लाल तिकोन

♦   अमृत राय      

    कल की कौन कहे, मैं तो यह भी नहीं जानता कि आज के दिन हिंदुस्तान की आबादी  कितनी है. कोई नहीं जानता. और तो और, इंदिरा गांधी भी नहीं जानतीं. एक विदेशी पत्रकार ने पूछ लिया, तो मुंह ताकने लगीं- और झट उनकी समझ में आ गया कि अब दस-बीस बरस में एक बार मर्दुमशुमारी करवाने से काम नहीं चलेगा, रोज़ मर्दुम-शुमारी होनी चाहिये, भले इस पर पचास करोड़ सालाना का खर्च आये, जैसा कि तखमीना कमेटी का खयाल है. बहुत ज़रूरी चीज़ है. अंधेरे में रहना ठीक नहीं. अपने को पता रहना चाहिए, हर रोज़… पानी कितनी तेज़ी से ऊपर चढ़ रहा है, कब घुटनों-घुटनों पानी था, फिर कब कमर तक पहुंचा, फिर कब सीने से आकर टकराने लगा,फिर कब गले को सहलाने लगा, फिर कब… यानी कि डूबने में अब कितनी देर है. खर्च की चिंता मत करो. खर्च तो लगा ही रहता है राजकाज में. यह खर्च न होगा, तो कुछ दूसरा खर्च होगा. इस कार्य के लिए एक महकमा होना पड़ेगा, जो मौसम का हाल बताने वाले डिपार्टमेंट की तरह रोज़ अपना बुलेटिन जारी किया करे… और जो अपने तथ्यों की प्रामाणिकता में उन मौसम वालों के भी कान काटे, जो धूप खिलने की बात कहते हैं, तो मूसलाधार पानी बरसता है…

    बिलकुल ठीक बात है. जब तक रोज़ाना मर्दुमशुमारी का यह महकमा कायम नहीं होता, सही तस्वीर अपने सामने नहीं आ सकती. यही समझिये कि पिछले आठ महीने से मैं इस मृगमरीचिका के पीछे भाग रहा हूं और जैसे-जैसे कुछ पास तक पहुंच पाता हूं कि वह और आगे खिसक जाती है. इस तरह तो मैं कयामत तक दौड़ता ही रहूंगा. क्योंकि यह तो ऐसी सदाबहार खेती है, जिसमें कभी कोई चूक नहीं होती, कोई साल छूंछा नहीं जाता, जैसा कि दूसरी खेतियों का दस्तूर है. कभी सूखा, तो कभी बूड़ा.

    यहां वह सब लफड़ा नहीं. हर साल दूनोंदून फसल ले लीजिये… और अगर हम इसी तरह तरक्की करते रहे, तो मुझे यकीन है कि वह दिन दूर नहीं, जब हम साल में तीन फसल काटेंगे और कम-से-कम इस एक पैदावार में सारी दुनिया से आगे निकल जायेंगे.

    इस बात से पता नहीं क्यों, अपनी सरकार की नानी मरती है! मेरे तो देशाभिमान में नयी-नयी कोंपलें फूटने लगती है. सचमुच कितने गौरव की बात है कि जहां और सब देश ईंट-पत्थर लोहे-लक्कड़ की चढ़ा-ऊपरी में लगे हैं- साल-भर में हमने इतनी मोटरें बनायीं, बोलो तुमने बनायी? हमने इतने कैमरे और टेपरिकार्ड और टेलिविजन सेट और कंप्यूटर बनाये, बोलो तुमने कितने बनाये?- वहां हम इन बेजान चीज़ों के मुकाबले में जानदार आदमियों की पैदावार बढ़ाने में लगे हैं. है कोई जो इसमें आगे जा सके हमसे? फिर क्या इस कदर बढ़-बढ़कर बातें करते हो, जबकि तुम भी जानते हो कि एक जीते-जागते आदमी के सामने तुम्हारा कंप्यूटर-कंम्प्यूटर कोई चीज़ नहीं.

    मगर यह रोजाना मर्दुमशुमारी वाला सिलसिला हमें जल्दी-से-जल्दी बैठाना पड़ेगा, क्योंकि उसके बिना अपनी बहुत हेठी हो रही है और हमें वह स्थान नहीं मिल रहा है, जिसके हम और कुछ नहीं तो अपनी संख्या के बल पर अधिकारी हैं. इसलिए मेरी भी यही राय है कि फौरन-से-फौरन यह महकमा कायम होना चाहिए- इसलिए नहीं कि हमें रोज़ पता रहे डूबने में अब कितनी देर है, जैसा कि अपनी सरकार का खयाल है, बल्कि इसलिए कि हमें रोज़-के-रोज़ मालूम होता रहे कि आज हम अपने गौरव के किस नये शिखर पर पहुंचे. लेकिन दुर्भाग्य से यहां तो आजकल सब तरफ ऐसे ही लोगों का राज है, जिनके लिए स्वर्गीय राष्ट्र के कवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है-

    जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,               वह नर नहीं नरपशु निरा है और मृतक समान है।

