मैं हारने वाला नहीं हूं

‘कहिये, क्या हाल-चाल है?’…‘बस जी रहे हैं किसी तरह.’ भले मुंह से यह उत्तर न दें, मगर बहुत बार ऐसी ही बात उठती है हममें से बहुतों के मन में.

    बहुधा जीवन आनंदहीन और बेस्वाद हो जाता है, क्योंकि हम आत्मविश्वास गवा बैठते हैं. हमें यह यकीन नहीं रह जाता कि हममें सफल होने का सामर्थ्य है.

    अक्सर होता यह है कि हमें अपने आप में आस्था रखना सिखाया ही नहीं जाता. सारे जीवन की नींव झिझक, अविश्वास और भय पर रख दी जाती है.

    नतीजा यह होता है कि हममें अपनी योग्यता, क्षमता और दक्षता के प्रति आस्था अंकुरित और पल्लवित हो ही नहीं पाती. ऐसी स्थिति में कोई उत्साह और समस्याओं का सामना करेगा भी कैसे?

    कभी ऐसा भी होता है कि हम आत्मविश्वास के साथ जीवन में उतरते हैं, मगर निराशा या विफलता का ऐसा जोरदार वार होता है कि हमारा आत्मविश्वास टूट जाता है और उसे हम फिर किसी तरह जोड़ नहीं पाते, या जोड़ने की कोशिश करने की हिम्मत भी हममें नहीं रहती.  

    मगर यह कोई लाइलाज स्थिति नहीं है. कैन्सर का अचूक इलाज अभी भले न निकाला हो, मगर इस मानसिक कैन्सर का इलाज हो सकता है, और इससे भी बड़ी बात यह है कि आप स्वयं उसका इलाज कर सकते हैं.

    सभी धर्मों में नामजप का बड़ा महत्त्व है. सैकड़ों पीढ़ियों के अनुभव पर आधारित इस आध्यात्मिक-धार्मिक विधि का उपयोग दुनियावी स्तर पर भी किया जा सकता है.

    ‘सफलता’ शब्द मन में दुहराइये. रात को सोने से पूर्व और सवेरे नींद खुलते ही सोचिये-मैं सफल होऊंगा, विघ्न-बाधाओं को जीतूगां. वेदों की बात करना शायद आपको दकियानूसी प्रतीत होता हो. मगर एक वेदमंत्र का हिस्सा है-अहमिंद्रो न परा जिग्ये. अर्थ है-‘मैं इंद्र हूं, कभी हारने वाला नहीं हूं.’ यह भावना मन में धारण कीजिये.

    ऐसा नहीं है कि यह मंत्र जप लेने से सब हो जायेगा, आपको हाथ-पैर नहीं हिलाने पड़ेंगे. इसका लाभ आपको इस रूप में होगा कि निराशा और पस्तहिम्मती का वह पक्षा-घात, जो आपको सफलता के लिए हाथ-पांव नहीं हिलाने दे रहा है, धीरे-धीरे दूर होने लगेगा. सफलता और विजय की प्राणवर्धक भावनाएं जोर पकड़ने लगेंगी. जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण धीरे-धीरे बदलने लगेगा.

    आपको इंटरव्यू में जाना है. आप बहुत चाहते हैं कि यह नौकरी आपको मिल जाये. वेतन अच्छा है, कंपनी की अच्छी साख है. आप नये ब्लेड से दाढ़ी बनाते हैं, अपनी सबसे बढ़िया कमीज, सूट, टाई और जूते पहनते हैं, करीने से बाल संवारते हैं, समय काफी और पैसे नाकाफी होने पर भी टैक्सी में जाते हैं, ताकि बस की भीड़-भाड़ में कपड़ों की क्रीज न खराब हो जाये.

