मैं जोहिला – प्रतिभू बनर्जी

`नर्मदा`सोन या शोणभद्रके अतिरिक्त `जोहिलावह तीसरी महत्त्वपूर्ण नदी है, जो मध्य भारत के मेकल पर्वतश्रेणी स्थित अमरकंटक पहाड़ के पठार से निकली है. पुराणों में जोहिला को ज्योतिरथा के नाम से भी पुकारा गया है. 

पुरातन काल से प्राचीन भारत के लोगों ने देश के भूगोल सम्बंधी अपने सटीक प्राचीन ज्ञान को `गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदे सिंधु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिम कुरुकी अवगाहन प्रार्थना के जरिये पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है. इसी प्रार्थना के जरिये सनातन हिंदू ज्ञान परम्परा में देश की सप्त नदियों को पवित्र नदियों के रूप में चिह्नित किया गया, जिनमें से नर्मदा अर्थात रेवा एक है. महामुनि मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर के सम्मुख नर्मदा के स्वरूप का उद्घाटन करते हुए कहा था–   इयं माहेश्वरी गंगा महेश्वरतनुद्भवा।   प्रोक्ता दक्षिण गंगेति भारतस्य युधिष्ठिर।। 

अर्थात, हे युधिष्ठिर! महेश्वर शिव के शरीर से उत्पन्न होने के कारण नर्मदा को माहेश्वरी गंगा कहते हैं. जिस क्षेत्र से नर्मदा प्रवाहित हो रही है, वह क्षेत्र (इंद्रप्रस्थ के) दक्षिण में अवस्थित होने के कारण इसे दक्षिण गंगा भी कहते हैं.

साथ ही इसी सनातन परम्परा में जहां समस्त नदियों को स्त्राrलिंग माना गया, वहीं ब्रह्मपुत्र व सोन को पुल्लिंग मानते हुए उन्हें महानद का मान दिया गया. ऐसा शायद इनके प्रचंड वेग व शक्तिवान प्रवाह के कारण था.

यह एक भौगोलिक चमत्कार है कि एक ही पठार से निकलने के बावजूद नर्मदा व सोन बिलकुल विपरीत दिशाओं में बहते हैं. 1312 किलोमीटर की यात्रा कर नर्मदा नदी जहां पश्चिम में गुजरात के भड़ोच में अरब सागर से मिलती है, वहीं 785 किलोमीटर लम्बा रास्ता तय कर पूर्व वाही सोन नद, पटना के समीप गंगा से जा मिलता है. इसे हिरण्यवाह भी कहा गया है. 289 किलोमीटर लम्बी जोहिला सोन की एक सहायक नदी है, जो पूर्वी मध्य प्रदेश के शहडोल के निकट दशरथ घाट के समीप उससे मिलती है. यह दशरथ घाट ही वह स्थल है, जहां अयोध्या नृपति राजा दशरथ ने आखेट खेलने आ, शब्दभेदी बाण से जंगली पशु के धोखे में श्रवण कुमार का वध कर दिया था. 

पूरे अमरकंटक क्षेत्र व नर्मदा तट में थोड़े बहुत रूपांतरण के साथ नर्मदा- सोन- जोहिला को लेकर एक लोककथा प्रचलित है. यह कथा प्रकृति के उपादानों के मानवीकरण करने की हमारी आदिम सहज वृत्ति का एक अनुपम उदाहरण है. हमारी यही सहज वृत्ति वायु, अग्नि, चंद्र व सूर्य को देवताओं की भांति तथा तारों को ऋषियों की भांति मान कर उन्हें आदर व श्रद्धा देती है. यही वृत्ति पर्वतों को पंख दे पक्षियों की भांति कल्पना की उड़ान देती है. और यही वृत्ति नदियों के दो रूप मानती आयी है. नदी का पहला रूप तोय या जलरूप, जिसे हम अपनी खुली आंखों से देखते हैं. यह रूप स्थूल रूप है. परंतु इसके अलावा एक दूसरा रूप भी है, जो सूक्ष्म रूप है, जो नदी की दैवी सत्ता है. तभी हम गंगा नदी को गंगा मैया तथा नर्मदा नदी को नर्मदा माई के रूप में पुकारते हैं.

लोककथा के अनुसार, मेकल कन्या नर्मदा के विवाह हेतु एक अटपटी किंतु कठिन शर्त रखी गयी. जो नरश्रेष्ठ अमरकंटक क्षेत्र में पसरी नेत्र व्याधि की दुर्लभ औषधि `बकावलीपुष्प (परवर्ती नाम `गुल बकावली‘) लेकर आयेगा, उससे नर्मदा का ब्याह होगा. शर्त अत्यंत कठिन थी जिसे पूरी करने में सफल हुआ सोन अर्थात शोणभद्र. तदनुसार दोनों का विवाह निश्चित हुआ.  

