सीधी चढ़ान (छठवीं क़िस्त)

जिन युवक सॉलिसिटरों ने मेरी मदद की, उनमें प्रथम थे नर्मदाशंकर     पार्वतीशंकर वकील, जमीयतराम काका के स्वर्गीय भाई के पुत्र. 1909 से 1933 तक, जब उनका स्वर्गवास हो गया, मैं उनका अत्यंत स्नेह-पात्र बना रहा. नरुभाई स्वभाव के शांत और सौम्य थे. वे शौकीन भी थे, परंतु अपने ठंडे और मीठे तरीके से. उनके साहचर्य में मुझे शांति मिलती थी. उनकी संयमशीलता बहुधा उलटे मार्ग पर जाने से रोक लेती थी.

पास होने से पहले मैं सॉलिसिटर की परीक्षा देने वालों के मंडल का सदस्य था. उसके संचालकों में थे दौलतराम कृपाराम पंड्या के भतीजे नयन सुखलाल, मेरे मित्र धीरजलाल नानावटी के बड़े भाई मणिलाल नानावटी, बालगंगाधर खेर (बाद में कांग्रेस की बम्बई सरकार के मुख्यमंत्री) और धनजीशा नानावटी (भारत सरकार के सॉलिसिटर).

सप्ताह में एक दिन कानून की समस्याएं सुलझाने के लिए हम सब एकत्र होते और वहां का काम-काज समाप्त होने पर हम अधिकतर चौपाटी से पैदल चलते हुए घर आते थे!

1912 के मार्च  में नयन सुखलाल पंड्या सॉलिसिटर बने और उन्होंने नयी फर्म शुरू की. मेरे पास होने के बाद पंद्रह वर्षों तक हमने साथ-ही-साथ अनेक कड़वे-मीठे अनुभव किये.

सितम्बर 1912 में मणिलाल सॉलिसिटर बने और अपने बड़े भाई की फर्म में शामिल हुए. तीनों भाइयों ने तिगुने सम्बंध से मुझे अपनाया.

1918 में जब खेर सालिसिटर हुए, तब मणिलाल ने अपने भाई की फर्म से मुक्त होकर ‘मणिलाल एण्ड खेर’ नाम की नयी फर्म बनायी. उसमें मेरा भी थोड़ा-बहुत हाथ था. खेर के साथ मेरी मैत्री अनेक क्षेत्रों में अटूट रूप से बनी रही. अंत में यह मैत्री 1937 में बम्बई में प्रथम कांग्रेस मंत्रिमंडल की स्थापना में कुछ अंशों तक कारण बनी, पर यह तो आगे की बात है.

धीरे-धीरे अन्य मित्र सालिसिटर बने. कई जो बने हुए थे, उन्होंने मैत्री स्थापित की. इन सालिसिटर मित्रों के यहां जब कोई भी उलझनपूर्ण काम आ जाते, या कोई गरीब मुवक्किल न्याय के लिए अकुलाता हुआ आ जाता, तब मैं उसकी सहायता के लिए उपस्थित हो जाता.

अनेक बार सुबह, शाम या रात को देर तक मेरे सॉलिसिटर मित्र और मैं ‘धूल-धोयों’ के समान धूल और सोने को अलग करने बैठते और कोर्ट के समय मैं सारे, कानूनी आधारों को देख डालता. 1913 से 1918 तक मैं इस प्रकार ‘सात-आठ मित्रों’ की सहायता करता रहा.

हम सब नये व्यवसायी थे. हम हंसते, चाय पीते, भूलें करते, और उलझनें जितनी सुलझ सकतीं, सुलझाते थे. कितना काम करते, इस पर ध्यान नहीं देते थे, और पैसा तो जैसा मुवक्किल और जैसी मल्कीयत होती, वैसा मिलता.

उस समय खेर न्यायमूर्ति बीमन के मंत्री के रूप में थे. बीमन की आंखें कमज़ोर थीं, इसलिए वे उनके पढ़ने का काम करते, उनके साथ घूमते और छुट्टी में उनके साथ यूरोप भी जाते. खेर के कारण उस न्यायाधीश के साथ मेरा निजी परिचय हो गया. और कोर्ट में वे मेरे प्रति बड़ी ममता का बर्ताव करने लगे.

न्यायाधीश बीमन में अनेक अद्भुत शक्तियां थीं. वे ठीक से देख नहीं सकते थे, इसलिए मुकदमे के नोट्स कोर्ट में टाइप कराते थे. उनकी स्मरण शक्ति इतनी तीव्र हो गयी थी कि लम्बे मुकदमे में भी एक-एक दस्तावेज के अंक और सारे बयान उन्हें याद रहते थे.  लम्बा-से-लम्बा फैसला होता, उसे भी धाराप्रवाह टाइप करा डालते थे.

‘फांकडो फितूरी’ (बांका फितूरी) नाटक में मुख्य अभिनय करने वाले मास्टर मोहन के लाभार्थ एक खेल होने वाला था. उसका सभापति-पद न्यायमूर्ति बीमन ने स्वीकार किया था. खेर, मणिलाल और मैं उनके साथ गये. उस नाटक में , मास्टर मोहन अपनी प्रियतमा की छतरी को सम्बोधित करके जो गुजराती गाना गाते थे, वह उस समय बम्बई में बड़ा लोकप्रिय हो गया था-

‘जुओ जमाना नी शोधो नवी,

आ छत्री छे मारी बैरी नी.

सारी छत्रीओ सोहाय,

हैयुं ते देखी हरखाय,

पण जुगते थी वापरो जेम,

तो बोलो वरसाद आवे केम?’

इस गाने के लिए अनेक बार ‘वन्स मोर’ होता. प्रत्येक बार मोहन उसमें समयानुकूल बातें जोड़ देता और लोग उछल-उछलकर तालियों की गड़गड़ाहट से उसकी सराहना करते. उस दिन भी उसने हम लोगों के विषय में यह गढ़कर ‘बीमन जेनुं सुंदर नाम, ते आव्या छे अहींयां ठाम’  अपना गाना गाया. साथ-साथ ‘सेक्रेटरी खेर’ और ‘एडवोकेट मुनशी’ को भी बीच में लपेट लिया.