    मगर अपने मन को सजाने-संवारने पर आप पूरा ध्यान नहीं देते. घबराये-घबराये ही इंटव्यू के लिए जा पहुंचते हैं. चाहिये यह कि आप अपने मन को शांत करें, यह विश्वास अपने मन में उपजायें कि मेरी योग्यता और व्यक्तित्व का, इंटरव्यू करने वालों पर अच्छा असर पड़ेगा और अधिक संभव यही है कि मैं ही चुना जाऊंगा. आप देखेंगे कि इसे आप अधिक जमकर, अधिक स्पष्ट और सुलझी हुई भाषा में बातचीत कर सकेंगे. इससे भी बढ़कर, आपको ज़्यादा बढ़-चढ़कर बातें करने की आवश्यकता नहीं रहेगी, जिसे गलत बातें कह बैठने का खतरा भी कम हो जाता है. याद रखिये, बहुत-बढ़-चढ़कर वही बोलते हैं, बिना बात रुआब गालिब करने की कोशिश वही करते हैं, जिन्हें अपनी योग्यता और क्षमता में पूरा भरोसा नहीं होगा.

    ईसा मसीह ने कहा हैं-‘मांगो, मिलेगा.’ हम अपने आपसे आत्मविश्वास मांगें और वह हमें न मिले, यह संभव नहीं है.

    मगर हमें अपनी मांग के बारे में बिलकुल स्पष्ट होना चाहिए. हलवाई के यहां जाकर हम यह नहीं कहते कि कोई भी मिठाई एक किलो दे दीजिये. आत्मविश्वास हमें किस मामले में चाहिये? हमें यह पता लगाना होगा कि दरअसल हमें डर किस चीज से लगता है. फिर उस डर की निर्मूलता को सिद्ध करना आसान हो जायेगा. उस डर के हटने पर हमारा प्रसुप्त आत्मविश्वास जागृत हो उठेगा.

    भय प्रायः झूठा होता है, भ्रांतिमूलक होता है, तर्कहीन होता है. बुद्धि के आगे वह टिक नहीं पाता. जैसे वेदांती कहते हैं कि माया का स्वरूप समझ लेने पर माया निरस्त हो जाती है, भय को भय के रूप में जानलेने पर प्रायः वह टूट जाता है.

    शायद आपको लोगों से मिलने-जुलने में भय लगता है. सोचिये, यह क्या बात है? आखिर आप आपने घर के लोगों, मित्रों और चाहे कोई परिचित हो या अजनबी, वह भी तो इंसान ही है, आपकी ही भांति. और इंसान के नाते आप और वह एक ही जमात के हैं, एक ही बिरादरी के हैं. तो फिर उससे घबराने का कोई कारण ही नहीं रह जाता. इसलिए ‘तुलसी या संसार में सबसे मिलिये धाय.’ अगर दौड़कर, लपकर मिलना आपके स्वभाव में नहीं है, तो भी जिससे मिलना ही है, उससे मुंह न मोड़िये, उससे आंख न चुराइये.

    बोलने के बारे में भी यही बात है. अपने घर के लोगों और मित्रों के साथ बातें करते समय जैसे आप  स्वाभाविक आवाज में बोलते हैं, उसी तरह बोलिये. आवाज़ को बहुत दबाने या ऊंचा करने की कोई आवश्यकता नहीं.

    लोगों से मिलने की घबराहट धीरे-धीरे दूर होगी. आदतें एक दिन में नहीं टूटतीं, उन्हें तोड़ने के लिए प्रयत्न अपेक्षित है. किसी ऐसे क्लब के सदस्य बनिये, जिसमें आपके दो-चार मित्र सदस्य हैं. या किसी ऐसी सभा-सोसायटी में आना-जाना शुरू कीजिये, जिसके कुछ कार्यकर्ता या पदाधिकारी आपके परिचित हैं. वे मित्र आपको अपने मित्रों से परिचित करायेंगे, और ये नये मित्र अपने मित्रों से. इस तरह आपको मित्र भी मिलेंगे. धीरे-धीरे आपको अपने चारों ओर मित्र नज़र आने लगेंगे. जब सब दिशाओं में आपको मित्र दिखाई देने लगेंगे, तब ‘सब दिशाएं मेरी मित्र हों’ यह वैदिक प्रार्थना आपके जीवन का सत्य बनती जायेगी. और मित्रों से भला कौन डरता है?

