मेघदूत से व्हाट्स अप तक वाया पोस्ट कार्ड

– डॉ. पुष्प कुमार शर्मा

लीजिये साहब, मैंने अपनी बात का सिर्फ शीर्षक ही बताया कि आप चौंक गये और यह जानने के लिए बैचेन हो गये कि मैं कौन हूं. इससे पहले कि आप कोई अंदाज़ा लगाये मैं खुद ही बता देता हूं कि मैं संदेश हूं, जी नहीं वो बंगाली मिठाई वाला संदेश नहीं बल्कि अपनी अभिव्यक्ति वाला संदेश अर्थात मन के आवेग, भावनाएं और जीवन की तमाम बातों को उजागर करने वाला संदेश जिसे अंग्रेज़ी में आप मैसेज कहते हैं. आज की पीढ़ी के लिए मेरा नाम कोई अजूबा नहीं है क्योंकि आज के लोग दिन-रात हाथ में मोबाइल थामे अपनी किसी एक अंगुली या अंगूठे से कुछ न कुछ मैसेज भेजते रहते हैं और अपनी भावनाओं को अलग-अलग प्रकार की इमोजी के माध्यम से एक दूसरे को व्यक्त करते रहते हैं. आश्चर्य तो तब होता है जब वे संक्षेप का भी संक्षेप बना लेते हैं. पर एक बात है, अपनी बात कह जाते हैं.

सच कहूं तो मेरा इतना संक्षेप रूप देख कर मुझे गरुड़ पुराण की बातें याद आती हैं कि मनुष्य की मृत्यु के बाद उसका सूक्ष्म शरीर बन जाता है जो आगे की यात्रा करता है- तो क्या मेरी यानी संदेश की मृत्यु हो गयी है. मैं आज अपना ही संक्षेप रूप देख रहा हूं कि मैं अपनी मृत्यु का साक्षी बन गया हूं और अपने को डिजिटाइजेशन होते हुए- देख पा रहा हूं जैसे मुझे सुरक्षित रखने की कोशिश की जा रही हो- अब लगता है कि न वो बातें रहीं, न वो भावनाएं, न वो उलाहने, न वो शिकायतें, न गहरे प्रेम की अव्यक्त-सी मौन भाषा, न वो दुश्मनी के ताने, न कोई दूरी और न कोई धुरी- बस सब कुछ डिजिट के रूप में हो गया और बात खत्म. तो क्या आज इनसान भावना शून्य हो गया? क्या सम्बंध व्हाट्स अॅप के एक संदेश के जितना ही है?

वैसे भी यह परम्परा रही है कि जो मरणासन्न होता है वह अपनी स्मृतियों में बहुत ही जागरूक-सा हो जाता है, जैसे आज मैं हो गया हूं. अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं यह कहना चाहता हूं कि आप जानते हैं मेरा अंग़्रेजी नाम मैसेज कैसे पड़ा. ओल्ड फ्रेंच लैटिन का एक शब्द है मिस्साटिकम (missaticum) जो वस्तुतः लैटिन शब्द missus से बना है जिसका सीधा-सा अर्थ होता है भेजना. अब रही बात संदेश शब्द की तो मैं यह बता दूं कि ‘सं’ का अर्थ होता है लगातार या निरंतर या साथ-साथ और जब यह उपसर्ग देश से जोड़ा गया तो शब्द बना संदेश अर्थात देशों या स्थान की कोई दूरी नहीं बल्कि निरंतरता है, जुड़ाव है. कुछ लोग मुझे समाचार के नाम से पुकारते हैं तो कुछ लोग कुशल क्षेम के रूप में- मतलब तो एक दूसरे से जुड़े होने या एक दूसरे की कुशलता से ही है. बोलचाल में तो आप भी कहते ही हैं न कि क्या हालचाल है. एक बात मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई अपनी कहानी सुनाने के लिए भूमिका नहीं बना
रहा हूं बल्कि मैं तो अपनी यात्रा के एक सहयात्री के रूप में आपको अपने साथ रखना चाहता हूं ताकि आप भी मेघदूत के पंखों पर सवार होकर निकल पड़ें मेरे साथ अतीत की यात्रा पर.