न्यायमूर्ति  बीमन के कोर्ट में अपने पहले बड़े केस के साथ मैं उपस्थित हुआ. एक अनपढ़ घाटी ने बंबई में घास बेचने का काम करके दो-चार लाख की मल्कीयत बना ली थी. वह दो स्त्रियों और एक ‘रखैल’ को छोड़कर मर गया गया. रखैल को एक लड़का था. उसने यह कहकर लड़के की ओर से दावा किया कि ‘मैं उसकी विवाहित स्त्री हूं और मेरा लड़का उसकी मल्कीयत का वारिस है.’

यह दावा न्यायमूर्ति बीमन के पास आया. उस समय उनके कोर्ट में प्रत्येक मुकदमे में बैरिस्टर रुस्तम वाडिया अवश्य होते थे. शंकरभाई अमीन सालिसिटर ने रखैल के पुत्र की ओर से वाडिया के साथ मुझे ‘जूनियर’ ‘ब्ऱीफ’ दी.   

इस मुकदमे की तैयारी करने के लिए मैं रोज सुबह-शाम शंकरभाई से मिलता था.

‘अजी शंकरभाई, इसमें तो कुछ भी तैयारी नहीं है?’ मैंने कहा.

‘वह तो हो जाएगी. बिना तैयारी के मुकदमा थोड़े ही चलाया जाएगा.’ शंकरभाई पान चबाते जाते थे और सारे कागज़ात मेरी तरफ करके शांति से प्रश्न करते जाते थे.

गवाह लोग घर आयेंगे और क्या-क्या बयान देंगे, यह मैं पूछता जाता और लिखता जाता था. एक दिन मैंने कहा-

‘पर शंकरभाई, यदि हमारे मुवक्किल की मां विवाहिता हो, तो विवाह के सबूत की भी तो आवश्यकता होगी न?’

‘विवाह तो हुआ ही होगा,’ शंकरभाई ने कहा- ‘क्यों भाई, विवाह का सबूत कहां है?’ उन्होंने अपने क्लर्क से पूछा.

‘साहब,’ उसने उत्तर दिया, ‘रात को गवाह लेकर आयेगा.’

रात को जब हम फिर मिले, तब क्लर्क उन दोनों आदमियों को ले आया, जो विवाह में उपस्थित थे.

‘परंतु शंकरभाई, यदि विवाह हुआ होगा, तो उसकी निमंत्रण-पत्रिका होगी, विवाह कराने वाला पुरोहित और बराती भी होंगे.’

‘हां, हां, यह बात ठीक है’, शंकर भाई ने कहा- ‘क्यों जी, इनके बारे में क्या कहते हो?’

‘हां, साहब, ये गवाह तो हाजिर हैं ही. कल सुबह उन सब को भी ले आऊंगा.’

दूसरे दिन पुरोहित, बैंडवाले और बरात के आदमी आये. मैंने उनके बयान लिखाये और वे सब कोर्ट में उपस्थित हुए.

कोर्ट में रुस्तम वाडिया मुझसे रोज कहते थे- ‘मुंशी, इसमें कुछ गड़बड़ है.’

एक के बाद एक गवाह आते, कल्पना में भी न आने वाली बातें उपस्थित करते और दूसरे पक्ष वालों को चकित कर देते थे.

अंत में निर्णय हो गया और हमारे मुवक्किल को काफी अच्छी रकम मिली. यह कहने की आवश्यकता नहीं कि सालिसिटर्स का सारा ही खर्च मिला.

मैं एकदम नया था, इसलिए लोग कुछ न कुछ सलाह मशविरा देते ही रहते थे. कोई कहता मुझे न्यायाधीशों को सलाम करना चाहिए, कोई कहता मुझे बड़े-बड़े सालिसिटरों के यहां जूतियां रगड़नी चाहिए.

न्यायाधीश के यहां जाना मुझे न भाया, पर सालिसिटरों से नया-नया परिचय प्राप्त करने की सलाह को मैं अमान्य न कर सका. पिताजी के एक मित्र से बम्बई के एक प्रतिष्ठित सालिसिटर के नाम पत्र लिखाकर मंगाया. उसे लेकर मैं उक्त सालिसिटर के घर पहुंचा. उन्होंने बड़ी ही शिष्टता से मेरा स्वागत किया और मेरी सहायता करने का वचन दिया. मैं खुश होता हुआ घर आया.

तीन सप्ताह तक मैंने उनकी ओर से ‘ब्रीफ’ आने की राह देखी, फिर पुनः उनसे मिलने गया. उनके शिष्टाचार की सीमा नहीं थी. केवल मुझे यह स्मरण कराना पड़ा कि मैं कौन हूं.

‘मुंशी,’ उन्होंने कहा, ‘मेरे आफिस से निकली हुई पहली ब्रीफ तुम्हारी होगी.’

उस ‘पहली ब्रीफ’ की मैं चातक की तरह राह देखने लगा. रोज उसकी ध्वनि सुनाई पड़ती थी, परंतु पर-स्त्री के घर पड़े हुए पति की पग-ध्वनि के समान वह केवल ध्वनि ही रहती.

मैं तीसरी बार फिर गया. फिर वही शिष्टाचार का प्रदर्शन. इस बार मुझे पुनः उनको यह याद दिलाना पड़ा कि मैं कौन हूं. हम केवल मीठी बातें करके एक-दूसरे से अलग हुए. खाली वचन देने की मुसीबत से मैंने उन्हें बचा लिया.

कुछ वर्षों से काम कर रहे एक सालिसिटर के पास मुझे मंछाशंकर काका ले गये. उन्होंने मेरा परिचय कराके मेरी सहायता करने के लिए उनसे कहा- ‘बहुत अच्छा, आपकी कही हुई बात पर भला इनकार हो सकता है,’ सालिसिटर ने उत्तर दिया.

उनके भाव से मुझे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे मैं घास का तिनका हूं!

जब मैं मिलता, तभी मंछाशंकर काका मुझे टोकते- ‘तुम बड़े शरमीले हो. तुम्हें उनसे फिर मिल आना चाहिए. क्लब में भेंट होने पर मैंने उनसे फिर बात की है.’

