‘मुझे इसी पथ पर चलते रहना है’

(विंसेन्ट वान गॉग का पत्र भाई के नाम)

महान चित्रकार विंसेन्ट वान गॉग का यह पत्र जीवन, प्रेम और कला के प्रति उनकी गहरी अंतर्दृष्टि का परिचय देता है.

जुलाई, 1880

प्रिय थियो,

तुम्हें अरसे से कुछ लिख नहीं पाया, इसलिए कुछ झिझकते हुए लिख रहा हूं. एक हद तक तुम मेरे लिए अजनबी हो गये हो, और मैं तुम्हारे लिए. शायद हमारे हित में यही होगा कि यह रिश्ता और न घिसटे. वैसे यकीन मानो अगर यह लिखना इतना ज़रूरी न होता तो मैं तुम्हें अभी बख्श भी देता. किंतु इसकी तह में भी तुम ही हो. एट्टन में मुझे पता लगा कि तुमने मेरे लिए पचास फ्रैंक भेजे हैं. मैंने उन्हें रख लिया है, ज़ाहिर है, झिझकते हुए और एक गहरी पीड़ा के साथ ही. मैं इस वक्त बड़ी मुसीबत में हूं और एक बहुत मुश्किल दौर से गुज़र रहा हूं. मैं और कर भी क्या सकता हूं? तुम्हारा आभारी हूं.

शायद तुम्हें पता चल गया होगा कि मैं बोरीनाज़ लौट आया हूं. पिताजी चाहते थे कि मैं एट्टन के नज़दीक ही बना रहूं ः लेकिन मुझे ठीक नहीं लगा. मुझे लगता है, मैंने ठीक ही किया. न चाहते हुए भी मैं उस घर में एक बहुत ही दुरूह और संदेहास्पद व्यक्ति हो गया हूं. शायद उन्हें मुझ पर कोई भरोसा नहीं रहा. इस स्थिति में मैं किसी के क्या काम आ सकता हूं? इस सबके चलते मुझे यही सही लगा कि मैं कहीं और चला जाऊं, तुम सबसे इतनी सुविधाजनक दूरी पर रहूं कि तुम्हारे लिए लगभग न के बराबर होऊं.

मैं जानता हूं कि परिवार के खोये हुए विश्वास को दोबारा पाना अब लगभग असम्भव ही है, फिर भी न जाने क्यों मुझे उम्मीद है कि धीरे-धीरे एक दिन हमारे सम्बंध फिर पहले-से हो जायेंगे और हम फिर एक बार अपने को बेहतर समझ के दायरे में पायेंगे. मैं चाहता हूं कि मेरे और पिताजी के बीच एक समझ व सौहार्द्र बन पाये, और मेरे और तुम्हारे बीच की यह खाई खत्म हो जाये. एक बुनियादी सौहार्द्र, बार-बार की गलतफहमियों से बेहतर है.

अब मैं तुम्हें कुछ अमूर्त तथ्यों से बोर करूंगा, लेकिन साथ ही चाहूंगा कि तुम यह सब धीरज के साथ सुनो. मैं एक बहुत भावनात्मक व्यक्ति हूं, इसी से कई बार मूर्खतापूर्ण हरकतें कर बैठता हूं, जिसका बाद में मुझे पछतावा होता है. जहां मुझे धीरज से पेश आना चाहिए, वहां मैं हमेशा ही कुछ ऐसा कर जाता हूं कि बाद में सिर्फ पछताना ही बचता है. हो सकता है दूसरे भी ऐसी गलतियां करते हों. खैर, अपने बारे में, मुझे नहीं सूझता मुझे क्या करना चाहिए. क्या मुझे स्वयं को एक खतरनाक व्यक्ति मान लेना चाहिए, जो बिल्कुल नालायक है? शायद नहीं. परंतु दिक्कत यह है कि इन सारे आवेगों-संवेगों को सही दिशा में कैसे मोड़ा जाये? मिसाल के लिए किताबों को लेकर मुझमें एक उत्कट आकर्षण है और मेरी हमेशा यही इच्छा रहती है कि मैं खुद को और बेहतर करूं, और पढूं, और गुनूं. पढ़ने की ऐसी लालसा मेरे भीतर है जैसी रोटी की. तुम निश्चय ही यह समझ पाओगे. तुम तो जानते हो कि कभी चित्रों और कलाकृतियों के लिए कैसा पागल था? उस दीवानेपन के लिए मैं आज भी शर्मिंदा नहीं हूं. विश्वास करो, आज भी उस संसार से दूर, मैं उसके लिए तड़पता हूं.

