पाप से परे

♦  गेरहार्ट हाउटमन      

 ( गेरहार्ट हाउटमन् (1962-1946) आधुनिक जर्मन साहित्य के दिग्गजों में थे. 1912 में वे अपने नाटकों के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुए; परंतु मूलतः वे कवि थे. और कवित्वगुण उनके गद्य में भी भरपूर है- वही कोमलता, वही भाव-प्रवाह. दो उपन्यास उन्होंने लिखे. एक था ‘देर केत्सर फान सोआना’, जिसमें उन्होंने धार्मिक जड़ता व संकुचितता पर प्रहार किया है. काव्यमय कथा और सशक्त शिल्प वाले इस मार्मिक उपन्यास का सार प्रस्तुत किया है रमेश उपाध्याय ने. )

       था तो यह स्विट्जरलैंड का एक प्रांत, पर यहां आबादी इतालवी लोगों की थी. यह इलाका टिश्शीनों कहलाता था और यहां मोंते गेनेरोसो नामक एक पर्वत था. मेंते गेनेरोसो की चोटी पर पहुंचने के यों तो कई रास्ते थे, पर सोआना होकर जाने वाला रास्ता सबसे अधिक दुर्गम था. फिर भी लोग वहां जाते, क्योंकि सोआना प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विख्यात था.

     मोंते गेनेरोसो की ऊंचाइयों पर चढ़ने वालों को अक्सर एक अजीब गड़रिया अपनी बकरियां चराता हुआ मिलता था. वह आंखों पर चश्मा लगाता था और धूप में संवलाये चेहरे के बावजूद पढ़ा-लिखा मालूम होता था. उसके काले, घुंघराले, लम्बे बाल कंधों पर बिखरे रहते और शरीर पर कपड़े की जगह वह केवल बकरी की खाल पहने रहता.

     अजनबी सैलानियों का कोई समूह उसके पास से गुजरता, तो उनके मार्गदर्शक उस गड़रिये को देकर हंसने लगते, फब्तियां कसते और चिढ़ाते, लेकिन वह उनकी ओर बिलकुल ध्यान नहीं देता था. कभी-कभी यह भी होता कि सैलानियों के मार्गदर्शक उसके पास जाते और देर तक उससे बातें करते. लौटने पर जब सैलानी लोग उनसे पूछते कि यह कौन था, तो वे चुपचाप आगे चल देते और दूर निकल जाने पर बताते कि इस व्यक्ति का इतिहास किसी को मालूम नहीं है. बस यही मालूम है कि लोग इसे ‘सोआना का पापी’ कहते हैं, इससे नफरत भी करते हैं, डरते भी है और अंधश्रद्धा के वशीभूत हो इसका आदर भी करते हैं.

     अपनी जवानी के दिनों में मैं भी सोआना जाया करता था और वहां के प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेता हुआ कुछ सप्ताह वहां बिताया करता था. सोआना में रहते समय गेनेरोसो पर चढ़ना-उतरना तो होता ही, इसलिए एक दिन मैंने भी सोआना में लोगों से उसके बारे में तरह-तरह की बातें सुनीं, तो मेरी इच्छा हुई कि एक बार जाकर उससे मिलूं.

     सोआना के एक जर्मन चिकित्सा की बातों ने मुझे और उकसाया. उसने  बताया कि पहाड़ पर रहने वाले उस झक्की आदमी को पढ़े-लिखे लोगों से मिलने में एतराज नहीं है. एक बार तो चिकित्सक स्वयं उससे मिलकर आया था. चिकित्सक ने कहा- ‘वैसे तो मुझे उस पर गुस्सा आना चाहिए क्योंकि वह मेरे पेशे में दखलंदाजी करता है. लेकिन खुदा का शुक्र है कि ज्यादा लोग उस शैतान से इलाज कराने नहीं जाते. हां, यह बात आप अच्छी तरह समझ लीजिए कि लोग उसे शैतान का पुजारी मानते हैं और चर्च वाले इस धारणा का खंडन नहीं करते, क्योंकि यह बात उन्हीं ने फैलायी है. कहते हैं कि शुरू में वह बड़ा नेक आदमी था और  किसी जादू-टोने का शीकार हो गया था, लेकिन जादूगर बन गया है. हालांकि मुझे वह ऐसा नहीं लगा. न तो उसकी उंगलियों पर मुझे लंबे नाखुन दिखाई दिये, न सिर पर सींग.’

     मैंने चिकित्सक की बातें सुनीं और उस व्यक्ति से मिलने की सोचने लगा. फिर एक दिन संयोगवश अचानक ही उससे भेंट हो गयी.

     हुआ  यह कि जब मैं एक दिन पहाड़ पर चढ़ रहा था, मैंने देखा कि एक बकरी ने रास्ते में एक बच्चे को जन्म दे दिया है और दूसरे को देने वाली है. निरीह बकरी ने मुझे ऐसी दृष्टि से देखा, जैसे मदद मांग रही हो. इस विचार से कि बकरी उसी गड़रिये की होगी, मैं जल्दी-जल्दी उसकी तलाश में चला और कुछ दूर पर बकरियां चराते गड़रिये को बुला लाया. इस बीच बकरी दूसरा बच्चा दे चुकी थी.

     गड़रिये ने चिकित्सक की-सी होशियारी से बकरी और बच्चों को सम्भाला. बड़े प्यार से उन्हें साफ किया और दोनों बच्चों को उठाकर धीरे-धीरे चल दिया. गड़रिये ने मुझे सिर्फ धन्यवाद ही नहीं दिया, बड़े हार्दिक सत्कार के स्वर में अपने साथ  चलने का निमंत्रण भी दिया. पहाड़ पर उसने पत्थर के ढोंकों से अपने और अपनी बकरियों के रहने के लिए मकान बना रखे थे. बकरियों का बाड़ा बाहर से तो अनगढ़ पत्थारों का एक ढेर ही लगता था, लेकिन अंदर से वह काफी अच्छा, गर्म और साफ-सुथरा था.

     गड़रिये ने बकरी और उसके बच्चों को वहां छोड़ा और मुझे कुछ ऊंचाई पर बनी झोपड़ी में ले गया, जो अंगूर की लताओं से छाये हुए चबूतरे पर बनी थी. पास ही एक पहाड़ी झरना बह रहा था, जिसका पानी चट्टान में प्राकृतिक रूप से बने हौजे में एकत्र होता था. हौजा के पास ही एक गुफा थी, जिसके मुंह पर लोहे का दरवाजा लगा था. गुफा अंदर जाकर मेहराबदार तहखाने का रूप ले लेती थी.

     इस स्थान से घाटी में देखने पर लगता कि हम अगम्य ऊंचाई पर पहुंच गये हैं. चारों ओर इतना सौंदर्य बिखरा पड़ा था कि मैं अवाक देखता रह गया. गड़रिया थोड़ी देर के लिए गुफा में गया और वापस आ गया. मेरी इच्छा हो रही थी कि उसके बारे में सब कुछ जान लूं पर मैं अपनी उत्सुकता दिखाकर कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहता था. वह मुझे अपनी झोपड़ी की ओर ले चला.

     मुझे आज भी याद है. अंगूर-लताओं से छाये हुए उस चबूतरे पर पत्थर की एक गोल मेज थी और उस मेज पर सोआना के उस पापी ने खाने-पीने की तमाम अच्छी चीजें जुटा दी थीं. जब हम आमने-सामने बैठ गये, तो उसने मेरी आंखों में आंखे डालकर देखा और मेरा दायां हाथ कसकर पकड़ लिया- मानो वह इस प्रकार अपना स्नेह और नैकट्य प्रकट कर रहा हो.

     पहली भेंट में बातें क्या-क्या हुई, यह मुझे पूरी तरह याद नहीं. बस इतना याद है कि उसने अपना नाम लुडोविको बताया और अर्जेंटाइना के बारे में कुछ बातें की. कुछ बातें स्विट्जरलैंड की राजनीति पर भी उसने कहीं और फिर मुझसे जर्मनी के बारे में कई प्रश्न पूछे, क्योंकि मैं जर्मन था. जब मैं चलने लगा, तो उसने कहा- ‘फिर आइयेगा.’

     हालांकि मैं उसकी कहानी मालूम करने के चक्कर में ही था, लेकिन कई बार मिलने पर भी मैंने अपनी इच्छा प्रकट नहीं की. लोगों ने मुझे एक कहानी सुना रखी थी कि लुडोविको सोआना का पापी क्यों कहलाता है, पर मैं उसी के मुंह से सुनकर जानना चाहता था कि उस कहानी में कितनी सचाई है. और यह भी कि वह इस अवस्था तक कैसे पहुंचा, उसकी यह दशा क्यों हुई, किस जीवन-दर्शन के आधार पर उसने यह परित्यक्त, एकाकी, वन्य जीवन स्वीकार किया. मेरे मन में बहुत-से प्रश्न थे, पर मैंने पूछे नहीं और यह अच्छा ही हुआ.

     लुडोविको मुझे प्रायः अकेला ही मिलता कभी अपनी बकरियां चराता हुआ और कभी अपनी कोठरी में बैठा हुआ. बकरियों से उसे बहुत प्यार था और उनके बीच वह खूब खुश रहता. कभी-कभी वह मुझे बांसुरी बजाता हुआ मिलता. संगीत का पशुओं पर क्या प्रभाव होता है, इस बात को वह अच्छी तरह समझता था और यह मैंने अपनी आंखों से भी देखा कि उसकी बांसुरी की एक तान सुनकर बकरियां उसके पास दौड़ आतीं, दूसरी तान सुनकर शांत खड़ी हो जातीं. किसी स्वर को सुनकर वे इधर-उधर फैलकर चरने लगतीं और किसी को सुनकर चुपचाप लुडोविको के पीछे-पीछे चल देतीं.