भगवान रामजी के युग में तो हनुमान जी संदेश लेकर खुद ही चूड़ामणि लेकर समुद्र पार निकल पड़े थे और भगवान कृष्ण  तो स्वयं ही संदेशवाहक बनकर धृतराष्ट्र की सभा में पहुंच गये थे ताकि संदेश के साथ ही युद्ध रोका जा सके. न जाने उस युग में संदेश अर्थात मुझे इधर-उधर करने के कितने ही साधन थे, पर मैं आपको इतनी दूर अतीत में नहीं ले जाऊंगा- बस केवल संकेत भर ही देना था कि मैं कितना पुराना हूं. आपने भी तो कहानियां पढ़ी होंगी जिनमें कई नाविक दूर समुद्र में बोतलों में मुझे बंद करके पानी में बहा देते थे ताकि वे अपनी बात अपनों तक पहुंचा सकें. बोतलों में बंद होकर
मैं कितनी सारी यात्राएं कितने सारे देशों
की कर चुका हूं यह मैं ही जानता हूं या
मेरी नियति.

आप हिंदी फिल्में तो देखते ही होंगे. न जाने कितने गाने भरे पड़े हैं फिल्मों में मुझे जीवंत रखने के लिए. याद है न- यह मेरा प्रेम पत्र पढ़कर या खत लिख दे सांवरिया के नाम बाबू या लिखे जो खत तुम्हें जो तेरी याद में, चिट्ठी आई है या संदेशे आते हैं- जैसे कितने सारे गाने हैं जो आप अपनों के लिए गुनगुनाते हैं. फिल्मों में ही आपने ‘कबूतर जा कबूतर जा’ सुना होगा जिसमें कबूतर के माध्यम से मुझे व्यक्त किया जाता रहा है. या फिर मेरे पिया गये रंगून का टेलीफोन. या किसी बाज़ पक्षी के पंजों से बंधा हुआ संदेश अर्थात मैं कितने ही युद्धों या समझौतों का साक्षी बना. यह सच है कि कबूतर के माध्यम से आज भी उड़ीसा राज्य में डाक सेवा चल रही है और मुझे भेजा जाता है!

राजा महाराजों के लिए घोड़े का प्रयोग संदेशों के लिए सबसे अधिक हुआ है और इसी ने आधुनिक डाक सेवा को जन्म भी दिया है. रेगिस्तान में सांडनियों (ऊंट) के माध्यम से संदेश भेजे जाते थे. आज भी बीएसएफ़ इस सेवा का उपयोग करता है जो एकदम सटीक सेवा है.

आषाढ़ के प्रथम दिवस को विरह की ज्वाला से दग्ध यक्ष ने सीधे-सीधे मेघ को कह दिया कि जा मेरी प्रेयसी को मेरा संदेश दे आ. यह सबको याद है, क्योंकि महाकवि कालिदास ने एक ऐसा साधन संदेश के लिए चुना जो सम्भवतः किसी ने सोचा भी न था. मुझे भी तो आश्चर्य हुआ कि यह मेरा कौन-सा रूप है- पर मेघदूत ने मुझे अमर कर दिया. आप कह सकते हैं कि मेघदूत से मेरी एक नयी तरह की यात्रा प्रारम्भ हुई थी जो अब तक निरंतर चल रही है.

मैं भी क्या चीज़ हूं, कितनी शुष्क शुष्क बातें कर रहा हूं- कहानी में रस नहीं है- कालिदास जी ने जो रस घोला था वह कहां गया? सम्भवतः मनुष्य भावनाओं से मुक्त हो गया है या भावशून्य हो गया है और यही कारण है कि मेरा भी रस समाप्त हो गया, वरना इत्र से सुगंधित होकर जब मैं किसी चाहने वाले के हाथ में पहुंचता तो वह बिना खत पढ़े ही समझ जाता था कि क्या लिखा गया होगा. रक्त से लिखे कितने ही प्रेमपत्रों में मैं किस-किस रूप में लोगों के हाथों गया हूं, कइयों ने तो मुझे चूम-चूम कर निहाल कर दिया. अब क्या हो गया- न कोई इत्र या न कोई रक्तलिखित खत और न ही कोई भावनाएं जो आंसू बनकर खत भिगो दें. मैं तो सारा का सारा इमोजी से बंध गया हूं और वो भी कार्टून की शक्ल में.

