भारतीयता हमारी पहचान होनी चाहिए   –  रमेश नैयर

आवरण-कथा

भारत के बहुसंख्यक हिंदू समाज को सदियों से जातिवाद बांटता रहा. छुआछूत की प्राचीरें खड़ी करता रहा. परंतु सौभाग्यवश उसे समतल-समरस करने की शक्तियां भी सक्रिय होती रहीं. संत-कवियों की उसमें विशेष भूमिका रही. उन्होंने लम्बी राजनीतिक दासता से बुझते और टूटते हुए मन को आस्था के रेशमी धागों से जोड़ने का अभियान उत्तर-पश्चिम भारत से पूर्वी अंचल तक मन-प्राण से गतिशील किया. प्राय सभी जातियों के साधु-संतों, पीरों-फकीरों ने भेदभाव की खंदकों को पाटा. उसमें सूफियों का अवदान भी भुलाया नहीं जा सकता. गुरुनानक ने जातिहीन सिख पंथ की स्थापना की. जातीय विभाजन के साथ ही धार्मिक टकरावों को यथासम्भव समाप्त करने में गुरुनानक देव और क्रांतिकारी संत कवि कबीर का ऐतिहासिक योगदान रहा. दोनों लगभग समकालीन थे. दोनों में भेंट होते रहने के आख्यान मिलते हैं. नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक की ढलान पर कबीर चौरा नाम का एक स्थान है. उसके बारे में शताब्दियों से प्रचलित धारणा है कि नानक और कबीर की वहां भेंट हुई थी. हरियाली से घिरे हुए कबीर चौरा में एक सामान्य से पक्के भवन पर उल्लेखित है कि दोनों की वहां भेंट हुई थी.

नानक के सिख पंथ में जातिवाद के लिए कोई स्थान था. धार्मिक और जातीय विभाजन तथा टकरावों को दूर करने के ध्येय से भी उन्होंने सिख पंथ की स्थापना की थी. नानक का सूत्र वाक्य था- ‘अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे. एक नूर से सब जग उपज्या कौन भले कौन मंदे.’ इस्लाम और हिंदू धर्मों के बीच एक सेतु का निर्माण भी उनका एक लक्ष्य था. उसके निमित्त अपने जन्म स्थान ननकाना साहिब (अब पाकिस्तान के पंजाब में) से मक्का तक की पदयात्रा करने का उल्लेख मिलता है. उन्होंने जात-पांत से ऊपर उठकर धार्मिक-सामाजिक एकता के लिए ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ की रचना शुरू की, जिसमें सभी संत-कवियों, सूफियों और पीरों-फकीरों के दोहों, साखियों और बाणियों को संकलित किया गया. अपने जीवनकाल में वे गुरु गंथ साहिब को पूर्ण नहीं कर सके. उसे एक सम्पूर्ण ग्रंथ का रूप देने का दायित्व चौथे गुरु अर्जुनसिंह ने निभाया. उसके लिए पाली से विकसित की गयी गुरुमुखी लिपि का उपयोग किया गया. गुरु ग्रंथ साहिब में अनेक हिंदू भक्त कवियों के साथ ही शेख फरीद, बुल्लेशाह सहित अनेक मुस्लिम सूफियों की प्रेरक काव्य पंक्तियों को पिरोया गया. कबीर की साखियों का भी सम्मानपूर्वक गुरुग्रंथ में समावेश है.

