मृत्यु का तर्पण

♦  काका कालेलकर    >

ब कोई कहेंगे कि मरण सर्वथा अनिष्ट है. लेकिन क्या यह आवाज़ सही है? मनुष्य कोअपना और अपने आत्मीयों का मरण भले ही अनिष्ट मालूम होता हो, लेकिन उसे दूसरे लोगों के मरने पर विशेष एतराज नहीं दीख पड़ता.

व्यापक दृष्टि से देखा जाय, तो मनुष्य आहार के लिए, शिकार के लिए या मनोविनोद के लिए जिन पशु-पक्षियों को मारता है, उनका मरण तो उसे इष्ट ही मालूम होता है. जब हम कोई सड़ी चीज़ सुखाने के लिए धूप में रख देते हैं, तब हम उसमें पैदा हुए जंतुओं का मरण ही चाहते हैं. जब हम पीने का पानी उबालते हैं, तब हम उसके अंदर रहने वाले असंख्य जंतुओं का मरण ही चाहते हैं. डाक्टर लोग जब जंतुनाशक (एंटीसैप्टिक) दवाओं का उपभोग करते हैं, तब वे पांच-दस या सौ-पचास ही नहीं, बल्कि कोट्यावधि जंतुओं का संहार चाहते हैं.

इस तरह, यदि देखा जाय तो हम मरण कदम-कदम पर चाहते हैं, मरण की सहायता लेते हैं और मरण के लिए पूरा मसाला तैयार करके रखते हैं.

अब मनुष्य मनुष्य के बीच के व्यवहार का विचार करें. आजकल के महायुद्धों में क्या चल रहा है? जर्मन लोग लंदनवासियों  का संहार करना चाहते हैं और ब्रिटिश बौम्बर जर्मनों का सत्यानाश करने पर खुश हो जाते हैं. यह कौन यह सकता है कि मनुष्य का मरण भी सब लोग अनिष्ट ही मानते हैं? जब कोई न्यायाधीश किसी खूनी शख्स को फांसी की सजा देना चाहता है, तब वह खूनी व्यक्ति और वह न्यायाधीश, दोनों मृत्यु के ही प्रेमी होते हैं. खूनी व्यक्ति ने अपने दुश्मन का मरण चाहा, इसलिए न्यायाधीश ने समाज का प्रतिनिधि बनकर खूनी का मरण चाहा. एक का कृत्य समाज-द्रोह माना गया, दूसरे का समाज-सेवा. इनमें फर्क होते हुए भी दोनों मृत्यु के ही खैरख्वाह साबित हुए, इसमें शक नहीं है.

और क्या मनुष्य अपनी मृत्यु भी हमेशा अनिष्ट ही समझता है? निराश होकर आत्महत्या करने के लिए जो तैयार हुआ है, ऐसे दुर्दैवी आदमी से जाकर पूछिए कि क्या वह मृत्यु को अनिष्ट समझता है? और उन बूढ़े-बूढ़ियों को भी पूछ लीजिए, जिनकी भोगेंद्रिय और ज्ञानेद्रियों ने तो उनसे रुखसत ले ली है, लेकिन लोभ और प्राण जिन्हें नहीं छोड़ रहे हैं, वे भी कहेंगे कि हम दिन-रात भगवान से यही प्रार्थना कर रहे हैं कि वह हमें मौत का आराम प्रदान करें. और प्रेमी जीव भी कई दफा यही चाहते हैं कि उनके प्रियतम की अंतिम पीड़ा दूर करने के लिए अगर मरण ही एकमात्र चारा हो, तो उस निष्ठावान मित्र को भेजने में भगवान क्षण की भी देरी न करें.

महादजी शिंदे के एक सरदार को दुश्मनों ने तोप के सामने खड़ा करके उड़ा दिया. छिन्न-भिन्न होकर वह किले की दीवार के नीचे गिर पड़ा. लेकिन उसके प्राण नहीं निकले. असह्य पीड़ा से व्याकुल होकर वह इसका इंतजार कर रहा था कि किसी दयालु राहगीर की मदद से वह मरण का साक्षात्कार कर ले. जब ऐसा एक पथिक मित्र मिल गया, तब उसने स्वाभाविक पूर्वक मरण-दान की याचना की.

कायर होकर जीवन-दान मांगने वाले बहुत होते हैं, लेकिन मस्त होकर मरण-दान की याचना करने वाले भी कभी-कभी निकल आते हैं.

