इन दिनों

  • इन दिनों
  • बेहद ज़रूरी है
  • बचाये रखना कुछ शब्दों को
  • बड़े जतन से
  • जैसे बचायी जाती है खड़ी फसल
  • जंगली जानवरों से
  • हांका लगाकर.

 

  • जैसे बचाये जाते हैं
  • दाल और मसाले
  • सीलन और घुन से
  • चटख धूप की चादर में फैलाकर
  • जैसे बचाते हैं
  • रंगीन कपड़ों की रंगत को
  • छाया की ओट में सुखाकर
  • जैसे बचा ही लेते हैं आप
  • अपनी पगार से कुछ छिटपुट चिल्लर
  • अपनी तमाम-तमाम ज़रूरतों को
  • बेहद चालाकी से घिस्सा देकर.

 

  • वैसे ही ज़रूरी है
  • बचा लिये जायें कुछ बेहद धूपीले शब्द
  • ताकि धूल में तब्दील होने से पहले
  • बचाये जा सकें वे चेहरे
  • जो तल्ख हवा और बदनाम समय से
  • चाटे जा रहे हैं दीमक की तरह.
  • कि बचा लिये जायें वे शब्द
  • जो लौटा सकें
  • बुझते चेहरों की रंगत
  • खिलते फूल की तरह
  • जो फैल जायें
  • खुशबू की तरह
  • सूखती नसों और मुरझाई रगों में.

 

  • सचमुच ही बचाये जाने चाहिए वे शब्द
  • जो अपनी ताकत से खींच सकें
  • ढेर-सी हिम्मत और चाहत
  • और लौटा दें वापिस
  • झमाझम बरसात की शक्ल में.

डॉ. मृदुला जोशी

(January, 2013)

1 comment for “इन दिनों

  1. समर नाथ मिश्र
    April 28, 2019 at 3:12 pm

    बहुत सामयिक व प्यारी रचना ।
    ऐसे समय मे जब साहित्य भाषायी संकरण और अतिवादी संक्रमण काल से गुजर रहा है , साहित्यिक शुचिता का संरक्षण महत्वपूर्ण है ।

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