बचकर कहां जायेगा चोर?

⇐   सुरजीत  ⇒

     कुछ वर्ष पहले. कैलिफोर्निया का एक छोटा-सा नगर . रात गए एक जौहरी अपनी दुकान बंद कर रहा था कि एक ग्राहक उसकी दुकान में आया. उसे एक मंगनी की अंगूठी चाहिये थी और वह भी तुरंत. जौहरी ने अंगूठियों का ढेर लगा दिया, लेकिन वह ठगा गया. ग्राहक ने रिवाल्वर के बूते पर बीस हजार डालर का डाका डाला.

     इस डकैती के तीन घंटे बाद ही पुलिस ने घटनास्थल से पचास मील दूर उस नकली ग्राहक को गिरफ्तार कर लिया. बेचारा ग्राहक भौंचक. यह उसका पहला बड़ा अपराध था और पुलिस चौकियों में उसका कोई रिकार्ड भी नहीं था. और इस डकैती में तो उसने विशेष सावधानी बरती थी. उसने दस्ताने भी पहन रखे थे, जिससे उसकी उंगलियों के निशान भी कहीं न मिल सकें. फिर भी पुलिस ने उसे इतनी जल्दी पकड़ लिया. लेकिन कैसे?

     असल में यह कमाल पुलिस का नहीं, ‘आइडेंटिटी-किट’ का था. यह एक ऐसा आविष्कार है, जिससे अपराधियों को पकड़ने में बड़ी आसानी रहती है. इस डकैती वाले मामले में जौहरी ने किसी तरह अपने को मुक्त करके पुलिस को फोन किया और पुलिस ने तत्काल गुप्तचर विभाग को. उनका एक अधिकारी छोटा-सा संदूकचायानी ‘आइडेंटिटी किट’ लेकर जौहरी की दुकान पर पहुंच गया. इस संदूकचे में चार इंच चौड़ी और पांच इंच लम्बी उन्नीस तस्वीरें थीं. उन तस्वीरों पर अलग-अलग संख्याएं लिखी थीं. उनमें नाक, आंख, ठुड्डी, माथा, ओंठ, पलकें यानी चेहरे के हर हिस्से की प्रायः हर प्रकार की आकृतियां मौजूद थीं और उनकी सहायता से हर प्रकार की तस्वीर तत्काल तैयार की जा सकती थी.

     गुप्तचर अधिकारी की प्रार्थना पर जौहरी डाकू के चेहरे का विवरण एक-एक करके अधिकारी को बताने लगा. सबसे पहले उसने उन तस्वीरों में से डाकू की नाक से मिलती-जुलती नाक की तस्वीर बतायी. फिर कानों की बारी आयी और इसी तरह से अन्य हिस्सों की. अधिकारी ने उसकी बतायी सारी आकृतियां एक साफ प्लेट में तरतीब से रख दीं. देखते-ही-देखते एक आदमी के नैन-नक्श उभरने लगे. उसके बाद संदूकचे में मौजूद सभी तस्वीरों, जिन्हें फाइल्स यानी वर्क कहा जाता है, की संख्याओं का निरीक्षण करते हुए पुलिस अधिकारी  ने नाक, ठुड्डी और आंखों के उपयुक्त वर्क निकाले और उन्हें तस्वीर में जड़ दिया.

     जौहरी यह तस्वीर देखकर चौंक उठा- ‘अरे, यह तो वही व्यक्ति है! बालों को जरा माथे पर झुका दीजिये और ओंठ थोड़े मोटे, अंाखें और बड़ी.’ पुलिस अधिकारी ने कुछ वर्क बदल दिये और जौहरी ने स्वीकार कर लिया कि अब यह हूबहू वही व्यक्ति है, जिसने उसकी दुकान लूटी थी.