तुम्हें याद होगा कि तब मुझे बखूबी पता था, शायद अब भी पता है… कि रेम्ब्रां कौन था, या कि मिले, जूल्स दुप्रे, देलाक्रॉय, मिलाई या एम. मारी कौन थे! अब वह वातावरण नहीं रहा. फिर भी आत्मा नामक वह तत्त्व, कहते हैं वह तो कभी नहीं मरता, अमर है और सदा किसी न किसी खेल में रत है. तो उस संसार को बिसूरने के बजाय मैंने अपने-आप से कहा… वह संसार, वह मातृभूमि तो सब तरफ है. इस तरह एक गहरे अवसाद में गिरने के बजाय मैंने अपने दुख को एक रचनात्मक मोड़ दे दिया. दूसरे शब्दों में मैंने एक आशावान दुख को एक ठहरे और भारी अवसाद के ऊपर तरजीह दी. और फिर मैंने गम्भीरता से
उन पुस्तकों का अध्ययन किया जो मेरे आसपास थीं, जैसे बाइबिल और मिश्लेट का
फ्रेंच रिवोल्युशन.

इन चीज़ों में डूबा रहनेवाला व्यक्ति कई बार दूसरों को चौंकाता है और कई बार अपने अनजाने में समाज के नियमों तथा रीति-रिवाजों के प्रति अन्याय भी करता है. हालांकि यह अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसको इतने बुरे रूप में लिया जाता है. तुम तो जानते हो, मैंने कभी अपने पहनावे पर उतना ध्यान नहीं दिया. मैं मानता हूं कि यह एक हद तक अभद्रता है. पर इसमें गरीबी और मजबूरी का भी अपना योग है और भरपूर निराशा का भी. कभी-कभी एक अभीप्सित एकांत के लिए यह निहायत ज़रूरी भी लगता है. ऐसा एकांत जो ज़रूरी अध्ययनों में एकाग्र होने का अवकाश दे सकता है. जब ये सारा कुछ आपको घेरे रहता है, स्वप्न दिखाता है तो फिर विचार और चिंतन के लिए सामग्री भी यही जुटाता है. और यूं जो कुछ ये दिखाये, वही देखना होता है.

अब देखो, लगभग पांच बरस से मैं एकदम बेरोज़गार हूं, यहां वहां भटकती हुई आत्मा-सा. तुम्हारा कहना है कि अमुक समय से मेरा पतन होता गया है, मेरे स्तर में गिरावट आयी है, या कि मैंने कुछ भी नहीं किया है. किंतु वास्तव में क्या यह सच है?

यह सही है कि मैं जैसे रह सका, रहा. कुछ बेतरतीब ही सही. यह सच है कि इस बीच मैंने कइयों का विश्वास खो दिया, यह सच है कि मेरी आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब है, यह सच है कि भविष्य अंधकारमय है, यह सच है कि मैं इससे बेहतर कर सकता था; यह सच है कि मैंने बहुत समय गंवा दिया है, यह भी सच है कि मेरी पढ़ाई-लिखाई भी लगभग चौपट हो चुकी है और मेरी ज़रूरतें, मेरी मांगें, मेरे साधनों से कहीं अधिक हैं. किंतु क्या इसी को तुम मेरा पतन कह रहे हो? क्या इसी का अर्थ तुम्हारे लिए ‘निक्रियता’ है?

लेकिन अब जिस पथ पर मैं हूं, उसपर मुझे चलते रहना है. अब अगर मैं कुछ नहीं करता हूं, नहीं पढ़ता हूं, लगातार अपनी खोज में जुटा नहीं रहता हूं, तो मेरा कोई ठौर नहीं है. मैं इसको इसी तरह देखता हूं… निरंतर चलते रहना, केवल यही ज़रूरी है.

पर तुम मेरा लक्ष्य पूछोगे.

