सैनफ्रांसिस्को के महाशय  –  इवान बुनिन

नोबेल-कथा

रूसी कथाकार बुनिन का जन्म 22 अक्तूबर, 1870 को हुआ था. पूरा नाम इवान एलेक्सेविच बुनिन था. इनकी रचनाएं बहुत ही कम उम्र में छपने लगी थीं परंतु तब भी इनके शब्दों में, ‘मुझे ख्याति प्राप्त करने के लिए काफी इंतजार करना पड़ा. इसके कई कारण थे. मैं राजनीति से दूर किसी विषय पर कुछ नहीं लिखता था. मैं किसी भी साहित्यिक स्कूल का नहीं था- मैं अपने को न प्रतीकवादी, न रोमांटिक, न यथार्थवादी कहता था और न मैंने कोई नकाब लगाया, न कोई झंडा ही फहराया…’ इनकी रचनाएं संख्या में थोड़ी हैं  परंतु गुणों की दृष्टि से वे उच्चकोटि की मानी जाती हैं.

द विलेज के लिए इन्हें सन् 1933 में नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया.

अकादमी ने इनके बारे में कहा था, ‘इनकी उस समर्थ कला के लिए जिसके द्वारा यह गद्य लेखन के क्षेत्र में रूस की क्लासिकल परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं, इन्हें यह पुरस्कार दिया जा रहा है.’

इनकी अन्य प्रमुख पुस्तकें हैं- ‘दि ड्रीम्स ऑफ चैंग’, ‘दि वेल ऑफ डेज’, ‘मेमोरीज एंड पोर्ट्रेट्स’ आदि.

वह सैनफ्रांसिस्को के जिस तबके का था, उसके लोग ज़्यादातर अपने मनबहलाव की शुरुआत यूरोप, भारत और मिस्त्र की यात्रा से करते थे. उसने भी यही ठीक समझा और दौरे की समूची रूपरेखा बना डाली.

नवम्बर के अंतिम दिनों में खराब मौसम के बावजूद जहाज समुद्र की लहरों को चीरता जिब्राल्टर की ओर बढ़ा जा रहा था. स्टीमर ‘एटलांटिस’ के तमाम यात्री यूरोप के बेहद खर्चीले आधुनिक साधनों से सम्पन्न होटल में पहुंचे.

शाम की पोशाक पहने वह बहुत कम उम्र का लग रहा था. उसके पास ही जोहानिसबर्ग का एक आदमी अपनी पत्नी के साथ खड़ा था. उसकी पत्नी महंगी पारदर्शी पोशाक पहने हुए थी. जब-जब वह सांस लेती, लगता सुगंध उड़ रही है.

पूरे दो घंटे में जाकर कहीं रात का भोजन प्राप्त हुआ. साथ ही डांस हॉल में डांस भी शुरू हो गया. वह भी लोगों के साथ रिफ्रेशमेंट बार की ओर बढ़ लिया, जहां लाल जैकिट पहने बड़ी-बड़ी आंखों वाले नीग्रो इंतज़ार कर रहे थे. मेजों पर पैर रखे हुए होंठों में हवाना का सिगार दबाये, वे ताज़ातरीन राजनीतिक घटनाओं से लेकर स्टाक एक्सचेंज तक की बहसों में खोये हुए थे.

जिब्राल्टर पहुंचकर सूरज की रोशनी देख सभी लोग बहुत खुश थे. मौसम वसंत के शुरुआती दिनों-सा था. यहां एक नया यात्री आया, जिसने आते ही अन्य यात्रियों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. शायद वह किसी एशिया के राजघराने का राजकुमार था. नाटे कद का यह आदमी उम्रदार होते हुए भी किसी युवक-सा लग रहा था.

सैनफ्रांसिस्को से आये परिवार की लड़की राजकुमार से कुछ फासले पर खड़ी थी और गौर से उसकी हरकतें देख रही थी. दरअसल पिछली शाम उसका परिचय राजकुमार से हो चुका था.

नेपल्स अब नज़दीक आ रहा था. बैंडवालों ने अपने चमचमाते पीतल के वाद्ययंत्रों के साथ डेक पर घेरा-सा बना लिया था. तभी जहाज का लम्बा-चौड़ा कप्तान ब्रिज पर पहुंचा और अपना हाथ उठाकर यात्रियों को सम्बोधित करने लगा. सैनफ्रांसिस्को के उस आदमी को लगा कि कप्तान अकेले उसे ही सम्बोधित कर रहा है. उसने सफर के खत्म होने पर कप्तान को बधाई भी दी.

