सात सवार

(अपने उपन्यास ‘देजर्तो देई तार्तारे’ से प्रसिद्धि पाने वाले इटालियन लेखक दिनो बुज्जाती की कृतियों में अतिसामान्य और अद्भुत का, हल्के-फुल्के हास्य और गहन वेदना का विलक्षण संगम है. उनकी सशक्त-सादी शैली में व्यग्रता और चिंता की अंतर्धारा है, जो उन्हें काफ्का के निकट पहुंचाती है. अल्बेर कामू ने उनकी कहानी ‘उन कासो क्लिनिको’ पर नाटक रचा था. प्रस्तुत कहानी एक रूपक-कथा है. पिता की राजधानी से दूर-ही-दूर हटता हुआ इसका नायक जीवन-यात्रा में बचपन से दूर हटते हुए आदमी का भी प्रतीक हो सकता है, अपने मूल आध्यात्मिक स्रोत से परे-ही-परे हटते हुए सांसारिक जीव का भी.)

            जब से मैं अपने पिता के राज्य की छान-बीन करने निकला हूं, प्रतिदिन राजधानी से दूर-ही-दूर होता जा रहा हूं और मेरे पास समाचारों का आना कम-ही-कम होता जा रहा है. जब मैं इस यात्रा पर रवाना हुआ, तब महज तीस साल का था और आठ साल से ज्यादा गुजर चुके हैं- ठीक-ठीक कहूं तो साल, छह महीने और पंद्रह दिन-निरंतर यात्रा करते हुए. जब मैं रवाना हुआ, तो सोचा था कि कुछ ही सप्ताह में आसानी से सीमा पर पहुंच जाऊंगा, मगर मुझे नये-नये लोग मिलते जा रहे हैं, नये गांवों और प्रांतों का पता लगता जा रहा है, सब कहीं मेरी भाषा बोलने वाले, मेरे ताबेदार होने का दावा करने वाले लोग हैं.

    कभी-कभी मैं सोचता हूं, मेरा कुतुबनुमा बौरा गया है और हालांकि हम समझते हैं कि हम दक्षिण की ओर बढ़ रहे हैं, पर वास्तव में हम गोल दायरे में चक्कर लगाये जा रहे हैं, और वास्तव में राजधानी से हमारी दूरी बढ़ ही नहीं रही है. शायद यही कारण है कि हम राज्य की सीमा पर नहीं पहुंच पा रहे हैं.

    मगर अक्सर यह खयाल भी मुझे सताया करता है कि शायद सीमाएं हैं ही नहीं, इस राज्य का कोई अंत नहीं, और इस अंतहीन यात्रा के बावजूद मैं कभी सीमा पर पहुंच ही नहीं पाऊंगा.

    जब मैंने यात्रा आरंभ की, तब मैं तीस साल का था- शायद यात्रा की दृष्टि से बहुत अधिक वयस्क. मेरे मित्रों ने जो बिलकुल जिगरी मित्र थे उन्होंने भी मेरी योजना की खिल्ली उड़ायी, क्योंकि उनका खयाल था कि मैं अपने जीवन के सर्वोत्तम वर्ष बरबाद कर रहा हूं. सच तो यह है, सिर्फ मुट्ठी-भर वफादार दोस्त ही मेरे साथ चलने को तैयार हुए.

    मैं यों ही विनोद में ही चल पड़ा था- और वह विनोद अब मैं अनुभव नहीं कर रहा हूं! तो भी मैंने निश्चय कर रखा था कि यात्रा के दौरान अपने प्रियजनों से संपर्क रखने का कोई उपाय अवश्य खोज लूंगा, और इसलिए मैंने अपने अंगरक्षकों में सर्वोत्तम सात सवारों को संदेशवाहक चुना.

    अपनी नादानी के कारण मैंने सोचा था, सात संदेशवाहक तो बहुत ज्यादा हैं. मगर ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, मैंने पाया कि सात बहुत ज्यादा नहीं हैं, बल्कि उपहासास्पद रूप से कम हैं. वैसे उनमें से कोई भी कभी बीमार नहीं पड़ा है, न डाकुओं द्वारा पकड़ा गया है, न किसी के घोड़े ने जवाब दिया है. सातों ने ऐसी दृढ़ता और लगन के साथ मेरी सेवा की है कि उसका समुचित प्रतिदान देना मेरे लिए कठिन होगा.