वह लक्ष्य धीरे-धीरे स्पष्ट होता जायेगा, वैसे ही जैसे एक ड्राफ्ट से एक स्केच निकलता है और फिर वही मंजते-मंजते एक चित्र बनता है. ज़रूरत होती है केवल उस पर गम्भीरता से डटे रहने की, उस विचार पर मनन करते रहने की, जब तक वह स्पष्ट रूप से एक दृश्य में नहीं बदल जाता.

तुम्हें यह जानकर अचरज होगा कि इवेन्जलिस्टों के साथ कुछ-कुछ वही बात है जो कलाकारों के. एक पुरानी अकादमी है, बहुत घृणित तानाशाह और भयानक लोगों की, जो मुखौटे पहनते हैं और एक कवच, पुरातन रीतियों और पूर्वग्रहों का… और जब शासन की बागडोर इनके हाथ में होती है… तब ये लालफीताशाही के उन तरीकों से ओहदे बांटते हैं जिसमें उनके चापलूसों को भीतर और अन्य को सहूलियत से बाहर रखा जा सके. चर्च का वह हॉल और उनका ईश्वर शेक्सपियर के ईश्वर की ही तरह एक शराबी फालस्टाफ है. इनमें से कई महानुभाव आध्यात्मिक मुद्दों पर कमोबेश वही विचार रखते हैं जो नशे में धुत्त फालस्टाफ रखता है… अगर उनमें लेशमात्र भी मानवीय करुणा होती तो वे स्वयं इससे अचंभित हेते… किंतु उनके अंधेपन के निदान का दूर-दूर तक कहीं कोई खतरा नहीं है.

मौजूदा परिस्थिति उस व्यक्ति के लिए तो अत्यंत ही गड़बड़ है, जो इससे असहमत है और पूरी शिद्दत से इसके विरोध में खड़ा है. मैं आज बेरोज़गार हूं या बरसों से बेरोज़गार हूं तो केवल इसलिए कि मेरे विचार उन लोगों के विचारों से भिन्न हैं, जो नौकरियां देते हैं… और ज़ाहिर है कि वे उन्हें ही अपने तंत्र के भीतर लेते हैं, जो वैसा ही सोच रखता हो. यह सिर्फ मेरे पहनावे की वजह से नहीं है, जिसको लेकर मुझ पर जब-तब फब्तियां कसी जाती हैं, बल्कि इसकी वजह कहीं अधिक गम्भीर और गहरी है, यह मैं तुम्हें निश्चित तौर पर कह सकता हूं.

लेकिन मैं तुम्हें यह सब क्यों बता रहा हूं… सच मानो तो किसी शिकायत के लहजे में और न ही किसी भी तरह के बहाने के तौर पर ही. मैं तो सिर्फ तुम्हारी बात के जवाब में यह सब कह रहा हूं. जब तुम पिछली गर्मियों में यहां आये थे और हम ला सौसियरे तक घूमने गये थे, तुमने उस सैर को याद किया था, जब हम रिज्वीक की पुरानी नहर तक घूमने गये थे, और तब तुमने कहा था- ‘हमारे विचार बहुत चीज़ों पर मिलते थे,’ और इसके बाद तुमने जोड़ा… ‘तबसे तुम बहुत बदल गये हो. तुम अब वह विंसेन्ट नहीं रहे.’ यह सही नहीं है. जो बदला है वह सिर्फ यह है कि तब मेरी ज़िंदगी कम मुश्किल और मेरा कल कम अंधकारमय था. मेरी अंतरात्मा, मेरा दृष्टिकोण, मेरा सोच तो अब भी वैसा ही है. बदलाव आया है, तो सिर्फ इतना कि अब मैं पहले से कहीं अधिक गहराई से सोचता हूं, अधिक गम्भीरता से भरोसा करता हूं और थोड़ी ज़्यादा शिद्दत से प्रेम करता हूं. इस तरह तुम्हारा यह मत बिल्कुल गलत है कि पहले की अपेक्षा अब मुझे रेम्ब्रां, मिले या देलाक्रॉय को लेकर कम उत्साहित होना चाहिए. चूंकि स्थिति इससे भिन्न ही नहीं, विपरीत है. ये किताबें और ये कलाकार ही क्यों, और भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे हमें प्रेम करना चाहिए, जिसपर हमें विश्वास करना चाहिए.