     कई बार ऐसा हुआ कि मैं उससे मिला चुपचाप बैठा रहा और चला आया. कई बार उसने मुझसे तरह-तरह की बातें कीं और बातों के दौरान वही अधिक बोलता. उसकी बातों में कई तरह के संदर्भ रहते- पौराणिक-कथाओं के, देवी-देवताओं के, ईसाई धर्म के… और इसी तरह जब एक दिन पशुओं पर बात चल रही थी, तो उसने ईसा मसीह के बारे में ऐसी बात कही, जिसे सुनकर मेरे कान खड़े हुए और मुझे लगा कि लोग इसे पापी क्यों कहते हैं.

     उसने कहा- ‘मेरा बस चलता तो मैं सूली पर लटकाये गये आदमी को पूजने के बजाय किसी जिंदा बकरे को पूजता.’ फिर उसने बताया कि यूनानी देवि-देवताओं में अधिकांश ऐसे हैं जिनका कोई-न-कोई अंग पशु का है. फिर बोला- ‘सच तो यह है कि इस युग में लोग इंसान को नहीं, जानवर को ही पूजते हैं.’

     इसी तरह की और-और बातें करता हुआ वह मुझे अपने घर में ले गया. घर के अंदर का वह हिस्सा चौकोर और साफ-सुथरा था और उसमें रखी हुई यूनानी और लातीनी पुस्तकें, कागज-कलम आदि देखकर मुझे लगा, यह लुडोविको का अध्ययन-कक्ष है और यह भी कि वह काफी विद्वान आदमी होगा. मेरी धारणा को पुष्ट करते हुए लुडोविको ने कहा- ‘आपसे क्या छिपाना. मैं एक अच्छे परिवार में पैदा हुआ हूं, मुझे अच्छी शिक्षा मिली है और जवानी के दिनों में मैं गलत रास्ते पर चला गया था. आप शायद जानना चाहेंगे कि फिर मैं अस्वाभाविक से स्वाभाविक, बंदी से मुक्त, दुखी और विकृत मनुष्य से सुखी और संतुष्ट व्यक्ति कैसे बना, और मैंने समाज और ईसाइयत से नाता क्यों तोड़ा लिया?’ इतना कहकर वह जोर से हंसा. फिर बोला- ‘किसी दिन मैं अपने इस परिवर्तन की कहानी लिखूंगा.’

     मुझे लगा, मेरी जिज्ञासाओं के समाधान का समय आ गया है, लेकिन लुडोविको ने आगे की बात हंसी में उड़ा दी और मुझे खिलाने-पिलाने में लग गया. उस समय मैंने उसे गौर से देखा, तो मुझे लगा, वह अपने धूप-तपे, संवलाये, बकरी की खाल से ढंके अर्धनग्न शरीर और आंखों पर चढ़ें चश्मे के बावजूद काफी खूबसूरत हैं.

     थोड़ी देर बाद उसने कम उम्र लड़कों की तरह मुस्कराते हुए स्वयं ही कहा- ‘पता नहीं क्यों, मैं आपके सामने इस तरह खुल गया हूं कि जो बातें मैंने किसी को नहीं बतायीं, वे भी आपको बताये जा रहा हूं,… दरअसल मैं कभी-कभी कुछ पढ़ता-लिखता रहता हूं और इधर अपने फालतू वक्त में मैंने एक कहानी लिखी है. यह कहानी मैंने सोआना के आस-पास के रहने वालों से सुनी थी और बेहद सीधी-सादी होते हुए भी मुझे अच्छी लगी. कहते हैं, उस कहानी की घटनाएं यहीं घटी थीं और सच्ची हैं. मैं वह कहानी आपको सुनाना चाहता हूं, आप सुनना चाहेंगे? उसे लिखने में मेरा बहुत समय नष्ट हुआ है- अगर आप सुन लेंगे, तो मुझे लगेगा कि मेरी मेहनत सफल हुई, वरना मैं उसे फाड़कर फेंक दूंगा.’

     मैंने खुशी-खुशी उसकी कहानी सुनना स्वीकार कर लिया. लुडोविको ने लाल अंगूरी शराब का पात्र उठाया और मुझे साथ लेकर मकान के भीतरी भाग में पहुंचा. वहां उसने मेटे कागज पर लिखी हुई कहानी की पांडुलिपि निकाली और मेरे सामने बैठकर सुनाने से पहले साहस बटोरने के लिए एक जाम पिया. फिर अपनी सुरीली आवाज में कहानी शूरू की-

     लुगानो झील के ऊपर वाली पहाड़ी ढलान पर चढ़ती हुई सर्पाकार सड़क पर लगभग एक घंटे में उस जगह पहुंचा देती है, जहां एक छोटी-सी बस्ती पहाड़ी चोटियों के बीच बसी हुई है. इस गांव के मकान अन्य इतावली गांवों के मकानों की तरह ही भूरे पत्थर और चूने से बने और उनके एक ओर गहरी घाटी है तथा दूसरी ओर मोंते गेनेरोसो नामक विशाल पर्वत की ऊंची और विस्तृत ढलान है. यह घाटी जहां बंद होती है, वहां एक गहरा कुंड है, जिसका संगीत घाटी में गूंजा करता है. यहां एक गिरजाघर भी है.

     बहुत दिन हुए, इस गिरजाघर में एक नया पादरी आया. उसकी उम्र लगभग पच्चीस वर्ष थी और उसका नाम राफेलियो फ्रांसेस्को था. उसका जन्म प्रांत टिश्शीनो के लिगोर्नेत्तो में उस परिवार में हुआ था, जिसमें संयुक्त इटली के सबसे महान मूर्तिकार ने जन्म लिया था. खैर, मूर्तिकार की तो मृत्यु हो चुकी.

     फ्रांसेस्को की प्रारंभिक शिक्षा मिलान में रहने वाले सम्बंधियों के पास रहकर हुई और बाद में उसने स्विट्जरलैंड और इटली के कई विद्यालयों में अध्ययन किया. उसकी मां कुछ कठोर और कट्टर धार्मिक स्वभाव की थी, इसलिए फ्रांसेस्को का झुकाव बचपन से ही धर्म की ओर हो गया. उसकी आंखें कमज़ोर थीं, इसलिए वह बचपन से ही चश्मा पहनता था. पहले तो वह चश्मे के कारण अपने सहपाठियों में कुतूहल का विषय बना, फिर अपनी मेहनत, नियमित दिनचर्या और पवित्रता के कारण बड़ा माना जाने लगा.

     आगे चलकर उसे पादरी बनना था, इसलिए वह पहले से ही नियमित और कठोर जीवन का अभ्यस्त होने की कोशिश में था. यहां तक कि एक-आध बार तो उसकी मां को भी उससे कहना पड़ा कि पादरी बनने से पहले वह चाहे तो जीवन का थोड़ा-बहुत सुख भोग ले. लेकिन फ्रांसेस्को पर इस बात का कोई असर नहीं हुआ. और जब वह पादरी बन गया, तो उसने इच्छा प्रकट की कि उसे किसी ऐसे गिरजाघर में भेजा जाये, जो नागरिक सभ्यता से दूर हो, जहां वह किसी निष्पाप संत की तरह रह सके और ईश्वरोपासना कर सके.

     इसीलिए जब वह सोआना के गिरजे में आया तो आस-पास रहने वालों ने देखा कि यह नया पादरी पहले वाले पादरी से बिलकुल भिन्न है. पहले वाला पादरी मोटे सांड-जैसा देहाती था और उसके कब्जे में कई सुंदर औरतें और लड़कियां रहती थीं, जबकि यह नया पादरी दुबला-पतला और एकांतप्रिय था. गांवों में आज भी चश्मा लगाने वालों को ज्यादा पढ़ा-लिखा और कठोर स्वभाव का माना जाता है, सो गांव के लोगों ने उसके विषय में कई धारणाएं बना लीं. शुरू-शुरू में उसके इस गंभीर स्वभाव को लोगों ने पसंद नहीं किया, लेकिन चार-पांच सप्ताह बाद ही उसने उन्हें प्रभावित कर लिया और वे पिछले पादरी को भूले गये.

     जल्दी ही फ्रांसेस्को वेला का नाम आस-पास के इलाके में फैल गया. जब भी वह अपने आश्रम से निकलर गलियों में आता, स्त्रियां और बच्चे उसे घेर लेते और श्रद्धापूर्वक उसका हाथ चूमते. ईसाइयों में परम्परा है कि जाने-अनजाने कोई पाप हो जाये, तो पादरी के सामने उसे स्वीकार लेते हैं. पाप की यह आत्मस्वीकृति पादरी के सामने एकांत में होती है. सोआना गांव के बारे में यह प्रसिद्ध था कि वहां बड़े भ्रष्ट लोग रहते हैं, किंतु जब से नया पादरी आया, आत्मस्वीकृति के लिए बहुत लोग आने लगे. फ्रांसेस्को जल्दी ही सोआना का संत माना जाने लगा. उसके अनुयायी भी बहुत हो गये, क्योंकि वह धार्मिक अनुष्ठानों के अलावा चर्च से सम्बद्ध स्कूल में बच्चों को स्वयं पढ़ाने भी लगा.

     आश्रम में फ्रांसेस्को के सिवा, बस एक वृद्धा रहती थी, जिसकी उम्र लगभग सत्तर वर्ष होगी. वही आश्रम की देखभाल करती और फ्रांसेस्को का काम-काज करती.

     मार्च मास की शुरूआत में एक रात वृद्धा ने सुना, बाहर से कोई जोर-जोर से आश्रम की घंटी बजा रहा है. लालटेन लेकर वह दरवाजा खोलने आयी, तो उसने देखा कि एक विचित्र व्यक्ति खड़ा है और पादरी से मिलना चाहता है. वृद्धा ने घबराकर दरवाजा बंद कर लिया और फ्रांसेस्को के पास जाकर सूचना दी. फ्रांसेस्को ने नियम बना रखा था कि  उसके दरवाजे से कोई भी निराश नहीं लौटेगा, इसलिए उसने धर्मग्रंथ से नजर उठाकर कहा- ‘उसे बुला लाओ, पेट्रोनिला.’