मंछाशंकर काका को खुश करने के लिए मैं एक रविवार को उक्त सज्जन के यहां गया. सालिसिटर साहब ने मेरा अभिभावक पद ले लिया और स्वयं सर्वगुण-संपन्न हो, इस प्रकार रोब से कहने लगे-

‘देखिए मि. मुंशी, एडवोकेट का व्यवसाय बड़ा कठिन है. यह काम ऐसा-वैसा नहीं. आप को लॉ-रिपोर्ट्स बराबर पढ़ते रहना चाहिए. सालिसिटरों को खुश रखना चाहिए, अन्यथा आपके समान नये व्यक्ति को वे काम कैसे दे सकते हैं? न्यायाधीशों के साथ भी अच्छा व्यवहार रखना चाहिए. मुकदमा चलाने की योग्यता आनी चाहिए. अंग्रेज़ी लहजे में बोलना चाहिए. यह सब आपको आता है न?’

यह सुनकर मैं अकुला गया. मैंने कहा-

‘देखिये मि., मैं तो मंछाशंकर काका के – जो आपके भी पूज्य हैं- दबाब डालने से आपके परिचय को ताज़ा करने आया हूं, आपकी कृपा और ‘ब्रीफ’ की याचना करने नहीं आया. इस व्यवसाय के लिए आपने जिन-जिन योग्यताओं की आवश्यकता का वर्णन किया है, उन सब को मैंने ध्यान में रख लिया है और जब मैं उन्हें प्राप्त कर लूंगा, तब मुझे आपको ज़रा भी कष्ट देने की जरूरत नहीं पड़ेगी. नमस्कार!’

मैंने विदाई ली और व्यवसाय चमकाने के इस प्रकार के प्रयोगों को तिलांजलि दे दी.

हरसिद्ध भाई दिवेटिया और अन्य एक-दो मित्रों ने एपलेट साइड पर ताज़ी वकालत शुरू की थी. उनके साथ मैं भी उस कोर्ट में उपस्थित होने लगा.

भड़ौंच-सूरत के मित्र मेरी प्रसिद्ध के लिए परिश्रम कर रहे थे. रांदेर म्युनिसिपैलिटी के चुनाव के सम्बंध में कुछ झगड़ा हो गया. सूरत के डिस्ट्रिक्ट जज के कोर्ट में एक मित्र ने मुझे बुलाया. ग्रांट रोड से  मैं सेकंड क्लास में बैठकर गया. बगल के फर्स्ट क्लास के डिब्बे में मैंने स्ट्रैंगमेन को बैठे देखा. उसके सामने आने से मुझे घबराहट होती थी.

कोर्ट में मैं चार घंटे बोला, स्ट्रैंगमेन आधा घंटा. मैं बहादुरी दिखाकर वापस आया और जीत गये स्ट्रैंगमेन. लौटते समय किराया मैंने स्वयं खर्च किया और मुवक्किल ने बरफी की ‘पोटली’ बंधवा दी.

मेरा नियम था कि चाहे जिस प्रकार का मुकदमा हाथ में आये. उस पर टूट पड़ना. भड़ौंच से आते हुए गाड़ी में एक मुसलमान मिले. उनके बक्स पर ‘मौलवी’… बी.ए. (आक्सन)’ लिखा था. उनकी दाढ़ी और कुरता उनकी आध्यात्मिक महत्ता के परिचायक थे. हम दोनों ने धर्म की चर्चा छेड़ी. मौलवी साहब ने यह कहकर कि वे ‘बहाई’ हैं, अच्छी तरह बातें कीं. ट्रेन से उतरते हुए उन्होंने मेरा पता लिख लिया.

दूसरे दिन मौलवी मेरे घर आये और अपना दुःख रोने लगे. मद्रास इलाके में अनंतपुर नाम का एक गांव है. वहां मौलवी साहब धर्म प्रचार करने के लिए गये थे. अंत में वे ‘बहाई’ हैं, यह बात प्रकट हो गयी और वहां के मुसलमानों ने धर्म-द्वेष के कारण उन पर फौजदारी का मुकदमा चला दिया. ‘होम करते हाथ जले’ की कहावत चरितार्थ हुई. वे धर्मगुरु थे. दो-तीन नवाब और निजाम हैदराबाद में एक-दो बड़े आदमी उनके शिष्य थे. उन्होंने मुझे उनके तार दिखलाये. तार में लिखा था कि मुकदमे की तारीख पर यदि वे बैरिस्टर लेकर नहीं पहुंचे, तो उनके नाम वारंट निकल सकता है. उन्होंने मुझे अनंतपुर चलने को कहा.

1913 के अक्टूबर की यह बात है. मेरे हृदय में गर्व की लहरें उठीं. बहाई मौलवी, बी.ए. (आक्सन), कौमी झगड़ा और मद्रास इलाके का अनंतपुर गांव. मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा  कि मानो इस प्रकार के ज़रूरी मुकदमे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हों. मैंने 100 रुपये, प्रतिदिन की फ़ीस मांगी. मौलवी ने स्वीकार कर लिया. परंतु उस समय उनके पास पैसे नहीं थे. उन्होंने मुझे विश्वास दिलाया कि जब वे हैदराबाद पहुंचेंगे, तब शिष्यों के पास से पैसे इकट्ठे करके रास्ते में गुंटेकल जंक्शन पर मुझसे फीस के साथ मिलेंगे.

क्षणभर के लिए भारत के एक अग्रगण्य वकील की कीर्ति मेरी आंखों के सामने नाच उठी. दो-तीन मित्रों ने कौमी झगड़े में न पड़ने की और फीस मिलने से पहले काम न करने की सलाह दी. पर मुझे मौलवी की मान-भरी दाढ़ी और आक्सफोर्ड की बी.ए. की उपाधि की याद आयी. धर्मांधता के चक्कर में फंसे हुए निर्दोष बहाई शहीद का दुःख निवारण करने के लिए मैं अधीर हो उठा और जिस उत्साह से निराश्रित स्त्रियों की रक्षा करने के लिए डान कीकोट ‘रोजिनांत’ पर बैठकर आगे बढ़ा था, उसी उत्साह से बहाई मौलवी की रक्षा के लिए मैंने अनंतपुर का टिकट कटाया और बोरीबंदर से गाड़ी पकड़ी.

