सीधी चढ़ान (चौदहवीं क़िस्त)

1915 में जब मैं गांधीजी से पहली बार मिला था, तब से फिर उनसे मिलने का अवसर नहीं

प्राप्त हुआ था. 1915 की 25 मई को उन्होंने साबरमती पर सत्याग्रहाश्रम स्थापित किया. सत्याग्रह की पुकार से 1915 में वीरमगांव का भूमि-कर उठवा दिया. 1917 में प्रतिज्ञा-पत्र से बंधे हुए मजदूरों की विदेश ले जाने की पद्धति रद्द करवायी. उसी वर्ष चम्पारण में उनका सत्याग्रह सफल हुआ. 1918 में खेड़ा का सत्याग्रह सफल हुआ. उसी वर्ष अहमदाबाद के मिल-मजदूरों के संघ का नेतृत्व ग्रहण करके उन्होंने समझौता कराया, पंच का सिद्धांत मिल-मालिकों से स्वीकार करवाया और दुनिया के लिए एक उदाहरण-रूप मजदूर-संघ की स्थापना की.

1918 की 27 अप्रैल को वायसराय लार्ड चेम्सफर्ड ने दिल्ली में युद्ध-सम्मेलन किया. गांधीजी उसमें शामिल हुए. हिंदी में भाषण करके सारे भारत का उपहास सहा, और उसके बाद फौज में भरती करने का काम आरम्भ किया. हम इस प्रवृत्ति के विरोधी थे. अगस्त में लार्ड विलिंगडन की अध्यक्षता में बम्बई में ‘युद्ध-सम्मेलन’ होने वाला था. मुझे ऐसा स्मरण है कि उस विषय पर विचार करने के लिए बिसेंट, लोकमान्य तिलक, गांधीजी, जिन्ना और हमारी समिति के अनेक सदस्य जमनादास के ऑफिस में एकत्र हुए थे. लोकमान्य ने कहा कि यदि सरकार मेरी शर्तें स्वीकार कर ले, तो मैं युद्ध में मदद करूं.

जब ‘युद्ध-सम्मेलन’ हुआ, तब लोकमान्य बोलने के लिए खड़े हुए. बताने लगे कि किस शर्त पर युद्ध में मदद करेंगे. विलिंगडन ने उन्हें रोका और वे सभा छोड़कर चले गये. बाद में जिन्ना रह गये. उन्होंने सरकार को खूब फटकारा. दूसरे या तीसरे दिन शांताराम की चाल में लार्ड विलिंगडन के व्यवहार का विरोध करने के लिए सभा हुई. गांधीजी उसके सभापति बने. इस प्रकार वे पहली बार ‘होमरूल-लीग’ के वर्तुल में आये.

इस घटना के कुछ दिनों बाद टाउन-हॉल में सभा होने वाली थी, उसमें हमारी लीग के चार आदमियों- जिन्ना, जयकर, भूलाभाई और हार्निमन- को बोलने का आमंत्रण मिला. लार्ड विलिंगडन उसका सभापतित्व ग्रहण करने वाले थे. हमारी समिति ने निश्चय किया कि उसने लोकमान्य तिलक का अपमान किया था, इसलिए उसके सभापतित्व में हेनेवाली सभा में हमारे प्रतिनिधि नहीं जायेंगे. भूलाभाई को यह उचित नहीं मालूम हुआ, इसलिए उन्होंने ‘होमरूल लीग’ से इस्तीफा दे दिया और उस सभा में गये. भूलाभाई ने लीग से इस्तीफा देकर हमारे व्यवसाय के निजी सम्बंध को देखते हुए यह मान लिया कि उससे इस्तीफा देना मेरा भी कर्तव्य है. लीग के साथ मेरा सम्बंध इतना निकटवर्ती और उनसे स्वतंत्र था कि ऐसा करने में मुझे अपना कर्तव्य न मालूम हुआ. उन्हीं दिनों गोधरा में प्रांतीय सम्मेलन हुआ. वहां जिन्ना भी आये. एक मुसलमान, हिंदू-मुस्लिम-एकता का पक्षपाती हो, फिर हिंदुओं की भावुकता का क्या कहना? गोधरा की जनता ने गाया-

‘आओ भाई जिन्ना,

पधारो भाई जिन्ना,

राम-रहमान को एक मानने वाले.’

उस सम्मेलन में अध्यक्ष थे गांधीजी, और उन्होंने जिन्ना से पहली बार गुजराती में बुलवाया. जिन्ना को उस समय अंग्रेज़ी और टूटी-फूटी कच्छी-गुजराती के सिवाय अन्य कोई भाषा नहीं आती थी.

11 दिसम्बर को शेरिफ ने लॉर्ड विलिंगडन को मान-पत्र देने के लिए बम्बई के नागरिकों की एक सभा की. हमें इच्छित अवसर मिल गया. इस सभा में विरोध प्रदर्शित करने के लिए हम लोगों ने बहुत पहले से प्रचार करना शुरू किया. जिन्ना बहादुर नेता थे. काम की जिम्मेदारी लेने के बाद सिर हथेली पर रखकर काम करते थे. वे किसी प्रकार की खटपट में नहीं पड़ते थे, पर हिम्मत और सफाई से उसे तोड़ डालते थे. उस समय हमलोग अधिक परिचय में आये. आज भी हमारी भिन्न रुचि को देखते हुए यह कहना कठिन है कि उनका मुझ पर प्रेम था या नहीं, परंतु सद्भाव पूर्ण रूप से था. व्यवसाय में भी मेरे मन में उनके लिए बड़ा सम्मान था. उनको मुझसे बड़ी आशा थी. उनके अनेक सिद्धांत बड़े कठोर थे, और मुझे प्रशंसा-मुग्ध करते थे. वे कभी चंदे के लिए पैसे नहीं देते थे. ‘मैं सार्वजनिक जीवन के लिए अपने समय की बलि देता हूं, यही मेरी चंदे की सहायता है.’ सार्वजनिक जीवन के विषय में वे अविक्रेय थे. एक बार किसी ने धारा सभा में किसी विषय पर प्रश्न करने की सिफारिश की. उन्होंने स्वीकार कर लिया. दो-चार दिनों बाद उन्हीं लोगों ने किसी अन्य काम के बहाने से सॉलिसिटर के द्वारा 100 गिन्नियां लिखकर उन्हें ब्रीफ भिजवायी. जिन्ना ने ब्रीफ देखी, उसका रहस्य समझा और उसे चेम्बर के बाहर सॉलिसिटर के पीछे फेंक दिया. ‘मैं जो सवाल करने वाला हूं, उसकी कीमत दे रहे हो? मैं ब्रीफ भी नहीं लूंगा और सवाल भी नहीं करूंगा…’