     और थोड़ी देर बाद वह विचित्र व्यक्ति पादरी के समाने खड़ा था. उसकी उम्र चालीस के करीब होगी. वह नंगे पांव था, कपड़े उसके फटे-पुराने थे और बारिश में भीगे हुए थे. कमीज आगे से खुली हुई थी, जिससे उसकी बालों वाली भूरी छाती दिखाई दे रही थी. चेहरे पर घनी, काली, बेतरबीब दाढ़ी-मूंछे थीं और बालों के बीच उसकी आंखे मशाल की तरह जलती दिखाई देती थीं.

     फ्रांसेस्को ने उससे आने का कारण पूछा, तो उसने अपने वन्य हावभावों के साथ ऐसी भाषा में धाराप्रवाह बोलना शुरू किया, जिसे समझना मुश्किल था. थी तो वह उसकी प्रदेश की कोई बोली, पर इतनी विचित्र कि जन्म से ही सोआना में रहने वाली वृद्धा को भी लगा कि वह जैसे कोई विदेशी भाषा बोल रहा है. काफी कठिनाई से कई सवाल पूछने के बाद फ्रांसेस्को इतना समझ पाया कि आगंतुक सात बच्चों का पिता है और उनमें से कुछ को वह चर्चा के स्कूल में भरती कराना चाहता है.

     ‘कहां से आये हो?’ फ्रांसेस्को ने पूछा.

     ‘सोआना से.’ आगंतुक ने उत्तर दिया.

     ‘यह कैसे हो सकता है! सोआना में रहने वाले हर परिवार को मैं जानता हूं, तुम्हें तो मैंने कभी नहीं देखा.’

     यह सुनकर आगंतुक ने अपने निवास-स्थान का लंबा-चौड़ा विवरण दिया, जिसे फ्रांसेस्को समझ नहीं सका. फिर भी उसने कहा- ‘अगर तुम सोआना के ही रहने वाले हो और तुम्हारे बच्चों की उम्र पढ़ने-लिखने की है, तो उन्हें अब तक तुमने भरती क्यों नहीं कराया? मैंने तो तुम्हें या तुम्हारी पत्नी को कभी चर्च में प्रार्थना के लिए आते हुए नहीं देखा.’

     आगुंतक की आंखों में अजीब-सा भाव आया और उसने ओंठ भींच लिये. उत्तर देने के बजाय उसने एक ठंडी गहरी सांस ली, जैसे उसके सीने पर भारी बोझ रखा हुआ हो.

     ‘खैर, ठीक है, तुमने आकर अच्छा किया. मैं तुम्हारा नाम लिखे लेता हूं और पता लगाऊंगा कि अभी तक तुम्हारे बच्चों को स्कूल में दाखिला क्यों नहीं मिला.’

     इतना सुनना था कि अजनबी आगुंतुक की आंखों से आंसू बह चले. फ्रांसेस्को की समझ में कुछ नहीं आया, पर उसने सांत्वना देते हुए कहा- ‘रोओ नहीं, भले आदमी, मैं सारे मामले की जांच करूंगा. बस, तुम अपना नाम बता दो और जाकर कल अपने बच्चों को मेरे पास भेज दो.’

     आगंतुक चुप हो गया और कुछ देर हताश, पीड़ित दृष्टि से फ्रांसेस्को की ओर देखता रहा. फिर उसने मेज पर से कागज-कलम उठाया और खिड़की की ओर चला गया. वहां अंधेरे में ही उसने कागज पर कुछ लिखा और पादरी को पकड़ा दिया. फ्रांसेस्को ने उसे विदा देने के बाद उसका नाम पढ़ा- लुकिनो स्काराबोटा. लेकिन यह नाम उसे एक बार भी सुना हुआ नहीं लगा.

     अगले दिन सुबह-सुबह ही फ्रांसेस्को गांव के मुखिया सिंडाको से मिलने गया और रात की सारी घटना, आगंतुक के नाम सहित, उसे सुनाकर पूछा कि यह आदमी कौन है और कहां रहता है. सिंडालो ने पादरी को ऊपर ले जाकर पहाड़ों की आरे इशारा करते हुए कहा- ‘देखिये, स्काराबोटा वहां रहता है.’ सिंडाको की उंगली काफी ऊंचाई पर अनगढ़ पत्थरों से बने एक मकान की ओर संकेत कर रही थी, जो पहाड़ के ऊपर एकदम अलग और अकेला दिखाई देता था.

     इसके बाद सिंडाको ने कहा- ‘आश्चर्य है फादर, अभी तक आपने उसके बारे में कुछ नहीं सुना. वह कोई गरीब आदमी नहीं है और जन्म भी अच्छे खानदान में हुआ है, लेकिन उसका  परिवार… फादर, ये बड़े घृणित लोग हैं. पिछले दस वर्षों से इन्होंने सोआना को बदनाम कर रखा है. दुर्भाग्य से जिस जगह वे रहते हैं, वहां हमारा कोई अधिकार नहीं… उसकी जो औरत है न, उस पर अदालत में मुकद्दमा भी चल चुका है. लेकिन वह कहती है कि उसके बच्चे इस आदमी के नहीं हैं, जिसके साथ वह रहती है. बताइये ज्यादा बेहूदी और क्या बात होगी? उसने अदालत में कहा कि ये सातों बच्चे गर्मी के दिनों में मोंते गेनेरोसों पर आने वाले सैलानियों के हैं.’   

     ‘एक बार को मान भी लिया जाये कि वह वेश्या है और उसके बच्चे बाहरी लोगों के ही हैं, लेकिन क्या वेश्या ऐसी होती है? न शक्ल, न सूरत गंदी और बदसूरत, जैसे पाप की प्रतिमा!’

     ‘इसलिए लोग ठीक ही कहते हैं कि बच्चे उसी आदमी के हैं जो कल रात आपके पास आया था. लेकिन खास बात तो यही है- वह आदमी उन बच्चों का बाप भी है और उस औरत का सगा भाई भी!’

     युवा पादरी का चेहरा फक हो गया. सिंडाको ने आगे कहा- ‘इन मामलों में लोकमत बहुत कम गलती करता है और इसलिए इस पापी परिवार से सब ने नाता तोड़ लिया है. लोगों की दृष्टि में ये लोग पापी ही नहीं, अपराधी भी हैं. इसलिए जब भी उनका कोई बच्चा गांव के आस-पास दिखाई देता है, लोग पत्थर बरसाने लगते हैं. ये लोग जिस चर्च में जाते हैं, उसे अपवित्र माना जाता है. एक बार तो उन्हें चर्च में घुसने का ऐसा मजा चखाया गया कि वे चर्च की ओर रुख करना ही भूल गये.’

     ‘आप ही बताइये, क्या ऐसे लोगों को चर्च में घुसने देना चाहिए? क्या इनके पाप की संतानों को सच्चे ईसाइयों के बच्चों के साथ बैठकर पढ़ने देना चाहिए? क्या हम लोग इन नीच पापी, जंगली जानवरों के साथ उठें-बैंठें?’

     पादरी फ्रांसेस्को का चेहरा पीला पड़ गया था और उस पर कोई भाव आसानी से नहीं पढ़ा जा सकता था कि सिंडाको के कथन की उस पर क्या प्रतिक्रिया हुई है. उसने धन्यवाद दिया और जिस गम्भीरता से आया था, उसी गम्भीरता से लौट गया. लेकिन वह परेशान था और बिशप को स्काराबोटा के मामले की सारी बातें लिख भेंजी.

     एक सप्ताह बाद उत्तर आया. बिशप ने लिखा था कि फ्रांसेस्को खुद ही जाकर उन लोगों से मिले और सारी बातें मालूम करें. बिशप ने फ्रांसेस्को की प्रशंसा भी की थी- ‘जानकर हर्ष हुआ कि तुम में इतनी आध्यात्मिक लगन है. यह अच्छी बात है कि इन भूल करने वालों और गलत रास्तों पर जाने वालों के लिए तुम्हारे मन में करुणा है और तुम उनकी मुक्ति के लिए चिंतित हो. चाहे कोई कितना भी बड़ा पापी हो, चर्च की ओर से उसे आर्शिवाद और सांत्वना मिलनी चाहिए.’

     स्काराबोटा का घर सांताक्रोचे नामक चोटी पर था. वह चोटी काफी ऊंचाई पर थी और रास्ता फ्रांसेस्को का देखा हुआ नहीं था, इसलिए उसने एक ग्रामीण मार्ग-दर्शक को अपने साथ लिया अपने आध्यात्मिक अभियान पर चल दिया. रास्ते में मोंते गेनेरोसो की पर्वतश्री फैली हुई थी. वृक्ष और झाड़िया, घास और चट्टानें, झरने और चरागाह… लेकिन फ्रांसेस्को प्रकृति-प्रेमी नहीं था. उसने चारों ओर फैली प्राकृतिक सुषमा को देखा जरूर, तन-मन में एक वासंती उत्फुल्लता भी महसूस की, लेकिन उसका मस्तिष्क धार्मिक समस्याओं में उलझा हुआ था. प्रकृति से अधिक उसे उन भग्न मंदिरों ने आकृष्ट किया, जो निर्जन में बनाकर खंडहर होने के लिए छोड़ दिये गये.

     फ्रांसेस्को की इच्छा हुई कि उन सब उपेक्षित गिरजों का जीर्णोद्धार कराये. उसे बर्बर प्रकृति की भयंकर शक्तियों के समक्ष जगह-जगह बने ये छोटे-छोटे गिरजे और उपासनागृह वातावरण में पवित्रता की सृष्टि करते हुए-से लगे. लेकिन उसे दुख भी हुआ कि रोमन कैथोलिक चर्च की इन पावन संस्थाओं के प्रति अधिकांश लोगों के मन में सच्ची, सक्रिय और जीवंत आस्था नहीं है, इसलिए ये उपेक्षित पड़ी हैं.

