मेरे विश्वविद्यालय के वे दिन… वे लोग –  डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी

आवरण-कथा

काशी विश्वविद्यालय का परिसर सचमुच विश्वविद्यालय का परिसर लगता था. अखिल भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय, दक्षिण, पूर्वी, पश्चिमी भारत के छात्रों की बहुत बड़ी संख्या होती थी उस समय. स्याम, तिब्बत, चीन, जापान तथा सोवियत-यूनियन, जर्मनी, फ्रांस आदि के छात्र और अध्यापक अक्सर घूमते और स्थानीय छात्रों-अध्यापकों से मिलते-जुलते दिखलाई पड़ते थे. पर्यावरण इतना हरा-भरा समृद्ध और खुला कि पूरा परिसर कोई विशाल आधुनिक गांव लगता था. विश्वविद्यालय के वातावरण में कुछ बात थी कि बाहर से आने वाला वहां पहुंचकर अनचीन्हा नहीं मानता था. वातावरण में अजनबीपन था ही नहीं. यह बात बनारस नगर में भी है. वह आपको फौरन अपना लगता है.

तब बनारस में आनंदमयी मां का निवास था, महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज, पं. महादेव शास्त्राr, सम्पूर्णानंद, बेढब बनारसी, विनोद शंकर व्यास, नज़ीर बनारसी, त्रिलोचन शास्त्राr, विष्णुचंद्र शर्मा, चंद्रबली सिंह, शम्भुनाथ सिंह, सुधाकर पांडे, मोती बी. ए. कुशवाहा कांत, ठाकुर प्रसाद सिंह थे, नामवर सिंह, शिव प्रसाद सिंह होनहार प्रतिभाशाली छात्र के रूप में विख्यात थे, केदारनाथ सिंह नवोदित थे. रामदरश मिश्र वहीं थे. रवींद्र भ्रमर जौनपुर से पढ़ने आये थे. कांतानाथ पांडेय ‘चोंच’ हरिश्चंद्र कॉलेज में हिंदी के अध्यापक थे, पं. सुधाकर पांडेय उनके सहयोगी थे. छायावादी आलोचक शांतिप्रिय द्विवेदी लोलार्क कुंड पर नामवर सिंह के
पड़ोस में रहते थे. राजनीतिज्ञों में कमलापति त्रिपाठी, सम्पूर्णानंद रुस्तम सैटीन विख्यात थे.

विश्वविद्यालय परिसर में अनेक विद्यार्थी घुमंतू छुट्टा घूमते थे. वे परिसर के सनातन विद्यार्थी थे. पढ़ते-पढ़ते नहीं, रहते-रहते अधेड़ हो गये थे. न वे फ़ीस देते थे न परीक्षा, मेस के भोजन का पैसा भी नहीं, बस रहते थे, दादागिरी करते थे. एक नाम भूल रहा हूं, शायद हरिहर गुरु. लोग कहते थे कि एक बार उन्होंने छात्र-जीवन में गाय की कसाई से रक्षा की थी- मालवीय जी ने फीस, हॉस्टल का किराया तो म़ाफ कर ही दिया था, भोजन के खर्चे से भी मुक्त कर दिया था. संस्कृत छात्रों का रुइया हॉस्टल ऐसे सनातनी छात्रों का अड्डा था. एम.ए. फाइनल के अंतिम दिनों में मैं भी वहीं रहता था. 1957-58 में मुदालियर कमेटी की रिपोर्ट पर छात्रों का जो आंदोलन हुआ उसमें छात्र-नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिलने गया. प्रतिनिधिमंडल के एक वयस्क लोकप्रिय छात्र-नेता ने नेहरू जी से कहा- मेरे ऊपर उद्दंडता का आरोप गलत है. मैंने डॉ. राधाकृष्णन के समय में कुछ नहीं किया, पं. गोविंद मालवीय के समय में कुछ नहीं किया, पं. अमरनाथ झा के उपकुलपति रहते हुए नहीं किया, आचार्य नरेंद्र देव के काल में मेरे ऊपर कोई आरोप नहीं लगा. सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर ने तो मुझे कई बार विदेश भेजा-जवाहरलाल नेहरू ने उनकी बात काटते हुए पूछा- आप कितने वर्षों से विश्वविद्यालय में पढ़ रहे हैं- ‘सिंस हाउ लांग यू हैव बीन इन द यूनिवर्सिटी बाइ द वे.’ छात्र नेता को याद नहीं था कि वे कितने वर्षों से पढ़ रहे हैं.