उन्हीं दिनों उनके विवाह का अवसर उपस्थित हुआ. सर दिनशा पिटिट की सत्रह वर्षीय पुत्री रति पिटिट के साथ उनका प्रेम-सम्बंध हो गया था और दोनों को एक दूसरे के साथ विवाह करने की इच्छा हुई. पारसी कौम में एक बड़ा ऐक्य है- जब अपनी कौम पर आक्रमण होते दीख पड़ता है, तब सब मिल जाते हैं. जिन्ना पर धिक्कार की वर्षा हुई. रति पिटिट पर माता-पिता और कौम ने मनमानी की. मामला कोर्ट में आया. हमारी बार-लायब्रेरी में पारसी बैरिस्टरों की टीकाखोरी की सीमा नहीं थी. सुने न जा सकने योग्य काव्य रचे गये. इस तूफान में जिन्ना अकेले पर्वत के समान अचल और स्थिर खड़े रहे. उनके बचाव में मैं भी अनेकों के साथ मार-पीट पर उतर आता था.

श्रीमती जिन्ना से मैं बाद में मिला था, जमनादास के यहां, होमरूल लीग में और कभी-कभी जिन्ना के चेम्बर में. ऐसी तेजस्वी स्त्री मैंने कदाचित ही देखी है. तलवार की धार की तरह उनकी जिह्वा चलती थी. उनका स्वभाव भी बिजली की तरह तीक्ष्ण था. उस समय उनके मन में देश-स्वातंत्र्य की अग्नि धधकती थी. जिन्ना उन्हें देशोद्धारक दिखलाई पड़ते थे. उनके साथ रह कर रण-कौशल दिखलाने की उन्हें बड़ी अभिलाषा थी.

उन दोनों की आंखों से झड़ती हुई प्रणय-ज्योति का सुगम स्मरण अब तक मेरे मन में बाकी है.

जिन्ना और उनकी पत्नी दोनों ने इस आंदोलन में भाग लिया. जिन्ना के भाषण में अपरिचित तीक्ष्णता आ गयी.

हार्निमेन ‘क्रॉनिकल’ में रोज विलिंगडन पुराण का उल्लेख करते और बम्बई की जनता में विरोधोत्साह की बाढ़ आती. जयकर- जिसके साथ मेरा गाढ़ा परिचय 1922 के बाद हुआ- और हार्निमन अंग्रेज़ी में हृदय-वेधक भाषण देते. परंतु इस प्रचार में जमनादास द्वारकादास का विशेष रूप से हाथ था. उनकी मैत्री अनेक भेद-प्रभेदों के रहते हुए भी अभी तक टिकी हुई है. चौबीसवें वर्ष में कॉलेज से निकलने पर- बिसेंट के इस लाडले पुत्र को, सार्वजनिक जीवन का नेता और करोड़पति फर्म का हिस्सेदार होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. जिस प्रकार हवा में पतंग आकाश पर चढ़ती है, उसी प्रकार राजनैतिक गगन में वे चढ़े. उनका स्वभाव राजवंशी, परंतु स्नेहमय था. वे दोनों हथेलियां भर-भरकर पैसे देते और बहादुरी से भाषण करते. वे अंग्रेज़ी अच्छी बोलते थे, परंतु दो वर्षों से गुजराती वाक्पटुता का जो नया सम्प्रदाय स्थापित हो रहा था, उसमें वे सबसे श्रेष्ठ थे. उनकी गुजराती अशुद्ध थी- विशेषकर कच्छी के अपरिचित प्रभाव से, परंतु शब्द प्रवाह अस्खलित और भाव-वैविध्य बहुत था. बिसेंट के संसर्ग से उनकी बोलने की पद्धति छटापूर्ण हो गयी और क्षोभ की उसमें छाया तक न रही.

मास्टर बहुत अच्छा बोलते थे, शुद्ध और गौरव-पूर्ण, सुंदर शब्दों से अलंकृत. उनकी आवाज़ भी प्रौढ़ थी. वे घटनाएं और उद्देश्य लगातार स्पष्ट रूप में उपस्थित करते थे. आरम्भ में चंद्रशंकर बड़ी सुंदरता से, प्रभावोत्पादक रूप में बोलते थे. उनकी आवाज़ भारी, बोलने की विधि लय-पूर्ण और उनका शब्द-कोश समृद्ध था. वे बीच-बीच में रसीले चुटकुले भी बोलते जाते थे. दो वर्षों तक उन्होंने हम सबसे अधिक प्रचार किया, परंतु वे अपनी शक्ति सुरक्षित नहीं रख सके. वे बड़ी बुलंद आवाज़ निकालने लगे, चाहे श्रोता सौ हों या दस सहस्र. लोकरंजन के तत्त्व भी उन्होंने खूब मिलाये. बम्बई में उनके अपने चुटकुले लोगों को जबानी याद हो गये थे.