दूसरे दिन शाम को गुंटेकल जंक्शन पर मौलवी साहब मुझे मिले. उनके बड़े लम्बे झब्बे और इस्त्री किये हुए कपड़े की जगह मैला पाजामा और फटी हुई जाकेट देखकर मैं विचार में पड़ गया. मैंने अपनी फीस मांगी. उत्तर में मौलवी साहब ने गहरा निःश्वास छोड़ा. उनके शिष्य लोग हैदराबाद में नहीं थे, इससे वे फीस के पैसे प्राप्त नहीं कर सके थे. अनंतपुर में उन्होंने मेरे ठहरने का स्थान निश्चित नहीं किया था, परंतु डाक-बंगला तो था ही!

इस सारी बातचीत के बाद मुझे अपनी मूर्खता का ख्याल आने लगा, परंतु वापस लौटने की हिम्मत नहीं हुई, गुंटेकल से अनंतपुर जाने के लिए मैं छोटी गाड़ी में बैठा. डिब्बे में एक मद्रासी ब्राह्मण मेरे साथ थे. उसके साथ बात करने पर मालूम हुआ कि वे अनंतपुर के डिप्टी कलेक्टर थे. ब्राह्मण-संस्कार के विषय में बात करते-करते हमने परिचय बढ़ा लिया. जीवन में पहली ही बार मैं मद्रासी ब्राह्मण से मिला और ब्राह्मणत्व की सारे भारत में फैली हुई समान-संस्कृति का मुझे ज्ञान हुआ. गोत्र और प्रवर, वेद और शाखा तथा पुराणों की मान्यता आदि के विषय में हमने बड़ी देर तक बातें की.

मौलवी के विषय में मैंने उनसे बात की. उनसे मुझे काफी जानकारी प्राप्त हुई, क्योंकि आरम्भ में यह मामला उन्हीं के हाथ में था. वस्तुतः वे न मौलवी थे, न बी.ए. और न ही उन्होंने आक्सफोर्ड या कोई दूसरी युनिवर्सिटी देखी थी. उन्होंने मस्जिद बनाने के लिए पैसे इकट्ठे करने शुरू किये थे, पर वे उनका हिसाब नहीं दे सके, इसलिए लोगों ने उन पर विश्वासघात का मुकदमा चला दिया था. महीनों से मुकदमे की तारीख पर मौलवी हाजिर नहीं रहते थे, इसलिए उनके नाम वारंट निकालने की तजवीज हो रही थी.

मेरा जोश शांत हो गया, मेरे सुनहले स्वप्न मिट्टी में मिल गये. मेरा चेहरा इस समय देखने लायक था.

उनसे मुझे मालूम हुआ कि अनंतपुर का डाक बंगला भी खाली नहीं है. साथ ही यह गाड़ी बारह-एक बजे रात को अनंतपुर पहुंचती है और गांव लगभग तीन मील दूर है. रात कहां बितायी जाए, इसकी मुझे चिंता हुई. मैंने उनसे बात की. उन्होंने स्टेशन पर वेटिंग रूम में मेरे लिए व्यवस्था कर देने का वचन दिया.

बारह बजे के लगभग मैं अनंतपुर पहुंचा. डिप्टी कलेक्टर ने स्टेशन मास्टर से कहकर मेरे लिए वेटिंग रूम में सोने का प्रबंध करा दिया. मौलवी साहब तो मेरे लिए डाक-बंगले में प्रबंध कर वापस आने की बात कहकर अदृश्य हो गये थे.

वेटिंग रूम में मैं दो आराम कुर्सियां आमने-सामने रखकर उनपर लेट गया. सामने वाली सीट पर रेलवे का वेतन देनेवाला-‘पे-क्लर्क’- एक बड़ा बक्सा पास रखकर सोया हुआ था. मेरे वेटिंग रूम में जाते ही उसने स्टेशन-मास्टर के पास जाकर अपना विरोध प्रदर्शित किया. उसकी  भाषा मेरी समझ में नहीं आयी थी, फिर भी मैंने यह जान लिया कि वह स्टेशन मास्टर से मुझे वेटिंग रूम से बाहर निकालने के लिए कह रहा है.

स्टेशन-मास्टर ने उसे समझाकर कहा कि मैं बम्बई का बैरिस्टर हूं, पर फिर भी पे-कर्ल्क को चैन न आया. उसने एक चपरासी को बुलाकर बक्स के पास सुलाया. मुझे स्पष्ट समझ में आ गया कि उसे यह संशय हो गया होगा कि मैं कोई डाकू हूं.

ढोंगी मौलवी, बिना फीस के उठाया हुआ यह जोखिम, निर्जन स्टेशन धान के खेतों में पाले-पोसे मच्छरों के संगीत और दर्शन, कुर्सियों में घुसे भूखे खटमल, शंकालु वेतन-क्लर्क और खुर्राटे मारता हुआ उसका गंदा चपरासी! बस क्या था, निद्रादेवी रूठ गयीं. तिस पर मैं 100 रु. अपने साथ लाया था और वसीयत में मिली हुई पिताजी की सोने की घड़ी भी मैं अपनी शान के लिए साथ लाया था. इस जोखिम को मैंने तकिये के नीचे सुरक्षित रखा. परंतु नींद का ज़रा-सा झोंका आते ही मैं बार-बार जानने के लिए सिरहाने के नीचे हाथ डालकर देख लेता था कि वह सुरक्षित है या नहीं.

वेतन-क्लर्क को भी नींद नहीं आ रही थी. वह लगातार करवटें बदल रहा था और बीच-बीच में ओढ़ी हुई चादर में से हाथ निकाल कर बॅक्स के ताले को टटोल लेता था.

पहली ही दृष्टि में हम लोगों को एक दूसरे की ईमानदारी पर जो विचित्र अविश्वास उत्पन्न हो गया था, उसे देखकर मेरी विनोदवृत्ति वश में न रह सकी. एक बार नींद का झोंका लेकर मैं जागा, तकिये के नीचे हाथ डाला, ताले की खड़खड़ाहट सुनी, वेतन क्लर्क के हाथ को उसे टटोलते देखा. मैं अपने को रोक न सका और उठ कर हंस पड़ा.

‘व्हाट मिस्टर, व्हाट इज दि मैटर?’ कहकर वेतन क्लर्क तुरंत उठकर बैठ गया.

मैं भी खूब हंसते हुए उठ बैठा. हंसी रुकने पर मैंने कहा- ‘मिस्टर, घबराइए नहीं. आप समझते हैं कि मैं चोर हूं, इसलिए ताला टटोलते हैं, और मैं समझता हूं कि आप चोर हैं, इसलिए अपनी घड़ी टटोलता हूं.’

