस्तुत किया गया. महाराज ने एक घूंट लिया और प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी ओर देखने लगे.

मैंने बताया, “यह यूनानी मधुपर्क है. मैंने इसकी व्यवस्था राजधानी में ही कर दी थी. यह नवनीत, मधु, जौ के आटे और अंगूरी मदिरा को मिलाकर बनाया गया है.”

“बहुत स्वादिष्ट है. क्या एक चषक और मिलेगा ?”

“क्षमा करें महाराज, हमें अभी नगर भी वापस चलना है.”

महाराज मेरा संकेत समझ गए. उन्होंने रिक्त चषक एक ओर रख दिया और पर्यंक पर जा विराजे.            

   (क्रमशः)

अप्रैल  2005

 

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