वर्षा में की हुई प्रचार-यात्रा के परिणाम-स्वरूप उन्हें दमे की बीमारी हो गयी और उसके कारण उसके बाद के उनके अनेक वर्ष व्यर्थ बीते. जब गुजराती वाक्पटुता और वाग्वैभव का विकास नहीं हुआ था, तब इन मित्रों ने नयी प्रणाली शुरू की. उनके प्रयत्न के परिणाम स्वरूप गुजराती व्याख्यान पद्धति प्रौढ़, प्रभावशाली और समृद्ध हुई. ये सब, और मैं भी विलिंगडन के विरुद्ध प्रचार करने में लग गये.

11 दिसम्बर की अगली रात को हमने देर तक सभाएं कीं, और सुबह के पांच बजने से पहले पंद्रह हजार आदमी टाउन-हॉल के आगे एकत्र हो गये. मान-पत्र देनेवालों ने भी हॉल भरने के लिए हरकारों, मजदूरों और बोहरों आदि को सबेरे के चार बजे से टाउन-हॉल की सीढ़ियों पर बिठा रखा था. जिन्ना हमारे नायक थे. वे पुलिस-कमिश्नर के साथ बात कर आये और यह निश्चय हुआ कि एक हरकारा या एक बोहरा यदि अंदर जाए, तो एक हम में से भी अंदर चला जाए. इस प्रकार सबेरे छह बजे सारा टाउन-हॉल भर गया. बाहर बम्बई की जनता का समूह एकत्र होने लगा.

हॉल के अंदर विनोद की सीमा नहीं थी. कोई बोहरे का मज़ाक उड़ाता, कोई हरकारे की खिल्ली उड़ाता, कोई हमारे पक्षवालों को भला-बुरा कहता, शोर-गुल होता, कुर्सियां टूटतीं, सीटियां बजतीं और कभी-कभी हंसी-मज़ाक भी होता. अनेक पारसी लोग जिन्ना को न कहने योग्य वचन भी कहते थे. एक बार उन पर किसी ने हमला करने का प्रयत्न किया. थोड़ी-थोड़ी देर बाद पुलिस भी अंदर आ जाती और शांति बनाने का प्रयत्न कर जाती थी.

पांच बजे व्यासपीठ पर बैठने वाले बम्बई के महाजन आने लगे. जब से वे आये, तभी से उन पर शब्दों की वर्षा होनी शुरू हो गयी. हम ते आवाज़ें लगाते ही थे, पर हरकारे और मजदूर आवाज़ें लगाने में जबर्दस्त थे. कोई किसी की सुनता नहीं था. महाजनों ने सर जमशेदजी को सभापति बनाने का प्रस्ताव किया. हमारी ओर से तेलंग के लिए सिफारिश हुई. थोड़ी शांति हुई, प्रस्ताव उपस्थित हुआ… हां… हां… नहीं… नहीं… ‘डाउन विद विलिंगडन’ की हमलोग आवाज़ें लगा रहे थे. बेचारे नासमझ मजदूरों की समझ में नहीं आता था कि वे क्या करें, अतः वे भी चिल्लाने में हमारा साथ दे रहे थे. दूसरे लोग घबरा गये. शोर-गुल इतना मचा कि अनेक लोग कुरसी पर खड़े हो गये और अनेक आगे आने लगे. अनेक लोग व्यास पीठ पर भी चढ़ने के लिए आ रहे थे, अतः सभापति और उनके मित्र उठकर पिछले रास्ते से चले गये.

जैसे-तैसे रात के आठ बजे हम बाहर निकलकर जगह-जगह पर भाषण देने लगे. मान-पत्र, प्रदान करने वाले के घर ही रह गया. बम्बई के गवर्नर ने पहली बार इसका स्वाद चखा कि बम्बई की जनता क्या है. इस अवसर की स्मृति के रूप में जनता ने ‘जिन्ना-हॉल’ बनवाया.

भूलाभाई और मेरे बीच की घटना के थोड़े दिनों बाद ही मैं दिल्ली-कांग्रेस में शामिल होने के लिए चल पड़ा. ‘सम्पूर्ण प्रांतीय स्वराज्य के बिना सुधार अमान्य हैं’, यह प्रस्ताव वहां भी उपस्थित हुआ और बम्बई में बिसेंट का पास कराया हुआ प्रस्ताव उड़ गया. परिणाम-स्वरूप बिसेंट और जिन्ना, दास और खापरडे के मुकाबले में निस्तेज हो गये.

ब्रिटिश सरकार की यह नीति थी कि एक ओर से सुधार उपस्थित करना और दूसरी ओर से देश-द्रोह के अपराध को विस्तृत करके उसके लिए सरकार को अधिक अधिकार देना. 1918 की जुलाई में ‘रॉलेट-समिति’ ने अपने वृत्तांत से इस नीति का समर्थन किया. देश में विरोध उत्पन्न हो गया. गांधीजी ने- जो अब तक राजनीतिक बहाव के बीच में नहीं आये थे- घोषणा की कि यदि रॉलेट के बताये हुए ‘काले कानून’ पास होंगे, तो वे सत्याग्रह आरम्भ करेंगे.