‘बट व्हाई डू यू लाफ?’

‘तेरा सिर फोड़ने के लिए-’ इस प्रकार बड़बड़ाकर मैं फिर लम्बी तानकर सो रहा.

पौ फटने तक हम दोनों में से कोई भी नहीं सो सका. जल्दी से उठकर मैं तैयार हुआ. गुस्से के मारे बड़बड़ाता हुआ वह क्लर्क अपनी द्राविड़ी बोली में स्टेशन मास्टर को डांट बता आया.

मौलवी साहब आये और ‘डाक बंगला खाली नहीं था, शहर में जाने के लिए गाड़ी   नहीं मिल सकती थी,’ आदि बातें बनाकर माफी मांगने लगे. मैंने भी अपना गुस्सा उन पर अच्छी तरह उतारा.

अंत में हम वकील के यहां गये. उसका मुवक्किल बम्बई से बैरिस्टर लायेगा, इसकी उसे स्वप्न में भी आशा नहीं थी. परंतु अपनी आंखों के आगे यह घटना देखकर वह बड़ा खुश हो गया. मजिस्ट्रेट को विश्वास था कि अभियुक्त नहीं आएगा, इसलिए वारंट निकालने का हुक्म देकर वे दौरे पर चले गये थे और कह गये थे कि अभियुक्त आये, तो उसे दौरे में उनके पास भेज दिया जाय, वे तारीख दे देंगे.

‘वे कितने मील दूर गये हैं?’

‘बाईस मील.’    

‘मैं वहां नहीं जाऊंगा. शाम की गाड़ी से मैं लौट जाऊंगा.’ मैंने कहा और मौलवी साहब मजिस्ट्रेट के पास तारीख डलवाने चले गये.

वकील ने मेरी बड़ी खातिरदारी की. नहाते समय इतने बड़े देग में उन्होंने मुझे पानी दिया कि नहाते-नहाते मेरे हाथ थक गये पर पानी खतम नहीं हुआ.

भोजन करने बैठे, तो ‘हलुवे’ जैसा लाल भात और मेरी खातिरदारी में बनाई हुई गेहूं की मोटी, और कच्ची रोटियां सामने आयीं. मिरच का तो पार ही नहीं था. वकील ने मुझे रोटी खाने के लिए आग्रह करते हुए कहा- ‘आपके लिए खास तौर से बनावायी हैं.’ परंतु मेरा हाथ न उठा. उनके आग्रह पर भी मैं टस-से-मस न हुआ. अंत में मैंने दही मांगा और दही के साथ लाल भात खाया.

शाम को मैंने बम्बई की ओर विजय-प्रस्थान किया.

मैंने अपने मुवक्किल को इस प्रकार छोड़ दिया, पर वह मुझे छोड़ने वाला नहीं था. उसने अपने मित्रों को मेरा पता बता दिया था. और वह स्वयं भी तार के सिवाय संदेश नहीं भेजता था. इसलिए हाईकोर्ट की लायब्रेरी में मेरे नाम पर या मेरे ‘केयर आफ’ पर इतने तार आने लगे कि मुझे शर्मिंदा होना पड़ा.

आ रहा हूं, आज इस ‘हाईनेस’ से, कल उस ‘हाईनेस’ से फीस जमा कर रहा हूं, मेरे केस में आने के लिए तैयार रहिए- आदि संदेश आते रहे. परंतु अनंतपुर की हवा खाकर मेरे मुंह का पानी सूख गया था, वह फिर आ नहीं सका.

एक दिन मेरे पास लगभग बारह वर्ष का एक लड़का, अठारह वर्ष की एक लड़की और लगभग पचीस वर्ष का एक युवक आया और मौलवी साहब का पता पूछा.

उन्होंने तीन तार दिखलाये, मैंने तेरह तार उनके आगे रखे. मौलवी ने अपनी बहन, बहनोई और लड़कों को  बम्बई बुलाया था, आठ दिनों से वे बम्बई आकर होटल में ठहरे हुए थे, पर मौलवी साहब का कोई पता न था.  अपना बम्बई का पता ‘केयर-आ़फ के एम. मुनशी, हाईकोर्ट’ के सिवाय और कुछ तो वे बतलाने ही क्यों लगे!

पांच-सात दिन बाद वह लड़का और लड़की दोनों फिर मेरे घर पर आये. दोनों के मुंह कुम्हलाये हुए थे. मेरे कुछ प्रश्न  करने पर लड़की रो पड़ी. मौलवी का पता नहीं. जितने पैसे साथ लाये थे, वे खत्म हो गये. वापस जाने के लिए पैसे नहीं थे, होटल वाले ने निकाल दिया था और रात से कुछ खाया नहीं था.

उस कोमल मुख पर आंसू टपकते देख मैं अकुला उठा. मैंने तुरंत दोनों को खाने के लिए बिठाया और घर वापस जाने के लिए लगभग तीस रुपये दिये. ‘योअर नीड इज ग्रेटर देन माइन,’ एक अंग्रेज़ी वीर के इन ऐतिहासिक शब्दों को मैंने झिझकते हुए अपने जीवन में उतारा.

थोड़े दिनों बाद मौलवी सपरिवार मेरे यहां आये, बिना फीस लिये अनंतपुर चलने की उन्होंने मुझसे प्रार्थना की.

मैंने अपनी डायरी में नोट किया-

‘मौलवी अपने परिवार के साथ आया. उसकी बहन ने रोकर मुझसे दयाभाव जाग्रत करने का स्त्राr-चरित्र दिखलाया. यह मनुष्य तो लुटेरा है. इसके लिए मैं अपने हित की बलि कैसे दे सकता हूं?’

कुछ महीनों बाद अनंतपुर का पुलिस-अधिकारी उसकी खोज करता हुआ मुझे हाईकोर्ट में मिला. मौलवी साहब मेरे जीवन-पट पर से विलुप्त हो गये.