     आगे चलकर फ्रांसेस्को ने देखा कि झील के किनारे सोआना का एक चरवाहा औंधा लेटा हुआ जानवरों की तरह अपनी प्यास बुझा रहा है. पानी पीने के बाद चरवाहा उठा और अपने जानवारों को घेरने लगा. कुछ बकरियां झील के ढालू किनारे तक चली गयी थीं, जहां से फिसलने पर वे सीधी पानी में जातीं. चरवाहे ने सीटी बजाकर, पत्थर फेंककर उन्हें किनारे से हटाया. यह देखकर फ्रांसेस्को के मन में विचार आया कि वह स्वयं भी तो चरवाहा ही है, अंतर यही है कि पशुओं की नहीं, मनुष्यों की देखभाल करता है… और जब पशुओं को सुरक्षित रखना इतना कठिन और उत्तरदायित्वपूर्ण काम है, तो मनुष्यों को रखना तो बहुत ही कठिन है, जो हरदम शैतान के प्रलोभनों में आने को तैयार रहते हैं.

     यही सब सोचता हुआ फ्रांसेस्को मार्ग-दर्शक के पीछे-पीछे  चलता सांताक्रोचे की चोटी पर पहुंच गया. लुकिनो के घर के पास पहुंचकर उसने ग्रामीण मार्गदर्शक को वापस भेज दिया, क्योंकि वह उन लोगों से एकांत में बातें करना चाहता था और लौटते समय अकेला रहना चाहता था.

     लुकिनों के घर के आस-पास पशुओं की फैलायी हुई काफी गंदगी थी और स्वच्छ पहाड़ी हवा में भी बकरियों की हीक महसूस की जा सकती थी. घर के दरवाजे से धुआं बाहर निकल रहा था और अंदर अंधेरा था. उसे आते हुए देखकर कुछ बच्चों ने उत्सुकता से बाहर झांका और फिर भीतर हो गये. फ्रांसेस्को भीतर पहुंचा तो उन्होंने मूक अभिवादन किया, जिसे वह देख नहीं पाया. एक बकरी उसके पास आयी, धीरे-से मिमियायी और उसे सूंघने लगी.

     धीरे-धीरे फ्रांसेस्को की आंखें अंधेरे की अभ्यस्त हो गयीं और उसने देखा कि वह जहां खड़ा है, वह जानवरों का बाड़ा है. दायीं ओर एक चौकोर कमरा था, जो पहाड़ के अनगढ़ पत्थरों से बनाया गया था. परिवार का भोजन बनाने का चूल्हा उसी में था और धुंआ निकलने का कोई रास्ता न होने के कारण छत और दीवारें इस कदर काली हो गयी थीं कि वह कमरा न लगकर गुफा-जैसा लगता था. चूल्हे के पास बिना पुश्त की, लकड़ी की एक बेंच पड़ी थी, जो घिस-घिस कर इतनी चिकनी हो गयी थी कि चिकने संगरमर की बनी लगती थी.

     फ्रांसेस्को यह सब देख ही रहा था कि लुकिनो स्काराबोटा अंदर दाखिल हुआ. वह हांफ रहा था- सिर्फ इसलिए नहीं कि पादरी को आते देख वह एक दूर की चोटी से दौड़ता हुआ आया था, बल्कि इसलिए भी कि पादरी का उसके घर आना बहुत बड़ी घटना थी. उसने फ्रांसेस्को का अभिवादन किया और उसे बेंच पर बैठाया. फिर उसने फूंक मार-मारकर चूल्हे की आग को प्रज्ज्वलित किया और पादरी के सामने दूध, रोटी और पनीर ला-लाकर रखने लगा. लेकिन फ्रांसेस्को ने चढ़ाई के बाद लग आयी भूख के बावजूद कुछ भी खाने से इंकार कर दिया- इस तरह किसी के घर जाकर कुछ खाना धार्मिक दृष्टि से वर्जित जो था!

     उस घुटन-भरे माहौल से जल्दी निकलने के लिए फ्रांसेस्को ने कहना शुरू किया- ‘लुकिनो स्काराबोटा, तुम्हें पावन गिरजाघर में आने से नहीं रोका जायेगा और अब तुम्हारे बच्चे भी ईसाई समाज से बहिष्कृत नहीं माने जायेंगे. लेकिन दो शर्तें हैं- एक तो यह कि तुम्हारे बारे में जो बुरी अफवाहें फैली हुई हैं, वे गलत सिद्ध हो जायें, या फिर तुम ईमादारी से अपने पाप को स्वीकार करो, प्रायश्चित करो और ईश्वर के बनाये रास्ते पर चलना शुरू करो. इसलिए निडर होकर सब कुछ सच-सच मुझे बता दो.’

     यह सुनकर लुकिनो एकदम चुप हो गया. उसके गले से कुछ आवाजें निकलीं भी, पर फ्रांसेस्को उनका अर्थ नहीं समझ पाया. फ्रांसेस्को  ने फिर से समझाना शुरू किया, तो वह घबरा गया. उसने पादरी के पांव पकड़ लिये और अपने ओठों से उसके जूतों को चूमने लगा. फ्रांसेस्को को बहुत बुरा लगा. यह तो मूर्तिपूजकों का ढंग हैं, ईसाइयों का नहीं. उसने लुकिनो को परे ठेलते हुए, कुछ गुस्से में आकर, स्पष्ट शब्दों में उस जघन्य पाप की बात शुरू की, जिससे लुकिनो की संताने जनमी थीं और धर्म तथा ईश्वर के विषय में बताने लगा.

     लुकिनो पादरी की बातें समझ नहीं सका, क्योंकि उसे नहीं मालूम था कि ईश्वर क्या है, और कौन है. अब तक वह एक काष्ठ-प्रतिमा को ईश्वर मानकर पूजता आया था. पादरी के मुंह से बार-बार धर्म और ईश्वर सुनकर वह उठा और अंधेरे में से उस काष्ठ-प्रतिमा को उठा लाया. प्रतिमा देखकर फ्रांसेस्को सिहर उठा. उसने पढ़-सुन रखा था कि मूर्तिपूजक लोग विधर्मी होते हैं और मूर्तियां ईश्वर-विरोध, लेकिन अपने स्वाभाविक धार्मिक भय के बावजूद  वह प्रतिमा को निकट से देखे बिना नहीं रह सका. उसने लुकिनो से प्रतिमा ले ली.

     लेकिन देखकर उसे अजीब-सी अनुभूति हुई. प्रतिमा और कुछ नहीं, लकड़ी पर खोदी  हुई एक अश्लील, कामोत्तेजक आकृति थी, जिसे प्राचीन ग्रामीण लोग प्रजनन का देवता कहकर पूजते थे. अचानक उसके मन में पुण्य-प्रकोप जाग उठा और उसने प्रतिमा को आग में फेंक दिया. लेकिन लुकिनो यह देखकर कुत्ते की तरह दौड़ा और जलती आग में से प्रतिमा को उठा लाया, जो तब तक आग पकड़ लिया, जैसे उसे खतरा उत्पन्न हो गया हो.

     फ्रांसेस्को ने यह देखकर प्रतिमा और लुकिनो दोनों को ही बुरा-भला कहना शुरू किया. पादरी की आवाज ऊंची थी. शायद उसी को सुनकर लुकिनो की बहन वहां आ पहुंची. पीले-से रंग की वह एक अनाकर्षक स्त्री थी. गंदी इतनी जैसे वर्षों से नहायी न हो. फटे हुए कपड़ों से उसकी नग्नता झांक रही थी. पादरी जब काफी कुछ कह चुका और थोड़ी देर के लिए रुका, तो स्त्री ने धीमे स्वर में अपने भाई  को पुकारा. लुकिनो आज्ञाकारी कुत्ते की तरह एकदम उठकर बाहर चला गया. तब वह पादरी के पास आयी, अभिवादन किया और फूट-फूटकर रो पड़ीं.

     रोते-रोते उस स्त्री ने बताया कि उसने पाप तो किया है, लेकिन वह पाप नहीं, जिसका दोष उस पर लगाया जाता है. उसका कहना था कि पाप उस अकेली ने किया है, उसका भाई निष्पाप है और ये बच्चे सचमुच यहां से गुजरने वाले अजनबी लोगों के हैं. फिर बोली- ‘इन बच्चों को इस निस्हाय अकेलेपन में जन्म देकर मैंने काफी कष्ट उठाया है. कुछ बच्चे तो जन्म लेने के तुरंत बाद ही मर गये, उन्हें मैंने अपने ही हाथों से इस पहाड़ी धरती में दफनाया है. आप मुझे क्षमा करें या न करें, पर ईश्वर ने मुझे क्षमा कर दिया है, क्योंकि मैंने बड़ी तकलीफे और परेशानियां झेली हैं.’

     फ्रांसेस्को सुनता रहा, लेकिन स्त्री के आंसू उसे द्रवित नहीं कर सके. उसे लगा, स्त्री झूठ बोल रही है. उसने कहा- ‘मैं  तुमसे बहस नहीं करना चाहता कि तुममें से किसका दोष कितना है, लेकिन एक बात तय है- अगर तुम चाहती हो कि तुम्हारे बच्चे जंगली जानवरों की तरह नहीं, सभ्य और सुसंस्कृत आदमियों की तरह विकसित हों, तो तुम्हें अपने भाई से अलग होना पड़ेगा. जब तक तुम उसके साथ रहोगी, लोग यही मानते रहेंगे कि तुम उस भयंकर पाप में डूबी हुई हो.’