    पहचानने में आसानी हो, इस विचार से मैंने उन्हें रोमन वर्णमाला के कम से नये नाम दिये-अलेग्जैंडर, बार्थोलोम्यू, केयस, डोमिनीक, एमिली, फ्रेडरिक और ग्रेगरी. घर से दूर रहने का मुझे बिलकुल अभ्यास नहीं था, इसलिए मैंने प्रथम संदेशवाहक अलेग्जैंडर को यात्रा के दूसरे दिन शाम को ही घर रवाना कर दिया. तब तक हम लगभग अस्सी कोस तय कर चुके थे. ताकि समाचारों का सिलसिला चलता रहे, मैंने अगली शाम को दूसरा संदेशवाहक भी रवाना कर दिया. फिर तीसरा, फिर चौथा और यात्रा की आठवीं शाम को ग्रेगरी भी रवाना हो गया. पहला संदेशवाहक अभी राजधानी से वापस नहीं आया था.

    दसवें दिन जब एक हम एक वीरान वादी में रात का पड़ाव डालने की तैयारी में थे, वह वापस हमसे  आ मिला. अलेग्जैंडर ने बताया कि जितनी आशा की गई थी, उससे कहीं धीमी रफ्तार में उसे यात्रा करनी पड़ी. मैंने तो सोचा था, चूंकि वह अकेला ही जा रहा है और बहुत ब़ढियां घोड़े पर सवार है, इसलिए हमें जितना वक्त लगा, उससे आधे समय में ही वह यह दूरी तय कर लेगा. मगर वास्तव में वह हमारी अपेक्षा सिर्फ डेढ़ गुना दूरी प्रतिदिन तय कर पाया था. हम चालीस कोस चलते थे और वह साठ कोस, इससे अधिक नहीं.

    यही बात दूसरों के साथ भी हुई. बार्थोलोम्यू हमारी यात्रा की तीसरी शाम को राजधानी को रवाना हुआ और दो सप्ताह बाद वापस आया. केयस ने चौथे दिन प्रस्थान किया और बीसवें दिन लौटा. मैं जल्दी ही समझ गया कि हर एक संदेशवाहक के लौटने के दिन का हिसाब लगाने के लिए यात्रा शुरू होने के जितनेवें दिन वह रवाना हुआ हो, उसे पांच से गुणा करना पड़ेगा.

    चूंकि हम राजधानी से दूर-ही-दूर होते जा रहे थे, संदेशवाहकों को भी अधिकाधिक लंबी यात्राएं करनी पड़ रही थां. पचास दिन बाद, एक संदेशवाहक के और दूसरे संदेशवाहक के आगमन के बीच काफी समय का अंतर रहने लगा. जबकि शुरू में हर पांचवें दिन एक संदेशवाहक हमारे शिबिर में आ पहुंचता था, अब पच्चीस दिन का अंतर रहने लगा था. इस कारण अपने नगर की खबरें दुर्लभतर होती जा रही थी. हफ्तों बीत जाते थे बिना समाचार के.

    जब यात्रा करते-करते छह महीने हो गये अब तक हम फसानी पर्वतमाला पार कर चुके थे- संदेशवाहकों के आगमन के बीच पूरे चार महीने का अंतर पड़ने लगा. अब वे मुझे बहुत पुरानी खबरें लाकर दे रहे थे. जो चिट्ठियां वे मेरे हाथ में लाकर रखते, तुड़ी-मुड़ी होतीं, उनका कागज पीला पड़ चुका होता, क्योंकि  संदेशवाहकों को ओस भरी रातों में खुले मैदानों में सोना पड़ता था.