दूसरी तरफ काशी विश्वविद्यालय में अध्ययन करना तपस्या करने के समान मानने वाले छात्रों की परम्परा थी. कहते हैं दर्शन के स्वनामधन्य प्रोफेसर टी. आर.वी. मूर्ति दक्षिण से पैदल चलकर काशी पढ़ने पहुंचे थे और इतने सम्मानित हुए कि सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बाद ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज में उनके स्थान पर अध्यापन करने निमंत्रित हुए. हिंदी में नामवर सिंह प्रतिभाशाली माने जाने वालों में सबसे ऊपर थे. डॉ. शिवप्रसाद सिंह उनके प्रतिद्वंद्वी, गिरीश चंद्र तिवारी एक वर्ष सीनियर थे. राममूर्ति त्रिपाठी यद्यपि संस्कृत कॉलेज में अध्यापक के रूप में विश्रुत थे किंतु वे हमारे क्लासफेलो थे. केदारनाथ सिंह, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, जितेंद्र पाठक, श्यामसुंदर शुक्ल हमारे साथ थे. दक्षिण भारतीय विद्यार्थी बी.वी. कारंत (कालांतर के प्रसिद्ध रंगमंच निर्देशक) हिंदी में एम.ए. कर रहे थे और म्युज़िक कॉलेज के छात्र थे. उनके साथ एक उर्सु नामक विद्यार्थी था. हिरण्यमय जी, कोतामिरे, गनेशन, नरसिंहाचारी हम लोगों से सीनियर थे. दक्षिण भारत के एक और विद्यार्थी एम.पी. एलकांत जिन्होंने अनेक वर्षों बाद अपने विवाह का निमंत्रण मुझे गांव के पते पर भेजा.

काशी में दो कवि-सम्मेलन याद हैं. एक काशी विश्वविद्यालय में हुआ. सम्भवतः 1954 के दिसम्बर में. आचार्य नरेंद्र देव थे. भोजपुरी और अवधी के लोकप्रिय कवि भी थे. पंत, जानकीवल्लभ शास्त्राr, बच्चन, सोहनलाल द्विवेदी, शम्भुनाथ सिंह, केदारनाथ सिंह, रवींद्र भ्रमर, श्रीपाल सिंह क्षेम, रूपनारायण त्रिपाठी आदि. अवधी के वंशीधर शुक्ल प्रथम कोटि के कवि थे. कविता गाकर नहीं पढ़ते थे. आचार्य नरेंद्र देव के प्रिय कवि थे. लेकिन उस दिन जम नहीं रहे थे. भोजपुरी का कवि जम रहा था.

वह कवि सम्मेलन स्मरणीय था. पंत जी ने अपनी बारीक कोमल आवाज़ में- ‘बांध दिये क्यों प्राण प्राणों से’ सुनायी. पंत जी अनुरोध करने पर कविता अकुंठ होकर सुनाते थे. नखरे नहीं बघारते थे. पंत जी से एक बार और काव्य-पाठ सुना है राजकमल के समारोह में, सरदार जाफरी के साथ. जब पंत जी को सोवियत लैंड नेहरू सम्मान मिला था. उन्होंने ‘आह! धरती कितना देती है’ का पाठ किया था और कविता खूब सराही गयी थी.

खैर विश्वविद्यालय के उस कवि-सम्मेलन में बच्चन जी की मधुशाला जम रही थी. बच्चन ने कविता के पहले वक्तव्य भी दिया- कायस्थ हूं. और द्विवेदी जी जैसे विद्वान मानते हैं कि पृथ्वीराज रासो में लिखा है- कायत्थ पिएंतों, तो मदिरा कायस्थ पीते खूब हैं. मैं पीता नहीं हूं, फिर भी मधुशाला लिखी. बच्चन जी, पं. जी पर व्यंग्य कर रहे थे. हजारीप्रसाद जी ने ‘हिंदी साहित्य ः उद्भव और विकास’ में लिख दिया था कि बच्चन की मधुशाला का जादू अब उतर गया है. एक अन्य स्थान पर बच्चन ने नामोल्लेख के बिना इस कवि-सम्मेलन में अपने जमने का बयान किया है और लिखा है कि मैं जब वाहवाही लूट रहा था श्रोताओं से, तब मंच पर बैठे एक विद्वान् कुछ ऐसा मुंह बना रहे थे मानो रबर चबा रहे हों- अनुमानतः बच्चन, पं. जी के बारे में ऐसा सोच रहे थे. पं. श्याम नारायण पांडे से जौहर की पंक्तियां- आज तुम बढ़े चलो, आज तुम बढ़े चलो, सुनी. शब्द मुंह से गोली की तरह निकलते थे. सोहनलाल द्विवेदी कविता पढ़ रहे थे, पं. जी से भ्रमर ने कुछ बात करना चाहा तो पं. जी ने उनसे चुप रहने का संकेत किया. मुझे जानकीवल्लभ शास्त्राr का सस्वर गीता पाठ बहुत अच्छा लगा- प्यास तुम्हारी कंठ-कंठ में रूप तुम्हारा नयन-नयन में- स्वर-लहरी जादू की तरह मूर्च्छित कर देती थी.