     यह सुनकर स्त्री बिफर उठी- ‘नहीं, मैं अपने भाई को नहीं छोड़ सकती. वह मेरे बिना जिंदा नहीं रह सकता. जैसे-तैसे मैंने उसे अपना नाम लिखना तो सिखा दिया है, पर न वह किसी से ढंग से बात कर सकता है, न बाजार में जाकर चीजें बेच सकता है. उसे सिक्कों तक का ज्ञान नहीं, रेलों और शहरों और लोगों से उसे डर लगता है. उसका सारा काम मैं करती हूं अगर मैं कहीं चली गयी, तो या तो वह कुत्ते की तरह मेरे पीचे-पीछे दौड़ा आयेगा या मर जायेगा. और फिर मेरे बच्चों का क्या होगा? जब तक मैं यहां हूं, किसी में हिम्मत नहीं कि मेरे भाई को यहां से ले जाये…’

     स्त्री जब ये बातें कर रही थी, तभी एक चौदह-पंद्रह साल की लड़की अंदर आयी और घर के काम-काज इस तरह करने लगी जैसे फ्रांसेस्को की उपस्थिति से उसे कोई सरोकार न हो. लेकिन उस अंधेरे में देखी हुई एक झलक से ही फ्रांसेस्को ने जान लिया कि लड़की बहुत सुंदर है.

     उसे देखकर नौजवान पादरी के मन में एक ऐसी भावना उठी, जिसे वह समझ नहीं पाया. उसे लगा, हालांकि इस लड़की का जन्म जघन्यतम पाप से हुआ है, फिर भी सम्भव है, इसमें पवित्रता का कोई अंश शेष हो, या हो सकता है इसे पता भी नहीं हो कि इसे शैतान ने दुनिया में भेजा है… हां, उसकी चाल-ढाल में ऐसी शांत सहजता थी कि उसे देखकर कोई यह नहीं कह सकता था कि इसका दिमाग परेशान है या इसकी आत्मा पर कोई बोझ है. इसके विपरीत ऐसा लगता था, जैसे वह एक सलज्ज आत्मविश्वास से भरी हुई है.

     अभी तक उसने फ्रांसेस्को की ओर नजर उठाकर भी नहीं देखा था, जबकि फ्रांसेस्को अपने चश्मे के भीतर से चोरी-चोरी लगातार उसकी ओर देखता जा रहा था. उसे अपने भीतर एक परिवर्तन-सा होता महसूस हुआ और थोड़ी देर पहले उस बंद, धुएं से भरी जगह में, जहां उसका दम घुट रहा था, उसे ऐसा लगा जैसे एक सुगंध व्याप्त हो गयी है, मानो किसी जादू के जोर से वह अंधेरी, दमघोटू जगह स्वर्ग बन गयी है. कुछ देर बाद लड़की सीढ़ी पर चढ़कर ऊपर की दुछती में गायब हो गयी. तब फ्रांसेस्को को अपने काम का ध्यान आया.

     स्त्री कह रही थी- ‘मैंने अपने भाई को आपके पास इसलिए भेजा था कि आप हम पर दया करें, इसलिए नहीं कि हमारा दुख और बढ़ायें. मैं एक अच्छी कैथोलिक हूं, लेकिन अगर चर्च किसी को ठुकराता है तो उसे पूरा अधिकार है कि वह शैतान के पास जाये. इसलिए अगर चर्च हमारी नहीं सुनता, तो हो सकता है कि मैं वह पाप सचमुच कर बैठूं, जिसका इल्जाम मुझ पर लगाया जाता है, पर जो मैंने अभी तक नहीं किया है.’

     फ्रांसेस्को स्त्री की बातें सुन रहा था, लेकिन साथ-साथ ऊपर से आती हुई आवाजें भी- जहां जाकर लड़की गायब हो गयी थी. एक मुधर गीत, जो कभी ऊंचे स्वर में गाया जाता और कभी बेहद हौले-से ली जानेवाली सांस की तरह. इसलिए फ्रांसेस्को का ध्यान स्त्री के सदन और क्रंदन की ओर कम, और उस श्रुतिमधुर ध्वनि में अधिक था. और उसके भीतर एक गर्म लहर दौड़ गयी- एक चिंता के साथ, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी.

     वह उठकर बाहर निकल आया. बाहर आकर उसने साफ पहाड़ी हवा में सांस ली और वह ताजगी से भर उठा. दूर-दूर तक मनोहारी प्राकृतिक सुषमा का विस्तार और नीचे दिखाई देता संत अगाता का उपासना गृह. उसे देखकर फ्रांसेस्को के मन में आया कि इन लोगों के आध्यात्मिक उद्धार के लिए वह इन्हें इसी उपासना-गृह में बुलाये. उसे लगा, शायद यह स्त्री मेरे सामने- एक आदमी के सामने- अपना पाप स्वीकारना नहीं चाहती, पर हो सकता है, वहां ईश्वर के सामने स्वीकार ले.

     स्त्री उसके पीछे-पीछे चली आयी थी और अब अपने घर के दरवाजे में ठिठकी हुई खड़ी थी. फ्रांसेस्को ने उससे कहा- ‘देखो, सोआना के चर्च में तो तुम लोग आ नहीं सकते, क्योंकि वहां तुमसे घृणा करने वाले लोग तुम पर पत्थर बरसायेंगे, इस लिए तुम लोग किसी दिन संत अगाता के उस उपासना गृह में आओ और आत्मस्वीकृतियों से अपनी आत्माएं शुद्ध करो.’

     स्त्री की आंखो में फिर आंसू भर आये, लेकिन उसने पादरी की बात मान ली और पादरी ने उन लोगों के लिए एक दिन निश्चित कर दिया.

     वहां से चलकर फ्रांसेस्को जब काफी दूर निकल आया तो धूप में एक चट्टान पर बैठ गया और सोचने लगा कि अभी-अभी उसे जो विचित्र-सी अनुभूति हुई थी, उसका कारण क्या था. कुछ समझ में नहीं आया तो उसे भय-सा लगने लगा. मैं तो अच्छा-भला चलकर ऊपर आया था और जो काम मुझे करना था, वह मैंने किया है, फिर ऐसा क्यों लग रहा है, जैसे कोई चीज छूट गयी है या मैं कोई काम करना भूल गया हूं. वह सोचता रहा, पर कोई बात पकड़ में नहीं आयी. आखिर उसने जेब से प्रार्थनाओं की पुस्तक निकाल ली और पढ़ने लगा. पर प्रार्थनाएं भी नौजवान पादरी की उस अजीब-सी बेचैनी को दूर नहीं कर सकीं.

     नीचे की ओर जाती हुई सड़क पर आंखें लगाये वह इस तरह बैठा था, जैसे उसे किसी के आने की प्रतीक्षा हो और इस प्रत्याशा में वह उठकर चल देने का साहस नहीं जुटा पा रहा था. न जाने कब तक वह यों ही बैठा रहता, यदि आस-पास चरती हुई बकरियां उसे घेर न लेंती. अचानक एक बकरी पीछे से उसके कंधों पर चढ़ आयी और वह उछल कर खड़ा हो गया. तभी दूसरी बकरी उसके हाथ से प्रार्थनाओं की पुस्तक ले भागी, जैसे पुस्तक कोई खाने कि चीज हो.

     फ्रांसेस्को फंस गया. उसने पुस्तक को बकरी के मुंह से छुड़ाने का यत्न किया, पर सफल नहीं हो सका. लेकिन उसी समय उसकी सहायता के लिए एक जवान लड़की आ गयी. दौड़कर वह प्रार्थनाओं की पुस्तक बकरी के मुंह से छुड़ा लायी. फ्रांसेस्को पहचान गया कि यह वही लड़की है, जिसे लुकिनो के घर में देखा था. लड़की की बड़ी-बड़ी भोली आंखे हंस रही थीं. और उसके कपोलों पर लाली दौड़ रही थी.फ्रांसेस्को ने उसे धन्यवाद देकर हंसते हुए कहा- ‘वाकई कैसी अजीब बात है, पादरी होकर भी मैं तुम्हारी बकरियों के सामने कितना निरुपाय और असहाय हो गया!’

     उसका मन था कि लड़की के सामने खड़ा देर तक इसी तरह बातें करता रहे, लेकिन तभी उसे ध्यान आ गया कि वह  पादरी है और पादरी को जवान लड़की से इस तरह आमने-सामने खड़े होकर ज्यादा बातें नहीं करनी चाहिये. जल्दी ही वह वहां से चल दिया, लेकिन उसे लगा कि उससे पाप हो ही गया है और वह जल्दी ही ‘इसका प्रायश्चित करेगा. थोड़ी दूर उतरने पर उसे सुरीले नारी-कंठ में गाया जाता हुआ एक गीत सुनाई दिया. वह ठिठक गया, लेकिन गाने वाली जब काफी देर देखते रहने के बाद भी नजर नहीं आया, तो वह फिर उतरने लगा.’

     पापी परिवार में फ्रांसेस्को का चर्च के काम से जाना, अपने आपमें कोई कास बात नहीं थी, लेकिन नौजवान पादरी को लगा कि वह पहाड़ी यात्रा उसके जीवन की एक विशिष्ट घटना बन गयी है. उसे महसूस होने लगा कि उसके अंदर कुछ बदलाव हो रहा है और उसे संदेह हुआ कि इस बदलाव के पीछे शायद शैतान का हाथ है. लेकिन साथ ही उसे यह भी लगा कि वह पार्वत्य प्राकृतिक सौंदर्य अब उसके लिए नये ढंग से सार्थक हो उठा है. और उसने अपनी नियुक्ति इस रमणीय स्थान में होने के कारण स्वयं को धन्य अनुभव किया.

     लेकिन उस पापी परिवार में जाकर लैटने के दिन से ही फ्रांसेस्को ने अनुभव किया कि अब उसके मन में पहले जैसी निर्विकल्प शांति नहीं रही है. पहले उसे सपने नहीं आते थे, अब आने लगे थे, और धार्मिक दृष्टि से यह कोई अच्छी बात नहीं थी. फ्रांसेस्को ने अपने इस परिवर्तन के बारे में सोचा तो उसे लगा हो न हो यह उस काष्ठ प्रतिमा को छूने के कारण हुआ है, जिसे उसने हाथ में लेकर आग में फेंक दिया था.