सिख पंथ ने छुआछूत के विरुद्ध सशक्त अभियान चलाया था. बड़ी संख्या में अछूत माने जाते रहे समाज में अलग-थलग पड़े और पूजा-अर्चना से वंचित वर्ग के लोगों ने सिख पंथ अपनाया. उच्च सिख जातियों ने सहजता से उन्हें स्वीकारा भी. मुगलों के खिल़ाफ गठित खालसा सेना में कथित शूद्र जाति के युवकों ने सशस्त्र युद्धों में बढ़-चढ़कर भागीदारी भी की. इन कथित  अछूतों को सर्वोच्च मान्यता पंथ के दसवें एवं अंतिम गुरु गोविंद सिंह ने उनके एक परम साहसी प्रसंग से द्रवित होकर दी थी. प्रसंग था गुरु तेगबहादुर की शहादत का. कश्मीर के ब्राह्मणों के तिलक लगाने और जनेऊ पहनने के अधिकार की बहाली के लिए गुरु तेगबहादुर ने चांदनी चौक पर सत्याग्रह किया. मुगल सम्राट औरंगजेब के निर्देश पर जब उनका शीश काटकर धड़ से अलग कर दिया गया तो उस वीभत्स त्रासदी के बीच एक समस्या पैदा हुई उनके अंतिम संस्कार की. गुरु के पार्थिव शरीर को मुगलों की फौज ने कड़ी चौकसी में घेर रखा था. तब अद्भुत साहस का परिचय देते हुए छापामार शैली से अछूत मानी जाती रही रंगरेटा जाति के भाई जैतो जी उनका शीश और लक्खी शाह बंजारा उनका धड़ लेकर बिजली की फुर्ती से पास ही बनी बांस-घास और पत्तों की एक झोपड़ी में पहुंच गये. झोपड़ी में आग लगा कर वहीं नवम गुरु का दाह संस्कार कर दिया गया. गुरु गोविंद सिंह ने दोनों की भरपूर सराहना की. उन्होंने अछूत भाई जैतोजी के बारे में कहा- ‘रंगरेटा गुरु का बेटा.’ इससे एक बड़ा तथ्य यह प्रमाणित हो गया कि अछूत वर्ग में रखे गये समुदायों में अनेक शूरवीर और पराक्रमी योद्धा भी थे. सम्भवत युद्धों में पराजित हो जाने के बाद जिन्हें बंदी बना लिया गया, उन्हें जो भी काम दिया गया, उसका निर्वहन करने को वे अभिशप्त हो गये. इस सम्बंध में डॉ. भीमराव आम्बेडकर की शोधपूर्ण पुस्तक ‘शूद्र कौन थे’ के कुछ महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष विचारणीय हैं.

डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने हिंदू समाज के उन बहुत कम गिनती के शक्तिमान समूहों को दर्पण दिखाया जिन्होंने वंचित वर्गों को समाज से बाहर निकालने के द्वार खोल रखे थे. अपने दम्भ और दुर्व्यवहार से वे उन्हें बाहर धकेल भी रहे थे. वंचित दलित और उपेक्षित वर्गों के समाज में लौट सकने का कोई द्वार खुला नहीं रखा था. बाबासाहेब आम्बेडकर ने हिंदू धर्मशास्त्राsं के गम्भीर व्यापक अध्ययन-शोध तथा अनेक अधिकारी विद्वानों से संवाद के बाद ऐतिहासिक महत्त्व की पुस्तक लिखी थी, ‘शूद्र कौन थे.’ बाबासाहेब की इस  ऐतिहासिक पुस्तक के कुछ अंशों के हिंदी अनुवाद उद्धृत करना प्रासंगिक होगा- ‘शूद्र सूर्य प्रजाति के आर्य समुदायों में से एक थे. एक समय था जब आर्यों का समाज तीन ही वर्णों जैसे- ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य को मान्यता देता था. शूद्र अलग से कोई वर्ग नहीं था, वह आर्यों के क्षत्रिय वर्ण का अंग था. इसे विस्तार से बाबासाहेब ने पुस्तक के सातवें अध्याय ‘शूद्र क्षत्रिय थे’ में समझाया है. शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच लगातार संघर्ष होता था. जिसमें उनके द्वारा ब्राह्मणों के ऊपर अनेक प्रकार के आक्रमण भी होते थे. शूद्रों के इन आक्रमणों, अत्याचार के कारण उनके प्रति घृणा बढ़ी और ब्राह्मणों ने शूद्रों का उपनयन संस्कार करना बंद कर दिया. उपनयन संस्कर से वंचित शूद्र जो (वस्तुत) क्षत्रिय थे, सामाजिक दृष्टि से तिरस्कृत हो गये और वैश्यों के नीचे की स्थिति में आ गये; और इस प्रकार चतुर्थ वर्ण की उत्पत्ति हुई… मेरा मानना है कि आर्यों के समाज के शूद्र कालांतर में ब्राह्मण नियमों की कठोरता के कारण इतने नीचे गिरा दिये गये कि उन्हें सामाजिक जीवन में सबसे निम्न स्थान ग्रहण करने के लिए विवश होना पड़ा… मैं जानता हूं हिंदुओं का मात्र एक वर्ग ही इस पुस्तक का स्वागत करेगा तथा वह वर्ग उन लोगों का है जो समाज सुधार की आवश्यकता तथा अपरिहार्यता को समझता है… मैं तीन व्यक्तियों का अत्यंत आभारी हूं, पहले महाभारत के शांतिपर्व अध्याय साठ के लेखक का आभार व्यक्त करता हूं. वह व्यास वैशम्पायन, सूत, लोम, हर्षण या भृगु में से कौन है, यह कहना कठिन है. वह जो कोई भी हो, उन्होंने पैजावन का शूद्र के रूप में वर्णन नहीं किया होता तो शूद्रों की उत्पत्ति के बारे में सभी सूत्र लुप्त हो गये होते.’              