उस समय शंकरलाल बैंकर गांधीजी के सम्पर्क में आये थे, और उन्होंने यह निर्णय किया था कि उनको ‘ऑल इंडिया होमरूल लीग’ का अध्यक्ष पद दिया जाए. उन्होंने मुझसे बात की. जमनादास की तरह बिसेंट के साथ मेरा निकट सम्बंध नहीं था, परंतु गांधीजी का ढंग मुझे अव्यावहारिक मालूम हुआ था. दिल्ली में बिसेंट की स्वीकार की हुई नीति मुझे पसंद नहीं आयी थी. भारतीय मानस विचित्र है, ज़रा भी किसी ने धीरे चलने के लिए कहा, कि हमारी शाब्दिक हिम्मत एकदम बढ़ जाती है. इस मानस को बिसेंट का झुकाव कायरतापूर्ण मालूम हुआ. अनेक लोगों ने तो ऐसे आक्षेप भी किये कि ‘यह तो सफेद चमड़ी है, इसे भारतीयों को स्वराज्य मिलना कहां से अच्छा लगेगा?’ पर यह आक्षेप नितांत असत्य था. रंग-भेद का खयाल यदि किसी अंग्रेज़ में नहीं देखने को मिला है, तो वह बिसेंट में ही. भारत का यदि किसी विदेशी ने मातृवत् पूजन किया है, तो वह उन्हीं ने. फिर भी शंकरलाल की बात मुझे सत्य मालूम हुई. हमने सब जगह मुकाबला किया और अंत में गांधीजी अध्यक्ष चुने गये. हममें जो डोर खींचने का दावा करने वाले मित्र थे, उनके हृदय बैठ गये. रॉलेट एक्ट का विरोध करने के लिए गांधीजी सारे भारत में घूम आये. उनकी लोकप्रियता की बाढ़ आ गयी. थोड़े समय बाद ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो हमने उन्हें अध्यक्ष नहीं बनाया था, वरन् वे कृपा करके हमें सदस्य बनाये हुए थे. अपने चाणक्यों की स्थिति देखकर-मुझे बड़ा मज़ा आता था.

गांधीजी के प्रति यह मेरा पहला अनुभव था. उनके अध्यक्ष होने के तुरंत बाद ही वैकुंठ देसाई के ऑफिस में पहली सभा हुई. रॉलेट-एक्ट के विषय में यह चर्चा हुई कि क्या करना चाहिए. तेरसी ने और मैंने बहिष्कार का समर्थन किया. हममें से कोई इसके सिवा दूसरा रास्ता नहीं जानता था. हमें यह मालूम था कि गांधीजी इसके विरुद्ध थे.

गांधीजी ने कहा कि बहिष्कार में हिंसा आ जाती है, अतः यह रास्ता व्यर्थ- वर्ज्य है. इसमें पाप है. बहिष्कार के विषय में उस समय मेरे विचार स्पष्ट थे. अगली रात को, बहिष्कार के समर्थन के लिए तैयार की हुई मेरे भाषण की प्रतिलिपि उस समय के मेरे राजनीतिक विचारों का परिचय देती है- ‘आक्रमण को पाप समझकर अनेक लोग उससे दूर रहते हैं. वे युद्ध के प्रति उत्पन्न उत्साह को दानवी वृत्ति मानकर उससे विमुख हो जाते हैं. राजनीतिक प्रवृत्ति में प्रेम के लिए स्थान नहीं है. एक राष्ट्र और दूसरे राष्ट्र के बीच न्याय हो सकता है, पक्षपात हो सकता है, पर प्रेम नहीं हो सकता. बहिष्कार में प्रेम का अभाव है, यह कहना मानस-शास्त्र और नीति-शास्त्र दोनों के विरुद्ध है. यह शस्त्र किसी विदेशी व्यक्ति के लिए नहीं, परंतु तुम्हारा शोषण करने वाली राजनीति के विरुद्ध व्यवहृत होता है. द्वेष जितना अधम है, उतना ही प्रेरक है. द्वेष उत्पन्न होता है, तो उसे प्रेरणा के या जागृति के रूप में उत्पन्न होने दो. इसमें हिंसा का प्रश्न उपस्थित नहीं होता, यह तो केवल औचित्य का प्रश्न है. हमारी पराधीन जनता के लिए, वह हिंसा अनुचित है, जो हमारा शासन-कर्ता के साथ संघर्ष करवा देती है, परंतु इससे हिंसा को हमेशा के लिए देश-निकाला दे देने का नाम राजनीति बिल्कुल नहीं है.

इस प्रतिलिपि- जिस पर कि अरविंद घोष का विशेष प्रभाव है- पर से मैं भाषण तैयार करके ले गया था. इसमें से कितना बोला गया, यह याद नहीं है, परंतु तेरसी ने इसका खूब समर्थन किया, एक-दो अन्य व्यक्ति भी इसके पक्ष में अचूक रीति से बोले! गांधीजी ने अपनी लाक्षणिक रीति से उत्तर दिया- ‘स्वदेशी व्रत चल सकता है, बहिष्कार में हिंसा आ जाती है, अतः वह वर्जित है. और यदि आप लोग उसे स्वीकार करेंगे, तो मैं पद-त्याग कर दूंगा. आपको दूसरा अध्यक्ष चुनना पड़ेगा.’

हम चकित हो गये. हम समझते थे कि यदि बहुमत से इसे स्वीकार करवायेंगे, तो गांधीजी मान लेंगे. ज़रा-से मतभेद से ही यदि सदस्य इस्तीफा देने लगें, तो लोक-शासन किस प्रकार चले? हम लोगों को क्या पता था कि हमारे बीच में देवांशी मनुष्य आ गया था! हमारे भाग्य में दो ही रास्ते रह गये थे, या तो उसके अधीन हो जाना, या भाग जाना.

गांधीजी ने तुरंत सत्याग्रह-समिति स्थापित की. उमर सोमानी और शंकरलाल मंत्री बने. कानजी द्वारकादास और मैं बम्बई की होमरूल लीग के मंत्री नियुक्त हुए.

एक और भी ऐसा ही अवसर आया, अब गांधीजी ने स्पष्ट कह दिया कि- ‘यह भी सेना है, भेद केवल इतना ही है कि युद्ध के समय उससे अलग हो जाओ, तो दंड मिलता है, इससे अलग होना चाहो, तो हो सकते हो.’

हम में से अनेक उतावले हो उठते, परंतु अंत में पिघले हुए घी की तरह होकर जो गांधीजी कहते, वही करते थे.

1919 के मार्च में काले कानून पास हुए, अतः गांधीजी ने सत्याग्रह करने का संकल्प प्रकट किया. सत्याग्रह-व्रत-पत्र पर हस्ताक्षर करवाये जाने लगे. छह अप्रैल को सारे देश में हड़ताल हुई और समस्त भारतीय जनता ने उसमें भाग लिया. उस दिन भारत ने अपने राष्ट्रीय महत्त्व का प्रथम दर्शन किया.