     उसे पता था कि पुराने लोग ऐसे प्राकृतिक प्रतीकों की पूजा करते थे और ईसाई धर्म ने उन अश्लील प्रतीकों के खिलाफ जेहाद छोड़कर ईसा के क्रास की स्थापना की थी, प्रतीक रूप में क्रास का ध्यान करने का विधान किया था. किंतु फ्रांसेस्को को स्वयं पर आश्चर्य होता कि अब वह जब भी क्रास का ध्यान करता है, उसकी आंखों में वह अश्लील और जुगुप्साजनक काष्ठ प्रतिमा नाचने लगती है.

     फ्रांसेस्को ने गांव के मुखिया को सारी बात बता दी थी और संत अगाता के उपासना-गृह में लुकिनो के परिवार को बुलाने की अपनी योजना बिशप को लिख भेजी थी. बिशप का उत्तर आया कि फ्रांसेस्को ने जो सोचा है, वह उचित है और यह अच्छा ही है कि कोई लोकापवाद न उठे. लेकिन बिशप की स्वीकृति से भी फ्रांसेस्को के मन को शांति नहीं मिली. उसे यह लगता ही रहा कि उस पर कोई जादू कर दिया गया है, जिसके कारण उसका चित्त अशांत है और उसके मन में बुरे विचार आते हैं.

     जिस गांव में फ्रांसेस्को का जन्म हुआ था, उसमें वह बूढ़ा पादरी अब भी रहता था, जिसने फ्रांसेस्को को धर्म-शिक्षा दी थी और पादरी बनने को प्रेरित किया था. एक दिन फ्रांसेस्को तीन घंटे की पदयात्रा करके वहां जा पहुंचा.

     बूढ़े पादरी ने फ्रांसेस्को का स्वागत किया और पूछा- ‘कैसे आना हुआ?’ और यह जानकर कि फ्रांसेस्को किसी पाप की आत्मस्वीकृति के लिए आया है, बूढ़ा स्पष्ट ही विचलित हो उठा. लेकिन वह उसकी आत्मस्वीकृति सुनकर उसे पापमुक्त करने के लिए तुरंत तैयार हो गया.

     फ्रांसेस्को ने सारी कहानी सुनायी और फिर कहा- ‘जब से मैं उन अभागे पापियों के यहां से लौटा हूं, अपने ऊपर किसी तरह के सम्मोहन का अनुभव कर रहा हूं. जब मैं सोआना के झरने की आवाज सुनता हूं, तो मेरी इच्छा होती है कि घंटो तक ऊपर से गिरते पानी के नीचे बैठा रहूं और तन-मन से स्वच्छ-स्वस्थ हो जाऊं. जब मैं चर्च में या अपने बिस्तर के ऊपर क्रास देखता हूं, तो मुझे हंसी आती है.’

     ‘पहले मैं मसीह के कष्टों का स्मरण कर-करके रोया करता था, अब नहीं रो पाता. बल्कि अब तो उन घटनाओं की कल्पना करते समय मुझे और ही और चीज़ें दिखाई देती हैं, जो लुकिनो की उस काष्ठ-प्रतिमा से मिलती होती है. पहले मैं धर्मग्रंथों में डूबे रहने के लिए कमरे की खिड़कियों पर परदे खींच देता था, अब मैंने परदे हटा दिये हैं. पहले मुझे पक्षियों के कलरव, झरनों की कल-कल और फूलों की सुगंध से स्वास्थ्य में विघ्न अनुभव होता था और अब मैं दोनों खिड़कियां पूरी तरह खोल देता हूं और ललचायी दृष्टि से प्रकृति की ओर देखता रहता हूं.’

     ‘इस सबसे मुझे बड़ी चिंता होने लगी है, लेकिन इससे भी बुरी बात यह है कि मेरा मन पाप की ओर उन्मुख रहने लगा है. मुझे ऐसा लगता है, जैसे किसी काले जादू से शैतान मुझ पर हावी हो गया है. मैं खिड़कियां खोलकर बाहर देखता हूं, तो वृक्षों पर गाते पक्षी मुझे अपवित्रता का बोध कराते हैं. वृक्षों की छालों और पहाड़ों की रेखाओं में मुझे ऐसी आकृतियां दिखाई देती हैं, जो मुझे नारी-शरीर की याद दिलाती हैं. सारी प्रकृति मुझे उस काष्ठ-प्रतिमा की पूजा करती हुई लगती है…’

     ‘पहले मैं पापियों को सही रास्ते पर लाने के लिए धार्मिक उत्साह से भरा रहता था, वह उत्साह मैं आज भी अनुभव करता हूं और स्वयं को शैतान से लड़ने वाला योद्धा करने की सोचता हूं, लेकिन वह उत्साह मुझे पहले की तरह सोते-सोते मैं जाग उठता हूं, मेरा चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ होता है और मेरा मन उस पहाड़ पर रहने वाली भटकी हुई आत्माओं के लिए करुणा से भर उठता है. लेकिन ‘भटकती हुई आत्माओं’ की बात सोचते समय मेरे दिमाग में लुकिनों और उसकी बहन नहीं, उनके पाप से जन्मी वह लड़की घूमती है…’

     फ्रांसेस्को के गुरु ने सारी बात सुनी और कहा- ‘डरने की कोई बात नहीं. तुमने जो कठिन मार्ग अपने लिए चुना है और जिस पर तुम हमेशा चलते रहे हो, उसी पर चलते रहो. शैतान को वश में करने के लिए तुम्हें इन सबका सामना करना ही पड़ेगा. हो सकता है, शैतान तुम्हारे द्वारा पराजित हेने तक तुम्हें बहुत शक्तिशाली और सुरक्षित लगे. लेकिन जीतोगे तुम ही.’

     फ्रांसेस्को ने राहत-सी महसूस की और वहां से लौट पड़ा. लौटते समय वह उस मकान के सामने से गुजरा, जिसमें उसका चाचा-प्रसिद्ध मूर्तिकार-रहा करता था. कला में फ्रांसेस्को की कोई विशेष अभिरुचि नहीं थी और वह अपने चाचा को सिर्फ एक बड़ा आदमी और उसकी कला को उस बड़े आदमी के द्वारा किये गये काम से ज्यादा अहमियत नहीं देता था लेकिन उस दिन न जाने किस प्रेरणा से उसकी इच्छा हुई कि उस मकान में जाये और अपने स्वर्गीय चाचा की कलाकृतियां देखे.

     पहले से परिचित, पड़ोसी किसानों से चाबी लेकर फ्रांसेस्को उस सूने मकान में पहुचा. अंदर हर चीज पर धूल जमी हुई थी और अजीब खामोशी छायी हुई थी. फ्रांसेस्को ने अपने शरीर में हल्की-सी सिंहरन मससूस की. वह आगे बढ़ गया. दायीं ओर दिवंगत कलाकार का पुस्तकालय था, जिसमें प्रसिद्ध लेखकों की पुस्तकें भरी पड़ी थीं और दीवारों पर उस्ताद चित्रकारों के बनाये हुए चित्र लगे थे. आगे चलकर वह स्थान था, जहां बैठकर कलाकार मूर्तियां बनाया करता था.

     फ्रांसेस्को सूने मकान में अपने कदमों की गूंज सुनता हुआ आगे बढ़कर उन मूर्तियों के पास पहुंचा, जो उसके चाचा ने बनायी थी. दांते और माइकेलेंजिलों आदि की मूर्तियों के बाद उसे तीन नग्न नारी-प्रतिमाएं दिखाई पड़ीं. उनमें से एक की उम्र बारह, दूसरी की पंद्रह और तीसरी की सत्रह रही होगी. फ्रांसेस्को उन्हें देखता ही रह गया. अवाक, आत्मविस्मृत. ध्यान आया तो उसने पाया कि उसका हृदय धड़क रहा है. उसने चारों ओर देखा. कोई देख नहीं रहा था, पर उसे लगा कि एकांत में भी ऐसी मूर्तियों को देखना पाप है.

     उसने वहां से तुरंत चल देने का निश्चय किया, ताकि कोई सचमुच ही आकार उसे इस स्थिति में देख न ले, पर वह दरवाजे तक आया और उसका इरादा बदल गया. उसने दरवाजा अंदर से बंद किया और वापस उन मूर्तियों के पास लौट आया.

     उसका हृदय और ज्यादा जोर से धड़कने लगा और एक भयमिश्रित पागपलन उस पर सवार हो गया. किसी अज्ञात आग्रह से उसने सबसे बड़ी मूर्ति के बालों को थपथपा दिया. हालांकि यह काम वैसे भी, और उसकी अपनी नजर में भी पागलपन जैसा ही था, फिर भी किसी हद तक धर्माचार्योचित तो था. लेकिन दूसरी मूर्ति को उसके हाथों कुछ ज्यादा सहना पड़ा. फ्रांसेस्को ने दूसरी मूर्ति का कंधा थपथपाया और बांह पर हाथ फिराया… गोल कंधा… एक गोल और सुडौल बांह, जो एक नाजुक और मुलायम हाथ पर आकर खत्म होती थी. तीसरी मूर्ति तक पहुंचकर तो फ्रांसेस्को बिलकुल ही पागल हो उठा. उसने मूर्ति को छुआ, सहलाया और अतंतः झिझकते हुए उसके नग्न, संगरमरी वक्ष को चूम लिया. तब एकाएक उसे ध्यान आया कि वह क्या कर बैठा है और पाप की चेतना से अभिभूत वह वहां से भागा- इस तरह जैसे कोइ उसका पीछा कर रहा हो.

     इस घटना के बाद के कुछ दिन फ्रांसेस्को ने अपने चर्च में प्रार्थनाएं और प्रायश्चित करते हुए बिताये. उसका खयाल था कि उपासना और प्रायश्चित के  द्वारा वह नारी शरीर के आकर्षण से मुक्त हो जायेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

     एक रात- उसे पता नहीं, वह जाग रहा था या सो रहा था- उसने देखा, चांदनी में नहायी हुई वे तीनों नग्न मूर्तियां उसके कमरे में आयीं और उसके बिस्तर की ओर उन तीनों का चेहरा देखा. तीनों चेहरे उसे एक नजर आये और वह एक चेहरा सांता क्रोचे की चोटी पर बकरियां चराने वाली किशोरी का था.