भारतीय राजसत्ताओं ने भले ही भक्त कवियों की उपेक्षा की और कई बार उन्हें दंडित एवं उत्पीड़ित भी किया. परंतु जन-सामान्य पर उनकी गहरी छाप पड़ी. कहा और गुनगुनाया जाने लगा, ‘जात-पात पूछे नहीं कोई. हरि को भजे सो हरि का होई..’ कबीर की साखी ‘जात न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान’ तो किसानों के खेत-खलिहान से प्रकांड पंडितों एवं साहित्यकारों तक गुनी तथा गुनगुनायी जाने लगी. गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने जब कबीर के काव्य का अनुवाद अंग्रेज़ी में किया तो उसके प्रकाशन से विश्व के समीक्षकों को कबीर के महत्त्व का एहसास हुआ. वे सामान्य संत कवि से उठाकर विश्व के एक महान कवि की आसंदी पर स्थापित कर दिये गये. कवींद्र रवींद्र के शांति निकेतन में अध्यापन करते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य में कबीर के महत्त्व को गम्भीर अध्ययन-अनुशीलन के आधार पर प्रतिपादित किया. कबीर ने कथित उच्च जातियों के पुरोहितों के पाखण्ड पर जो हल्ला बोला था, उसे साहित्यिक मान्यता दिलाने में पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी का अविस्मरणीय योगदान था.

सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को अंग्ऱेजों द्वारा विपुल सैन्य शक्ति के बूते कुचल दिये जाने के बाद भी भारतवासियों की स्वातंत्र्य-कामना भीतर ही भीतर कुलबुलाती रही. यह कामना नब्बे वर्षों तक चले स्वतंत्रता आंदोलन में रह-रहकर मुखर होती रही. उस आंदोलन में एक धारा थी ब्रिटिश साम्राज्य को भारत से उखाड़ने के ध्येय से सशस्त्र प्रतिरोध करने वाले क्राांतिकारियों की. उस धारा में दलित क्रांतिकारी भी शामिल थे. उनमें से अनेक युवा क्रांतिकारी उस सशक्त साम्राज्य से लड़ते-लड़ते शहीद हो गये. शहादत के इसी जज़्बे से नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने देश के बाहर इंडियन नेशनल आर्मी का गठन किया.