एक और कवि सम्मेलन याद है, काशी नागरी प्रचारिणी सभा के प्रांगण में. हीरक जयंती समारोह का, 1954 या 55 में हुआ था. दिनकर, सुमन के काव्य-पाठ की याद है- दिनकर काव्य पाठ को उठे तो पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने कहा- राभौ दिनकरः। दिनकर ने कविता सुनाई थी- ‘गीत नहीं कांटे ले आओ’. सुमन ने ‘कुछ आज न दुनिया पहले-पहले छली गयी’- अंत में ‘वह कल-कल करती चली गयी’ कवि सम्मेलन का वातावरण गम्भीर, शांत और स्तरीय था. बाज़ारू या हल्ला-हुल्लड़वाला नहीं था. द्विवेदी जी सभा में विराजमान थे. द्विवेदी जी ने नागरी प्रचारिणी सभा के एक और दृश्य का वर्णन किया है, निराला विषयक लेख (खंड-10) में. इस घटना का सम्बंध निराला जी से है. यह भी किसी विशिष्ट काव्य समारोह का ही प्रसंग होना चाहिए.

द्विवेदी जी ने लिखा है- ‘नागरी प्रचारिणी सभा के पीछे एक मंडप में लगभग तीस हजार (30000) से भी अधिक लोग उपस्थित थे. अचानक बिजली चली गयी. सभा में बालक, वृद्ध, नारियां थीं. सब किंकर्त्तव्यविमूढ़. कुछ भी हो सकता था. तभी एक ओर से अंधकार को चीरता हुआ एक ओजस्वी स्वर सुनाई दिया और सबने एक घन-गम्भीर गर्जना सुनी, जिसके कारण सभा में सन्नाटा छा गया. उन्होंने ऊंचे स्वर से ‘राम की शक्ति-पूजा’ सुनाना प्रारम्भ किया और तब तक सुनाते रहे जब तक बिजली का प्रकाश न हो गया. सभा का हाल यह था कि अर्थों को न समझते हुए भी एकदम मंत्रमुग्ध स्तब्ध. केवल उनके ओजस्वी स्वर से ही इनकी धारा बह रही थी उसी का लोग रसपान कर रहे थे. उनका प्रवाह अद्भुत था, वाणी अत्यंत तेजस्वी. लग रहा था कि श्रोता, बुद्धि की आंख से उनका शरीर स्पष्ट देख पा रहे हैं.’

काशी के संगीत-समारोह अद्भुत होते हैं. काशी वास्तविक महोत्सवा है. बुढ़वा मंगल, रामलीला, गहरेबाज़ी वहां के प्रिय उत्सव हैं. संगीत-समारोह मैंने कोई नहीं सुना. तब शास्त्राrय संगीत में मेरी कोई रुचि नहीं थी. अनोखे कंठे, सितारा देवी, गोदई महाराज (शांता प्रसाद) का नाम सुनता था. संकटमोचन का संगीत-समारोह सर्वाधिक विख्यात था. पं. ओंकारनाथ ठाकुर को कई बार सुना. संगीत-संस्कार के बिना भी उनका कंठ-स्वर अपनी गम्भीरता से प्रभावित करता था. बलवंत भट्ट और वी.वी. जोग को सुना. गुरु पूर्णिमा के अवसर पर संगीत महाविद्यालय में गुरुपूजा का उत्सव होता था. उसमें मैंने पहली बार ओंकारनाथ ठाकुर से ‘ओम जय जगदीश हरे’ का गायन सुना. अभूतपूर्व आकर्षण था. उसी सभा में उन्होंने ‘जोगी मत जा, मत जा’ भी गाया, ‘हरि तुम हरो जन की पीर’ तो मानो विश्व के अस्तित्व को करुणामय नाद में रूपांतरित कर देता था. एक बार उनका गायन विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह पर हुआ. विद्यार्थियों से खचाखच भरे एम्फ़ीथियेटर में. छात्र सबको हूट कर रहे थे. ओंकारनाथ जी ने आते ही प्रार्थना की- ‘बच्चो, मेरे धौले (सफेद केशों) पर धूर मत डालना.’ उन्होंने मन से गाया और पूरी सभा ने मन से सुना. केदारनाथ सिंह ने बताया- उन्होंने ‘कामायनी’ का नृत्य रूपक तैयार किया था- रुक जा, रुक जा ओ निर्मोही का गायन समझाते- एक ‘रुक जा’ के बाद दूसरा ‘रुक जा’ और ज़ोर से होना चाहिए, क्योंकि सुननेवाला तब तक और दूर चला गया होगा.