खैर किस से कहें ये सब बातें. खुद ही दोहरा लेता हूं अपनी कहानी. अब देखिए न, डाक सेवा की कहानियां अलग-अलग देशों में अलग हैं. अंग्रेज़ी में कहते हैं post जिसका अर्थ होता है केंद्र या स्थान. बहुत पहले यही तो होता था- एक घुड़सवार या पैदल व्यक्ति मुझे लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाता था और उसी रूप में वापसी भी करता था- संदेश लेकर. मैं बात करना चाहूंगा डाक प्रणाली की. कहते हैं हमारे देश में सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने ईसा पूर्व 321 वर्ष पहले डाकसेवा शुरू की थी. वे अपनी सारी गोपनीय रिपोर्ट आदि घुड़सवार के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजते थे. पर वस्तुतः यह सब सुनी सुनाई बातें ही हैं क्योंकि इनका कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं है. इतिहासकारों ने विशेषकर जियाउद्दीन बरनी ने स़ाफ तौर पर यह दर्ज़ किया है कि अल्लाऊद्दीन खिलजी, जो 700 वर्ष पहले दिल्ली के सुल्तान थे, ने 1296 में हरकारों के माध्यम से सुनियोजित डाक सेवा शुरू की थी. इसमें एक नियत स्थान से एक हरकारा डाक लेकर दूसरे नियत स्थान तक जाता था और वहां से दूसरा और फिर तीसरा. यह एक शृंखला की तरह से डाक सेवा थी. बीच में डाक की छंटाई होती थी, वितरण होता था और आगे की योजना होती थी. बहुत ही सुनियोजित तरीका सुल्तान खिलजी ने अपनाया था.

समय आगे बढ़ा और बादशाह बाबर ने अनियमित घुड़सवार डाक सेवा को नियमित कर दिया और उसका सही पोषण किया. महाकवि कालिदास ने यक्ष की विरह वेदना के लिए मेघ को अपना माध्यम बनाया था और अब बाबर ने घोड़ों को संदेशवाहक बना दिया. मेघदूत में मैं सिर्फ भावना के रूप में ही था जबकि अब मुझे एक आकार मिल गया लिखित रूप का. भले ही प्रारम्भ में मुझे भोजपत्र या चमड़े पर लिखकर काम चलाया गया पर बाद में कागज़ भी मेरा साधन बन गया जो आज भी है तो सही.

इतिहास में यह दर्ज़ है कि फ्रांस में वर्ष 1653 में मेगेंशियर डी वेलायर ने एक छोटे-से डाकघर की स्थापना की और अपने ग्राहकों को पत्र की पावती देने की परम्परा की शुरुआत की जिस पर लिखा होता था- परिवहन के भुगतान के लिए रसीद. वहां डिब्बे में पत्र डाले जाते थे और वितरण होता था. परंतु पूर्व प्रदत्त डाक टिकट सबसे पहले ब्रिटेन में जारी हुआ था 6 मई 1840 को. इसे पेनी ब्लैक स्टैम्प नाम दिया गया. इस स्टैम्प पर रानी विक्टोरिया की तस्वीर छपी हुई थी. हैरानी की ही बात है कि प्रारम्भ में स्टैम्प को कोई भाव नहीं दिया गया था. पर वर्ष 1841 तक आते आते 72 लाख स्टैम्प छपे और वितरित हुए. बस इसी को देखते हुए अन्य कई देशों में भी यह प्रणाली लागू हो गयी.

भारत में, जी हां अपने देश में, डाक की शुरुआत ईस्ट इंडिया कंपनी ने वर्ष 1727 में ही कर दी थी पर सही तरीके से एक बड़ा डाकघर चेन्नई में 1786 में बना. यही भारत में डाक का सही प्रारम्भ था. भारत में भी पेनी ब्लैक की देखा-देखी 1852 में पहला पूर्व प्रदत्त डाक टिकट जारी किया गया जो कि आधे आने (उस समय की मुद्रा) का था. वैसे विश्व का पहला सर्कुलर पोस्टल स्टैम्प 1 जुलाई 1852 में छपा जिस पर ईस्ट इंडिया कंपनी का लोगो था और उसे 1 अक्टूबर 1854 को जारी किया गया.