सरकार घबराहट से पागल हो गयी. गांधीजी को पंजाब जाते हुए रोक लिया गया. डॉ. किचलू और डॉ. सत्यपाल को प्रांत से बाहर निकाल दिया गया. ग्यारह को डायर अमृतसर में आया. तेरह को जलियांवाला बाग में हत्याकांड हुआ. सारा देश भड़क उठा. इंग्लैंड में भी हाहाकार मच गया.

18 अप्रैल को गांधीजी ने सत्याग्रह बंद कर दिया, और यह स्वीकार किया कि उन्होंने हिमालय के समान बड़ी भूल की थी. डायर के किये हुए हत्याकांड की जांच करने के लिए समिति बैठायी गयी. पंजाब में ऐसा कोई वकील नहीं था, जो जनता की ओर से खड़ा होता. ‘प्रेसीडेन्सी एसोसियेशन’ ने- दो-एक वर्ष मैं उसका मंत्री भी रहा था- हंटर-समिति के आगे जनता का प्रश्न उपस्थित करने का काम मुझे सौंपा. 3000रु. महीना फीस थी. राजनीतिक कामों में भी वकील फीस अवश्य लेते थे. यह उस समय की प्रथा थी. जब कांग्रेस-कमेटी ने निश्चय किया कि हंटर-समिति के सम्मुख लोक-पक्ष का बयान न लिया जाए और मुझे पंजाब जाने की आवश्यकता नहीं- तब मुझे शांति मिली. तीन हजार रुपये लेकर महीने-भर के लिए बम्बई से बाहर जाना मुझे गहरे आत्म-त्याग के समान मालूम हो रहा था. अभी गांधी-युग नहीं आया था.

उस सत्याग्रह के जमाने की एक घटना है. उमर थे महाराजा, कमाने और खर्च करने के लिए उनके पैसों की कोई सीमा नहीं थी. मिजाज भी था बड़ा, बड़े भले, उत्साही और उदार थे. कांग्रेस के वे अग्रगण्य संचालक बन गये थे. उन्हें जिस बात की धुन समा जाती, उससे उन्हें रोकने की किसी की मजाल नहीं थी. उन दिनों शौकतअली ने खिलाफत के विषय में एक फतवा दिया था, जिसे उमर ने छपवाया था. गवर्नर था लॉर्ड लाइड. उसने वह गांधीजी को बताया. गांधीजी ने उसे अनुचित बताया. उमर से पूछने पर उन्होंने कहा कि सारी कॉपियां खप चुकी हैं, इसलिए सरकार को सौंप देने की कोई चीज़ नहीं रही. गांधीजी ने इसे मान लिया और गवर्नर को इसकी सूचना दी.

वास्तव में उसकी सैकड़ों कॉपियां प्रेस में पड़ी हुई थीं और जब पुलिस की तलाशी का वक्त हुआ तब किसी भी तरीके से सारी कॉपियों को जला डालने का निश्चय हुआ. रात को जमनादास सिवरी जाकर सारी प्रतियां वहां जला आये. किसी ने यह बात गांधीजी से कह दी. गांधीजी ने सबको बुलाकर सत्य बात स्वीकार कर लेने की सूचना दी और उमर को पुलिस कमिश्नर से माफी मांग लेने की आज्ञा दी. उमर तड़प उठे. गांधीजी ने स्वयं भी उपवास आरम्भ किया और जमनादास तथा उमर से भी उपवास करवाया. अंत में हारकर उमर ने अभिमान छोड़ा और पुलिस से माफी मांग ली.

उस समय मैं जिन्ना के साथ काम कर रहा था. मेरे सहकारियों का मन गांधीजी के सहकारियों से दूर हटता जा रहा था.

1919 के दिसम्बर मास में मैं अमृतसर में होने वाली कांग्रेस में गया था- देवीदास सॉलिसिटर जैसे कुशल संचालक के दल के साथ. वे सब कुछ सम्भाल लेते थे. औरों को केवल खा-पीकर मौज करने का काम रह जाता था. रास्ते में जब स्टेशन आते, तब दो-चार मित्र उतरकर दही-बड़े, जलेबी आदि खरीद लाते, दावतें उड़तीं और धमा-चौकड़ी मची रहती.

मणिलाल नानावटी भी उस समय साथ थे.

मुझे जब भी लम्बा सफर करना पड़ता, तभी मेरे छक्के छूट जाते, ट्रेन में नींद न आती और पेट चमड़े की थैली बन जाता था. जरा भी धूल लगती कि खांसी-जुकाम हो जाता था. दो दिनों के सफर के बाद जब मैं निश्चित स्थान पर पहुंचता, तब एकदम ढीला पड़ जाता.

उस समय की कांग्रेस पहले दर्जे में सफर करने वालों की और अच्छे होटल में ठहरने वालो की कांग्रेस थी. कांग्रेस में जाने से सहन करने वाली अनियमितता, असुविधाएं और जागरण हमेशा मुझे निर्बल बना छोड़ते थे, परंतु अमृतसर में मणिलाल नानावटी ने मां की तरह मेरा ध्यान रखा.

अमृतसर-कांग्रेस की विषय-विचारिणी-समिति को हिंदुस्तान के इतिहास में एक सीमा-चिह्न कहा जा सकता है. मांटेग्यू के सुधार हमारे सामने थे. जलियांवाला बाग के शहीदों का बहता हुआ लहू हमारा खून उबाल रहा था.

कांग्रेस के नेताओं में एक ओर थे पंडित मोतीलाल नेहरू और बिसेंट, और दूसरी ओर थे लोकमान्य तिलक, विपिनचंद्र पाल और सी.आर. दास. देशबंधु दास ‘मॉर्निंग कोट’ पहनकर आते, सात-आठ युवक बैरिस्टरों को साथ लाते और हाथ ठोंककर ज़ोरदार भाषण करते थे.

