सरहदों को लांघतीं बाल कहानियां

  भुवेंद्र त्यागी  >   

एक राजा था, एक रानी थी, उनके चार राजकुमार थे…
सुंदरवन में भोलू भालू, नटखट
बंदर, चालाक लोमड़ी और बघेरा बाघ रहते थे…
एक बार गर्मी की दोपहर एक कौवे को ज़ोर से प्यास लगी…
दो बिल्लियों को एक रोटी मिली, तो वे उसके लिए झगड़ने लगीं…
एक मगरमच्छ की नज़र एक बंदर के मांस पर थी…
समंदर में मछलियों का एक परिवार रहता था…
एक बार एक घड़ियाल ने नदी में पानी पीने आये एक हाथी का पैर पकड़ लिया…
आसमान में एक सुंदर परी रहती थी….
एक लड़की को उसकी सौतेली मां बहुत सताती थी…

इस तरह की न जाने कितनी कहानियां, न जाने कितनी पीढ़ियां, न जाने कितनी सदियों से सुनती आयी हैं! इन तमाम कहानियों के पात्र, परिवेश, सीख और मनोरंजन दुनिया भर के बच्चों को एक-सी लय और कौतूहल में बांधे रहे हैं. कहानी सुनाने के तरीके भी एक से ही रहे हैं. कोई दादी-नानी परिवार के बच्चों को इकट्ठा करके कहानी सुनाती और बच्चे बिना पलक झपकाये, तन्मयता से कान लगाये, हुंकारा भरते हुए कहानी सुनते रहते. वे बच्चे बड़े हो जाते, फिर अपने बच्चों को वही कहानियां सुनाते, फिर उनके बच्चे उनकी जगह ले लेते, फिर उनके बच्चे, फिर उनके बच्चे… यह सिलसिला अनवरत चलता आ रहा है… शायद तब से, जब से मानव ने भाषा बनायी और शब्दों को पिरोकर कहानियां गढ़ीं. यही कारण है कि दुनिया भर के बच्चों के हिस्से में करीब-करीब एक-सी कहानियां आयीं. सभ्यताएं आयीं और गयीं, राजवंशों के उदय और पतन हुए, सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव हुए, युग बदले, नहीं बदलीं तो बच्चों की कहानियां ही नहीं बदलीं.

आखिर वह क्या वजह है, जो सदियों तक देशों-महाद्वीपों की सरहदों को तय करते-फलांगते ये कहानियां आज भी मौजूद हैं, भाषा में थोड़े-बहुत बदलावों के साथ, पात्रों के नामों में मामूली से हेर-फेर के साथ. यह आखिर क्या करिश्मा है, जो इन कहानियों को सार्वकालिक और सार्वभौमिक बनाये हुए है?

बाल साहित्य के शोधार्थियों ने इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने में काफी माथापच्ची की है. इस बारे में कई अवधारणाएं भी आयीं, मगर तर्कों की कसौटी पर कोई गगज्यादा न टिक सकी. अब एक शोध ने इस राज़ से पर्दा उठा दिया है. ब्रिटेन के डरहम विश्वविद्यालय के शोधार्थी डॉक्टर जमशेद तेहरानी ने पूरी दुनिया में सुनी-सुनायी जाने वाली ऐसी ही कुछ मिलती-जुलती कहानियों का अध्ययन करके निष्कर्ष निकाला है कि इन कहानियों में समानता की वजह सृष्टि के इतिहास और विकास के क्रम में मानव समुदायों का एक जगह से दूसरी जगह जाना है. इस परम्परा की शुरूआत आदिमानव के बाद के कबीलों के दौर में तब हुई होगी, जब ज़रूरी भोजन-पानी और सुविधाजनक व सुरक्षित आसरे की तलाश में मानव ने अनजान राहों पर अपने कदम बढ़ाये होंगे.

डॉ. तेहरानी की शोध कहती है कि मानव की आवाजाही के साथ-साथ बाल कहानियों का सफर भी शुरू हुआ. इसकी शुरूआत हुई होगी एशिया और यूरोप की सरहद पर. कुछ कहानियां एशिया से यूरोप की ओर गयीं और कुछ यूरोप से एशिया की ओर आयीं. तेहरानी ने इस संदर्भ में एक बाल कहानी का उदाहरण दिया है. वे कहते हैं-

‘बचपन में हममें से लगभग सभी ने एक बकरी की कहानी सुनी होगी, जो अपने बच्चों को इस हिदायत के साथ छोड़ गयी थी कि चाहे उन्हें कोई भी बुलाये, वे उसके आने तक घर का दरवाज़ा न खोलें. पास में ही छिपे एक भेड़िये ने उसकी बात सुन ली. बकरी के जाते ही उस भेड़िये ने बकरी की आवाज़ में उसके बच्चों को पुकारा. बच्चों ने यह सोचकर दरवाज़ा खोल दिया कि उनकी मां लौट आयी है. भेड़िया बच्चों को खा गया. स्कूल जाने की उम्र में यही कहानी ‘लिटिल रेड राइडिंग हुड’ (हिंदी अनुवाद ‘नन्ही लाल चुन्नी’) में पढ़ने को मिलता है.