स्टेट ऑफ हैदराबाद अर्थात हैदराबाद राज्य ने चार भाषाओं- यथा अंग्रेज़ी, मराठी, तेलुगू और उर्दू में अपना डाक टिकट जारी किया था जो अपने आप में एक नया प्रयोग था. ये सभी टिकट अधिकांश रूप में सरकारी प्रेस में ही छपते थे परंतु कुछ टिकट किशनगंज और जयपुर की प्रेस में भी छापे गये. यहां तक कि 1947 में तो टाइम्स ऑ़फ इंडिया की प्रेस में भी डाक टिकट छापे गये थे.

यह भी जान लीजिए कि पूरी दुनिया में केवल हमारे महात्मा गांधी ही हैं जिन पर 43 से अधिक देशों ने डाक टिकट जारी किये हैं. कहा जाता है कि लगभग 80 प्रकार के टिकट गांधीजी पर निकाले गये हैं. हमारे देश की ही विशेषता है कि यहां राजस्थान में ऊंट डाक सेवा है तो उड़ीसा में कबूतर और सियाचिन में कुत्तों की डाक सेवा है. है ना मज़ेदार बात!

आंकड़ों की बात करें तो हमारे देश में लगभग 153454 डाकघर हैं जो कि विश्व में सबसे अधिक हैं और लगभग 604341 शहरों, कस्बों या गावों में 562000 डाक डिब्बे हैं. अब आप कहेंगे कि मेघदूत से बढ़कर हम इन डिब्बों तक आ गये हैं फिर भी मैं परेशान-सा क्यों हूं. आप बताएं आपने अंतिम खत कब लिखा था? याद नहीं है न? इतना बड़ा डाक-तंत्र होते हुए भी हम सिमट गये हैं केवल छोटे-छोटे व्हाट्स अॅप के संदेश तक. क्या यह बदलते स्वरूप का एक भाग है या मनुष्य की बदलती भावनाओं का प्रतिबिम्ब. कुछ भी हो, मेरी परेशानी का तो एक कारण है ही.

खैर, अब तक का किस्सा मेरे लिखित या मुद्रित रूप का था. खूब चला. मौखिक भी कभी टेल़ीफोन से तो कभी आमने-सामने मैं खूब चला. कभी टार्जन की हुआं हुआं से तो कभी ढोल-नगाड़ों की ध्वनि से. परंतु इस बीच आया तार- टेलीग्राम. एक छोटी-सी मशीन से टिक-टाक टिक-टाक की आवाज़ों में बंद होकर मैंने अपना आकार बदला, रूप बदला पर भावनाएं लेकर ही चला. बचपन में माचिस की दो खाली डिब्बियों के धागा बांध कर अपने मित्रों से आपने खूब सारी बातें की होंगी- यह था मेरा टेलीफोन का आदि रूप जो आगे जाकर वीडियो फोन भी बन गया. और साहब अब तो मोबाइल ने आकर सारी दूरियां मुट्ठी में ही बंद कर दीं हैं.

पौराणिक कथाओं में मेरे अर्थात संदेश के लिए आकाशवाणी थी या फिर नारद मुनि जी जो इधर से उधर क्षणभर में पहुंच कर काम की बात कह आते थे. यह  मोबाइल  कुछ-कुछ पौराणिक कथाओं का ही एक साधन लगता है- सब कुछ तो है इसमें. बस एक ही बात नहीं है कि ल़िफ़ाफा देखकर मजमून भांपने की स्थिति. अब न वो बंद ल़िफ़ाफे रहे और न ही रहा वो गरीब का पोस्ट कार्ड.

बंद ल़िफ़ाफों की दबी छुपी भावनाएं अब खुल्लम-खुल्ला होकर इमोजी बन गयी हैं. अब ल़िफ़ाफे को देखकर कोई गुदगुदी नहीं होती और न ही कोई देवर या ननद उसे लेकर परेशान करते हैं. अब गांव की कोई गोरी डाकिये को रोककर कोई खत लिखवाती, न ही अपनी चिट्ठी पढ़वाती है. वो दिन हवा हुए जब यह सब करते हुए वो गोरी धरती में पैर का अंगूठा गाड़े गाड़े धरती हो जाती और आकाश के साथ उड़ उड़ जाती. अब तो बस रीचार्ज करवा लो और शुरू हो जाओ! बादल बरसे या बिजली गरजे या आये कोई विरह की लहर- कुछ भी नहीं होता. अब मेघ महाराज जायें लम्बी छुट्टी पर, कोई फर्क नहीं पड़ता. मोबाइल है न!