बारात ले नर्मदा की देहरी में आने के बाद उसने नर्मदा की अनुपमा सखी जोहिला (कहीं-कहीं उसे नाईन कहा गया) को देखा और उसका दिल उस पर आ गया.  जोहिला ने भी उसका प्रेम स्वीकार कर लिया. ठीक विवाह से पहले नर्मदा ने उन दोनों को रंगरेलियां मनाते हुए देख लिया. विवाह के लिए वधूवेश में तैयार हो फेरे लेने की प्रतीक्षा में बैठ अपने वैवाहिक जीवन के सुखद सपने बुनती नर्मदा के लिए ये वज्राघात से कम न था. ाढाsधित, क्षुब्ध व अपमानित नर्मदा ने सोन को प्रबल धक्का दिया व खुद पिता का घर त्याग, पश्चिम वाहिनी हो गयी. तेजस्विनी नर्मदा के भय से सोन पहाड़ से कूदकर पूर्व की ओर भाग चला. जोहिला ने भय से पूर्ववाही हुए सोन का अनुसरण किया व उससे ब्याह कर सुहागिन हो गयी. सबकी दुलारी व पूज्या नर्मदा, बिन ब्याही रह गयी. उस प्रणय वंचिता का दर्द लोगों का दर्द बन गया. उसे लोक सहानुभूति मिली. दूसरी ओर सोन की सुहागन बनकर भी लोगों के लिए जोहिला रही वह कलंकिनी, जिसने नर्मदा से उसका होने वाला पति छीन लिया. 

गायत्री, सावित्री, करगंगा एवं कपिला वे आरम्भिक छोटे नदी-नाले हैं, जो नर्मदा में मिलते हैं. इनसे मिलकर ही नर्मदा अपना शैशव रूप त्याग बड़ी होती है. इसी तरह खुज्जी व गंगई वे आरम्भिक छोटे नदी- नाले हैं, जो सोन से मिल उसे बड़ा बनाते हैं. जोहिला के शुरुआती सहायक नदी- नालों में करौंधी, पोती, गिरार, तिनके, पंडरिया और घोड़ाचटार हैं. 

(1)

पहचाना मुझे? …नहीं न!! 

नहीं पहचाना जान कर मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा. 

एक साधारण स्त्राr को उसके परिजनों व आस-पास निवास करने वालों के अतिरिक्त साधारणत: कोई नहीं जानता. जो कुछ लोग जानते भी हैं, वे उसे अमुक की बेटी, बहन, पत्नी, मां, भाभी, चाची या ऐसे ही किसी अन्य रूप में जानते हैं. किंतु उसके इस अपरिचय या बहुत थोड़े-से परिचय के बावजूद उसका अपना एक अस्तित्व फिर भी होता है.  भले ही लोग- बाग याद न रखें, तमाम नातों-रिश्तों के बीच उसका अपना एक नाम भी होता है; अपरिचय के बाद भी एक अलग व्यक्तित्व होता है. स्वाभाविक रूप से मेरा भी है. 

वह कोई भी स्त्राr, जो समाज में अनजानी या अल्प परिचिता है, अपने अज्ञात- अल्पतम ज्ञात परिचय के बाद भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने की नैसर्गिक इच्छा हमेशा अपने हृदय में संजोकर रखती है, उसे पालती है. वह केवल इच्छा ही नहीं पालती, वरन ज़रूरत पड़ने पर उस अस्तित्व को बनाये रखने के लिए संघर्ष भी करती है. उसके इस संघर्ष से समाज में कोई उथल-पुथल भले ही न मचे, उसके संघर्ष से समय के पन्नों में किसी ाढांति की सुगबुगाहट की आहट भले ही दर्ज न होती हो, लोग-बाग भले ही उसके विरोध या समर्थन में अपने-अपने मतों का खंडन-मंडन करते न दिखते हों, भले ही उसके चारों ओर के परिवेश में कुछ बदलता नहीं दिखता हो, पर उस संघर्ष को असफल या निरर्थक नहीं माना जा सकता. आप मानो या न मानो, उस संघर्ष से उस स्त्राr के मन में अपने होने के प्रति एक आश्वस्ति जागती ज़रूर है. और अपने होने की वह अनुभूति, जो उस स्त्राr के मन में जागती है क्या कम बड़ी उपलब्धि है? फिर उस संघर्ष को लोक स्वीकृति मिले या ना मिले. 