मोहनदास करमचंद गांधी (महात्मा गांधी) के नेतृत्व में चले प्रदीर्घ अहिंसक स्वतंत्रता आंदोलन से भारत को 15 अगस्त 1947 को राजनीतिक आज़ादी मिल गयी. यह आज़ादी भारत-विभाजन के दौरान हुए भयावह सांप्रदायिक रक्तपात और लाखों की संख्या में विस्थापन के बीच मिली थी. उसके बाद भी भारत को शताब्दियों पुराने जातिवाद के सड़ांध मारते नासूर से मुक्ति नहीं मिल पायी थी. जातीय भेदभाव की गहरी खाई को पाटकर सर्वजातीय एकात्मता के लिए महात्मा गांधी ने अछूत कहीं जाने वाली जाति में जन्मे उच्च कोटि के विद्वान और संविधानविद डॉ. भीमराव आम्बेडकर को एक ऐतिहासिक दायित्व सौंपा. वह था हिंदू समाज के दलित वर्ग को एक अलग देश मांगने के लिए उकसाने के शातिर षड्यंत्र को विफल करने का. डॉ. भीमराव आम्बेडकर को स्वतंत्र भारत गणराज्य के संविधान के निर्माण के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में गठित संविधान सभा द्वारा महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया. सदियों की सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी को कम करने के लिए विकास की धारा से कटे हुए अनुसूचित जाति एवं जनजाति के वर्गों को दस वर्षों तक आरक्षण का कवच दिया गया. समाज में एकात्मकता कायम करने के लिए यह ज़रूरी भी था. इस हेतु भारतीय राजनीति में भी कुछ अभियान चलाये गये. उनमें प्रमुख था समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया का ‘जाति तोड़ो’ आवाहन.

पिछड़े वर्गों द्वारा मांगे गये आरक्षण के निर्धारण के लिए 1 जनवरी 1979 को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग का गठन किया गया. 1989 में जब कांग्रेस से बगावत कर राष्ट्रीय जनमोर्चा के नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 1980 से ठंडे बस्ते में पड़ी हुई मंडल आयोग की रिपोर्ट को 9 अगस्त 1990 को आंशिक रूप से लागू कर दिया. तब से अब तक क्या होता रहा है और किस प्रकार हरियाणा में जाट आरक्षण को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों में जान-माल का भारी नुकसान हुआ वह ताज़ा इतिहास है. जातिवाद की दीवारों को तोड़ने और उससे खुदी गहरी खाइयों को भरने के कम से कम छह शताब्दियों के अभियान की एक लम्बी परिक्रमा के बाद एक बार फिर वोटों की राजनीति से परास्त होते दिख रहे हैं. फिर वही जात-पांत का बखेड़ा भारत की आत्महंता चुनावी राजनीति खड़ा कर रही है. जात न पूछो साधु की का सामाजिक एकता एवं समरसता का सूत्रवाक्य शीर्षासन की मुद्रा में पहुंच गया है. सबको सरकारी, गैर सरकारी नौकरियों में आरक्षण चाहिए. इसलिए आज की आरक्षणवादी राजनीति का मूलमंत्र हो गया है- ‘अब जाति ही पूछो साधु की, पड़ा रहन दो ज्ञान.’

तेज़ी से बदलते विश्व में भारत में एक बड़ी आर्थिक सम्भावना देखी जा रही है. भारत के विकास की पहली शर्त है सामाजिक सामंजस्य बढ़ना और आर्थिक गैर-बराबरी का यथासम्भव कम होना. आज का सामाजिक सच तो यह है कि अनेक सवर्णों की आर्थिक दृष्टि से सामाजिक हैसियत भी किसी दलित से बेहतर नहीं रह गयी है. फिर भी, दलितों को राजनीति का मोहरा बनाकर जिस तरह भारतीय समाज को जातियों के खांचों में बंटे रहने के लिए बाध्य किया जा रहा है, वह अपने आप में एक बड़े खतरे की चेतावनी है. जातियों के नाम पर होने वाला बंटवारा एक भारतीय समाज की स्थापना की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है. जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर ही भारतीयता को साकार किया जा सकता है.

अप्रैल 2016

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