     ‘आइडेंटिटी-किट’ में मौजूद हर वर्क पर एक गुप्त चिन्ह और संख्या होती है. उदाहरणार्थ, एच-66 घने बालों वाली आकृति को और एच-35 गंजे सिर को पेश करता है. जब किसी की शक्ल तैयार हो जाती है, तो यह चिन्ह और नम्बर तस्वीर के नीचे एक पंक्ति में जमा हो जाते हैं. यह संख्या आसानी से प्रसारित की जा सकती है और जहां कहीं भी पुलिस के पास ‘आइडेंटिटी-किट’ हो, वह इन संख्याओं के सहारे अपराधी की शक्ल तुरंत तैयार कर लेती है. फिर तो उस शक्ल की प्रतिलिपियां जगह-जगह इस तरह से वितरित कर दी जाती हैं कि अपराधी चाहे जहां भी हो, उसे पहचानने में कोई कठिनाई नहीं होती.

     ‘आइडेंटिटी-किट’ के आविष्कारक हैं, लास एजेंल्स के टेक्निकल सर्विसेज डिविजन के उच्चाधिकारी ह्यू सि. मैकडानल्ड. पहले वे गुप्तचर विभाग में काम करते थे. फिर उनकी बदली पहचान विभाग में कर दी गयी. वहीं उंगलियों चिन्हों पर कार्य करते हुए उनके मस्तिष्क में ‘आंडेंटिटी-किट’ बनाने का विचार आया.

     उन्होंने सोचा कि यदि अंगुलियों के चिन्हों को, उनकी हजारों संधियों के बावजूद, अक्षरों और नम्बरों से प्रकट किया जा सकता है, तो सिरों और चेहरों के साथ ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता. प्राप्त विवरणों से अपराधी की तस्वीर तैयार करना बहुत महंगा पड़ता था और समय भी  अधिक लगता था. यही कारण था कि यह ढंग केवल महत्त्वपूर्ण मुकद्दमों में ही काम में लाया जाता. मैकडानल्ड एक ऐसा आविष्कार करना चाहते थे, जिसकी सहायता से कम समय और कम खर्चें में आसानी से सही तस्वीर तैयार की जा सके.

     सबसे पहले उन्होंने चेहरों की तस्वीरों को विभिन्न भागों में विभाजित किया. फिर उन्हें अलग-अलग तरीकों से पुनः इकट्ठा करने का प्रयास किया. यह एक लम्बे समय तक चलनेवाला और ऊबा देनेवाला काम था. शुरू में तो कोई निष्कर्ष निकलता नहीं दिखाई पड़ा. लेकिन बिना किसी प्रोत्साहन के भी वे वर्षों तक अपने अवकाश के समय में इस पर कार्य करते रहे.

     जैसे-जैसे पहचाने की सूझ-बूझ बढ़ती गयी, उन्हें इसका अधिक-से-अधिक विश्वास होता गया कि हर वयस्क की शक्ल के भागों को सावधानी से विभाज्य संख्याओं में बताया जा सकता है. लेकिन अपने इस विचार को कार्यान्वित करने के लिए न तो उनके पास रुपया था. न व्यक्तित्व शक्ति. निराश होकर वे इस योजना का परित्याग करने ही वाले थे कि उन्हें एक आकस्मिक सहायता मिल गयी.

     उनका एक मित्र साता-आना टाउनसेंड कंपनी से सम्बंधित था. यह कंपनी वायुयानों और उससे सम्बंधित वस्तुओं को तैयार करने की विशेषज्ञ थी और नये आविष्कारों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाती थी. इसके व्यवस्थापकों को जब मैंकडोनल्ड की योजना का पता चला, तो उन्होंने काफी दिलचस्पी ली. उन्होंने मैकडोनल्ड से एक अनुबंध किया, जिसके अनुसार कंपनी ने उन्हें रुपये, तकनीकी विशेषज्ञ व फोटोग्राफर और हर प्रकार की सामग्री मुहैया करने का दायित्व अपने ऊपर लिया और आविष्कार के सर्वाधिकार कंपनी के पास रहे.