सुबह-सुबह डायनिंग रूम में नाश्ता किया गया. डायनिंग रूम की खुली खिड़कियों से आकाश में छाये घने बादल और उदास मौसम स़ाफ नज़र आ रहा था… पर थोड़ी देर बाद सूरज की पहली किरण के साथ सारा मौसम बदल गया.

दोपहर को वे लोग ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच से होकर गुज़रे, जिनमें खिड़कियों की बहुतायत थी. वे संग्रहालयों में गये जहां स़फाई और प्रकाश व्यवस्था देखते ही बनती थी. इसके बाद सभी चर्च गये. दोपहर का भोजन सैन मारटियम की पहाड़ी पर किया. यहां कुछ गणमान्य लोग ही इकट्ठे हुए. तभी सैनफ्रांसिस्को के परिवार की लड़की तो खुशी से उत्साह में करीब-करीब बेहोश ही हो गयी. उसने अखबार  में राजकुमार के रोम रवाना होने की खबर पढ़ ली थी.

रिवाज के मुताबिक पांच बजे होटल में ही चाय ली गयी… धीरे-धीरे भोजन का समय भी आ पहुंचा.

चलने वाला दिन इस परिवार के लिए बहुत यादगार साबित हुआ. इस दिन सूरज निकला ही नहीं. समूचा कैपरी अंधेरे में खोया हुआ था, लगता था जैसे वह कभी इस ज़मीन का हिस्सा रहा ही नहीं. स्टीमबोट के केबिन के सोफे पर वे पांव सिकोड़कर बैठ गये… उबकाई आने के कारण ज़्यादातर लोग अपनी आंखें बंद ही किये हुए थे. परिवार की औरत इस लम्बी समुद्री यात्रा में ऊब चुकी थी.

छोटी लड़की डरी-सी लग रही थी. वह लगातार पीली पड़ती जा रही थी. अक्सर वह अपने दांतों के बीच नींबू का टुकड़ा फंसाये रहती. ओवरकोट और बड़ा-सा टोप पहने हुए उस परिवार का आदमी लड़की के पीछे लेटा हुआ था.

उसके चेहरे का रंग गहरा, मूंछें सफेद थीं और उसके सिर का दर्द तेज़ होता जा रहा था. दरअसल, पिछली कुछ शाम से वह ज़्यादा ही पी रहा था.

कैपरी के टापू पर शाम को काफी धुंध छाई हुई थी. सैनफ्रांसिस्को से आये आदमी के स्वागत के लिए कुछ लोग खड़े थे. किसी और को इनकी परवाह भी नहीं थी.

जवान और सुंदर नज़र आने वाला होटल का मालिक मुस्कराते हुए, अतिथियों के सामने झुका-झुका ही अभिवादन कर रहा था. सैनफ्रांसिस्को के आदमी ने एक नज़र उसे देखा, और सोचा, यह वही शख्स है जिसने उसे कल रात कल्पना में सोने नहीं दिया था, ‘एकदम वैसा ही है वह आदमी,’ उसने सोचा ‘फ्रॉक कोट, वही सिर… एकदम वही बाल…’ वह कॉरीडोर पार करता हुआ तेज़ी से अपनी पत्नी और बेटी को कल्पना और यथार्थ के इस अद्भुत संयोग के बारे में बताने के लिए चल दिया.

उसकी तबीयत ठीक नहीं थी. धीरे से… लेकिन कुछ बेहूदे ढंग से, उसने खिड़की बंद कर दी. तभी होटल का एक आदमी आ पहुंचा. उसने दोपहर के भोजन का आदेश दिया… कि उनकी मेज दरवाज़े से खासे फासले पर होनी चाहिए… वे लोकल वाइन और शैंपेन लेंगे.

सैनफ्रांसिस्को का आदमी अब तैयारियां करने लगा, जैसे किसी शादी में जाना हो.

इस शाम इस आदमी ने क्या सोचा और महसूसा, यह बताना बहुत ज़रूरी है. यह भी कहा जा सकता है कि इसमें कुछ भी अजीबोगरीब नहीं था. परेशानी तो यही है कि इस ज़मीन पर हर चीज़ बड़ी आसानी के साथ उतर आती है… पर, क्या उसके जेहन में कोई चीज़ गहराई से उतरी थी?