दोनों पक्ष मन में गांधीजी से ईर्ष्या करते और प्रकट रूप में उपहास करते रहते थे. पर वे समझ में न आने वाली रीति से अकेले मौन बैठे हुए थे. सुधारों पर विवाद छिड़ गया. किसी ने- जहां तक याद है श्रीनिवास शास्त्री ने- कहा कि मांटेग्यू ने हिंदुस्तान की इतनी सेवा की है कि नगर-नगर में उसकी प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए. सत्यमूर्ति भयंकर भाषण करने में प्रसिद्ध थे. उन्होंने शास्त्री जी की खूब खबर ली और यह प्रतिपादित किया कि चेम्सफर्ड खराब-से-खराब वायसराय है.

बाद में जलियांवाला बाग के हत्याकांड और अमृतसर के दंगे के समय जनता द्वारा प्रदर्शित किये गये घातक आदेश, दोनों का विरोध करने वाला प्रस्ताव उपस्थित हुआ. इस प्रस्ताव का पिछला भाग हम लोगों को अच्छा नहीं लगा. दो अंग्रेज़ों की हत्या और सैकड़ों निर्दोष स्त्राr-पुरुषों को गोली से उड़ाना- इन दो बातों को एक समान कैसे माना जाए? अनेक लोगों को संदेह हुआ कि यह काम बिसेंट का होगा, ब्रिटिश होने के कारण अंग्रेज़ों के प्रति उसे सहानुभूति हुई होगी. एक पंजाबी नेता ने तो कह भी डाला कि भारतमाता की संतान ऐसा प्रस्ताव नहीं गढ़ सकती. लोकमान्य ने भी विरोध किया. पाल और दास ने रोष प्रदर्शित किया और बहुमत से इस प्रस्ताव का पिछला भाग उड़ा दिया गया.

दूसरे दिन जब हम विषय-विचारिणी-समिति में एकत्र हुए, तब यह चर्चा चली कि प्रस्ताव के उड़ जाने से रात को गांधीजी को नींद नहीं आयी थी. नेतागण हंस रहे थे, मज़ाक उड़ा रहे थे. ‘हां… महात्मा को नींद नहीं आयी! क्या होगा? कहीं पृथ्वी पर प्रलय तो नहीं होगी?’ आदि-आदि.

सभा आरम्भ हुई, सभापति ने कहा कि गांधीजी चाहते हैं, कि कल जो प्रस्ताव उड़ा दिया गया था, उस पर फिर से विचार हो. कइयों ने इसका विरोध किया. गांधीजी टेबल पर बैठे और उन्होंने इस प्रस्ताव पर पुनः विचार करने की सूचना दी. गांधीजी को मैंने अनेक बार बोलते सुना है, परंतु उनके इस भाषण को प्रभावोत्पादक वाक्पटुता के अद्वितीय उदाहरण के रूप में आगे वर्णित किये हुए बिसेंट के भाषण के साथ रखा जा सकता है. ऐसा याद है कि उन्होंने कुछ-कुछ इस प्रकार आरम्भ किया था-

‘कल पंजाब के एक नेता ने कहा है कि भारतमाता की संतान ऐसा प्रस्ताव नहीं गढ़ सकती. इस प्रस्ताव का प्रारूप मैंने स्वयं बनाया है. मैं भारतमाता की संतान हूं. यह टीका सुनकर मैंने इस पर बड़ा विचार किया कि क्या मैं भारतमाता की संतान के रूप में ऐसा प्रस्ताव गढ़ सकता हूं? सारी रात मैंने विचार किया और मुझे विश्वास हो गया कि भारतमाता की संतान ही ऐसा प्रस्ताव गढ़ सकती है.’

बाद में उन्होंने हिंसा-अहिंसा का भेद समझाया. एक घंटे तक वे बोले होंगे. उनके प्रत्येक शब्द से जीवन-भर की तपश्चर्या और संकल्प प्रकट हो रहे थे. हम लोग श्वास रोके सुन रहे थे. जब वे बोल चुके, तब उनकी वाक्पटुता और व्यक्तित्व से परास्त होकर हमने उनकी शरण ली. फिर उस प्रस्ताव पर विवाद हुआ, मज़ाक हुआ और व्यंग्य-बाणों की वर्षा हुई. लोकमान्य, दास और पाल ने बहुत कहा, पर कोई प्रभाव नहीं हुआ. वही प्रस्ताव पास हुआ. इस प्रकार कांग्रेस के सम्राट का पद गांधीजी के हाथ में चला गया.

अक्टूबर 1919 में गांधीजी ने खिलाफत-कॉन्फ्रेंस की. इस कदम पर जिन्ना को ज़रा भी विश्वास नहीं था. असहयोग भी हमारी समझ में नहीं आता था. 1920 के मई मास में फ्रेंचब्रिज पर असहयोग-आंदोलन के सिलसिले में बड़ी सभा हुई. गांधीजी ने त्रिविधि बहिष्कार करने के लिए सूचित किया. जुलाई 1920 में गुजरात राजकीय मंडल ने धारा-सभा का बहिष्कार किया. उस सभा में मुझे बुलाया गया था, पर मैं नहीं गया. एक लिखित टिप्पणी मैंने भेज दी थी.

मेरे राजनीतिक विचारों में एक बात उस समय निश्चित थी. वह यह कि भारत के लिए राजनीतिक संस्थाओं की सत्ता बड़ी ही आवश्यक है. 1908 – 1909 से ही मैं विप्लववादी नहीं रह गया था.

