प्रजातंत्र और हम

       ♦  महात्मा गांधी

जन्मजात प्रजातंत्रवादी जन्मजात अनुशासनप्रेमी होता है. जिसे प्रायः सब मानवीय-दैवीय नियमों का स्वेच्छा से पालन करने की आदत हो, प्रजातंत्र उसका सहज स्वभाव बन जाता है. जो भी प्रजातंत्र की सेवा करने की महत्त्वाकांक्षा रखते हों, वे इस कसौटी पर अपने को कसकर योग्यता प्राप्त कर लें.

     ब्रिटिश इतिहास के सतही अध्ययन से हमारा यह ख्याल बन गया है कि सारी सत्ता संसदों से रिस-रिसकर जनता तक पहुंचती है. वास्तव में, सत्ता तो जनता में निहित है और तात्कालिक रूप से उन लोगों के सुपुर्द की जाती है, जिन्हें जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है. जनता से पृथक संसद का कोई अधिकार तो क्या अस्तित्व भी नहीं है.

     अनुशासित और विवेक प्रजातंत्र संसार की सुंदरतम वस्तु है. पूर्वग्रही, अज्ञानी और अंधविश्वासी प्रजातंत्र अराजकता में जा गिरता है, अपना सर्वनाश कर सकता है.

 ♦  सर विंस्टन चर्चिल

 प्रजातंत्र की जो भी महिमा गायी जाती है, उस सबके मूल में वह छोटा-सा आदमी है, जो छोटे-से कठघरे में जाकर छोटी-सी पर्ची पर छोटा-सा चिन्ह बनाता है. तमाम शब्दाडंबर और लम्बे-चौड़े शास्त्रार्थ भी इस बात के जबर्दस्त महत्त्व को घटा नहीं सकते.

 ♦   फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट

            इतिहास इसका प्रमाण है कि तानाशाहियों का जन्म सशक्त और सफल सरकारों से नहीं, बल्कि दुर्बल और लाचार सरकारों से होता है. यदि लोगों को प्रजातंत्रीय तरीकों से ऐसी सरकार मिल जाये, जो उन्हें भय और भुखमरी से बचा सके, तो उनका प्रजातंत्र सफल होता है, अन्यथा लोग बेसब्र हो उठते हैं. इसलिए स्वतंत्रता को कायम रखने का एकमात्र अचूक उपाय है- जनता के हितों की रक्षा कर सकने वाली सशक्त सरकार, और सरकार पर अपना वर्चस्व रख सकने वाली सशक्त और जानकार जनता.

       

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