     अब उसे कोई संदेह नहीं रहा कि उस पर जादू कर दिया गया है. और फिर तो उसे अपने आस-पास की हर चीज में वही चेहरा दिखाई देने लगा. वह पुस्तक पढ़ रहा होता और पुस्तक के पृष्ठों पर उसे ललछौंहे भूरे बालों से घीरा वह मासूम चेहरा दिखाई देने लगता, जो अपनी बड़ी-बड़ी काली आंखों से उसकी ओर ताकता. वह पृष्ठ पलट देता, तो चेहरा दूसरे पृष्ठ पर उभर आता. पुस्तक बंद कर देता, तो वह चेहरा उसे दीवारों, दरवाजों, खिड़कियों और परदों पर दिखाई देने लगता. और फ्रांसेस्को बड़ी बेचैनी से उस दिन की प्रतीक्षा करने लगा, जिस दिन संत अगाता के उपासना-गृह में लुकिनो सपरिवार आने वाला था.

     आखिर वह दिन भी आया.

     फ्रांसेस्को ने परम आनंद की अवस्था में प्रकृति के सौंदर्य-दर्शन का अद्भुत सुख अनुभव करते हुए पहाड़ की चढ़ाई पूरी की और उस छोटे-से उपासना-गृह में पहुंचा, जिसके आंगन में खड़े चेस्टनट वृक्ष के नीचे लुकिनो और उसकी बहन पहले से ही आकर बैठे हुए थे. फ्रांसेस्को ने जल्दी से इधर-उधर देखा- वह लड़की दिखाई नहीं दी. वह घबरा गया, पर उसने अपनी घबराहट को प्रकट नहीं होने दिया.

     अंदर छोटे-से चर्च में एक सेवक ने सारी तैयारियां कर रखी थी. न जाने कब से जलकुंड सूखा पड़ा था. फ्रांसेस्को अपने साथ एक बोतल में पवित्र जल लेता आया था. जलकुंड में वह उंडेला गया और लुकिनो तथा उसकी बहन ने अपने पापी हाथों की खुरदरी उंगलियां उसमें डबोयीं, जल अपने ऊपर छिड़का और घुटनों के बल देहरी पर बैठ गये. 

     फ्रांसेस्को उत्तेजित था. रहा नहीं गया तो वह बाहर आया और थोड़ी ही दूर चलने पर उसने देखा कि घास में खिले छोटे-छोटे नीले फूलों पर वह लड़की बैठी सुस्ता रही है, जिसकी उसे तलाश थी. फ्रांसेस्को ने पुकारा- ‘अंदर चलो, मैं तुम्हारी राह देख रहा हूं.’

     लड़की उठ आयी. फ्रांसेस्को ने पूछा- ‘तुम्हारा नाम क्या है?’

     ‘अगाता.’ लड़की ने कोयल की तरह कुहुक कर रहा.

     ‘पढ़ना-लिखना आता है?’

     ‘नहीं.’

     ‘चर्च, ईश्वर और उपासना का कोई मतलब समझती हो?’

     लड़की चुप होकर फ्रांसेस्को की ओर देखने लगी. फ्रांसेस्को की आंखें उन आंखों से मिलीं. कुछ भी पूछना शेष नहीं रहा. लड़की आकर माता-पिता के पास बैठ गयी और फ्रांसेस्को ने विधिवत उपासना आरम्भ करायी और महसूस किया कि उसका काम नीरस, शुष्क और व्यर्थ नहीं है- उसमें रस है और सार्थकता है, और यह काम सचमुच ईश्वरीय है. उसने मन-ही-मन ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम का अनुभव किया और वह प्रेम उसे उक धारा के रूप में ईश्वर से अपनी ओर और स्वयं से सम्पूर्ण सृष्टि की ओर बहता प्रतीत हुआ.

     लेकिन उपासना के बाद जब वह सोआना के चर्च में लौटकर आया. तो उसके मन में फिर द्वंद्व शुरू हो गया. उसे लगा, वह संत अगाता के चर्च में अपने पापपूर्ण इरादे ही पूरे करने गया था और वह अशांत हो उठा. उसे याद आया, वह एक सप्ताह बाद फिर उन लोगों से संत अगाता के चर्च में आने के लिए कह आया है और यह कहते समय उसका ध्यान लुकिनो या उसकी बहन की पाप-शांति की ओर नहीं, बल्कि कहीं और ही था…

     एक सप्ताह फ्रांसेस्को को बहुत लम्बा महसूस हुआ. इस बीच मई का महीना शुरू हो गया. चर्च में मेरी की पूजा होने लगी. गांव भर की स्त्रियां और लड़कियां मां मेरी की प्रार्थना करने चर्च में आतीं और पवित्र कुमारी मां मेरी के गीत गातीं. फ्रांसेस्को मेरी के सम्मान में प्रार्थनाएं करता, लेकिन उन प्रार्थनाओं के दौरान उसे लगता कि वह मेरी की जगह अपने मन की देवी को बैठाये हुए हैं… दूर पहाड़ पर रहने वाली उस लड़की को, जिसका नाम अगाता है…

     आखिर वह सप्ताह भी बीता और फ्रांसेस्को निश्चित समय पर संत अगाता के गिरजे में लुकिनो के पापी परिवार की उपासना कराने पहुंचा. आज के दिन की उसने बड़ी बेचैनी से प्रतीक्षा की थी और सुबह सोकर उठने पर मारे खुशी के ऐसा अनुभव किया था, जैसे वह सब कुछ पा गया है. लेकिन संत अगाता की चोटी पर पहुंचकर उसे निराशा ही हाथ लगी. लड़की आज नहीं आयी थी, फ्रांसेस्को के पूछने पर उसकी मां ने बताया कि घर के काम में व्यस्त रहने के कारण वह नहीं आ सकी.

     फिर उपासना कराने में फ्रांसेस्को का मन नहीं लगा. जल्दी-जल्दी बेगार-सी टालकर उसने उन लोगों को विदा किया और स्वयं बाहर आकर बिना कुछ सोचे-विचारे एक ओर चल दिया. किधर जाना है, यह उसके सामने स्पष्ट नहीं था. लेकिन उसे भय किसी प्रकार का नहीं था. खुशी भी नहीं थी. प्रकृति अब भी अपनी जगह उतनी ही सुंदर थी, लेकिन फ्रांसेस्को के लिए इस समय उसमें कोई आकर्षण नहीं था. उसके मन में गुस्सा उबल रहा था और गुस्सा इसलिए था कि अगाता नहीं आयी थी. अगाता के न आने के बीस कारण हो सकते थे, लेकिन फ्रांसेस्को को एक ही कारण नजर आया कि अगाता किसी से प्यार करती है और चर्च में न आकर कहीं अपने प्रेमी के आलिंगन में होगी.

     पहाड़ की चढ़ाइयों पर चढ़ता-उतरता, गीले-चिकने पत्थरों पर फिसलता, झाड़-झंखाड़ों में फसंता-उलझता फ्रांसेस्को हांफने लगा. उसकी पोशाक कई जगह से फट गयी, घुटने और हथेलियां  छिल गयीं, चेहरे पर खरोंचे आ गयीं, लेकिन वह रुका नहीं. अचानक एक जगह उसे धुआं उठता दिखाई दिया और वहां जाकर उसने देका कि एक सुनहरे बालों वाला लड़का आग जलाकर एक बर्तन में कुछ पका रहा है.

     फ्रांसेस्को को देखकर वह सहम गया, लेकिन पोशाक से पादरी को पहचानकर उठा और विनम्रता से झुककर उसने फ्रांसेस्को का हाथ चूमा. सफाई देना जरूरी नहीं था, लेकिन अपनी हालत देखकर फ्रांसेस्को न झूठ बोला- ‘मैं ऊपर एक आदमी को देखने गया था, लौटने में राह भटक गया.’

     लड़के की समझ में नहीं आया कि क्या कहे. पादरी के सामने अकेले होने में उसे न जाने कैसा संकोच अनुभव हो रहा था. कुछ बोला नहीं, पर उसने अपनी बास्कट पत्थर पर बिछाकर पादरी को आसन दिया, आग में कुछ लकड़ियां डालीं और फिर ऊंचे स्वर में किसी को पुकारा. उसकी पुकार पहाड़ियों में गूंजती चली गयी. अनुगूंज ज्यों ही शांत हुई, फ्रांसेस्को ने कुछ आवाजें अपनी ही ओर आती हुई सुनीं. शायद कुछ बच्चे हंसते और किलकारियां भरते आ रहे थे और उनमें कोई स्त्री भी थी. फ्रांसेस्को के हाथ-पांव सुन्न होने लगे, लेकिन साथ ही उसे एक अद्भुत मुक्ति की-सी अनुभूति भी हुई. एक उत्तेजना की अनुभूति भी.

     थोड़ी देर बाद फ्रांसेस्को ने एक अजीब तमाशा देखा. आगे-आगे एक बकरी पर सवारी गांठे हुए अगाता आ रही है और पीछे-पीछे बच्चों का एक झुंड हंसता-चीखता चिल्लाता आ रहा है. अगाता ने बकरी के सींग पकड़ रखे हैं और बकरी की पीठ पर सवार होने के बावजूद वह पैरों पर चल रही है. शायद यह सवारी उसने बच्चों के मनोरंजन के लिए चुनी थी, लेकिन पहाड़ी रास्ते पर तेज दौड़ने वाली बकरी को एकदम छोड़कर उतर पड़ना गिरने के डर से सम्भव नहीं था, इसलिए वह फ्रांसेस्को के पास आकर ही रुक पायी.