जमीयतराम काका की व्यावहारिक दृष्टि अद्भुत थी. प्रत्येक वस्तु पर उनकी नज़र रहती थी. जो काम वे करते, उसमें अधूरापन या अनिश्चितता बिल्कुल नहीं होती थी. छोटे बच्चों ने जीभ साफ की है या नहीं, इसकी भी उन्हें रोज़ चिंता रहती थी. जब कहीं विवाह में जाना होता, तब परिवार की सब स्त्रियां उनके पास आकर गहने पहन कर जातीं और बारात वापस होते ही फिर उन्हें सौंप जाती थीं. ‘बैरिस्टर का काम न बन पड़े तो कोई बात नहीं, परंतु चपरासी से लेकर सॉलिसिटर तक का काम तो मुझे आना ही चाहिए,’ इस प्रकार वे कहा करते थे. आवश्यकता की वस्तु की ओर ध्यान न दिया गया हो, यह हो ही नहीं सकता था. अपनी सावधानी पर उन्हें बड़ा गर्व था. उसी से वे विपत्ति को मात करते थे. जितने ट्रस्ट और जितनी मल्कीयतें उनके हाथ में थीं, उनकी व्यवस्था एकदम सही होती थी. रात को सारे काम से निश्चिंत होकर सभी बहियों के खातों की देखभाल स्वयं करके ही वह सोते थे.

बाह्य दृष्टि से उनका स्वभाव कठोर मालूम होता था, परंतु आंतरिक दृष्टि से समझदार और महत्त्वपूर्ण था. ज़रा-ज़रा सी बात में चिल्ला पड़ते, पर उनका हृदय मुश्किल से ही व्याकुल होता था.

अच्छा काम करना और पर्याप्त पैसे लेना, यह था उनका सूत्र. कोई थोड़ी फीस की बात करता कि उन्हें गुस्सा आ जाता. मुवक्किल की दुकान पर कुछ खरीदने जाते, तो उसे मुंहमांगे दाम देते और ऐसे मुवक्किल से वे हमेशा कहते, ‘तुम भी मेरा कास्ट्स (फीस की रकम) पूरा-पूरा देना, मेरे भाव में कढ़ी न करना.’

पैसे प्राप्त करने और खर्च करने, दोनों ओर उनकी दृष्टि तलवार की धार के समान थी, इसमें ज़रा भी कमज़ोरी  या ढीलापन नहीं आता था. अनुचित तरीके से मिले हुए धन को वे शिव-निर्माल्य समझते. झूठे व्यवहार के वे कट्टर शत्रु थे. वे मंदिरों में ंजाति के लिए, सगे-संबंधियों की सहायता के लिए और ब्राह्मणों के लिए पैसे खर्च करते, इसके सिवाय उनकी मुट्ठी बंद रहती थी.

काका स्पष्ट धर्माभिमानी थे. नये जमाने की दृष्टि उन्हें चुभती थी. मंछाशंकर काका की तरह धर्म-ग्रंथों के पाठक नहीं थे, जन्म से भार्गव ब्राह्मण होने के कारण उसकी उचित रूढ़ियों का पालन करने में उन्होंने अपना कर्तव्य माना था. जवानी में खाने-पीने में तूफान मचाये थे, बलवा भी किया होगा. जब मैं उन्हें जानने लगा, तब तो उन्होंने बारह ज्योतिर्लिगों के दर्शन करके आने में जीवन की सफलता मान ली थी. वे कहते- ‘भाई, जब बड़े होगे, तब इसकी खूबी समझ में आयेगी.’

मैं उनके लिए अनबूझी पहेली के समान था. निर्धन होने पर भी मैं अभिमानी था. समय खराब करने पर भी परीक्षा में पास हो गया था. वर्णव्यवस्था के विरुद्ध भाषण करने पर भी जाति को सुधारने के प्रयत्न करता था. उनकी दृष्टि में मैं धर्म-भ्रष्ट था, फिर भी वेद और पुराण से परिचय बढ़ाया और ब्राह्मणों द्वारा की हुई जगत की सेवा की बातें करता था. उन्हें आशा थी कि कभी मैं सुधर जाऊंगा.

मैं व्यवस्था में किस प्रकार आगे बढूं, इसकी उन्होंने सावधानी से योजना बनायी थी. भूलाभाई के पास उन्होंने मुझे सीखने के लिए भेजा, इसमें उनकी दूरदर्शिता थी. एक बात यह थी कि साथ-साथ भूलाभाई को काम देनेवाले सॉलिसिटर को आकर्षित करने का क्षेत्र मिला. काका ऐसा काम नहीं देते थे, जिसमें मुझे केवल कमाई हो, बल्कि ऐसा काम देते थे जिसमें परिश्रम करना पड़े.

हाईकोर्ट के अनेक बड़े सॉलिसिटर रोज दोपहर को लायब्रेरी में मिलते थे. यह काका का दरबार कहलाता था. जब कोर्ट खुला होता, तब रोज दरबार लगता. वहां कोर्ट की बातें होतीं, नये फैसलों की छान-बीन की जाती, किसी सॉलिसिटर को कोई उलझन मालूम होती, तो उसे काका सुलझाते. कोई कठिनाई में पड़ जाता, तो काका उसे हाथ पकड़कर पार लगाते. नगर की बातें भी होतीं. किसी समय किसी की इज़्ज़त भी लुट जाती. अश्लीलता का रंग भी कभी-कभी जमता. काका इस दरबार में एक-छत्र राज्य करते, योजना बनाते, दूसरे सॉलिसिटरों को कमाने के रास्ते बतलाते. सब उनसे प्रेम करते थे और साथ ही डरते भी थे कि कहीं काका के आगे कान न पकड़ना पड़े.

मुझे काम देने के लिए काका ने अपने किसी मित्र से कभी नहीं कहा था, परंतु मुझे धीरे-धीरे दरबार का अंग बना लिया और इतना ही नहीं, उन्होंने ऐसे प्रसंग खड़े किये कि जिनमें मैं प्रतिष्ठित सॉलिसिटरों की नज़रों में खरा उतरूं. इनमें से काका के पश्चात स्वर्गीय विजभूखनदास पकवासा (कबलभाई) का प्रेम प्राप्त करने का मुझे सौभाग्य मिला; और उनके कारण उनकी फर्म मेसर्स तैयबजी डाह्याभाई के सब हिस्सेदार मुझमें दिलचस्पी लेने लगे.