तो अगर तुम एक व्यक्ति को चित्रों के गम्भीर अध्ययन-मनन के लिए क्षमा कर सकते हो तो इसके लिए भी कर देना कि पुस्तकों के प्रति उसका प्रेम रेम्ब्रां के प्रति उसके प्रेम जितना ही मूल्यवान है… मुझे तो दोनों एक दूसरे के पूरक लगते हैं. मुझे फ्राबीशियस का एक पोर्ट्रेट बेहद पसंद है, वही जिसे एक दिन हम लोग हार्लेम संग्रहालय में देखते खड़े रह गये थे. लेकिन मुझे डिकेन्स के उपन्यास ‘दो नगरों की कथा’ का नायक सिडनी कार्टन भी उतना ही पसंद है… और कई और ऐसे पात्र, कई किताबों के आर-पार जो वास्तव में खास हैं. मुझे लगता है कि शेक्सपियर के राजा लियर का कैण्ट उतना ही कुलीन और गरिमापूर्ण है जितनी कि केयसर द्वारा बनायी गयी एक छवि. और क्या कहूं, हे ईश्वर! शेक्सपियर कितना अद्भुत है. उसके समान रहस्यवादी और कौन हो सकता है? एक अजब-सी खुमारी और बुखार से कांपती उसकी भाषा और शैली की तुलना स़िर्फ एक कलाकार की कूची से ही की जा सकती है. लेकिन हमें ‘पढ़ना’ सीखना चाहिए, वैसे ही जैसे हमें ‘देखना’ सीखना चाहिए. जीवन जीने की कला यही है.

तो, तुम्हें यह नहीं मानना चाहिए कि मैं चीज़ों का मूल्य नहीं जानता.. बल्कि मैं तो अपनी सीमाओं के उल्लंघनों में ही एक-सा रहा आता हूं और बावज़ूद कुछ एक बदलावों के वही पुराना विंसेन्ट हूं. मुझे स़िर्फ एक ही चिंता सताती है. मैं इस संसार के क्या काम आ सकता हूं? क्या मैं इसके लिए कुछ कर सकता हूं? मैं कैसे और अधिक जान सकता हूं, कैसे और अधिक गहराई के साथ अध्ययन में जुट सकता हूं? यही सब कुछ मेरे दिलो-दिमाग पर छाया रहता है. मुझे अपने निर्धनता के इस बाड़े में घुटन-सी होने लगती है.

यह कभी-कभी एक गहरी उदासी का सबब बन जाता है. तब आप एक खोखलापन महसूस करते हैं, जिसे शायद दोस्ती और सच्चे लगाव ही भर सकते थे, यकायक एक निराशा और भयानक अवसाद भीतरी ऊर्जा को तेज़ी से कुतरने लगता है. लगता है भाग्य ने प्रेम, मित्रता, संवाद के मुंह पर एक भारी पत्थर लगा रखा है और भीतर गुफा की अंधेरी बाढ़ आपका दम घोंटे दे रही है. मैं चीखना चाहता हूं, ‘यह सब कब तक, हे ईश्वर!’

समझ में नहीं आ रहा, क्या कहूं. क्या हमारा अंतर कभी बाहर प्रकाशित होता है? हो सकता है, हमारे भीतर एक प्रचंड ज्वाला धधकती हो और फिर भी उसपर कोई हाथ सेंकने नहीं आता. उस रास्ते से गुज़रनेवालों को दीखता है, चिमनी से उठता धुएं का एक अंश… और वे आगे बढ़ जाते हैं.

अब तुम ही बताओ, क्या किया जाये? क्या उस आग को धधकाए रखना चाहिए और धैर्य और साहस से प्रतीक्षा करनी चाहिए, उस कल की, जब कोई आयेगा और उसके पास बैठेगा, और ठहर जायेगा, शायद सदा के लिए? मुझे लगता है जिसे ईश्वर पर विश्वास हो, उसे मानना होगा कि आज नहीं तो कल ऐसा ज़रूर होगा.