मैंने भी अपने होने की अनुभूति को बनाये रखने के लिए बहुत संघर्ष किया है, विपरीत परिस्थितियों को झेला है, कष्ट किया है. न केवल मानसिक प्रताड़ना तथा सामाजिक अपमान का सामना किया है, वरन सामाजिक रूप से मान्य व स्थापित नैतिक मापदंडों का उल्लंघन भी किया है. परंतु अपने अस्तित्व के लिए यह सब करने वाली दुनिया की मैं ना तो प्रथम स्त्राr हूँ और ना ही अकेली. 

बहुत पीछे छूट गये अतीत में यादों के झरोखों से झांक आज जब मैं अपने हृदय को टटोलती हूं तो मुझे अपने किये पर कोई ग्लानि, पश्चाताप या किसी प्रकार के शर्म की अनुभूति नहीं होती. ऐसा तो तब होता, जब कुछ त्रुटि करने की भावना या किसी प्रकार का अपराधबोध चोरों की भांति मेरे मन के किसी कोने में दुबक कर बैठा होता.  

अपने जीवन के पथरीले ऊबड़-खाबड़ पथ पर प्रवाहित हो मैं सहस्राब्दियों से लोक प्रदत्त लांछना सहती आ रही हूं. जैसे मुझे लोक-लांछना मिली, वैसे ही मेरी अनन्या सखी नर्मदा को मिली लोक- सहानुभूति व सम्मान. राजकुमार सोन की प्रणयवंचिता व अविवाहिता रह जाने का दर्द लिये पश्चिम गामिनी हो, नर्मदा पूज्या हो गयी और मैं प्रियतम सोन का प्रणयदान और साथ पाकर भी लोगों के लिए रही वही कलंकिनी, जिसने अपनी प्रिय सखी नर्मदा का होने वाला पति उससे छीन लिया. 

नर्मदा द्वारा रखी गयी शर्त को अपने साहस, चातुर्य और सामर्थ्य के बल पर पूरा कर राजपुत्र शोणभद्र अर्थात सोन बारात लेकर आये तो थे उसे ब्याहने; किंतु उनका ब्याह हुआ मुझसे. जिस नाटकीय परिस्थिति में मैं सोन की हुई, वह हठात घटित हुई थी. इतनी हठात कि मैं उसके सामने बेबस, निरीह-सी बिना प्रतिरोध समर्पित हो गयी. झूठ नहीं कहूंगी, उस समर्पण के समय नरपुंगव राजपुत्र सोन के प्रति मेरे मन में एक अव्यक्त आकर्षण अवश्य था. नर्मदा के प्रति थोड़ी-सी नारी सुलभ ईर्ष्या भी थी. परंतु भगवान महादेव साक्षी हैं, मैंने नर्मदा से कोई छल नहीं किया. सोन जैसे नरश्रेष्ठ का प्रेम मिलना मेरा प्रारब्ध था. फिर भी मेरा दुर्भाग्य, मुझे यह लोकनिंदा मिली कि मैंने कुंवर शोण को अपने रूप- यौवन के भ्रमजाल में इस तरह फांसा कि वह उससे निकल न सका. 

मेरा केवल एक ही दोष था. वह यह कि आर्य शोणभद्र ने, जिसे लोग `सोन’ तथा `हिरण्यवाह’ के नाम से भी जानते हैं, मुझसे अपना प्रेम निवेदित किया और उनसे अनायास मिले उस प्रेम को मैंने हृदय से स्वीकारा. हां, अपना मस्तक गर्व से उठा कर कहती हूं कि उस प्रेम को स्वीकारने के बाद मैंने उसे साधिकार पाने के लिए पुरजोर चेष्टा की एवं साहस के साथ समस्त विपरीत परिस्थितियों का सामना किया. प्रेम करके हार जाना मुझे गवारा न था. 

आज समय के गवाक्ष से झांक कर पीछे देखती हूं, तो पाती हूं कि मुझ जैसी न जाने कितनी लड़कियों ने प्रेम किया और केवल दुख पाया. अपने विवश, निरीह प्रेम को लेकर वे खुद तो मरीं, साथ में अपने अनुरागी प्रेमियों को भी मर मिटने पर मजबूर किया. काश, उनका प्रेम माखन-सा कोमल न हो, प्रस्तर शिला-सा कठोर व सुदृढ़ होता. काश, उनके आकुल – विह्वल प्रेम ने उनके प्रेमियों को मर मिटने की सीमा तक लाचार न कर दिया होता! क्यों नहीं उन प्रेम दीवानियों ने अपने प्रेमियों के साथ मरने या उनके लिए मर मिटने की अपेक्षा मेरी तरह उनके साथ जीना पसंद किया? जब वे लड़कियां प्रेम कर सकीं, तो फिर उसे पाने के लिए विद्रोह क्यों नहीं कर सकीं, समाज के सामने तन कर खड़ी क्यों न हो सकीं और अपने प्रेमियों को जयी बनने का साहस क्यों नहीं दे सकीं?  

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