वसंत के बीजों पर डाका पड़ा है – ध्रुव शुक्ल

आवरण-कथा

लगता है कि सारा जीवन ग्रीष्म से शुरू होकर वसंत तक यात्रा करने जैसा है. ग्रीष्म ऋतु नया जन्म लेने की तैयारी के लिए ही धरती पर आती है. संवत्सर की शुरुआत इसी ऋतु से होती है जब सूर्य धरती से जल उठाकर गगन मण्डल में स्थापित करता है और लोक सर्जक मेघ धरती पर अवतरित होने के लिए व्याकुल हो उठते हैं. जल के विरह में आकुल धरती उनकी बाट जोहती रहती है. जीवन की सारी सम्भावना धरती पर आर्द्रता की वापसी में ही छिपी हुई है. देखते ही देखते पूरी प्रकृति जल की लय-ताल और उसमें बसे छंद पर नाचने-थिरकने लगती है. वर्षा अपनी बिजलियों की पताकाएं फहराती और नगाड़े बजाती हुई धरती में पानी बोती है. तभी तो किसान धरती पर अपने हल की नोक से जीवन पर उपकार करने वाली रेखाएं खींच पाते हैं, जिनमें बीज बसेरा करते हैं और उनके भीतर छिपा बहुरंगी जीवन अपनी पलकें खोल देता है. फिर शरद ऋतु में धरती नयी ब्याही बहू की तरह लगने लगती है. पकता हुआ धान देखकर लगता है जैसे धरती सबका घर चलाने की तैयारी में मगन है. फिर होता है धरती को पाले की चादर ओढ़ाती हेमंत ऋतु का आगमन. गेहूं के दानों से फूटते अंकुर और दूर्वा, धरती को हरीतिमा से भर देते हैं. जब हौले-हौले धान के लहलहाते खेतों के बीच सबको ठिठुराती शिशिर ऋतु आती है तो सारा जीवन फिर धूप खोजने लगता है. तभी तो गुनगुनी धूप लिये, टेसू के फूलों से वनों में आग दहकाता, हवा में सुगंध भरता, सुहानी शामें और लुभावने दिन लिये, फूलों में खिला और आम के बौरों से लदा वसंत सबके जीवन में प्रकृति के उपहार की तरह प्रवेश करता है. सबके साथ होली खेलता है. एक उछाह और उल्लास के रंगों की होली. जीवन जैसे खिल-सा जाता है.

प्रभुता और प्रकृति का सम्बंध प्रेमी और प्रेमिका जैसा जान पड़ता है. यह प्रेम वसंत के उल्लसित रंगों में सदा से रंगता आया है. मनुष्य की प्रभुता को भी धरती पर प्रतिष्ठित होने के लिए उज्ज्वल प्रकृति का आंगन चाहिए जिसमें वसंत बहुरंगे चौक पूरता है. पृथ्वी पर देवता सबके उपकार के लिए ऐसे ही आंगन में उतरते हैं. पर हमारे समय के बाज़ारू विश्व-प्रभु प्रकृति को प्रेयसी की तरह नहीं, रखैल की तरह बरत रहे हैं और धरती के उर्वर आंगन को बहुराष्ट्रीय कोठों में बदल रहे हैं. ये विश्व-प्रभु यह भूल ही गये हैं कि संसार एक बड़ा प्रजा-क्षेत्र है जिसमें मनुष्य सहित सभी प्राणियों की भागीदारी है. सभी प्राणी ऋतुओं के सहयोग से अपनी-अपनी योग्यता के अनुरूप उत्पादन और विनिमय में सदा भागीदार होते आये हैं. यह दुनिया की बहुत बड़ी पार्टनरशिप है जिसे स्वार्थपूर्ण निजी क्षेत्र के बाड़ों में समेटकर नहीं रखा जा सकता. पृथ्वी एक प्रजा-क्षेत्र है जो परमार्थ से ही चलता आया है, उसे स्वार्थ से नहीं चलाया जा सकता. नहीं चलाया जा सकेगा.