फिलहाल मेरा खराब दौर चल रहा है, काफी वक्त से ऐसा ही चल रहा है और शायद कुछ समय और ऐसा ही चलेगा. पर जब सारा गलत, सारा बुरा हो चुकेगा तब शायद सही समय भी आयेगा. हालांकि मैं उस वक्त से कोई आस लगाये नहीं बैठा हूं और हो सकता है, वह वक्त कभी न आये, पर यदि जैसा है उससे कुछ बेहतर भी हो जाये, तो मैं संतुष्ट होऊंगा और कहूंगा- ‘देखो, आखिर कुछ तो था.’ किंतु तुम कहोगे, इसके बावजूद तुम एक निहायत ही नागवार आदमी हो क्योंकि धर्म को लेकर तुम्हारे विचार बहुत वाहियात हैं और तुम्हारे संकोच और पछतावे बहुत ही बचकाने.

अगर मेरे विचार असम्भव और बचकाने हैं तो मैं उन्हें बदलने का प्रयत्न करूंगा… इतना ही कह सकता हूं. और बस, कमोबेश ही कुछ मैं इस विषय पर सोचता हूं. सूवेस्त्र के unphilosophesous les toits में तुम पाओगे, एक साधारण व्यक्ति, एक मज़दूर की, अपने देश की कल्पना क्या होती है. ‘शायद तुमने कभी यह सोचा ही नहीं कि तुम्हारा देश वास्तव में क्या है?’ उसने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘तुम्हारे आसपास सब कुछ, वह सब जिसने तुम्हें पाल पोसकर बड़ा किया है, वह सब जिससे तुमने प्रेम किया है, वह खेल के मैदान, वे घर, वे पेड़, वे खिलखिलाती हुई लड़कियां जो सामने से गुज़र रही हैं… वही है तुम्हारा देश. जो कानून तुम्हारी रक्षा करते हैं, जो रोटी तुम्हारा मेहनताना है, जो शब्द तुम बोलते हो, जो खुशी और गम तुम्हें लोगों से मिलते हैं और जिन वस्तुओं के बीच तुम रहते हो, वे ही तो हैं तुम्हारा देश. वह छोटा-सा कमरा जहां तुम रोज़ अपनी मां को देखा करते थे, वे स्मृतियां, जो वह अपने पीछे छोड़ गयी है, वह धरती जिसमें वह समायी हुई है… वही तो है तुम्हारा देश! उसे ही तुम रोज़ देखते हो, उसमें ही सांस लेते हो, हर तरफ वही है. अपने अधिकार और अपने कर्तव्य, अपना प्रेम और अपनी ज़रूरत, अपनी स्मृतियां और अपनी कृतज्ञता, तुम खुद खोजो और वह सब कुछ एक नाम से ही समेट लो… यही तो है तुम्हारा देश.’

ठीक इसी तरह मैं सोचता हूं, मनुष्य में और उसके कर्म में जो कुछ भी सुंदर है, जो कुछ भी शिव है, जो भी आंतरिक, आध्यात्मिक या आत्मिक सौंदर्य है, वह ईश्वर की देन है, और जो भी असुंदर और मलिन है वह उसकी देन नहीं है.

लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि ईश्वर को जानने का सबसे सच्चा रास्ता है सृष्टि में बहुत कुछ को प्यार करना. कोई मित्र, कोई संगी, कोई किताब, कोई वस्तु… कुछ भी, जिसे भी तुम पूरे मन से चाहते हो, वही तुम्हें ईश्वर के बारे में भी बतायेगा. यही मैं अपने आप से कहता हूं. किंतु वह प्रेम ऊंचा होना चाहिए, अर्थपूर्ण और गहरी सहानुभूतिवाला, समझदार और सदा गतिशील, स्वयं को और परिष्कार की ओर ही ठेलता हुआ. वही राह ईश्वर तक ले जाती है, एक निष्कंप और अडिग आस्था तक.