1914-15 में एक बड़ा ही मनोरंजक अनुभव मुझे हुआ. तब मैं अनुभवहीन था. उस समय एक गिनी पंद्रह रुपये की नहीं थी, परंतु दो सौ चालीस अमूल्य आनों की थी, और प्रत्येक आने की उपयोगिता की सीमा नहीं थी. हाईकोर्ट की ओरिजिनल साइड पर फीस की गणना पंद्रह रुपये की एक गिनी के हिसाब से होती है. क़ोर्ट में जब मैं खड़ा होता, तब कानों में धम-धम आवाज़ होती, अंगुलियां इस तरह कांपतीं जैसे हवा में पत्ता कांपता है और पैर मोटर के हवा निकलते हुए टायर की तरह मुड़ने लगते.

मैंने एक दावा- अरजी  लिखी थी. मेरी समझ में वह रत्ती-रत्ती सही थी और उसमें गलतियां न थीं. मेरे मुवक्किल की यह फरियाद थी कि उसकी प्रिय-पत्नी उसके साथ रहने के बदले अपने काका के घर चली गयी थी. हमने प्रार्थना की थी कि माननीय कोर्ट उस क्रूर-हृदया पत्नी को हमारे आतुर हाथों में पुनः सौंप दे और साथ ही पचास हजार रुपयों की कीमत के जो गहने वह ले गयी थी, वे भी पुनः दिलवा दे.

यह बिना बचाव लम्बा झगड़ा कहा जाता था, इसलिए प्रतिपक्षी उपस्थित हो ही नहीं सकता था. मुझे तो केवल अपने मुवक्किल का बयान लेकर हुक्मनामा प्राप्त करना था. ब्रीफ पर भी मेरे सॉलिसिटर ने मेरी फीस के तीन गिनी अर्थात पैंतालीस रुपये लिख दिये थे, इसलिए वसंत में अह्लादित सृष्टि कोकिलगान करती मुझे सुनाई दे रही थी. सवा दो बजे न्यायाधीश बीमन के कोर्ट में एक अगली कुर्सी पर जाकर मैं बैठ गया. अपने मुवक्विल की दाम्पत्य-जीवन की अभिलाषा को संतुष्ट करने की उत्कंठा मेरे हृदय में उठ रही थी. काका सामने सॉलिसिटर की बेंच पर बैठे हुए थे. ढाई बजे जब कोर्ट उठा, तब काका मेरे पास आये.

‘इस झगड़े में तुम हो?’

‘जी हां.’

काका ने डराती हुई आवाज में  पूछा- ‘तुम इसका हुक्मनामा लेने वाले हो?’ तीन गोल्ड मुहरें और बिना प्रतिपक्षी के लिया जाने वाला हुक्मनाम, इन दोनों के कारण मैं इतने उत्साह में था कि काका के गले लगने को तैयार था.

‘जी हां,’ मैंने कहा.

‘लो भाई, लो,’ काका ने भयंकर आवाज़ में कहा, ‘देख लेंगे, ले लो.’

यह आवाज़ सुनकर मेरा हृदय क्षण-भर के लिए धड़कना बंद हो गया.           साढ़े तीन बजे न्यायाधीश बीमन के सामने मैं फिर उपस्थित हुआ. वृद्ध और हंसमुख रजिस्ट्रार कमलाकर मेरा पक्ष लेता था. उसने मेरी ओर आंख से संकेत करके मेरे झगड़े के पक्ष वालों के नाम पुकारे. काका की ओर विजय-भरा नयन-तेज फेंककर मैंने कोर्ट को सूचित किया कि मैं वादी की ओर से हाजिर हुआ हूं.

कमलाकर ने फिर से प्रतिवादी का नाम पुकारा. कोई नहीं आया, परंतु कमलाकर ने उठकर न्यायाधीश से कहा कि प्रतिवादी ने माननीय को एक पत्र लिखा है। काका के मुख पर हास्य चमका और मेरे हृदय में हिमालय की ठंडक फैल गयी. फिर कमलाकर ने पत्र पढ़ा. पत्र से प्रतिवादी कृतघ्नता की मूर्तिमान-सी प्रतीत हुई. उसने लिखा था कि उसका पति और मेरा मुवक्किल विषयी मनुष्य है, कोई काम-धंधा नहीं करता. जब वह उसके साथ रहती थी, तब वह हमेशा कोकीन खाकर बच्चों को मारता-पीटता रहता था. थोड़ी सम्पत्ति, जो उसके पिता छोड़ गये थे, वह उसने पूंक डाली थी. और इस कारण उसने अंत में लड़के के साथ शहर में अपने काका के यहां शरण ली थी. प्रतिवादी स्त्री ने अंत में कहा था कि यदि मेरे मुवक्किल के साथ रहने का मुझे माननीय हुक्म देंगे, तो यह घातक कृत्य कहलायेगा, और इतना ही नहीं, इससे अधिक पाप करना माननीय के लिए असम्भव हो जाएगा.

न्यायाधीश बीमन ने कहा- ‘मि, मुंशी, आपका मुवक्किल तो ब्रह्मराक्षस मालूम होता है.’

‘ऐसी बात नहीं है.’ मुझे तो बिना देखे मुवक्किल का वर्णन करने के लिए पैसे मिलने वाले थे, इसलिए मैंने उत्साह से कहा- ‘माननीय! मेरा मुवक्किल अभी जब गवाह के कठघरे में आयेगा, तब आप ही देख सकेंगे कि ये सब आक्षेप झूठे हैं.’

वादी का नाम पुकारा गया. पत्नी के बिना तड़पते हुए अपने विरहाकुल प्रणयी मुवक्किल को माननीय के सामने उपस्थित करने की मेरी इच्छा थी. परंतु ‘बाप रे!…’ मेरे हृदय से ध्वनि निकली.

गवाह के कठघरे में वादी आया- पान चबाते हुए, सिर पर कोनेदार टोपी लगा कर गहरी आंखों से हमें देखते हुए, बाहर निकली हुई जीभ से अपने मुख की शोभा की अभिवृद्धि करता हुआ. उसने किसी और का कढ़ा हुआ कोट पहना था. उसकी इस्त्री से स्पष्ट पता लग रहा था कि कोर्ट में पहनने के लिए किसी परिचित धोबी से किराये पर लाया गया होगा.

अपने मुड़ते हुए घुटनों को मैंने ज्यों-त्यों करके रोका.