मैं जानता था कि इस प्रकार का बहिष्कार गांधीजी कराना चाहते हैं, अतः मेरा अरण्य-रोदन कोई नहीं सुनेगा. परंतु अपने विचार भेजकर मैंने अपना कर्तव्य पूर्ण किया. उन विचारों का उपयोगी भाग निम्नलिखित था-

धारा-सभाओं का बहिष्कार

‘मेरा यह दृढ़ मत है कि धारा-सभाओं के बहिष्कार का आंदोलन आरम्भ करने में कोई लाभ नहीं है. उसके कारण ये हैं-

  1. बहिष्कार से देश के अच्छे-से-अच्छे व्यक्ति धारा-सभाओं से निकल जायेंगे या अलग रहेंगे, इससे धारा सभाओं के द्वारा देश की जो प्रगति होने की सम्भावना है, वह नहीं होगी.
  2. जिनकी उपस्थिति से मार्ले-मिंटो के सुधारों वाली धारा-सभाओं में भी अधिकारियों की गैर-जिम्मेदार मनोवृत्ति पर अंकुश रहता है, वे देश के सबसे अधिक प्रभावशाली पुरुष, बहिष्कार के कारण धारा-सभा में जाना बंद कर देंगे.
  3. चुनावों के सिलसिले में राज-काज में आगे बढ़े हुए राजनीतिज्ञों द्वारा जो प्रबल और व्यवस्थित प्रचार कार्य चलने की आशा है, और उस प्रचार से जनता को सामान्यतया जो राजनीतिक शिक्षा मिलती है, वह धारा-सभाओं का बहिष्कार होने से नहीं मिल सकती.
  4. बहिष्कार से निम्न प्रकार के मान-मर्यादा और पद प्राप्त करने का प्रयत्न करने वाले खुशामदी लोगों को रचनात्मक कार्य करने का अवसर मिल जायेगा और लोगों के मन में यह समझकर बैठे रहने की वृत्ति उत्पन्न होगी कि आज जो भी स्थिति है, वही उत्तम है.
  5. धारा-सभा में स्थान मिलने से मनुष्य को अमुक पद प्राप्त होते ही हैं, और जो न्याय चाहता है, वह यदि धारा-सभा का सदस्य हो, तो उसकी आवाज़ अधिक ज़ोरदार और प्रभावशाली साबित हुए बिना नहीं रह सकती.
  6. मेरा मत है कि राजनीति में आगे बढ़े हुए विचारों वाले दल को अलग रखने की स्थिति और सरकार के साथ असहयोग की नीति में शामिल करने की दशा में यह पहला कदम है. आप जोश के साथ प्रचार कर सकते हैं, परंतु थोड़े ही समय में ध्येय-प्राप्ति न कर सकने पर आपको अधिक ज़ोरदार प्रचार करना पड़ेगा. अर्थात लोगों में असहयोग की अग्नि जलानी पड़ेगी और सम्भवतः सरकार दमन नीति काम में लायेगी. इससे समाज में इतना उत्पात मचेगा कि सुव्यवस्थित प्रगति का जो लाभ देश को मिलना चाहिए, वह नहीं मिल सकेगा.

इससे मेरा यह मत है कि राष्ट्रीय पक्ष के लोगों को खिलाफत और पंजाब के लिए न्याय प्राप्त करने के लिए धारा-सभाओं की बैठकों में चुने जाने के लिए देश के आगे आना चाहिए. मैं यह मानता हूं कि यदि हम पर्याप्त आंदोलन करें, तो देश भर में राष्ट्रीय पक्ष वाले उचित संख्या में धारा-सभाओं में चुने जायें. चुने जाने के पश्चात राष्ट्रीय पक्ष के सदस्य वफादारी की शपथ लें. परंतु जब तक न्याय न मिले, तब तक धारा-सभाओं के काम काज में अन्य किसी प्रकार का भाग न लें. यह सारा कार्यक्रम चुनाव के प्रचार के अंतर्गत लोगों के आगे रखा जाना चाहिए –

  1. इस कार्यक्रम में पंजाब का प्रश्न एक पक्ष द्वारा अपना बनाया होने से उसके लिए बड़ा तीव्र-आंदोलन चलेगा.
  2. असहयोग की धमकी देने से और चुनावों में खड़े होने से इनकार करने पर जो प्रभाव होगा, उसकी अपेक्षा चुनाव हो जाने के पश्चात धारा-सभाओं के साथ असहयोग करने से अधिक प्रभाव होगा.
  3. ऐसा करने से धारा-सभा प्रतिष्ठा और पद प्राप्त करने का प्रयत्न करने वाले खुशामदी लोगों के हाथ में जाने से बच जायेगी.
  4. ऐसा करने से सरकार को यह ढोंग रचने से रोका जा सकेगा कि वह सुधारों वाली धारासभाओं को निर्विघ्न और सरलता से चला रही है.’

अमृतसर-कांग्रेस के बाद गांधीजी ने देश पर जादू-सा कर दिया. पहली अगस्त को लोकमान्य स्वर्गवासी हुए और बम्बई की जनता ने उन्हें भव्य सम्मान प्रदान किया. सितम्बर में कलकत्ता की विशेष कांग्रेस ने असहयोग स्वीकार किया.

गांधीजी ‘होमरूल लीग’ का नाम ‘स्वराज्य सभा’ रखना चाहते थे, और उसके उद्देश्यों में से ‘रचनात्मक साधन’ (कॉन्स्टीट्यूशनल मीन्स) शब्द निकाल कर ‘शांतिमय और अचूक साधनों’(पीसफुल एंड इफेक्टिव मीन्स) से स्वराज्य प्राप्त करना, यह परिवर्तन करना चाहते थे. चार सितम्बर को जब कलकत्ते में लीग की सभा हुई, तब जिन्ना ने यह विषय उठाया कि इसके लिए उचित नोटिस नहीं दिया गया था. अतः बम्बई में सभा की बैठक पुनः बुलाने का निश्चय हुआ.

गांधीजी के सोचे हुए परिवर्तनों में हमने जिन्ना और जयकर के हस्ताक्षरों से संशोधन उपस्थित किया.

‘कांग्रेस के कानून एक प्रकार से स्वराज्य प्राप्त करना है,’ यह संशोधन मैंने और हरसिद्ध भाई देवेटिया ने पेश किया था.

