समष्टि कामना की सामूहिक अभिव्यक्ति   – लक्ष्मीकांत वर्मा

महाशिवरात्रि

तमस तांडव का लोक में एक और रूप पाया जाता है जिसका नाम ही प्रेरणा है. इसमें प्रपन्न नृत्य के सभी अंगहारों और पदों, गतियों भ्रामरी की चाल अधिक सरल और सुगम रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं.

तमस नृत्य के बाद दूसरा प्रधान नृत्य योग नृत्य माना जाता है. इसका दूसरा नाम प्रदोष है. यह प्रदोष नृत्य शिव शक्ति को प्रतिष्ठित करके करते हैं. यह शिव शक्ति के योग का नृत्य है इसलिए कुछ आचार्य इसे योग नृत्य भी मानते हैं. त्रिपुरा सुंदरी को स्वर्ण सिंहासन पर बैठा कर शिव यह नृत्य करते हैं. अनेक मणियों-माणिक और मुक्ता से सजे-सजाये इस सिंहासन पर जब त्रिपुर सुंदरी शक्ति रूप बैठती है तो सारा वातावरण जगमगा जाता है. सारे देवी-देवता यह नृत्य देखने के लिए कैलाश पर्वत पर आ जाते हैं. सरस्वती अपनी वीणा बजाने लगती हैं. इंद्र अपनी बांसुरी के स्वर से वातावरण को गुंजित कर देते हैं. ब्रह्मा मंजीरा बजाने लगते हैं और इस पूरे साज-सज्जा से त्रिपुर सुंदरी को प्रसन्न करने के लिए शिव अपना नृत्य प्रारम्भ करते हैं.

इस नृत्य में शिव के केवल दो हाथ हैं और वह कैलाश पर्वत के ऊपर कठोर भूमि पर नृत्य करते हैं. इस नृत्य में उनके पैरों के नीचे कोई असुर नहीं है और न शिव के नृत्य में वीभत्स और भयंकर रस है. वीर रस अपने उदात्त स्वरूप में वर्तमान है. भैरव और वीरभद्र भी इसमें स्तुति मुद्रा में है क्योंकि परम तत्त्व पराशक्ति से योग और शक्ति अर्जित करने के लिए यह नृत्य करता है. ऐसा लगता है कि महाकाल स्वयं त्रिपुर सुंदरी, मूला शक्ति की करुणा को द्रवित करने के लिए यह नृत्य करते हैं. त्रिपुरा सुंदरी का जो भाव इस नृत्य में है वह त्रैलोक्य जननी का है. त्रैलोक्य को ईश्वर स्वयं अपने ही अर्धांग को मातृ-शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करके स्वयं अपने लिए मातृ-शक्ति को टिकाता-सा लगता है. शिव का यह तांडव पूर्णतः नैसर्गिक है और समष्टि कामना की सामूहिक अभिव्यक्ति है.

इस पूरे रूपक का सूक्ष्म स्वरूप भीतर निरंतर प्रतिष्ठित होता रहता है. हम जो निरंतर तमस और सत्त्व के द्वंद्व में डूबे रहते हैं, स्वयं अपने अंतर-जगत में मातृ शक्ति को प्रतिष्ठित करके उसे वत्सल रूप में जागृत करते रहते हैं. हमारे अंतर का सर्जक, इंद्रिय जगत, संग्रह भाव, हमारे ज्ञान की वाणी स्वरूप, भीतर का लक्ष्मी भाव- ये सब के सब त्रिपुर सुंदर त्रैलोक्य जननी के आह्वान के साथ जागृत हो जाते हैं. वास्तव में यह आत्म यज्ञ ही प्रदोष तांडव, योग तांडव है. कैलाश हमारी नैसर्गिक आकांक्षा है. सिंहासन हमारा निर्मल मन है. गोधूलि की लालिमा हमारा कौतुहल भरा राग है और डूबता सूर्य हमारा प्रखर अहंकार है. प्रदोष वह संधि है जहां तमस सत्त्व में बदलता है.