     पांच वर्ष तक पूरी तन्मयता और परिश्रम से काम चलता रहा. फोटोग्राफरों के दलों ने संयुक्त राज्य अमरीका एवं अन्य कई देशों की यात्रा की और पचास हजार चेहरों की तस्वीरें जमा की. इन तस्वीरों की काट-छांट के बाद प्राप्त भागों की जांच-पड़ताल की गयी. फिर सीमा बंदी का काम शुरू हुआ. इसके बाद विशेष भाग अलग छांटे गये. इनमें से आंख, नाक, ठुड्डी, ओंठ भौहें और बालों की आकृतियों को ठीक रूप में मिलाने से पचास हजार तस्वीरें बनायी जा सकती थीं और हर चेहरा पुनः तैयार किया जा सकता था.

उंगलियों के चिन्हों की तरह चेहरे के चिन्ह तैयार करने का मैकडोनल्ड का सपना पूरा हो चुका था. शुरू में पांच सौ विशेष वर्कों पर संख्या और चिन्ह लगाकर सही ढंग से ‘आइडेंटिटी-किट’ में सजाकर रख दिया गया. आविष्कार अब परीक्षण के लिए तैयार था.

     लास एंजेल्स के उच्चाधिकारी पीटर जे पिव्ज ने पहला प्रयोग करने में सहायता की. ह्यू मैकडोनल्ड के आविष्कार में वे बराबर सहयोग भी देते रहे थे. ‘आंडेंटिटी-किट’ से तैयार की गयी तस्वीरों की मदद से एक सौ तेईस में से अठारह अपराधियों को आश्चर्यजनक तेज़ी से गिरफ्तार किया गया. जैसे-जैसे इस ‘किट’ का उपयोग करने वाले अपनी कला में दक्ष होते जा रहे थे, सफलता का अनुपात बढ़ता जा रहा था.

     इस ‘आइडेंटिटी-किट’ की विशेषता यह है कि इसकी सहायता से सभी अपराधी, चाहे उनका कोई रिकार्ड हो या न हो, पकड़े जा सकते हैं.

     पहली सफलता से ही प्रभावित जिलाधीश पिव्ज ने अपने जिले के लिए और छः आइडेंटिटी-किटों का आर्डर दिया और  कैलफोर्निया के सभी जिलाधीशों से इस यंत्र से लाभ उठाने की बात कही.

     मैकडोनल्ड ने शुरू में ही यह अनुभव किया कि किसी चेहरे को एक-आध दूसरा हिस्सा भी कुछ का कुछ बना सकता है. और उन्होंने अपने आविष्कार में इस बात का पूरा खयाल रखा है. अपराधी सामान्य रूप से नकाब जैसी वस्तुओं का उपयोग करने लगे हैं. प्रायः जनाना नेट का.

     यदि कोई यह कहे कि चोर का चेहरा, कद और शरीर छोटा था, नाक पतली और भिंची हुई एवं थोड़ी नुकीली थी और बाकी सब कुछ नेट में छिपकर पहचानने लायक नहीं रह गया था, तो ‘आइडेंटिटी-किट’ के विशेषज्ञ के लिए बचे हुए अंकों का विवरण कुछ यों होगा… पतले ओंठ, सुनहरे बाल (बाल नोट में से दिखाई दे जाते हैं), तंग ललाट और छोटी आंखें और इसी आधार पर वे तस्वीर तैयार करने में सफल हो जाते हैं.

     ‘आइडेंटिटी-किट’ की बदौलत न सिर्फ अधिकारी ही अपराधी को शीघ्र पकड़ पाते हैं, बल्कि जनसाधारण से भी उन्हें बड़ी सहायता मिलती है. ऐसे उदाहरणों की भरमार है, जिसमें अधिकारियों ने अपराधी की तस्वीर लोगों के बीच बांट दी और उनकी सहायता से अपराधी आनन-फानन पकड़ा जा सका.

(फरवरी 1971 )

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