प्रश्न का समाधान

⇐  धर्मपाल जैन  ⇒   

    शिवराम-किंकर योगत्रयानंद महाशय सोनारपुर में रहते थे. मकान के दूसरे तल्ले में एक बड़ा कमरा था. उसी में उनका आसन था. श्री गोपीनाथ कविराज प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचींद्रनात सान्याल के साथ वहां पहुंचे.

    देखा, पुस्तकों से घिरा, लम्बी ज़टा रखाये और गले में रुद्राक्ष की माला धारण किये, प्रसन्न-वदन, साक्षात शिव की भांति तेजपूर्ण मुखमंडल वाला एक गौरवर्ण का वृद्ध महापुरुष बैठा है. प्रणाम करके ये लोग एक किनारे बैठ गये.

    शचींद्र ने इनसे पहले ही कह दिया था. कि बातें तुम्हीं करना, मैं पीछे बैठा रहूंगा. वैसा ही हुआ. कविराजजी आगे बैठे और शचींद्र कुछ फासले पर पीछे. महापुरुष ने परिचय पूछने के बाद जिज्ञासा-निवृत्ति के लिए प्रश्न करने का आदेश दिया.

    गोपीनाथजी ने निवेदन किया- ‘आये (यदि सत्य है , तो तत्त्वदर्शियों के विचारों में परस्पर मतभेद क्यों? मनीषी डॉ. गोपीनाथ कविराज के जीवन का एक जिज्ञासा-प्रसंग तो थे केवल दर्शनार्थ, किंतु यदि आज्ञा है तो एक-आध शंका सेवा में प्रस्तुत करूंगा.’ इसके बाद उन्होंने निम्नलिखित श्लोक पढ़ाः

  •     देवा विभिन्नाः स्मृतयो विभिन्ना
  •     ना।सौ मुनिर्यस्य मतं न भिन्नम्।
  •     धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां
  •     महाजनो येन गतः स पन्थाः।।

और निवेदन किया कि क्या तत्त्वज्ञानी मुनियों में भी, जो कि पूर्ण सत्य के साक्षात स्वरूप ही होते हैं, मतभेद संभव है?

    महात्माजी उनकी बुद्धिमत्ता की प्रशंसा करते हुए बोले-

    ‘धर्म का तत्त्व एक अत्यंत गम्भीर रहस्य है. वह मन से अतीत है. मन का निरोध किये बिना इस गुहा में प्रवेश असम्भव है. मुनिवर्ग मन को लेकर शास्त्राsं की व्याख्या करता है.’

    ‘जो मन से इसकी व्याख्या करेगा या इसे देखने का प्रयत्न करेगा, उसे शास्त्रा के’ तत्त्व अपनी प्रकृति अनुसार ही दिखाई पड़ेंगे. प्रत्येक मुनि की प्रकृति भिन्न है. अतः उनके मतों में विभिन्नता स्वाभाविक है, क्योंकि मुनिमात्र मन के अनुगामी हैं.

    ‘तत्त्व का साक्षात्कार मन को अतिक्रम करके होता है. किंतु उस स्थिति में, साक्षात्कार कर लेने पर भी वर्णन नहीं हो सकता. वर्णन करने के लिए शब्द की आवश्यकता होती है और उसकी पृष्ठभूमि में मन की क्रिया रहती है. मन ही विकल्पों का मूल है.’

    ‘प्राचीन काल में योगी लोग वितर्क-समाधि से किसी वस्तु का स्वरूप-साक्षात्कार करके उसका विवरण जनता के सामने व्यवहार-भूमि में देते थे. ये विवरण विकल्पमय  हैं. तत्त्व का साक्षात्कार होता है, जहां मन नहीं रहता. वह निर्विकल्प स्थिति है. परंतु तत्त्व का उपदेश होता है वाक्यों से, जिनमें मन की आवश्यकता होती है, यह ज्ञान विकल्प-ज्ञान है, किंतु साक्षात्कार तो विकल्पशून्य निर्विकल्प है.’

    ‘वेद, स्मृति सब शब्दात्मक हैं, अतः परम प्रामाणिक होने पर भी ये विकल्परहित नहीं हैं. मुनि भी मननशील हैं, वे विकल्प से रहित नहीं हैं. इसलिए धर्म का तत्त्वान्वेषण करना हो, तो हृदय-गुहा में प्रवेश करना पड़ता है.’

    ‘जन-साधारण के लिए हृदय-गुहा में प्रविष्ट होकर तत्त्व-ग्रहण करना सम्भव नहीं है. उनके लिए एकमात्र उपाय है, महापुरुषों द्वारा निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण करना.’

 

    एक पंडित थे, बड़े स्वाध्यायी. शास्त्रार्थ करने के लिए उन्होंने कई ग्रंथों से सामग्री उतार ली, और शास्त्रार्थों में उनकी धाक जम गयी. ऐसे ही एक दिन उन्हें कुछ चोरों ने मार्ग में घेर लिया.

    पंडितजी ने पास जितनी भी सामग्री थी, सब दे दी, परंतु वह कागजों का पुलिंदा अपने हाथ में उठाये रखा. जब एक डाकू ने वह भी लेना चाहा, तब अनुनय करते हुए बोले- ‘इन कागजों से शास्त्रार्थ करने में मुझे बहुत सहायता मिलती है, इनमें मैंने धर्म लिख रखा है.’

    डाकुओं का सरदार इस पर बोला- ‘अरे पंडित, धर्म तो जीवन में उतारने की चीज़ है. कागज में लिख रखने की चीज़ थोड़ी है. तुमने सारा समय यों ही गंवा दिया.’ उसने कागज लौटाते हुए कहा.

    पंडितजी सलज्ज भाव से बोले- ‘यह पहला शास्त्रार्थ है, जिसमें मैं पराजित हुआ हूं. अब से मैं धर्म को जीवन के पन्नों पर लिखूंगा.’

    ( फरवरी 1971 )

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