‘मइया मोरी मैं नहिं माखन खायो’ तो बिल्कुल अध्यापक की तरह समझाते. माखन मुंह पर लिपटा, हाथ पीछे करके यशोदा से छिपा रहे हैं और समझते हैं कि सब मान लेंगे कि माखन नहीं खाया है- पूरा दृश्य समझाते और अपनी मंद-गम्भीर वाणी में गाते. वाणी क्या थी- नाद-गंगा की विश्वप्लाविनी धारा थी.

ओंकारनाथ ठाकुर का कंठ स्वर न भूतो न भविष्यति था. उनका स्वर, स्वर-संसार निर्मित करता था. द्विवेदी जी की वाणी ने और उनके कंठ-स्वर ने मेरा जीवन धन्य-सार्थक कर दिया.

1955 या 56 में महापंडित राहुल सांकृत्यायन काशी आये. वे मेरे लिए मिथक पुरुष थे. उनका काशी आगमन एकाधिक कारणों से स्मरणीय बन गया. उन दिनों काशी विश्वविद्यालय छात्र संघ में शंकर दयाल सिंह किसी पद पर थे. वही शंकर दयाल सिंह जो बाद में प्रसिद्ध हिंदी-सेवी सांसद हुए. वे छात्र-जीवन में ही बहुत सक्रिय थे. छात्र नेता विद्यासागर नौटियाल आदि के प्रयास के चलते राहुल जी से छात्र-संघ के वार्षिक समारोह को सम्बोधित करने की प्रार्थना की गयी. बहुत बड़ी संख्या में छात्र और अध्यापक आर्ट्स कॉलेज के सामने वाले मैदान में जमा हुए. विशाल पंडाल बना. राहुल जी यथासमय पधारे. मंच पर जो कुर्सियां रखी थीं उनमें से किनारे की कुर्सी पर बैठ गये. भाषण देने खड़े हुए. नागपुरी धोती, कुर्ता खद्दर का. सदरी, सिर पर छोटे-छोटे बाल, लम्बी काया. कैमरा लटकाये हुए. मामूली चप्पलें. ठेठ पूर्वी उत्तर प्रदेश वाले निम्न-मध्यवर्गीय किसान, मानो अभी खेत में हल चला के आ रहे हैं. किसी प्रकार का कोई आडम्बर-दिखावा नहीं. भाषण में कहा-

आज से हज़ारों वर्ष पूर्व भारत में एक दार्शनिक हुआ था धर्मकीर्ति. उसने मूर्खों के तीन लक्षण बताये थे- पहला जो यह माने कि संसार को बनानेवाली कोई चेतन सत्ता है, जो कृपालु है. दुनिया कौन बहुत अच्छी बनी-बनायी मनुष्य को मिल गयी है. हर चीज़ के लिए उसे खून-पसीना बहाना पड़ा है. इस दुनिया में सांप, बिच्छू, घड़ियाल, मलेरिया, हैजा भी तो हैं. आदमी को उनसे बचना, लड़ना पड़ता है. दूसरा लक्षण है- ज्योतिष पर विश्वास करना; तीसरा है- स्नान को धर्म से जोड़ना. राहुल जी ने कहा- विद्यार्थियों को सादगी से रहना चाहिए. यहां आकर अपने को निरक्षर जनता से विशिष्ट या अलग-थलग नहीं समझना चाहिए. लेनिनग्राद विश्वविद्यालय में जलाने की लकड़ी की कमी थी, सो वहां के प्रोफेसर लकड़ी काटकर जलावन जुटाते थे. अंत में यह राय भी दी कि जो लड़के, लड़कियों को छेड़ें उन्हें मिलकर पीटना चाहिए.