मिसाल के तौर पर- कोई रेम्ब्रां को बेहद प्रेम करता है, पूरी शिद्दत से, तो वह ईश्वर की उपस्थिति को महसूस करेगा… यह व्यक्ति जब फ्रांस की क्रांति का इतिहास पढ़ेगा, तो कतई विचलित नहीं होगा, वह बड़ी-बड़ी चीज़ों में उस दैवी स्पर्श को पा सकेगा, जो इस सारे ताने-बाने को थामे हुए है. अल्प समय के लिए ही सही, किंतु जिसने दुख की शाला का एक पाठ भी पढ़ लिया, उसका अनुभव किसी भी अन्य से अधिक समृद्ध होगा. जो सच्चे कलाकार और अन्य विभूतियां अपने कर्म के माध्यम से हमसे कह गयी हैं, उन्हें सही
अर्थों में ग्रहण करना ही असल काम है… और वही ईश्वर तक पहुंचने का साधन भी. किसी ने यही एकाधिक किताबें लिखकर बतलाया है तो किसी ने तस्वीरों के माध्यम से या फिर बाइबिल या गॉस्पेल ही को लें… वे भी हमें सोचने-विचारने को बाध्य करती हैं. जब भी वक्त मिले मनन करो, सोचो, विचारो… यह तुम्हारे वैचारिक स्तर को साधारण से अनपेक्षित रूप से ऊंचा उठा सकता है. अगर हम ये जानते हैं कि कैसे पढ़ना चाहिए… तो चलो हम पढ़ें!

यही सही है कि कभी-कभी हम भावशून्य हो जाते हैं, भटक जाते हैं. कुछ लोग तो विचित्र तरह से मूक दर्शक बन जाते हैं, शायद मेरे साथ ऐसा ही हुआ हो, परंतु इसमें मेरा ही दोष है. एक न एक दलील तो देना सम्भव है ही… मैं बहुत व्यस्त था, डूबा हुआ था, परेशान था आदि. किंतु अंततः व्यक्ति इस सबसे पार पा लेता है. स्वप्नदर्शी कभी-कभी कुएं में गिर जाता है पर फिर अंत में बाहर भी निकल आता है. और फिर ऐसे खब्तुल्हवास लोगों के भी अपने सुखद अंतराल होते हैं, उनके विकट स्वभाव की भरपाई करते हुए. उनके पास, जैसा वह है वैसा होने की ठोस वजहें भी होती हैं जो अधिकतर तो समझी नहीं जातीं या फिर जान बूझकर अनदेखी की जाती हैं, चूंकि उनमें किसी को कोई रुचि नहीं होती. एक व्यक्ति जिसे लम्बे समय तक लहरों पर उछाला गया हो, कभी अपने ठिकाने भी पहुंच जाता है; एक व्यक्ति जो किसी काम का नहीं है, बेरोज़गार और नाकारा है, वह भी कभी ऐसा सही काम पा जाता है, जो अंततः उसके होने का अर्थ दे सके.

मैं न जाने क्या-क्या लिखे जा रहा हूं… जो भी मेरी कलम से फिसल रहा है. बहरहाल, मुझे सच में बहुत खुशी होगी यदि मुझमें तुम एक खाली और निठल्ले आवारा से बेहतर कोई छवि देख पाओ.

दूसरी तरफ एक आलसी है, जो अपना ही बैरी है. वह भीतर ही भीतर कुछ करने को मचलता रहता है लेकिन प्रकट में कुछ नहीं कर पाता. जैसे वह किसी पिंजरे में बंद हो, या जैसे उसके पास वह कुछ हो ही न, जो किसी को भी क्रियाशील बनाता है, मानो परिस्थितियां स्वयं ही उसे उस ओर ठेलती जाती हैं. ऐसा व्यक्ति कई बार यह भी नहीं जानता कि उसे क्या करना चाहिए? किंतु उसे कहीं लगता है कि वो किसी लायक है, कि उसके जीवन का कोई औचित्य है, कि वह जो है उससे अलग और बेहतर हो सकता है. मैं कैसे किसी के कुछ काम आ सकता हूं, कैसे किसी की मदद कर सकता हूं? मेरे भीतर कुछ है, लेकिन क्या? यह और तरह का आलसी है- अगर तुम चाहो तो मुझे ऐसा भी मान सकते हो.

