वनस्पति-लोक का विदूषक

              ♦   डॉ. अंबिका प्रसाद दीक्षित     

      उच्च श्रेणी के वनस्पति-समुदाय में शायद सबसे अजीब शक्ल-सूरत कैक्टसों की होती है. बहुधा ये कांटों से लदे होते हैं और कभी-कभी अत्यंत खूबसूरत फूल इनमें लगते हैं. अजब विरोधाभास है.

     रूप के कारण यदि इन्हें विदूषक कह सकते हैं, तो इनके स्वभाव के कारण इन्हें तपस्वी भी कहा जा सकता है. प्रायः ये मरुस्थलों में तप करते हुए दिखाई पड़ते हैं. वास्तव में बात यह है कि कैक्टस अपने मांसल शरीर के भीतर पानी इकट्ठा रखने का पूरा प्रबंध रखते हैं, इसलिए रेगिस्तानों में भी हरे-भरे रहते हैं. चूंकि सूर्य का प्रकाश इनके लालन-पालन के लिए अत्यावश्यक होता है,  इन्हें  ‘सूर्य के बच्चे’ (चिल्ड्रन आफ द सन) की भी संज्ञा दी गयी है.

     कैक्टस के बारे में उपलब्ध सबसे पुराना विवरण कोरोनाडो का दिया हुआ है. यह विवरण 1540 का है, जब नयी दुनिया की खोज हुई ही थी. कैक्टस का उद्गम-स्थल भी अमरीका माना जाता है. वहीं से ये जहाजी बेड़ों द्वारा यूरोप लाये गये, फिर अन्य स्थानों पर इनका फैलाव हुआ.

     पश्चिमी गोलार्ध में ये उत्तर में कनाडा से लेकर मध्य अमरीका और वेस्ट इंडीज होते हुए पैटागोनिया तक पाये जाते हैं. नाटकीय आकार के इन पौधों की लगभग 5,000 जातियों का अब तक पता चला है.

     लाखों वर्ष पूर्व, सारा अमरीका महाद्वीप झीलों, नम जंगलों एवं नाना प्रकार के वनस्पतियों से ढंका हुआ था. धीरे-धीरे पृथ्वी और उसकी जलवायु में परिवर्तन हुआ, वर्षा की कमी से ये स्थान रेगिस्तान में परिवर्तित होने लगे. इस महान परिवर्तन के दौरान वनस्पति समुदाय को भी अस्तित्व के लिए होड़ करनी पड़ी और वही वनस्पतियां बच सकीं, जिन्होंने अपने को परिस्थितियों के अनुकूलन ढाल लिया.

     शुष्क वातावरण में पलने के लिए कुछ वनस्पतियों ने अपने शरीर को ऐसा बना लिया कि उनके भीतर का बहुमूल्य पानी जल्दी भाप बनकर निकल न सके. इसके लिए उन्होंने अपनी पत्तियों की संख्या कम कर ली एवं उनका आकार भी छोटा कर लिया. कुछ में तो पत्तियां बिलकुल ही समाप्त हो गयीं. इसके साथ-साथ पौधे का तरल भाग गाढ़ा होकर दूध-जैसा बन गया.

     तना विशेष रूप से मोटा हो गया, जिससे उसमें अधिक-से-अधिक पानी इकट्ठा हो सके. शरीर में कई कोने बन गये, ताकि किसी भी भाग पर अधिक देर तक सीधी धूप न पड़े. मोटे तने में भोजन बनाने वाले ऊतकों का जमाव हो गया और वे स्वयं भोजन बनाने का काम करने लगे. भक्षक जीवों से अपनी मासंल काया की रक्षा के लिए उन्होंने कांटों का कवच पहन लिया. इस तरह उस विलक्षण और रोचक वनस्पति-समुदाय का विकास हुआ जिसे ‘कैक्टस’ कहा जाता है.