अगर दुनिया में मरण न होता तो नये-नये प्राणी जन्म भी न लेते. जन्म और मरण एक ही सिक्के के दो बाजू हैं. मरण है, इसीलिए दुनिया का जमा-खर्च ठीक रहता है. मरण से कोई नफरत न करे. वह सबका परम मित्र है, वह सर्व-समर्थ है, उसने कभी किसी को निराश नहीं किया है.

आश्चर्य की बात यह है कि हरएक प्राणी मरणशील होते हुए भी मरण को कोई ठीक रूप से पहचानता नहीं. सामान्य लोग मरण  से इतने डरते हैं कि असल में मरण क्या चीज़ है, यह कोई सोचता ही नहीं. मृत्यु के समय शरीर में असह्य वेदना होती है, इसलिए लोग मरण से नफरत करते हैं. रोग होने पर उसे दूर करने के लिए डाक्टर हमारे पास आता है, उस डाक्टर को ही दुष्ट समझना कितना न्याय है, उतना ही, जब आदमी को रोग, प्रहार अथवा निराशा या ऐसा ही कोई आघात असह्य होता हो, जब उसकी व्यथा को दूर करने के लिए जो मरण आता है, उसे दोषी समझना न्याय है. जब कोई आदमी चिंता, अपमान या किसी रोग के कारण अपनी शैया पर करीब-करीब रात भर तड़पता रहता है और अंत में दयालु निद्रा आकर उसे शांत करती है, तब कोई यह नहीं कहता कि निद्रा ही उसकी बैरिन है. एक अंग्रेज़ कवि ने अपने निद्रास्तोत्र में नींद को ‘मनुष्यों की दयालु दाई’ (काइंड नर्स ऑव मैन) कहा है. मरण के साथ भी अगर इन्साफ करना है, तो उसे मनुष्य का परम सखा कहना चाहिए. बड़े-बड़े धन्वंतरि और मनोवैज्ञानिक, जो शांति और सांत्वना मनुष्य को नहीं दे सकते, वह यह परम सखा निश्चित और स्थायी रूप से प्रदान करता है.

लोग कहते है, “इस तरह मरण का काव्यमय वर्णन करने से वह प्रिय थोड़े ही हो सकता है?” बात सही है; मरण इतना अनिवार्य और अवश्यंभावी है कि उसकी सिफारिश करके उसको स्वीकार कराने की ज़रूरत ही नहीं. हमें तो सिर्फ दुःख और दुःख के बीच का बड़ा भेद बताना है. जीवन से वियोग होने के कारण आदमी को जो दुःख होता है, वह दुःख अलग है और मरण के पूर्व जो शारीरिक वेदना होती है, उसका दुःख अलग है. दोनों के लिए मरण का कुछ भी उत्तरदायित्व नहीं है, मरण तो अपना सेवा-कार्य कर देता है और मनुष्य को दुःख मुक्त करता है, इतना ही हमें बताना है.

गीता में कहा है कि जैसे कपड़े पुराने होने पर हम नये कपड़े पहन लेते हैं, उसी तरह एक देह के जीर्ण होने पर उसे छोड़कर मनुष्य दूसरी देह ले लेता है, इसमें दुःख करने का क्या कारण है?

यह आश्वासन सार्वत्रिक नहीं हो सकता है. जब कोई नौजवान, उसकी सारी शारीरिक और मानसिक शक्तियां उत्कृष्ट हालत में होते हुए भी, मारा जाता है अथवा किसी दुर्घटना से मर जाता है, तब हम यह आश्वासन कैसे ले सकते हैं कि जो वत्र फेंका गया, वह पुराना था? अभिमन्यु जब चक्रव्यूह में मारा गया, तब क्या अर्जुन यह मान सकता था कि उसके लड़के का शरीर जीर्ण-शीर्ण हो गया था, इसलिए वह उसने छोड़ दिया और अर्जुन का अपना शरीर इतना जीर्ण नहीं हुआ था, इसी वास्ते उसका देहपात नहीं हुआ.

आश्वासन तो इस विश्वास से मिल सकेगा कि वत्र के बिना कोई जीवात्मा रह ही नहीं सकता. जो वत्र फेंका गया, वह चाहे जीर्ण हो या नया, उसे फेंक देते ही दूसरा वत्र (देह) मिलने ही वाला है. प्राणियों के लिए देह धारण अवश्यंभावी है,  यही एक आश्वासन हो सकता है.