बसंत में पिंजरे में बंद पक्षी जानता है कि उसके भीतर बहुत सारी सम्भावनाएं हैं, वह समझता है कि उसे क्या करना है, किंतु वह नहीं कर पाता. वह क्या है उसे अच्छी तरह याद नहीं आता. फिर कुछ धुंधले से विचार उसके दिमाग में आते हैं और वह अपने-आप से कहता है, ‘वे सब अपने घोंसले बना रहे हैं, अण्डे से रहे हैं और नन्हें-मुन्नों को बड़ा कर रहे हैं’ और वह पिंजरे की छड़ों से अपना सिर टकराता है. किंतु पिंजरा वैसा का वैसा ही बना रहता है. पक्षी दुख से पागल हो जाता है.

फिर, प्रजनन का समय आता है और उसके ऊपर दुख का पहाड़ टूट पड़ता है. ‘पर उसके पास तो सब कुछ है,’ उसकी टहल करनेवाले बच्चे कहते हैं. वह पिंजरों की सलाखों के पार आकाश में बादलों को गड़गड़ाते, घिरते देखता है और भीतर ही भीतर अपनी आत्मा से विद्रोह कर उठता है, ‘मैं fिपंजरे में कैद हूं, कैदी हूं इसीलिए मजबूर, और तुम सोचते हो मुझे किसी चीज़ की दरकार नहीं, हाय रे मूर्ख! तुम सोचते हो, मेरे पास वह सबकुछ है, जो मुझे चाहिए. ओह! मैं तुमसे आज़ादी की भीख मांगता हूं, ताकि मैं और पक्षियों की ही तरह एक पक्षी हो सकूं.’

कोई आलसी व्यक्ति किसी चिड़िया से मिलता-जुलता होता है. कैसी-कैसी भीषण परिस्थितियों के पिंजरे में बंद लोग कुछ कर पाने में असमर्थ हैं. किंतु इसी के साथ मैं यह भी जानता हूं कि इससे मुक्ति भी है, भले ही मंथर गति मुक्ति क्यों न हो, सही या गलत, लेकिन एक आहत प्रतिष्ठा, गरीबी, अपरिहार्य स्थितियां या अन्य आपदाएं यही सब कुछ तो मनुष्य को बंदी बनाता है.

हम हमेशा यह बतलाने की स्थिति में नहीं होते कि वह क्या है जिसने हमें ढांप रखा है, बंदी बना रखा है, जो हमें दफन किये देती है… हालांकि हम उन चट्टानों, उन दरवाज़ों, उन दीवारों को बखूबी महसूस करते हैं. क्या यह सब हमारी कल्पना, फंतासी है? मुझे नहीं लगता. और मैं पूछता हूं, ‘हे ईश्वर! यह कितनी देर तक चलेगा? क्या आजीवन, सदा ऐसा ही कोहरा बना रहेगा? तुम जानते हो इस कारावास से मुक्ति कहां है? केवल एक सच्चे और गहरे प्रेम में. मित्रता, भाईचारा, प्रेम, सौहार्द, यही सब इस कारागार के द्वार खोल सकते हैं, इसके बिना जंजीरें नहीं कट सकतीं. जहां प्यार, सहानुभूति तरंगित होते हैं, वहीं जीवन पुनः संचरित भी हो पाता है. और इस कारागार के दूसरे भी कई नाम हैं… पूर्वग्रह, गलतफहमी, भ्रम, अज्ञान, अविश्वास और मिथ्या ग्लानि.’

किंतु छोड़ो, कुछ और बात करते हैं… मुझे लगता है कि अगर मैं संसार में अपने स्तर से नीचे गिरा हूं तो वहीं तुम ऊंचे उठे हो; जहां मैंने किन्हीं लोगों की सहानुभूति गंवाई है, वहीं तुमने कई दूसरों की पायी भी तो है. यह मुझे प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त है… और सदा प्रसन्नता देती रहेगी. यदि तुममें इतनी गहरी समझ न होती तो मैं तुम्हारे लिए डरता, लेकिन मुझे मालूम है कि तुममें वे सब गुण हैं और रहेंगे. जहां तक मेरा सवाल है, मेरे लिए इतना ही काफी होगा, अगर तुम मुझे सबसे निम्न कोटि के फालतू या नाकारा किस्म के व्यक्ति से थोड़ा बेहतर समझो.

सदा तुम्हारा

विंसेन्ट

(राजुला शाह द्वारा अंग्रेज़ी से रूपांतरित. सम्पादित. ज्ञानोदय से साभार)

(जनवरी 2016)

 

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