मुश्किल से 15 मिनट बोले होंगे. फिर चुपचाप कुर्सी पर बैठ गये. लोग और भी सुनना चाहते थे. उपकुलपति सर सी.वी. रामास्वामी अय्यर सभा में नहीं आये. लड़के उनके पास आये तो कहा- हू इज़ राहुल सांकृत्यायन- ए बुद्धिस्ट मांक एंड हैव मैरिड अ रशन गर्ल.

रात को हम लोग जुलूस में अय्यर के निवास पर गये. नारा लगाया उनके विरोध में- सी.वी. अय्यर होश में आओ. विद्यासागर नौटियाल ने बताया है कि राहुल जी के सभा-स्थल पर आते ही सर सी.वी. रामास्वामी अय्यर उठकर चले गये. द्विवेदी जी और राजबली जी पांडे को छोड़कर सभी प्ऱोफेसर भी उठकर चले गये.

दूसरे दिन प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति विभाग के हॉल में राहुल जी का मध्यएशिया का इतिहास पर भाषण हुआ. हॉल खचाखच भरा था, लोग खड़े थे. राहुल जी लगभग डेढ़ घंटा अबाध गति से बोले- पिन ड्रॉप साइलेंस. भाषण सुनने के बाद मानों ज्ञान की ज्योति नेत्रों में आ गयी हो. किसी इतिहासविद् का ऐसा प्रभावशाली भाषण हिंदी क्या मैंने अंग्रेज़ी में भी नहीं सुना.

अगले दिन एक गोष्ठी हुई. साहित्य-संघ की ओर से. राहुल जी ऐतिहासिक उपन्यासों पर बोले. गोष्ठी अंग्रेज़ी विभाग के रीडर, मन्नन द्विवेदी के अनुज, डॉ. रामअवध द्विवेदी के घर पर हुई वे विश्वविद्यालय परिसर में ही रहते थे.

राहुल जी ने कहा- इतिहास रस जैसी  कोई चीज़ नहीं होती. ऐतिहासिक उपन्यासकार को तथ्यों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए. उन्होंने चतुरसेन शास्त्राr के ऐतिहासिक उपन्यासों की इस दृष्टि से आलोचना की. ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ को निर्दोष बताया. डॉ. रामअवध द्विवेदी ने राहुल जी के विचारों से असहमति जतायी. राहुल जी ने उनका विनम्रता से समाधान करना चाहा, किंतु डॉ. द्विवेदी उखड़े रहे.

नामवर जी ने बताया कि मार्क्स क्लब में राहुल जी का भाषण हुआ. उसमें अधिकांशतः कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे. राहुल जी ने ठेठ भोजपुरी लहजे में कहा मार्क्स ने जो किताबें लिखी हैं, उनका सम्बंध आप लोगों से कम, उन लोगों से ज़्यादा है, जो इस सभा में नहीं हैं- रिक्शा चलाते हैं, बोझा उठाते हैं. आप लोग मार्क्स की किताबें ही न पढ़िए, उन्हें पढ़कर उन लोगों के बीच जाया कीजिए, उनसे
मिला कीजिए जो मार्क्स की किताबें नहीं पढ़ पाते.

विश्वविद्यालय परिसर में नज़ीर बनारसी का नाम सुना करता था. नज़ीर बनारसी बनारस के अपने शायर थे. कलाम निहायत स़ाफ, उस्तादाना. हिकमत की दुकान थी- अस्सी से चौक जाओ तो मदनपुरा में बायें तऱफ. हमेशा दुकान पर मिलते. मैं उन दिनों ढूंढ़-ढूंढ़कर उर्दू काव्य-रसिकों और शायरों से मिला करता था. इसी तुफैल में ]िफराक साहब से मिल चुका था. नज़ीर बनारसी अधेड़, कद में मुझसे भी छोटे. पांच फीट के. मोटे थे. उनकी अजमत से वाक़िफ न हों तो देखकर हंस पड़े- शायर के रूप में उनकी बहुत इज़्ज़त थी. बनारसी संस्कृति के उर्दू प्रवक्ता की थी उनकी शायरी-

नज़ीर आये थे पीने आबेज़म ज़म

लिये थे हाथ में गंगाजली भी

गंगा नहीं गंगा जल का पवित्र पात्र. गांधी जी की हत्या पर काशी में जो भारी शोकसभा हुई थी उसमें यह शेर पढ़कर नज़ीर ने भीड़ को रुला दिया था-

ज़मी वालों ने तेरी कद्र जब कम की मेरे बापू

ज़मीं से ले गये तुझको उठाकर आस्मां वाले

पहली मुलाकात में ही उन्होंने मुझे घंटों शेर सुनाये. अपने बारे में बताया- मैं नजीम अकबराबादी के शजरे में आता हूं- आत्मीयता देने वाले, पुरखुलूस शख्सियत. वामपंथियों से चिढ़े हुए- उन्हें ‘सुर्ख लकीरों के फ़कीर’ लिखने वाले.