    हम अब भी यात्रा किये जा रहे थे. मैं अपने मन को यह मनाने का व्यर्थ ही प्रयत्न किया करता था कि मेरे सिर पर से जो बादल गुजर रहे हैं, वे मेरे बचपन के दिनों के बादल हैं, दूर के कस्बे पर स्थित आकाश मेरे सिर पर छाये नीलाकाश से भिन्न नहीं है, वायुमंडल वही है, हवा का झोंका वही है, पंछी का गीत वही है. मगर वास्तव में बादल, आकाश, वायुमंडल, हवा, पंछी अब मुझे नये लग रहे थे और मैं अपने को एकदम अजनबी अनुभव कर रहा था.

    चलते चलें. चलते चलें. राह में मिलने वाले आवारा घुम्मकड़ मुझसे कहते कि सीमा दूर नहीं है. मैं अपने आदमियों को बिना रुके चलते रहने को प्रोत्साहित करता रहता, ताकि निराशा के बोल उनके मुंह से बाहर निकलने से पहले उनके होठों पर ही मर जायें. चार साल गुजर चुके थे. ओह! कितनी थकान! अजीब बात थी- राजधानी,मेरा घर, मेरे पिता, सब मुझे बहुत दूर महसूस होते थे, जैसे मुझे विश्वास ही नहीं होता था कि उनका अब भी अस्तित्व है. प्रत्येक संदेशवाहक के बीच बीस महीने के एकांत और चुप्पी का व्यवधान रहता था. वे मुझे अजीब-से पत्र लाकर देते-पुराने और पीले पड़ चुके पत्र, जिनमें मैं विस्मृत नाम, अजीब-से मुहावरे और समझ में न आने वाले विचार पाता था. और अगले दिन सिर्फ रात-भर के विश्राम के बाद, जब हम आगे चल पड़ते, तो संदेशवाहक उलटी दिशा में रवाना हो जाता था मेरा पत्र लेकर, बहुत दिन पहले लिखा हुआ मेरा पत्र.

    साढ़े आठ साल बीत चुके है. आज शाम को मैं अपने तंबू में अकेला बैठा ब्यालू कर रहा था कि डोमिनीक ने प्रवेश किया. बेतहाशा थका हुआ होने पर भी वह मुस्कराया. पिछले सात साल से वह बस एक ही तो काम करता आ रहा है- मैदानों, जंगलों और रेगिस्तानों में घोड़ा दौड़ाना, न जाने बीच में कितनी बार घोड़ा बदलना और चिट्ठियों का यह पुलिंदा लाकर मेरे हाथ में रखना, जिसे अब इतनी रात गये खोलने की मेरी कोई इच्छा नहीं है. वह आकर बिस्तर पर पड़ गया है, क्योंकि कल पौ फटने के साथ उसे रवाना हो जाना है.

    यह उसकी आखिरी रवानगी होगी. मैंने अपनी नोटबुक में हिसाब लगाकर देख लिया है कि अगर सब-कुछ सही-सलामत रहे, अगर अब तक की तरह ही मैं अपनी यात्रा जारी रखूं और वह अपनी यात्रा, तो मैं डोमिनीक को फिर चौंतीस साल से पहले नहीं देख पाऊंगा. तब मैं बहत्तर साल का हूंगा. मगर मैं अपने को बहुत ही थका-हारा अनुभव करने लगा हूं और तब तक अवश्य मौत ने मुझे आ पकड़ा होगा. तो मैं उसे फिर कभी देख न पाऊंगा.

    चौंतीस वर्षों में-नहीं उससे भी पहले भी पहले, काफी पहले-डोमिनीक अचानक ही मेरे शिबिर की धूनी देखेगा और आश्चर्य करेगा कि यह क्या बात है कि राजकुमार ने इतने सारे वर्षों में इतने कम वर्ष तै किये हैं! आज की ही तरह तब वह मेरे तंबू में प्रवेश करेगा-वर्षों पुरानी पीली पड़ी हुई और गुजरे जमाने की बेमानी खबरों से भरी चिट्ठियां लिये हुए. मगर यह देखकर कि मैं अपने पलंग पर अचल और मृत पड़ा हुआ हूं और मेरे दोनों ओर दो सैनिक मशालें थामे खड़े हैं, वह दरवाजे पर ही ठिठककर खड़ा रह जायेगा.