‘तुम इस दावे में वादी हो?’ मेरे मुवक्किल को मेरी ओर देखने की परवाह नहीं थी, वह तो कठघरे के पास सॉलिसिटर की बेंच पर बैठे हुए काका की ओर आंखें फाड़कर देखता रहा. उसने गला खंखारा. मानव-जीवन का प्रवाह बदल डालने वाली कोई भीषण प्रतिज्ञा वह करने जा रहा था, ऐसा स्पष्ट मालूम होने लगा. उसने माननीय की ओर देखकर बोलना शुरू किया. उसकी आवाज़ घुट रही थी- या तो पान का रस निगला न जाने से या पत्नी-विरह व्यक्त करने वाले प्रणयी के भग्न हृदय में छाये हुए एकाकीपन से. एक-एक बोल पर पान के कण चारों ओर उड़ रहे थे.

‘माई लार्ड, खून हो गया- मेरे ससुर का, और… नगर के दीवान और जमीयतराम जीवनराम सॉलिसिटर, बम्बई हाईकोर्ट ने सारे पैसे ले लिये.’

काका के मुख के भाव से प्रतीत हुआ कि वे उपहास कर रहे हैं. अब मुझे होश आया कि काका किसलिए यहां बैठे थे. परिस्थिति सुधारने के लिए मैंने एक भगीरथ प्रयत्न किया-

‘माननीय, वादी को अंग्रेज़ी अच्छी तरह नहीं आती, दुभाषिये को आज्ञा दीजिये कि इससे गुजराती में प्रश्न करे.’

न्यायमूर्ति बीमन को इस प्रसंग में बड़ी दिलचस्पी पैदा हो गयी थी.

‘नहीं, मि. मुनशी’ उन्होंने कहा, ‘हम इस समय दिलचस्पी से भरी खून की रहस्यमयी बातों की दुनिया में है. ठीक, मि. वादी, फिर तुम्हारे खून का क्या हुआ?’

पढ़ाये हुए तोते को शोभा देने वाले ढंग से वह फिर बोलने लगा-

‘माई लार्ड, खून हो गया- मेरे ससुर का, क्षज्ञ-और… नगर के दीवान और जमीयतराम जीवनराम सॉलिसिटर, बम्बई हाईकोर्ट, ने सारे पैसे ले लिये.’

न्यायमूर्ति की स्थिर मुखमुद्रा पर हास्य छा गया. मेरे निकट ही रुस्तम वाडिया बैठे थे. उनके हंसने की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी. मुझे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे मेरे चारों ओर धुंध छा गयी है और उसमें से मैंने सौ मुख हंसते हुए देखे. पसीने की बूंदें मेरे माथे पर उभर आयीं. अपने हाथों को कहां डालूं, यह न सूझने से मैंने उन्हें पीठ के पीछे ले जाकर अंगुलियों को मिलाकर मरोड़ डाला और मैं खड़ा रह सकूं, इतनी चेतना प्राप्त करने का मैंने प्रयत्न किया.

न्यायाधीश बीमन निर्दयता की मूर्ति बनकर बैठ गये.

‘ठीक, ठीक, मि. वादी, तुम कोकीन खाते हो?’

‘नहीं, माई लार्ड.’ मेरे मुवक्किल ने कहा, ‘मैं सबेरे भात खाता हूं, दाल खाता हूं और दो बार चाय पीता हूं.’

वहां इकट्ठे हुए लोगों के गलों से निकली हुई आवाज़ मेरे कानों से इस प्रकार टकरायी, जैसे तोप के धड़ाके हों. मुझे यह न सूझा कि क्या करूं. अपने सॉलिसिटर से प्रेरणा पाने के लिए मैंने पीछे देखा. वे कब के अंतर्धान हो चुके थे और मैं रह गया था अकेला- मित्र-विहीन, सॉलिसिटर से परित्यक्त और मुवक्किल के द्रोह से व्यथित.

मनोरंजन की आशा रखकर बैठे हुए समूह के बीच मैंने शकुंतला की तरह प्रार्थना की- ‘भगवति वसुंधरे देहि में विवरम.’ परंतु कोर्ट की भूमि अपनी क्रूर-हृदयी निश्चलता से न डिगी. न्यायाधीश बीमन ने मुझसे मज़ाक में पूछा-

‘मि. मुंशी, अब आपके मुवक्किल का क्या किया जाय?’

क्या  किया जाय. यह जाने मेरी बला! यह मैं जानता हूं, ऐसा न्याय मेरे साथ करने की यह अन्यायवृत्ति इस न्यायाधीश में भला कहां से आ टपकी?

रुस्तम वाडिया की कुहनी मेरी पसलियों में चुभी.

‘दावा वापस ले लो. दावा करने की आज्ञा के साथ दावा वापस ले लो,’ सारा कोर्ट सुन सके इस प्रकार ऊंची आवाज़ में उन्होंने मेरे कान में कहा. बिजली गिरने और बादल गरजने के समान भयंकर अट्टहास से मेरे कान फट गये.

अपने दावे को, अपने मुवक्किल को या अपने आप को मैं किस प्रकार वापस ले लूं, इसका मुझे ज़रा भी होश नहीं था. यह कला तो अकेले मेरे सॉलिसिटर मित्र को आती थी और वे उसका कब ही से उपयोग भी कर चुके थे. आधे होश में मैंने वाडिया की सलाह का उच्चारण किया.

‘फिर दावा करने की आज्ञा के साथ वादी को वादा वापस लेने की आज्ञा दें.’

न्यायमूर्ति ने तटस्थता से फैसला किया.

‘मि. मुनशी, इससे अधिक अच्छा आप इस समय और कुछ नहीं कर सकते.’ न्यायाधीश बीमन के टाइपराइटर पर इस हुक्म के टाइप होने से पहले ही मैं वहां से पलायन कर चुका था.

इसके पश्चात बहुत दिनों तक लायब्रेरी में जाना मेरे लिए बहादुरी की पराकाष्ठा पर पहुंचने के समान हो गया था. इतनी हिम्मत यदि मैं रणक्षेत्र में काम में लाया होता, तो मुझे कितने पदक मिलते!

इस प्रकार यह रस-भर अनुभव पूर्ण हुआ- जिसकी रसहीनता कितने ही समय तक मुझे बेधती रही.

(क्रमशः)

अप्रैल  2014 

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