उनके मित्रों, शिष्यों, प्रशंसकों, ईर्ष्या-द्वेष रखने वालों की संख्या बहुत बड़ी थी. उनके साथ हम किसी रेस्त्रां में पीने गये. रात को ठहरे. सवेरे उन्होंने तवे की रोटी और कलेजी का लजीज नाश्ता कराया. ऐसा नाश्ता कभी-कभी ही मिलता है. घर की औरतों के लिए सख्त पर्दा था. उनका बेटा बहुत शिष्ट और मिलनसार था. नज़ीर साहब ग्राहकों को पर्चा बनाकर दवाएं देते रहते. इस काम में उन्हें मज़ा आता.

नज़ीर साहब की शायरी में बनारसी रंग और स्थानीय संस्कृति की झलक थी. खासतौर पर उनकी भाषा में. शम्भुनाथ सिंह से उनकी अच्छी पटती थी. काशी में उन दिनों ऐसे अनेक उपन्यासकार थे जो हर महीने कम-से-कम एक उपन्यास ज़रूर लिखते. वही उनकी आय का स्रोत था. वे कुशवाहा कांत की परम्परा में थे- गोविंद सिंह, केसर आदि. मधुर नाम के एक चित्रकार भी थे. वे नज़ीर साहब के मिलने-जुलने वालों में थे. बनारस के दूसरे मशहूर बनारसी शायर कैस थे. वे सम्भवतः हिंदू थे. शराब में डूबे रहते. उनका यह शेर लोगों की जुबान पर था-

‘कैस’ मस्ताना चला। झूमता मैखाना चला

नज़ीर साहब ने तुलसी पर एक नज़्म कही थी. उसकी दो पंक्तियां याद हैं-

तुलसी पे लिखने का आया जो खयाल

कुछ देर तक तो खयालों को पसीना आया

काशी की संस्कृति के इस प्रतीक कवि को काशी के साप्रदायिक तत्त्वों ने एक दंगे में मार दिया. उनका घरबार तोड़ दिया. कहते हैं कि एक पुलिसवाले ने उनको पीटा और वे यह सदमा नहीं झेल पाये. कहते थे कि एक ख्वाब है अपने जीते जी बुढ़वा मंगल का उत्सव फिर रायज (प्रचलित) हो जाए.

एक दिन वे अल्लामा खैर बहोरवी के साथ द्विवेदी जी के यहां आये. बहोर पूर्वी उत्तर प्रदेश- सम्भवतः बलिया जिले का प्रसिद्ध कस्बा है. खैर साहब स्वतंत्रता सेनानी थे. वे काशी में गालिब अकादमी बनाने का प्रस्ताव लेकर आये थे. द्विवेदी जी ने सम्मानपूर्वक उनके आयोजन में सहयोग करने का आश्वासन दिया.

खैर साहब और नज़ीर बनारसी द्विवेदी जी से बात कर रहे थे. कमरे में 13, 14 वर्षीय लालजी थे. नज़ीर बनारसी ने दीवार पर टंगी रवींद्रनाथ ठाकुर की फोटो देखी- फोटो में रवींद्रनाथ काश्मीरी टोपी लगाये थे, दाढ़ी थी ही, पूरे सूफी संत लग रहे थे. नज़ीर बनारसी बोले- मुहब्बत हर सूरत अख्यितार कर लेती है और हर हालत में खूबसूरत लगती है.

लालजी के हाथ में कोई बाल-पत्रिका थी. उसमें एक कहानी थी- ‘और वह बौना हो गया.’ वही पेज खोलकर मेज़ पर रख दिया था और मुझे दिखाने का इशारा कर रहे थे. मैं दूसरी तरफ देखने लगा, गनीमत थी नज़ीर बनारसी हिंदी नहीं जानते थे.

(व्योमकेश दरवेश, राजकमल प्रकाशन, के कुछ अंश)

मार्च 2016

 

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