दाढ़ी बनाने के बाद वह देर तक शीशे के सामने खड़ा होकर गौर से देखता रहा कि उसके मोती-से रंग वाले बालों में कुछ छूट तो नहीं गया है!

‘कितना भयानक है यह!’ उसके मुंह से निकला. बगैर यह सोचे-समझे कि ‘भयानक’ क्या होता है. उसने अपने हाथों की उंगलियों के जोड़ों को गौर से देखा. फिर नाखूनों के रंग को देखते हुए एक बार फिर बड़बड़ाया.

उसने अपनी टॉर्च को कालर के गिर्द कसा और फिर डिनर कोट पहनते हुए कपों को सेट किया. उसने आखिरी बार अपना रूप शीशे में निहारा. फिर खुशी से वह पत्नी के कमरे की ओर चल दिया. पत्नी के कमरे के पास पहुंचकर उसने ऊंची आवाज़ में पूछा, ‘अभी ज़्यादा देर लगेगी क्या?’

‘पापा, सिर्फ पांच मिनट.’ बेटी ने जवाब दिया.

इसके बाद वह लाल दरी पर चलता हुआ धीरे-धीरे लाइब्रेरी की ओर बढ़ लिया. हल्के सलेटी रंग की स्कर्ट पहने एक बूढ़ी औरत तेज़ी से उसके आगे से निकल गयी… उसे शायद डिनर के लिए तैयार होने में देर हो गयी थी. होटल के नौकर भी तेज़ी से इधर-उधर आ-जा रहे थे… वह इस तरह चलता रहा, जैसे उसे इन सबकी कोई परवाह ही न हो.

शीशे के दरवाज़े वाले डाइनिंग रूम में मेहमान पहले ही इकट्ठे हो चुके थे. कुछ ने भोजन शुरू भी कर दिया था. वह इजिप्शियन सिगरेट और माचिसों वाली मेज़ के सामने रुका और एक महिला से सिगार लेते हुए उसने तीन लीरा मेज पर उछाल दिये. अब वह लाइब्रेरी की ओर चल दिया.

लाइब्रेरी में एक जर्मन अखबार पढ़ने में तन्मय था. उसने जर्मन पर एक टेढ़ी नज़र डाली और चमड़े की आर्मचेयर पर बैठ गया. कसी हुई कॉलर उसके गले को जैसे घोंटे दे रही थी. उसने अपना सिर झटका और अखबार के शीर्षक पढ़ने लगा. कुछ पंक्तियां बाल्कन युद्ध के विषय में पढ़कर अपनी आदत के मुताबिक उसने पेज पलट दिया. उसे लगा आंखों के आगे धुंधलका-सा छाता जा रहा है. उसके गले की नसें भी फूलने लगीं… और आंखें बाहर निकलने को हो आयीं उसने हवा लेने की गर्ज से आगे की ओर बढ़ने की कोशिश की और… फिर अचानक उसके मुंह से अजीबोगरीब आवाज़ निकलने लगी. कंधे ढीले छोड़ते हुए उसने कांपना शुरू कर दिया. संभलने की काफी कोशिश करने के बावजूद वह फर्श पर गिर ही पड़ा. जर्मन उसकी यह हालत देखकर तेज़ी से बाहर की ओर पलटा और अलार्म बजा दिया.

सभी लोग अपना-अपना खाना छोड़कर तेज़ी से लाइब्रेरी की तरफ भागे और ‘क्या हुआ- क्या हुआ’ कहने लगे. तभी होटल का मालिक मेहमानों के बीच में रास्ता बनाता हुआ वहां आ पहुंचा, ‘कुछ नहीं हुआ, सैनफ्रांसिस्को के यह महाशय बेहोश हो गये हैं, बस.’

निचले कॉरीडोर में ले जाकर छोटे किंतु ठंडे कमरे में बिस्तर पर उसे अभी लिटाया ही था कि उसकी बेटी बेतहाशा भागती हुई आयी. उसके बाल कंधों तक झूल रहे थे. उसकी स्कर्ट और ड्रेसिंग गाउन करीब-करीब अधखुले-से थे. इसके बाद उसकी पत्नी वहां पहुंची, जो डिनर के लिए लगभग तैयार थी. उसके चेहरे पर आतंक छाया हुआ था.