इस प्रश्न की ओर अब हम एक दूसरी दृष्टि से देखें. हमारी मोक्ष की कल्पना क्या है? हम चाहते हैं कि एक दफा शरीर छूट जाने पर फिर से शरीर धारण करना ही न पड़े. कबीर ने ठीक ही कहा है कि मनुष्य को मरना भी तो सीखना चाहिए. मरना ही है तो ऐसा मरे कि फिर से जीना ही न पड़े. जो लोग मृत्यु से डरते हैं, वे जीवन चाहते हैं. जिन लोगों ने दैहिक जीवन के देहधारी अवस्था के, स्वरूप को अच्छी तरह से जान लिया है, वे तो जीवन से ही घबड़ाते हैं, मृत्यु से नहीं. वे कहते हैं, “कच्चे मरने से फिर से जन्म लेना पड़ता है. अगर कोई चीज़ खराब है तो जीवन है.” बौद्ध लोग भी जीवन के बंधन से मुक्त होकर निर्वाण की शून्यता में प्रवेश करना चाहते हैं.

“तब जीवन क्या है?” यही सवाल हमारे सामने खड़ा हो जाता है. “जीवन एक साधना है या सज़ा है?”

जब तक हम जीवन को नहीं पहचानते, तब तक मरण को भी नहीं पहचान सकेंगे. बचपन से ही हमने यह मान लिया है कि जीवन और मरण परस्पर-व्यावर्तक हैं, परस्पर-विरोधी हैं. “जहां प्रकाश नहीं, वहां अंधेरा है, उसी तरह जहां मरण आ गया, वहां जीवन खतम हुआ.” यह उपमा यहां जान-बूझकर उल्टे रूप में दी है. इसका उल्टा रूप हो ही नहीं सकता. क्या हम यह कहें कि “जहां अंधेरा नहीं है, वहां प्रकाश है. अथवा जहां मरण नहीं, वहां जीवन है?” सच देखा जाय तो मरण का जीवन पर कुछ भी असर नहीं होता. जीवन के लिए मरण की उतनी ही कीमत है, जितनी देखती हुई आंखों के लिए पलक मारने की. मरण सचमुच जीवन में न तो कोई बाधा डाल सकता है, न उसको घटा या बढ़ा सकता है. जीवन तो निरंतर जारी ही है. अनेक मृत्यु आ जाएं, तो भी जीवन का प्रवाह नाटक के जैसा है, वरना नाटक भार-रूप हो जाता.

मरण अवश्यंभावी है, इसमें तो संदेह नहीं है. किंतु “मरण की उपयोगिता क्या है? अगर वह उपयोगी है, तो ऋतुचक्र के समान वह निश्चित समय पर क्यों नहीं आता?”

मरण की उपयोगिता वही है जो गणित में स्लेट बदलने की होती है. गणित का सवाल करते-करते जब एक स्लेट भर जाती है, तब आगे के लिए जितने आंकड़े काम के हों, उतने नई स्लेट पर लिख लिये जाते हैं और बाकी का सारा विस्तार मिटा दिया जाता है. अगर हम ऐसा न करें तो, स्लेट फिर से काम नहीं आयेगी और गणित भी आगे नहीं बढ़ेगा. एक जीवन में हम जो कुछ कमाते हैं, वह सब हमें वहीं-का-वहीं छोड़ देना है. लेकिन हम जो कुछ आंतरिक लाभ पाते हैं, उसे लेकर आगे बढ़ते हैं. ‘परस्मैपदी’ लाभ इस आयु के लिए है. ‘आत्मनेपदी’ लाभ जन्म-जन्मांतर के काम आते हैं. ‘परस्मैपदी’ लाभों का बोझ अगर बढ़ता चला जाय तो आदमी को देखते-देखते बुढ़ापा ग्रस लेगा और नये-नये अनुभव लेने की उसकी क्षमता ही नष्ट हो जायगी. ऐसे महान अभिशाप से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है मरण.

जीवन और मरण का विचार करते-करते पुनर्जन्म पर आ गये. लोगों का सामान्यतः ऐसा ख्याल है कि जिस तरह हम पानी, दूध या चावल एक बर्तन से निकालकर दूसरे बर्तन में भर देते हैं, उसी तरह जीवात्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करता है. कोई-कोई ऐसा मानते हैं कि यह जीवात्मा नित्य है और अनंत है. दूसरे कहते हैं, जीवात्मा का उतना ही स्वतंत्र अस्तित्व है, जितना किसी घड़े में भरे हुए ‘घटाकाश’ का. आकाश तो सर्वत्र एकरूप ही है, व्यक्तित्व आकाश का नहीं था; किंतु घट की आकृति से कुछ काल के लिए उत्पन्न हुआ था. बौद्ध लोग ऐसे आकाश को ‘शून्य’ कहते हैं और घट को ‘संस्कार-समुच्चय’ कहते हैं. फलतः वे आत्मा का स्वीकार नहीं कर सकते. जो आत्मा सर्वगत है, वह ‘शून्य’ हो या ‘ब्रह्म’, व्यक्तित्व की दृष्टि से एक ही हैं. और जब जीवात्मा मायारूप ही है, तब मरण का उस पर कोई असर होने का कारण ही नहीं.