     सभी कैक्टसों का एक प्रधान लक्षण होता है ‘एरिओल’, जो पौधे के पोरों का ही दूसरा रूप है. नयी शाखाएं (यदि कोई हों) कांटे, बाल इत्यादि यहीं से निकलते हैं.

     शास्त्राrय दृष्टि से कैक्टस कुल को मुख्यतया तीन वर्गों में विभाजित किया गया है- पेरेस्की, ओपन्सी और सेरी.

  1. पेरेस्की में आदिम रूप कैक्टस आते हैं, जो जंगली वृक्षों से काफी मिलते-जुलते हैं. ये कैक्टस प्रायः झाड़ी या लता के आकार के होते हैं और इनमें जंगली गुलाब की भांति एक साथ बहुत फूल लगते हैं. इनमें कांटे तो होते हैं, पर नुकीले मुड़े हुए शूल (स्पाइन) नहीं पाये जाते.
  2. ओपन्सी का प्रधान लक्षण है ‘एरिओल’ के पास ‘ग्लाकिड्स’ या ‘ब्रिस्टिल’ का पाया जाना. इस वर्ग के कैक्टसों में तने मांसल, गोल या चटपटे आकार के तथा एक दूसरे से इस तरह जुड़े हुए होते हैं कि किंचित दबाव से अलग हो जाते हैं, पर ‘रिब्स’ नहीं होती. पत्तियां सामान्यतया नहीं होतीं और यदि होती भी हैं, तो रूपांतरित होती हैं और मौसम के अनुसार गिरती रहती हैं. फूल चक्रकार होते हैं. नागफनी इसी वर्ग में आती है.
  3. सेरी वर्ग के सदस्यों का खास लक्षण है इनके शरीर में ‘रिब्स’ और मांसल तनों की उपस्थिति तथा ग्लोब्स की लगातार बढ़वार. इनके एरिओल में ‘ग्लाकिड्स’ नहीं होते. साधारणतः फूल काफी सुंदर हेते हैं और सीधे-पौधे से जुड़े होते हैं. यह वर्ग काफी बड़ा है. छोटे से लेकर वृक्षाकार कैक्टस तक इसमें आते हैं. रेगिस्तान में उगने वाले, पहाड़ों पर पाये जाने वाले एवं उष्णकटि-बंधीय प्रदेशों में पराश्रयी रूप में पाये जाने वाले कैक्टस इसमें शामिल हैं. शास्त्राrय दृष्टि से इसे आठ अनुभागों में विभाजित किया गया है. मगर उनकी तफसील में जाना आवश्यक नहीं.

कुछ खास कैक्टसः

     मैमिलेरिया- इनमें शोख रंग के ढेरों फूल लगते हैं. प्रायः ये गोल या लम्बोतर आकार के छोटे कैक्टस होते हैं. इनकी जरा अधिक देखरेख करनी पड़ती है. इनकी कुछ जातियां गोल खरबूजे की शक्ल की होती हैं, चोटी पर गोलाई में फूलों का गच्छा लगने पर ये बड़ी खूबसूरत लगती हैं. इस प्रकार की कुछ प्रसिद्ध जातियां हैं- जिमनों कैलीसियम, जिमनोप्लेटेंस, विलिमम साई इत्यादि. कुछ नाम बड़े मज़ेदार हैं- मैडम विलडाई, मैडम शिल्हासी.

     सेरी- ये फैलने वाले कैक्टस हैं तथा सामान्यतया वृक्षों के सहारे बढ़ते हैं. इनमें सुंदर आकार के सफेद, लाल एवं पीले रंग के फूल लगते हैं. इसी वर्ग का एक कैक्टस हैं, ‘सेलेनिसेरियस ग्रेंडीफलौरा’ जिसके फूल प्रायः आधी रात को खिलते हैं तथा सूर्योदय होते-होते मुरझा जाते हैं.

     इकाइनोफ्सिस- इनमें कीप (फनेल) के आकार के सफेद, गुलाबी तथा पीले फूल लगते हैं. इनका पालन काफी आसान होता है. पौधे का आकार गोल होता है.