कुछ लोग वापस डायनिंग हॉल में आकर भोजन करने लगे थे. वे सभी अपने-आप में खामोश थे.

उधर सैनफ्रांसिस्को वाला आदमी एक सस्ते लोहे की पलंग पर गुमसुम पड़ा था. मद्धिम रोशनी का बल्ब हल्का प्रकाश फेंक रहा था. उसके माथे पर बर्फ रखकर ठंडक पहुंचाने की कोशिश की जा रही थी. पर धीरे-धीरे उसका चेहरा पीला पड़ने लगा.

…और अब वह खत्म हो चुका था.

तभी होटल का मालिक वहां आ पहुंचा. उसने डॉक्टर से कुछ बातचीत की और खामोश हो गया. मृतक की पत्नी ने कहा कि लाश पहले उसके कमरे में पहुंचायी जानी चाहिए.

‘नहीं मैंडम, यह एकदम नामुमकिन है!’ उसने विनम्रता से जर्मन भाषा में कहा.

लड़की जो अब तक भौचक-सी अपने पिता के शव को देखे जा रही थी, ज़मीन पर पसर गयी और मुंह पर रूमाल ढांपे ज़ोर-ज़ोर से रो पड़ी. उसकी मां के आंसू एकदम सूख गये और वह अपने हाथ उठाकर कहने लगी कि अब मेरी इज़्ज़त नहीं की जा रही.

रात को जब होटल सो चुका था, एक वेटर ने रूम न. 43 की खिड़की खोली, खिड़की बगीचे के कोने की तरफ थी. वेटर ने रोशनी का रुख मोड़ा और दरवाज़े की ओर नज़र मारकर लौट गया. शव अंधेरे में पड़ा रहा.

कॉरीडोर में बैठे होटल के नौकर कुछ बना रहे थे. तभी स्लीपर पहने लुइजी ने प्रवेश किया. उसने फुसफुसाते हुए कुछ पूछा और कमरे की ओर हाथ का इशारा किया. फिर वह फुसफुसाने के अंदाज में ही चीखा… नौकरों के गले जैसे घोट ही दिये गये थे. उसने इसके तुरंत बाद एक-दूसरे के कंधों पर एक-दूसरे के सिरों को टिकाया और कमरे की ओर बढ़ लिया. दरवाज़ा खोला और कुछ पूछा, फिर कुछ क्षण बाद वह खुद ही दुखी स्वर में बोला, ‘हां, अंदर आ जाओ!’

और जब रूम नं. 43 की खिड़कियों का रंग सफेद हो गया, केले के पेड़ के पत्ते हवा में फड़फड़ाने लगे, केसरी के आसपास का रंग पीला होने लगा, सभी घुमंतू अपने-अपने कामों में लग गये तो एक बड़ा संदूक लाया गया.

छोटी बांहों का पुराना कोट पहने लाल आंखों वाला गाड़ीवान लगातार चाबुक मारते हुए अपने छोटे लेकिन ताकतवर घोड़े को दौड़ाये चला जा रहा था. उसके सिर में काफी दर्द था. इसी वजह से वह खामोश था, पर उसकी बगल में रखे संदूक में पड़े सैनफ्रांसिस्को के आदमी के शव ने उसे अचानक होने वाली आमदनी से खुश कर दिया था.

घाट के पास हेड डोरमैन गाड़ीवान से आगे निकल गया. वह मृतक की पत्नी और बेटी को ऑटो में लेकर आया था.

मृतक का शव अपने गंतव्य के रास्ते पर था. एक नयी दुनिया का समुद्र-तट, जहां एक कब्र उसके इंतज़ार में थी. संयोग की बात यह थी कि यह वही जहाज था, जो सैनफ्रांसिस्को के उस परिवार को पूरी शान से लेकर आया था.

विलासमय केबिनों, डाइनिंग रूम और हॉलों में प्रकाश और उल्लास फैला हुआ था. लोग बढ़िया और चुस्त कपड़े पहने और ऑरकेस्ट्रा की धुनों में मस्त थे. सभी बेखबर होकर संगीत की लहरों के साथ-साथ एक-दूसरे में खोये हुए. उन्हें नहीं पता था कि दूसरी तरफ समुद्र के बीचोबीच जहाज ने समुद्री तूफान और अंधेरे के साथ कितना संघर्ष किया है.

अनुवाद – महेश दर्पण

मार्च 2016

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