मरण होने पर यह व्यक्तित्व कहां जाता है? यह कहना कि विष्णु लोक में जाता है, इंद्रलोक में जाता है, बच्चों का समाधान करना है. और फिर जब पता चला कि यह कल्पनामात्र है, तब उसे छोड़ देने की अपेक्षा उस कल्पना को रूपक मानकर हम उसमें से कुछ-न-कुछ दार्शनिक या आध्यात्मिक अर्थ निकालने की चेष्टा करते हैं. शुद्ध बुद्धि कहती है कि जिस तरह नमक या मिश्री का टुकड़ा पानी में गिरते ही घुल जाता है, उसी तरह मनुष्य का व्यक्तित्व उसके आसपास के सम्बद्ध सामाजिक जीवन में विलीन हो जाता है. आदमी ने जो कुछ भला या बुरा किया हो, वह उसका शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक कर्म ही उसकी आत्मा थी.  उसका जो कुछ असर समाज पर हुआ होगा, वही उसका मरणोत्तर जीवन है. मरण के पहले मनुष्य प्रधानतया अपने शरीर में रहता था और उस केंद्र को सम्हालते हुए वह अपने व्यक्तित्व को इस समाज में या विश्व में चाहे जितना बढ़ा सकता था. मरण के बाद वह शारीरिक केंद्र नष्ट होता है, किंतु जब तक उसके व्यक्तित्व की स्मृति बनी रहती है, तब तक उसका जीवन जारी ही है. उसका जो कुछ भला या बुरा कर्म समाज पर असर करता है, वही उसका मरणोत्तर जीवन है. ठंडे कमरे में जब हम एक अंगीठी रखते हैं, तब कमरे की हवा में जो उष्णता आती है, उसकी अपेक्षा अंगीठी की उष्णता ज्यादा होती है. वही उसका व्यक्तित्व है. जब अंगीठी का कोयला खत्म हो जाता है, तब अंगीठी की सारी-की-सारी उष्णता कमरे को मिल जाती है. तब तो कमरे के अंदर  की सब उष्णता सम-समान हो गयी. जो उष्णता अंगीठी के कोयले में थी, वह सारे   कमरे में फैल गयी. अंगीठी ने कमरे के जितना व्यापक रूप धारण कर लिया और उसका मोक्ष हो गया. अंगीठी के कोयले मर गये; लेकिन उसकी उष्णता कमरे की गरमी के रूप में जीवित है. यही अंगीठी का मरणोत्तर जीवन है.

जब हम कमरे के दरवाजे और खिड़कियां खोल देते हैं, तब अंदर की उष्णता बाहर की हवा में विलीन हो जाती है. कितना भी अत्यल्प क्यों न हो, उस उष्णता का लाभ सारे वायुमंडल को मिल ही जाता है.

मनुष्य के मरने पर उसका जीवात्मा कहिए या संस्कार-समुच्चय कहिए, उसके व्यक्तिगत वायुमंडल में या परिस्थिति में विलीन हो जाता है और अंत में वही सारे समाज में संस्कृति के रूप में रह जाता है. व्यक्तियों का सामुदायिक मरणोत्तर जीवन ही संस्कृति है. इसलिए संस्कृति को समाज की आत्मा कहना चाहिए. असंख्य जीवात्माएं मिलकर यह सामाजिक विराटात्मा हम पाते हैं. व्यक्ति की कीर्ति जीवात्मा की छाया है. समाज की प्रतिष्ठा और उसकी क्षमता सामाजिक आत्मा का व्यक्त स्वरूप है.

इस सामाजिक आत्मा की सेवा हम जीवन के ही द्वारा कर सकते हैं. मरण है तो जीवन का एक आवश्यक पहलू. इसलिए जब हम मौके पर मरना नहीं जानते, तब हमारा जीवन क्षीण और व्यर्थ हो जाता है. मरण में हमेशा जीवनद्रोह नहीं होता. जो लोग मौके पर मरण को स्वीकार नहीं करते, उनका जीवन निस्तेज, भाररूप  और व्यर्थ हो जाता है. उसके बाद उनके लिए ‘यज्जीवति तन्मरणं, यन्मरण’ सोस्याविश्रांति’- वह जितना जीता है, वह उनके व्यक्तित्व का मरण है और बाद में जो शारीरिक मरण आता है, वह उनकी विश्रांति है.

 

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