इस कहानी में भेड़िया एक नन्हीं बच्ची की नानी का रूप धरकर आता है. ये दोनों कहानियां दरअसल एक ही हैं. यूरोपीय देशों में भेड़िये की नज़र बकरी के बच्चों पर है, तो भारत में नानी की नाती पर. डॉ. तेहरानी ने पाया कि यह कहानी मामूली बदलावों के साथ दुनिया भर में 72 रूपों में मौजूद है. कहानी का भोला पात्र कहीं बकरी है, कहीं लड़की तो कहीं किसी और जानवर का मासूम बच्चा. यह बच्चा कहीं एक है, कहीं दो, तो कहीं तीन. खलनायक कहीं भेड़िया है, कहीं बाघ, तो कहीं राक्षस. कहीं वह मां का रूप धरकर आता है, कहीं नानी का, तो कहीं दादी का. बच्चों को बहकाकर अपना उल्लू सीधा करने के लिए वह कहीं आवाज़ बदलता है, कहीं पूरा वेश और कहीं अपने असली रूप में ही आता है. वह तरह-तरह की तरकीबें आजमाता है. कहीं वह अपने मकसद में कामयाब होता है, तो कहीं सही समय पर मिली किसी मदद की वजह से बच्चे बच भी जाते हैं. इस कहानी से बच्चों को यह सीख मिलती है कि बड़ों की बात हमेशा माननी चाहिए, कभी किसी अजनबी पर भरोसा नहीं करना चाहिए और अपने दिमाग का इस्तेमाल करना चाहिए.

डॉ. तेहरानी ने कहानी के इतिहास को खंगालने के लिए कंप्यूटर विज्ञान की मदद ली. उन्होंने जीवविज्ञान में इस्तेमाल होने वाला वंशवृक्ष का तरीका अपनाया. इसके अनुसार, सबसे सरल संस्करण सबसे पुराना होता है और सबसे जटिल संस्करण सबसे नया. उन्होंने कहानियों के आंकड़े जीवों के विकास को जानने के काम आने वाले तीन विभिन्न प्रकार के कलन गणित में डाले. जीववैज्ञानिक यह तरीका जैव विकास से संबंधित समूहों या उनके वंशवृक्ष बनाने में इस्तेमाल करते हैं. यह तकनीक विभिन्न पांडुलिपियों के रिश्तों को जानने के भी काम आती है. बाइबल के अलग-अलग समय के संस्करणों का तारतम्य भी इसी तकनीक से स्थापित हुआ है.

डॉ. तेहरानी ने जीवविज्ञान की इस तकनीक के सहारे ही साहित्य में एकरूपता का कारण ढूंढ़ निकाला. उन्होंने यह विचार दिया है कि आज मौजूद गगज्यादातर कहानियां प्राचीन सिल्क रूट की राहों पर घूमते-फिरते एक जगह से दूसरी जगह पहुंची हैं. मगर उन्होंने इस सम्भावना से भी इंकार नहीं किया है कि जंगली जानवरों की कहानियां अफ्रीका से चली होंगी. उनका मानना है कि ‘वोल्फ एंड द किड्स’ 2000 साल पहले और ‘लिटल रेड राइडिंग हुड’ 1000 साल पहले लिखी गयी होगी. हालांकि पंचतंत्र में भी इसी तरह की कहानियां मौजूद हैं. उनका यह भी मानना है कि जब परियों की कहानियों के सफर की दिशा पता चल जायेगी, तो मानव के प्रवास मार्ग के रहस्य पर से भी परदा उठ जाएगा.

बच्चों का मन बहलाने, उन्हें नैतिक शिक्षा देने, उनमें साहस, धीरज, मर्यादा, स्वाभिमान, दूसरों का सम्मान और चरित्र निर्माण जैसे गुण भरने के लिए मानव इतिहास में समय-समय पर जिन कहानियों को रचा गया, आखिर वही कहानियां एक दिन मानव इतिहास को निर्धारित करने में मदद करेंगी. इन कहानियों के रचयिताओं ने शायद इसकी कल्पना भी न की होगी… मगर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कहानियां होती ही हैं कल्पनाओं से परे! वे तो एक अलग ही संसार रचती हैं. वे कभी उस संसार को भी पुनः सृजित करेंगी, जिससे हम सहस्राब्दियों दूर आ चुके हैं!

(जनवरी 2014) 

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