     जाइगोकैक्कटस- ये ‘क्रिसमस कैक्टस’ के नाम से जाने जाते हैं. अनेक रंग के खूब फूल देने वाले ‘फिललोकैक्टस’ भी इनमें शामिल हैं.

     गृहोद्यानों में कैक्टस उगाना स्थान एवं जलवायु पर बहुत कुछ निर्भर रहता है. मांसल शरीर के होने के कारण अधिकांश कैक्टस विपरीत परिस्थितियों में भी जी लेते हैं और काफी उपेक्षा भी बर्दाश्त कर लेते हैं. शुष्क वातावरण के आदी कैक्टस को यदि महीनों पानी न मिले, तो अधिक-से-अधिक यही होगा कि वह दुबला-पतला हो जायेगा, उसकी वृद्धि रुक जायेगी. यदि उसे सूर्य के प्रकाश एवं खुली हवा से वंचित रखा गया, तो उसके रूप का आकर्षण समाप्त हो सकता है और सम्भव है फूल न निकलें, परंतु पौधा नहीं मरेगा.

     उचित पानी, धूप एवं खुली हवा तथा तनिक-सी खाद देकर कैक्टस से अत्यंत आकर्षक फूलों का उपहार पाया जा सकता है. कांटों से लदी काया के बीच फूल देखते ही बनते हैं.

     वसंत ऋतु में कैक्टस विशेष सक्रिय होता है. उस समय पौधों के लिए उचित प्रकाश एवं हवा का प्रबंध करना चाहिए. सूर्य की रोशनी में प्रखरता आने के साथ-साथ स्वस्थ पौधों को पानी की कुछ अधिक आवश्यकता होती है. स्वच्छ आकाश के दिनों में प्रातः काल का समय पानी देने के लिए उत्तम होता है. चूंकि इन दिनों पौधे बढ़ाव पर होते हैं, इसलिए इस समय उचित मात्रा में खाद देना भी अच्छा होता है. फास्पोरस एवं पोटाश खाद की अधिक आवश्यकता होती है.

     एक भाग दूमट मिट्टी, दो भाग पत्ती की खाद, एक भाग खूब सड़े हुए गोबर की खाद तथा एक भाग कंकड़- यह कैक्टस उगाने का अच्छा माध्यम है. गर्मी के दिनों में उषा के सूर्य का प्रकाश पौधों के लिए अधिक उपयोगी होता है. दोपहर की प्रखर धूप में ताप से पौधे के झुलसने का भय हो सकता है. यह देखा गया है कि मछली के चूर्ण एवं शैवाल की खाद से कैक्टस की वृद्धि तथा पुष्पोत्पादन खूब होता है. यदि सफेद बाल वाले कैक्टस (मैमिलेरिया और एस्ट्रोफिटम) उगाने हों, तो एक मुट्ठी चूना मिला दें.

     शुष्क प्रदेशों में, जहां की मिट्टी चूने, लवण, एवं जीवांश पदार्थ से युक्त होती है, कैक्टस की वृद्धि अधिक हो पाती है. पौधा मिट्टी से अपना भोजन उचित रूप से प्राप्त कर सके, इसके लिए मिट्टी का नम रहना आवश्यक है, पर जल की निकासी का प्रबंध ठीक-ठीक होना चाहिए.

     स्केली कीड़े और मिलीबग कभी-कभी कैक्टस के पौधों को परेशान करते हैं. इसका इलाज है, मैलाथियान के हल्के घोल का छिड़काव. छिड़काव दबावपूर्वक करना चाहिए, क्योंकि कीड़े भीतर की ओर छिपे रहते हैं. लाल मकड़ी भी कैक्टस के तनों को बदरंग करती पायी जाती है. हर तीसरे दिन इंड्रीन का छिड़काव करें. पौधे के किसी भाग में घाव हो जाये, तो वहां लकड़ी के कोयले का चूर्ण छिड़कना चाहिए.

(अप्रैल 1971)

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