    यह भी हो सकता है कि आपको अपने काम और पेशे के बारे में घबराहट होती हो. यहां भी भय का विश्लेषण कीजिये. क्या आपमें उस पेशे के लिए आवश्यक ज्ञान नहीं हैं? यदि सचमुच यही बात है, तो अपना ज्ञान बढ़ाइये. ज्ञान बढ़ाने के लिए समय और शांतिपूर्ण प्रयत्न आवश्यक है. आपाधापी में आठ पुस्तकें पढ़ डालने से ज्ञान नहीं बढ़ जायेगा.

    अपने पेशे में दिलचस्पी लीजिये. दिलचस्पी लेने से आपको अपने काम में आनंद आने लगेगा. यह आनंद का भाव तन्मयता और एकाग्रता को बढ़ायेगा, उससे अपने पशे के बहुत-से राज आपके सामने अपने आप खुलने लगेंगे. जहां पहले आपको केवल समस्याएं सूझती थीं, वहां अब आपकों उत्तर सूझने लगेंगे.

    और एकाग्रता एवं तन्मयता तभी सध सकती है, जब आप एक साथ अनेक काम करने का प्रयत्न न करें. अष्टावधान और शतावधान बेशक जबर्दस्त दिमागी चमत्कार हैं, लेकिन व्यावहारिक जीवन में ‘एकावधान ’ ही अधिक अच्छा है.

    इस तरह आप देखेंगे कि आपको अपने आपको नया बनाना होगा और यह आसान काम नहीं है. परंतु प्रयत्न और प्रार्थना से यह संभव है. कुछ सुझाव नीचे दये गये हैंः 1) सवेरे उठते ही प्रभु को धन्यवाद दीजिये कि आप स्वस्थ हैं, आपको शारीरिक मानसिक बल मिला है, आपको सुख और सफलता के अवसर आपके सामने हैं. (यदि आप नास्तिष्क हैं, तो भी कृतज्ञा तो अनुभव कर ही सकते हैं.). 2) विजयी और सफल होने का संकल्प मन में जब-तब दुहराते रहिये.  3) अपनी आंखों के आगे अपना मुस्कराता हुआ, सफल होता हुआ, लोगों को स्नेह-संतोष देता और उनसे स्नेह-संतोष पाता हुआ स्वरूप अंकित रखिये. 4) समस्या के आ पड़ने पर भय के तत्त्व को दूर करके, समस्या पर विचार कीजिये. रामायण का सुरसा-प्रसंग याद कीजिए. हनुमान सुरसा के आगे अपनी काया को जितना ही विशाल बनाते जाते हैं, वह उस से दुगुना आकार ग्रहण करती जाती है. चतुर हनुमानजी मच्छर-सा छोटा शरीर बनाकर चुपचाप उसके मुंह में घुसकर निकल जाते हैं. समस्याएं सूझ-बूझ से सुलझती हैं, भय सूझ-बूझ के पैरों में बेड़ी डाल देता है. 5) रात को सोने से पहले सफलता का संकल्प एक बार और दोहराइये और दिनभर जो सफलता, सुख और स्नेह-संतोष मिला है, उसके लिए अपने सिरजनहार को (या संसार को) धन्यवाद दीजिये.

    अपनी क्षमता के प्रति आस्था, पुरुषार्थ का संकल्प, दूसरों के सौजन्य में विश्वास और नैतिकता में निष्ठा, इन फूलों को अपने तकिये के पास रखकर सोइये. सवेरे फूल की तरह तरोताजा होकर उठिये और नये दिन में फूल की तरह मुस्कराते हुए प्रवेश कीजिये. सफलता आपका वरण करेगी.

–    जयवर्धन

 (जनवरी 1971)

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