    कितनी सटीक बात कही! वह नर नहीं है, जो लाल तिकोने की बात करता है. होता, तो कभी ऐसा उलटा काम न करता, हद हो गयी, जिधर निकलो, जहां जाओ, लाल तिकोन विराज रहा है, जैसे कामदेव को जलाकर राख कर देनेवाला शंकरजी का तीसरा नेत्र. उसके सामने कौन ठहर सकता है! हम भी आगे बढ़ जाते हैं. पर वह मदन-दहन दृष्टि हमारा पीछा करती है कहती है, कहां आओगे मुझसे बचकर, मैं सर्वत्र हूं. गलियों में, सड़कों पर, तिराहों-चौराहों पर, पेड़ों पर, मकानों पर रेल्वे-प्लैटफार्म पर, बस-स्टैंड पर, कहीं शंकर के उस तीसरे नेत्र से त्राण नहीं.

    और सिनेमा के परदे पर लाल तिकोन का पदार्पण तो सबसे बड़ा अन्याय है. प्रेम के सनातन त्रिकोण की कहानी हमें आगे दिखायी जाने वाली है. उसी के लोभ से खिंचकर हम आये हैं और शहर के तमाम इक्के वालों, रिक्शे वालों की भीड़ में घुस-पिसकर धक्का-मुक्की करके हमने टिकट खरीदा है और आकर अपनी सीट पर बैठे हैं, इस इंतज़ार में कि अब तस्वीर शुरू होती है, रंगीन तस्वीर, बहुत-बहुत तरह से रंगीन… कश्मीर की घाटी… रंग-बिरंगे फूलों की बहार… नगीना झील का गहरा नीला पानी… हिमालय की धवल हिमाच्छादित चोटियां… बनारस की रंगीन सुबह … मालवे की रंगीन शाम… टोकियो और पेरिस की रंगीन रातें… और इस रंगीन परिवेश में पलता हुआ प्रेम का सनातन बंबइया त्रिकोण, जिसमें एक अनिंद्य रूपसी युवती है और एक उसका प्रेमी है. दोनों एक-दूसरे को जी-जान से प्यार करते हैं, जैसे प्रकृति की गोद में कुलांचे भरते हिरना-हिरनी… नायक गाता है- ‘बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं’, तो नायिका गाकर ही जवाब देती है- ‘होगा होगा होगा’…तीन बार, जैसा कि और सब कसमों की तरह प्यार की कसमों में भी होता है… हाय राम! कितनी जल्दी दोनों का मिलन हो जाये और फिर दोनों मिलकर अपने प्रेम का नन्हा-सा संसार बनायें… अपनी सीट पर बैठे-बैठे हमारा दिल बल्लियों उछलता रहता है कि जैसे वह हमारी ही कहानी हो, जो रुपहले परदे पर दिखायी जा रही है… लेकिन हम अनुभवी सिने-दर्शक हैं, इसलिए जानते हैं कि इतनी जल्दी दोनों का मिलन नहीं हो सकता. बाधा उपस्थित होगी, होगी, होगी. और उसी का नाम है खलनायक, भारतीय चित्रपट का प्राण… जो मंच पर आते ही नायक को खिसकाकर स्वयं लड़की को हथिया लेने की गरज से तरह-तरह के जाल रचता है, जिन्हें हम अनुभवी सिने-दर्शक तो देखते ही भांप जाते हैं. लेकिन नायक बेचारा इतना भोला है कि उसको समझते समझते जीवन के परदे पर महीनों, कभी-कभी बरसों (और सिनेमा के परदे पर एक घंटे) का समय लग जाता है. लेकिन तब फिर वह इस ज़ोर से फूटता है कि ज्वालामुखी भी क्या फूटेगा. प्रलय होने  में अब देर नहीं. क्योंकि हमारा यह नायक भोला-भाला प्रेमी ही नहीं, पराक्रमी वीर भी है, कोई उसके आगे ठहर नहीं सकता. खलनायक ने बड़ी भूल की जो उसके निरीह बहिरंग को देखकर उसकी प्रेमिका पर हाथ डाल बैठा. अब बच्चू को आटे-दाल का भाव मालूम होगा. ऊपर से बुद्धू दिखता है तो क्या, मगर हीरो सचमुच हीरो है… फिर दोनों में जो राम-रावण-युद्ध छिड़ता है, उसी में सब पैसा वसूल हो जाता है… पहाड़ की चोटी पर, समुद्र की तलहटी में, झुलसे हुए बियाबान रेगिस्तानों में, बीहड़ जंगलों में, जहां दिन को भी रात रहती है और हाथ को हाथ नहीं सूझता, कहीं छपछाप तलवारे चल रही हैं, कहीं भीम और दुःशासन के समान दोनों एक दूसरे से आमरण गूंथे हुए हैं, कहीं पेड़ के पीछे छिपकर गोली चलायी जा रही है… मोटरे अंधी-तूफान की तरह दौड़ रही हैं, न खाई की चिंता, न खड्ड की… और जहां मोटरों का बस न चले, वहां हवाई जहाजों में बैठकर दुश्मन का पीछा किया जा रहा है… खलनायक प्रेमिका को साथ लेकर पानी के जहाज से विलायत जा रहा है और नायक पनडुब्बी में बैठा उनका पीछा कर रहा है और नायिका जानती है कि नायक वहीं-कहीं है, उस अतल जल में उसकी मुक्ति के आयोजन में लगा हुआ, मौका मिलते ही ऊपर आ जायेगा और उस खलनायक की नाक पर घूंसा मारकर उसे समुद्र में गिरा देगा, जहां ठीक उसी समय कोई दैत्याकार शार्क मछली आकर उसे समूचा निगल जायेगी… इस कल्पना से ही नायिका इतनी प्रसन्न हो जाती है कि बरबस उसके कंठ से गाना फूट पड़ता है, जो किसी अदृश्य दूरभाषा के सहारे नायक तक पहुंच जाता है, और फिर दोनों अपनी अदृश्य टेलिफोन-लाइन को पकड़े-पकड़े सात मिनिट वाला एक रसभीना दोगाना गाते हैं… फिर सब कुछ यथापूर्वमकल्पयत् होता है और नायक खलनायक को शार्क मछली की खूराक बनाकर- और सो भी इस खूबी से कि जहाज पर किसी को इसकी कानों-कान खबर भी नहीं होती- नायिका के साथ विलायत चला जाता है… फिर यथासमय उनकी शादी हो जाती है और आनन-फानन में नायिका कुछ बहकी-बहकी सी बातें करने लगती है, जिन्हें उसके पेट में बैठा हुआ बच्चा भी समझता है, लेकिन हमारा यह बुद्धू नायक नहीं समझ पाता और आखिकार नायिका लाखों दर्शकों के सामने नायक के कान में धीरे-से कुछ फुसफुसाती है, तब हज़रत की अक्ल में बात कुछ धंसती है और आप पागलों की तरह हंसने और नाचने-कूदने लगते हैं.