    परंतु फिर भी डोमिनीक, तुम रवाना हो जाओ, और मुझ पर क्रूरता का इल्जाम मत लगाना. मेरा अंतिम अभिनंदन ले जाओ, उस नगर को जहां मैं जनमा था. तुम्हीं एकमात्र अवशिष्ट कड़ी हो मेरे और उस लोक के बीच, जो कि कभी मेरा था. ताजातर पत्र बताते हैं कि बहुत कुछ बदल गया है- मेरे पिताजी मर चुके हैं, राज्यसत्ता मेरे सबसे बड़े भाई के हाथ पहुंच चुकी है, मुझे सदा के लिए गुमशुदा समझा जा रहा है, और जहां पहले ओक के वृक्ष थे, जिनके नीचे मैं खेला करता था, वहां अब पत्थर के विशाल प्रासाद बनाये जा रहे हैं. मगर फिर भी वह मेरी पुरानी निवास-भूमि है. डोमिनीक! तुम उसके साथ मेरी आखिरी कड़ी हो. पांचवा संदेशवाहक एमिली, जो अगर परमात्मा ने चाहा तो एक साल आठ महीने बाद वापस आयेगा, दुबारा रवाना नहीं हो सकेगा. उसके यहां आकर लौटने लायक वक्त नहीं बचेगा. सो तुम्हारे बाद डोमिनीक, बस चिरमौन! अगर मैंने सीमा को खोज लिया, तो और बात है.

    मगर जितनी ही लंबी यात्रा करता हूं, उतना ही मुझे विश्वास होता जाता है कि सीमा है ही नहीं. मुझे शक है कि कोई सीमा नहीं है कम-से-कम उस अर्थ में तो नहीं, जिस अर्थ में हम इस शब्द को समझते हैं. वहां मेरी राह रोकने वाली कोई विभाजक दीवार नहीं है, कोई गहरी घाटी नहीं है, कोई पहाड़ नहीं है. शायद मैं सीमा को पार कर जाऊंगा और मुझे पता भी नहीं चलेगा और अज्ञानवश आगे बढ़ता चला जाऊंगा.

    इस कारण मेरा इरादा है कि भविष्य में जब एमिली और दूसरे संदेशवाहक लौटेंगे, वे राजधानी को नहीं प्रस्थान करेंगे, बल्कि उलटी दिशा में चल पड़ेंगे और मुझसे आगे निकल जायेंगे, ताकि मुझे पता लग सके कि आगे क्या है. इधर कुछ समय से शाम को एक नयी व्यग्रता मुझे दबोचा करती है. यह उन सुखों की हसरत नहीं है, जिन्हें मैं पीछे छोड़ आया हूं, जैसी कि यात्रा के आरंभिक दिनों में उठा करती थी. बल्कि मैं उन अज्ञात देशों को  खोजने को अधीर हूं, जिनकी ओर मैं बढ़ा जा रहा हूं. मुझे इसका अधिकाधिक मान होता जा रहा है और अब तक मैंने यह बात किसी से भी नहीं कही है कि ज्यों-ज्यों मैं इस यात्रा की असंभावित समाप्ति की ओर बढ़ता जाता हूं, त्यों-त्यों, प्रत्येक दिन बीतने के साथ, एक विलक्षण ज्योति आकाश में चमकने लगी हैöऐसी ज्योति, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा है, सपनों में भी नहीं. जिन पहाड़ों और नदियों को हम पार करते हैं, उनकी परछाइयां मुझे नया आकार ग्रहण करती दिखाई देती हैं, और हवा न जाने किन अपशकुनों से भर उठी है.

    कल सांझ नयी आशा मुझे उन पहाड़ों की दिशा में और आगे ले जायेगी- पहाड़ जो अनजाने हैं और अभी रात की परछाइयों में छिपे हुए हैं. एकबार फिर मैं अपना तंबू समेट लूंगा, जबकि दूर-अतिदूर के उस नगर के लिए मेरा निरर्थक संदेश लिये डोमिनीक क्षितिज के उस पार अदृश्य हो जायेगा.

– दिनो बुज्जाती

(अनुवादः मैत्रेयी दत्ता) 

        (जनवरी 1971)

 

    

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