तांडव नृत्य का तीसरा स्वरूप नादांत तांडव है. कहते हैं एक बार विष्णु अतिशेष अर्थात काल स्वरूप शेषनाग के साथ कैलाश पहुंचे. वहां देखा शिव नितांत रौद्र भाव में कहीं के लिए प्रस्थान कर रहे हैं पूछने पर शिव ने बताया कि वह ताराग्राम जा रहे हैं. वहां कुछ मीमांसा प्रधान ऋषि नास्तिकता फैला रहे हैं. उनका नाश करना है. विष्णु और अतिशेष ने प्रार्थना की कि वह भी चलेंगे. उस यात्रा में विष्णु ने स्त्राr रूप में और अतिशेष ने पुरुष में शिव के साथ ताराग्राम में प्रवेश किया. वहां ऋषियों ने इन तीन व्यक्तियों को देखा तो शंका में पड़ गये. उन्होंने इनको समाप्त करने के लिए नाग को आहूत किया. शंकर ने नाग अपने गले में लपेट लिया. फिर उन्होंने एक बार हाथी भेजा. शंकर ने उस हाथी का चमड़ा खींच लिया और उसे धारण कर लिया. सिंह भेजा तो उसे मार कर उन्होंने अपना आसन बना लिया. अंत में उन्होंने एक बौने दैत्य को आहूत करके शिव का विनाश करने के लिए भेजा. शिव ने उस दैत्य को अपने पैरों के अंगूठे के नीचे गिरा दिया. गिरने के बाद उस पर खड़े होकर शिव ने तांडव नृत्य करना प्रारम्भ किया. यह नृत्य इतना भयंकर और विकराल था कि उससे सारा संसार ध्वस्त होने लगा. दिशाओं से आग निकलने लगी. पहाड़ कम्पायमान हो गये और ताराग्राम में भूचाल आने लगा. यह दशा देख कर ऋषियों ने शिव की बड़ी प्रार्थना की. अपराध के लिए क्षमा मांगी और ईश्वर की सत्ता स्वीकार करके यथावत देव सत्ता को स्वीकार किया.

जब सारा नृत्य समाप्त हो गया तब अतिशेष ने शिव की स्तुति की वे यह एक बार फिर देखना चाहते हैं. शिव ने कहा तिल्लई शैली का यह तांडव वह कुछ काल बाद चिदम्बरम मंदिर में करेंगे. अतिशेष और विष्णु आश्वस्त होकर उस घड़ी की प्रतीक्षा करने लगे, जब शिव चिदम्बरम के इस नृत्य को पुनः करेंगे. कथा के अनुसार चिदम्बरम में काली की प्रतिष्ठा थी. काली के उपासक शिव को नकारने लगे तब शिव काली  के चिदम्बरम मंदिर गये. स्वयं काली को अपना भाव बताया. काली ने शिव से अपने साथ नृत्य करने के लिए कहा. स्वयं काली तमस तांडव में निपुण थीं. शिव ने जितने भी कर्ण, अंगहार, भ्रामरी आकाशचारी गतियों का प्रदर्शन किया काली ने सब करके दिखा दिया. अंतिम चरण में शिव ने अपने पैर को सिर पर रख कर नृत्य करना प्रारम्भ किया. काली का दिगम्बर रूप उस मुद्रा का अनुकरण करने में हिचक गया. बस काली चिदम्बरम मंदिर से बाहर हो गयी और शिव वहां प्रतिष्ठित हो गये. आज भी चिदम्बरम मंदिर के बाहर काली का मंदिर है. लोग काली की पूजा करके शिव की पूजा करने मंदिर में जाते हैं.

इस पूरे कथा रहस्य का एक आध्यात्मिक अर्थ भी है. यहां तिल्लई का अर्थ मनुष्य के हृदयगुहा में स्थित रजस, तमस और सत्त्व भाव है. इनसे एक अहंकार पैदा होता है और उस अहंकार में शिव का भाव लोप होने लगता है तो स्वयं अंतस का शिव भाव यह नृत्य करता है. अंतस का विष्णु भाव और महाकाल भाव इस नृत्य के साक्षी होते हैं और काली का मूल कोमल भाव कैसे स्वतः शक्ति में उत्पन्न होता है इसकी पूरी व्याख्या की जा सकती है.

इस नृत्य के मुद्रा में शिव के पांचों भावों में चार भाव प्रधान हैं. उद्भव, स्थित, संहार और अनुग्रह इन प्रदर्शनों में व्यक्त होता है. नीचे बायें हाथ में त्रिशूल है जो तिरछा होकर शिव के शरीर में लगा है. दाहिने  पैर के नीचे बौना दैत्य धराशायी है और बायां पैर दाहिने पैर के घुटने तक उठा हुआ है. नादांत या तिल्लई नृत्य के तांडव की व्याख्या अनेक रूपों में की जा सकती है पर मूल भाव है शिवत्त्व की रक्षा.

काली के तांडव का एक रूप जिसमें काली शिव के वक्षस्थल पर पैर रखकर नृत्य करती है बड़ा मार्मिक है. कहते हैं सृष्टि विलास से थक कर शिव उदासीन और निष्क्रिय हो गये. शिव को उनकी अपनी लीला में फिर अवस्थित करके उनकी निष्क्रियता और उदासीनता को समाप्त करने के लिए स्वयं शिव के अंतस से काली प्रकट होती हैं और उनके वक्ष पर तांडव करके शिव को फिर अपनी सृष्टि में रुचि पैदा करती हैं. फिर विश्व की सृष्टि में जो हाहाकार मचा रहता है उसे शांत करती हैं.

शिव का स्वरूप नित्य अनादि और अनंत है. वह आदि से अंत तक दैविक है. शिव ही हमारे अंतस में व्याप्त तमस को सत्य प्रदान करते हैं. तांडव उसी तमस को सृजन में बदलने का नृत्य है. 

मार्च 2016     

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