मोबाइल आया तो मुझे लगा कि बस अब सब कुछ मौखिक ही होगा. पर नहीं, इनसान ने खोज लिया एसएमएस का रास्ता अर्थात शॉर्ट मैसेज सिस्टम- देखा जाये तो मेरा तो गला ही घोंट दिया गया. छोटे-से छोटा कर दिया गया. जो जो सार्थक शब्द थे उन्हें नये रूप का जामा पहना दिया गया और लोग भूल गये प्रेम की पाती, विरह के गीत, भक्ति के दोहे, कुशलक्षेम की खत, खुशी या गम के न्योते- सब कुछ सिमट गया चंद शब्दों में.

रही सही कसर पूरी हुई इस व्हाट्स अप के आगमन से जिसे हिंदी में कहें तो ‘क्या हाल है’. यही व्हाट्स अप ‘परिष्कृत’ होकर व्हाट्स अॅप बन गया. सुनने में लगता है न की गली का कोई दादा आप से कह रहा हो कि क्यों बे क्या हाल है? यह है आधुनिक मेघदूत, जी हां सही मायने में तभी तो लोग कहते हैं न कि क्लाउड में सेव कर लो अपनी सारी फ़ाइलें. यह आधुनिक मेघदूत बिल्कुल अलादीन के जिन्न की तरह से है जो बात बात पर यह कहता है कि क्या हुकुम है मेरे आका- बस एक बटन दबायें और आपका संदेश क्षणभर में दुनिया के किसी भी कोने में झट से पहुंच जाता है. मैं तो बस आपकी एक बटन का मुरीद बन कर रह गया. है तो यह मेघदूत से भी अधिक तेज़, बहुत ही तेज़. आपको नंबर की ज़रूरत है- इनसान की नहीं बस नंबर की. फिर भले ही आपका रिश्ता कैसा भी हो. रिश्ते सारे नंबर हो गये हैं.

पर क्या यह आधुनिक मेघदूत- व्हाट्स अॅप- मां की ममता, पिता का दुलार, भाई बहन की मनुहार, प्रेयसी का प्यार और सगे सम्बंधियों की आपसी गुहार ये सब व्यक्त कर सकता है. सोचिए क्या इन्हें पढ़कर मन में कोई विचार आता है. कई बार तो बहुत सारे संदेश आप बिना पढ़े ही डिलीट कर देते हैं या आगे भेज देते हैं और बड़बड़ाते हैं कि यह बहुत ही पकाता है. सारा अपनापन तो खत्म-सा लगता है. पोस्ट कार्ड हाथ के स्पर्श को लेकर चलता है जो डिब्बे से होता हुआ पोस्ट ऑफिस के माध्यम से आपके पास पहुंच ही जाता है और आप अपनों के स्पर्श को महसूस कर सकते हैं, पर व्हाट्स अॅप में यह सुख कहां है जी! मुझे इलेक्ट्रॉनिक रूप देकर मनुष्य ने नया रूप भले ही दे दिया हो और अपने लिए मेघदूत से भी अधिक विश्वसनीय साधन तो ढूंढ़ लिया हो, पर संवेदना खो दी है.

मुझे कोई गम नहीं है कि मैं आज मृतप्राय हो गया है. बस सोचता हूं कि कभी कविगुरु कालिदास ने मुझे इस रूप में देख लिया तो क्या कहेंगे? उनका यक्ष किससे बातें करेगा? दुख इस बात का नहीं है कि मैं आज कवियों और शायरों की दुनिया से अलग हो गया हूं, दुख इस बात का भी नहीं है कि मैं अपनी भाषा खो बैठा हूं, दुख यह भी नहीं है कि मुझे एक नया रूप मिल गया है, बस दुख तो इस बात का है कि मैं अब मनुष्य की पूरी भावना की अभियक्ति नहीं कर पा रहा हूं. वैसे, यह मेरा दुख है. उसका शायद न हो जो मेरे माध्यम से दूसरे तक पहुंचना चाहता है. आखिर दुनिया बदली है, आदमी बदला है. भावनाओं का स्वरूप भी बदल गया हो शायद!       

(जनवरी 2016)

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