    अब तक तस्वीर अपनी पूर्वनिर्धारित सत्रह हज़ार फुट की लम्बाई पर पहुंच गयी होती है. फिर अगला सीन अस्पताल का होता है, जहां आसन्न-प्रसवा नायिका कमरे के अंदर छटपटा रही है और नायक कमरे के बाहर बेचैनी से टहल रहा है, सिगरेट-पर-सिगरेट फूंके जा रहा है. अब तक वह सत्ताईस सिगरेट फूंक चुका है, जिसके टुर्रे गलियार-भर में बिखरे पड़े है. कभी छत की धरन की ओर ताकता है, कभी आहें भरता है, कभी हाथ मलता है. और जब इस सब कार्यकलाप में तीन मिनिट बीत जाते है, तब अवसर के अनुकूल साढ़े तीन मिनिट का एक गाना होता है. गाना पूरा होते ही एक नर्स आकर्ण मुस्कराती और दायें-बायें आगे-पीछे जैसे धान का लावा बिखेरती हुई आकर नायक को बताती है कि लड़का हुआ है, हूबहू आपका नक्श है, ऐसी ही नाक, ऐसी ही आंखें, यहां तक कि बाल भी ऐसे ही…

    फिर नायक को कहां किस बात की सुधबुध रहती है! नर्स के मना करते-करते भी वह धड़धड़ाता हुआ कमरे के अंदर घुस जाता है. फिर दोनों विमुग्ध नेत्रों से कभी एक दूसरे को देखते हैं और कभी अपने सहकारी उद्योग की इस पहली ‘उपज’ को… और गोल-मटोल बच्चा, पलने में पड़ा हुआ, लंबी दौड़ के ओलिम्पिक चैम्पियन एमिल जेटोपैक के फेफड़े लगाकर ‘केहा-केहा’ करता रहता है, जिससे नवप्रसूता स्त्रियों की चोलियां भीग जाती है.

    वात्सल्य-रस का यह कैसा अनुपम दृश्य होता था, और बंबई टाकीज़ ने कैसे इस चीज़ को एक शास्त्र में बांधकर अपने शिखर पर पहुंचा दिया था, यह तो अब उन पुराने चित्रों को देखकर ही जाना जा सकता है. क्योंकि अब तो ऐसी तस्वीरें बनती ही नहीं और बनें भी तो सेंसर उन्हें पास नहीं कर सकता. बच्चों की केहां-केहां तस्वीरों से गायब ही हो गयी, और अगर यही हाल रहा तो कुछ वर्षों में यह रस ही नहीं रहेगा इस देश में…

    इसलिए मैंने तो अजनमे बच्चों का एक संघ बनाने का निश्चय किया है, जिसकी सबसे पहली मांग होगी कि भारतीय संविधान के नागरिक अधिकारों वाले अनुच्छेदन के पहले पैरे में एक यह धारा जोड़ दी जाये, जिसके बिना दूसरे सब अधिकार झूठे और निरर्थक हो जाते हैं- सबको जन्म लेने का समान अधिकार है…

( फरवरी  1971 )

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