प्रत्येक संवत्सर में वसंत के रसपूर्ण उपहार बोतलों और डिब्बों में भरकर गोदामों में कैद कर लिये जाते हैं. वे बेस्वाद और बासी होकर बाज़ार में आते हैं और घर तक आते-आते ज़हरीले हो जाते हैं. बाज़ारू विश्व-प्रभुओं को देखकर लगता है कि जैसे सारी ऋतुएं उनकी नौकरानियां हैं जो उनकी तिजोरी भरने के लिए हर साल आती हैं. विश्व-प्रभु अक्सर भारत उद्यान यात्रा पर आया करते हैं. उनके आगमन पर हमारे राजकीय प्रासादों में ऐसी धूम मचती है जैसे बौराये वसंत के बीच कामदेव उद्यान-यात्रा के लिए आये हों. फूलों से लकदक इन प्रासादों में लुका-छिपी का ऐसा खेल खेला जा रहा है कि वसंत को कहां बेच दिया गया, किसी को पता ही नहीं चलता. ये आउटसोर्सिंग करने वाले छलिया उद्यान-यात्री वसंत के उपहारों को बेरहमी से निचोड़ने का कुचक्र रच रहे हैं और विडम्बना यह है कि इस कुचक्र की जड़ें और गहरी करने में भारत-उद्यान के रखवालों को ज़रा भी शर्म नहीं आ रही है.

दुनिया के बाज़ारों में भारत-उद्यान की बोली बड़ी ऊंची आवाज़ में लगायी जा रही है. वन-उपवन उजड़ते चले जा रहे हैं तो अब पेड़-पौधों को ठिगना बनाकर गमलों में रोपा जा रहा है. सजल-सफल प्रकृति की गहराई को उथला और ऊंचाई को बौना बनाकर प्रकृति सौंदर्य का भी व्यापार चल निकला है. ऊंचे-ऊंचे वृक्षों को घर और सड़कें बनाने के लिए रास्तों से ऐसे हटाया जा रहा है, जैसे दुश्मन हों. मज़े की बात यह है कि फिर उनसे बौनी मैत्री करके उन्हें गमलों में सजाकर कमरों में रख दिया जाता है. ये बौने वृक्ष भी फल देते हैं. लोग उनके किस्से बढ़-चढ़कर पड़ोसियों को सुनाते हैं, पुरस्कार जीतते हैं. कोई उनकी छाया की चर्चा नहीं करता. वृक्षों की छाया से हीन मकानों में बौने वृक्षों के साथ रहते लोग कितने बौने दिखाई देने लगते हैं! त्रासदी यह भी है कि इन्हें इस बौनेपन का अहसास भी नहीं होता!

वसंत के उपहार निर्भय होकर खुले में खिलते हैं. वे दंगाग्रस्त इलाकों, कर्फ्यू से भरी बस्तियों और सुदूर वनों में एक साथ फूलते-फलते रहते हैं. उन्हें बाज़ारों में किस कीमत पर बेचा जायेगा, किन कारखानों में पीसा जायेगा, कहां और किस घर में उनकी चटनी और मुरब्बा बनेगा और किस जूठन के घूरे पर वे फेंक दिये जायेंगे, इससे बेखबर और बेखौफ होकर वे दुनिया को पाल-पोसकर जीने लायक बनाये रखते हैं. वसंत को ईश्वर का घर कहा गया है. वह वसंत के उपहारों में बसकर पूरे जीवन को पालता-पोसता है. ईश्वर एक बीज जैसा है जो पूरी पृथ्वी पर तरह-तरह की छाया, खुशबू, रंग और रस सबके लिए रचता है.

आज दुनिया में वसंत के बीजों पर डाका पड़ा है. ज्ञानी सदा सचेत करते आये हैं कि ऐसी लूट से भरी दुनिया दीर्घजीवी नहीं होती. एक दिन ईश्वर अपने सारे बीजों को किसी नौका में रखकर दूसरी पृथ्वी की खोज में निकल पड़ता है.

फरवरी 2016

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