3 अक्टूबर को मुरारजी गोकुलदास मार्केट के हाल में यह सभा हुई. गांधीजी उसके अध्यक्ष थे. पंडित मोतीलाल जी, जवाहरलाल जी, राजगोपालाचार्य जी, ये सब उनके पक्ष में थे. उमर और शंकरलाल ने अच्छी संख्या में सदस्य एकत्र किये थे. अपने पक्ष की हार को हम निश्चित समझे बैठे थे.

जिन्ना और जयकर का संशोधन गिर गया. 20 के विरुद्ध 45 मतों से मेरा उपस्थित किया हुआ और हरसिद्धभाई का अनुमोदित प्रस्ताव भी उड़ गया. जिन्ना ने तीसरा संशोधन उपस्थित किया- ‘स्वराज्य का अर्थ है साम्राज्य में जिम्मेदार राजतंत्र बनाना,’ वह भी उड़ गया.

जिन्ना ने वैधानिक विषय उपस्थित किया- ‘तीन चौथाई बहुमत के बिना विधान में परिवर्तन नहीं हो, लीग के विधान के अनुसार यदि उसमें परिवर्तन करना हो, तो कौंसिल के उपस्थित सदस्यों के तीन चौथाई बहुमत की आवश्यकता होगी.’

अध्यक्ष ने निर्णय दिया कि इस प्रस्ताव में जान नहीं थी, और प्रस्ताव उचित रूप में पास हो गया था. जिन्ना विरोध प्रदर्शित करके इस सभा से चले गये. हमने भी अनुकरण किया.

5 अक्टूबर को हम बीस सदस्यों ने लीग से इस्तीफा दे दिया. इन बीस में जिन्ना, जयकर आदि के अतिरिक्त हमारा मंडल भी शामिल था.

हमारे इस्तीफों का गांधी जी ने उत्तर दिया. जिन्ना ने उसका जवाब लिखा. उस पर विचार करने के लिए हम अंतिम बार एकत्र हुए और हमारी इस सामुदायिक प्रवृत्ति का अंत हो गया. गांधीजी ने अपना प्रयोग आरम्भ कर दिया था. देश उनके चरणों पर झुक गया था. परंतु हम लोगों को उस प्रयोग में बड़ा खतरा नज़र आया. गांधीजी की कार्य पद्धति का किसी को पूरा पता नहीं था और उनकी शांति की बात कितने अंश में सत्य थी, इसका भी हमें विश्वास नहीं था.

दिसम्बर में मैं नागपुर की कांग्रेस में गया- उसे छोड़ने से पहले उसके दर्शन करने के लिए. दो वर्षों में गांधीजी ने उसे भिन्न ही स्वरूप प्रदान कर दिया था. उसका बाह्य स्वरूप यात्रियों के बड़े समूह के समान हो गया था. विभिन्न प्रांतों से नये खद्दरधारी नेता उसमें आ गये थे. राजनीति के पुराने निष्णात मुश्किल से ही नज़र आते थे. जो समूह एकत्र हुआ था, वह अधिकांश में जोशीले गांधी भक्तों का था. विचार स्वातंत्र्य का उपहास करना, उसे दबा देना, सब जगह दीख पड़नेवाली इस मनोदशा में अहिंसा का अंश विशेष रूप से नहीं झलकता था. भारत विजय करने निकले हुए विजय-मस्त सैनिकों का यह पड़ाव था.

एक मित्र मिल गये- ‘तुमने अभी तक खादी पहनना शुरू नहीं किया?’ उन्हेंने पूछा.

‘अभी मैं उसकी सार्थकता समझ नहीं सका हूं?’ मैंने अपनी कमज़ोरी स्वीकार की.

‘विदेशी, वेश्या है, खादी, पतिव्रता स्त्री है. इसमें सार्थकता समझने की क्या बात है?’

मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं था.

जयकर और मैं अलग रहते थे, पर दिन भर साथ-साथ घूमा करते थे.

मैं गुजरात कैम्प में गया. मेरे पुराने मित्रों के साथ मेरी राजनीतिक एकरूपता टूट गयी थी.

विषय-विचारिणी-सभा में जो अवास्तविक-सा वातावरण फैला हुआ था, वह मुझे बड़ा खटका. गांधीजी, मुहम्मदअली और शौकतअली जो कहते थे, वही होता था. गांधीजी बहुत कम बोलते थे. मुहम्मदअली ने एक बार कहा-

‘ब्रिटिश साम्राज्य तो गुजर गया और दफनाया भी जा चुका है.’

मैं अपनी हंसी न रोक सका. इस प्रचंड उत्साह को अपनाने में मैं असमर्थ रहा. जिन्ना ने अद्भुत प्रगल्भता दिखलायी. तीस हजार विरोधियों के बीच भी उन्होंने अकेले यह आवाज़ उठायी कि कांग्रेस को अपना लक्ष्य नहीं बदलना चाहिए. उन्होंने मुहम्मदअली का उल्लेख ‘मिस्टर मुहम्मदअली’ कहकर किया.

हजारों आदमी खड़े हो गये. हजारों आवाज़ों ने विरोध प्रदर्शित किया. ‘मौलाना… मौलाना…’

जिन्ना अटल रहे. इस प्रतिपक्षी जनसमूह में उन्होंने अकेले ही जिह्वा की झूठी अंजलि देने से इनकार किया.

उस समय की कांग्रेस का यह अंतिम दृश्य था.

मैं चला गया. यह संस्था मेरी समझ से बाहर की वस्तु बन गयी. मैंने उससे इस्तीफा दे दिया.

बाद में एक-दो मित्रों ने मुझसे कहा कि गांधीजी मुझसे मिलना चाहते हैं. मैंने मिलने जाना अस्वीकार कर दिया. उनके प्रभाव में घिसट जाने का अवसर अभी मेरे लिए नहीं आया था.

(क्रमशः)

दिसंबर  2014 

 

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