     उस अद्भुत सवारी से उसके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये थे, जिन्हें ठीक करने का ध्यान उसे तभी हो आया, जब उसने पादरी को देखा. हंसी भी उसकी तभी रुकी पायी. फ्रांसेस्को उस अल्हड़-मस्त लड़की को देखता ही रह गया. फिर जब वह पास आ खड़ी हुई, उठते हुए बोला- ‘आज तुम चर्च में क्यों नहीं आयी?’

     उसके स्वर और चेहरे से लगा, जैसे वह बहुत गुस्से में है, लेकिन फ्रांसेस्को के मन में उस प्रश्न का अर्थ ही कुछ और था. लड़की चुप रही तो वह उसे जोर-जोर से डांटने लगा. शब्द और शब्द… जिनका आत्मा से कोई सरोकार नहीं. लेकिन उसे अपने भीतर एक अद्भुत शांति अनुभव हुई. उसे लगा, जैसे वह पादरी नहीं, गड़रिया है और एकदम जंगली ढंग से अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहा है. और यह सच भी था- उसका वास्तविक रूप उसके सामने आ गया था और अब वह इस खयाल से बचना भी नहीं चाहता था कि उसके अंदर कितना परिवर्तन हो चुका है.

     यह बेतहाशा पागलपन से भरी तलाश पादरी की तो नहीं हो सकती. चर्च ने तो उसे यह काम नहीं सौंपा कि वह इस तरह भटकता हुआ किसी लड़की को खोजे और खोजकर इस तरह डांटे. जीवन में पहली बार फ्रांसेस्को ने अनुभव किया कि उसके कदम ही नहीं, उसकी आत्मा भी किसी शून्य में निकलकर भटक गयी है. वह ऐसी जगह आ पहुंचा है, जहां वह आदमी की तरह लुढ़क रहा है, बूंद की तरह गिर रहा है, तूफान में पत्ते की तरह उड़ रहा है.

     गुस्से में बोला गया प्रत्येक शब्द उसे बता रहा था कि अब अपने आप पर उसका कोई वश नहीं रहा और अगाता पर वह किसी भी कीमत पर अधिकार कर लेना चाहता हैं. शब्दों से ही सही, उसने अगाता को अपने अधिकार में कर लिया है. वह उसे जितना ही अपमानित करता, उतना ही सुख उसे अनुभव होता. अगाता के चेहरे पर झलकने वाली प्रत्येक पीड़ा उसके मन में एक उन्माद में वह लड़की के पैरों पर गिरकर मन की सच्ची भावना व्यक्त कर देता.

     आग पर रखे बर्तन में उबलता हुआ खाद्य पदार्थ पक चुका था और बच्चे पादरी के सामने  उसे न खा सकने के विचार से उठाकर चलने लगे, तो फ्रांसेस्को ने अगाता से कहा- ‘तुम सोआना में मेरे स्कूल में आना. वहां मैं तुम्हें लिखना-पढ़ना सिखाऊंगा. सुबह और शाम की प्रार्थनाएं करना दिखाऊंगा. ईश्वर की आज्ञाएं तुम्हें सुनाऊंगा और बताऊंगा कि पाप से कैसे बचा जाये. फिर तुम हर सप्ताह मेरे सामने आत्मस्वीकार (कन्फेशन) किया करोगी.’

     लेकिन इतना कहने के बाद जब फ्रांसेस्को चला आया-  एक बार भी मुड़कर पीछे देखे बिना- तो सबसे पहले उसे स्वयं आत्मस्वीकार की इच्छा हुई. उस पाप का स्वीकार जो उसने कर डाला था. लेकिन निकट के एक चर्च में जाकर आत्मस्वीकृति कर आने के बाद भी उसे शांति नहीं मिली. उलटे, उसे अपने आप पर चर्च पर और सब चीजों पर गुस्सा आने लगा. फिर उसे लगा कि अब सचमुच वह गंदे बेहूदे, अश्लील शैतान की गिरफ्तारी में आ गया है. अगाता याद आने लगी. क्या वह सोआना आयेगी? उसके हाथों से खींची हुई डोरी से चर्च की घंटियां बजेंगी?

     प्रतीक्षा करने लगा. तरह-तरह के विचार मन में आये. पाप की वह संतान सोआना के चर्च में आयेगी, तो लोग क्या कहेंगे?

     दोपहर के समय फ्रांसेस्को ने गांव के चौराहे की ओर से उठता हुआ एक शोर सुना. एक भीड़ का शोर. पुरुषों की दबी-दबी-सी किसी चीज का विरोध करती हुई आवाजें, लेकिन स्त्रियों की चीखें, चिल्लाहटें और गालियां ऊंचे स्वर में सुनाई पड़ी. फ्रांसेस्को ने खिड़की से झांकर देखा और आतंक से जड़ हो गया. आगे-आगे अगाता और पीछे-पीछे लोगों की भीड़. मर्द, औरतें और बच्चे-सब इत तरह पत्थर फेंकते और शोर मचाते हुए, जैसे वह सुंदर लड़की कोई खूंखार जंगली जानवर हो और वे उसे गांव से भगा देना चाहते हों.

     फ्रांसेस्को की चेतना तब लौटी, जब चर्च की घंटी जोर-जोर से बजी. उसने जल्दी से दरवाजा खोला और अगाता को अंदर खींच लिया. पादरी को देखर शोर थम गया और पत्थर फेंकते हुए हाथ रुक गये. लेकिन दरवाजा बंद कर लेने के बाद भी कुछ बचकाने हाथों से फेंके हुए पत्थर दरवाजे से टकराते रहे.

     लड़की बेहद डरी हुई थी. फ्रांसेस्को स्वयं भी उत्तेजित हो उठा था. लेकिन उसने अगाता को अपने पीछे आने का इशारा किया और उसे चर्च से अपने निवास स्थान में ले आया. सीढ़ियों पर पेट्रोनिला खड़ी थी और उन दोनों को इस दृष्टि से देख रही थी, जैसे हर सम्भव सहायता करने को तैयार हो. लेकिन अगाता उसे देखकर अपनी अपमानजनक स्थिति के प्रति सचेत हो गयी.

     ऊपर पहुंचकर फ्रांसेस्को ने अगाता से बैठने के लिए कहा. वह बैठ गयी और बताने लगी कि गांव वालों ने किस तरह उस पर हमला किया. ‘किस तरह’ पर ही उसका ध्यान था, ‘क्यों’ पर नहीं. क्रुद्ध भीड़ के उस आक्रमण का कोई कारण भी हो सकता है, वह नहीं समझ पायी, क्योंकि बचपन से प्रकृति के बीच रहते-रहते उसे ऐसे अनेक अनुभव हुए थे कि आदमी अगर वर्र या ततैयों के छत्ते के पास या चींटियों के बिल के पास चला जाये, तो वे आक्रमण कर देती हैं और काटती हैं., उसकी दृष्टि में यह आक्रमण एकदम प्राकृतिक था.

     लेकिन बर्र-ततैयों से भी तो आखिर निपटना ही पड़ता है. उनके आक्रमण से कभी हमें नफरत होती है, कभी गुस्सा आता है, कभी कष्ट होता है और हम उन पर क्रुद्ध होते हैं, या उन्हें गालियां देते हैं या रोने लगते हैं. जब जैसी परिस्थिति हो. इस लिए अगाता सोआना के निवासियों के आक्रमण से क्षुब्ध तो थी, लेकिन रो नहीं रही थी. उसने जो कुछ बताया, या तो गुस्से में, या खुलकर हंसते हुए. और जब वृद्धा पेट्रोनिला उसके पास बैठकर उसके फटे हुए कपड़े सीने लगी, तो वह भी सम्भल गयी और अपने बिखरे हुए सुनहरे बालों को संवारने लगी.

     फ्रांसेस्को के जीवन में यह पहला अवसर था, जब उसने अगाता की पूरी, गूंजती हुई, शानदार सुरीली आवाज सुनी. साथ ही उसने पेट्रोनिला की उपस्थिति के कारण अपनी प्रेयसी से अलंघ्य दूरी महसूस की. इतनी निकटता और इतनी दूरी! उसकी इच्छा हो रही थी कि अगाता को सीने से लगा ले.

     आखिर उसे एक उपाय सूझा. वह एकदम उठकर गांव के मुखिया सिंडाको के पास चल दिया. सिंडाको ने बड़े ध्यान से पूरी बात सुनी और अगाता को चर्च में शरण देने की बात का समर्थन किया. ईसाई धर्म के अनुसार यह बिलकुल ठीक था कि समाज से बहिष्कृत और सताये हुए लोग भी यदि प्रभु की शरण में आयें, तो उन्हें शरण दी जाये, सिंडाको ने यह वादा भी किया कि वह गांव वालों की इस हरकत के खिलाफ कड़ी कार्रवाही करेगा.

     फ्रांसेस्को के चले जाने के बाद सिंडाको की पत्नी ने कहा- ‘यह नौजवान पादरी किसी दिन कार्डिनल बनेगा- हो सकता है पोप भी बन जाये. उसका चेहरा देखा, कैसा हो गया है! मुझे लगता है, यह भटकी हुई आत्माओं को पाप-पंथ से हटाकर धर्म-मार्ग पर लाने के लिए बड़ी कठिन तपस्या कर रहा है- शायद उपवास और जागरण करते हुए हर समय प्रार्थनाएं किया करता है. पर मुझे डर लगता हैं, क्योंकि शैतान सबसे ज्यादा पवित्र लोगों पर ही अपने हथकंडे आजमाता है. ईश्वर करे पादरी अपनी तपस्या में शैतान से बचा रहे.’

     लेकिन रास्ते में फ्रांसेस्को का सामना जिन स्त्रियों से हुआ, उनकी आंखों में अलग-अलग भाव थे. श्रद्धा के भी, भय के भी और व्यंग्य तथा उपहास के भी. फ्रांसेस्को नजरें झुकाये चर्च में लौट आया.

     चर्च में मां मेरी के सामने घुटनों के बल बैठकर वह प्रार्थना करने लगा- ‘मां मेरी, सहायता करो.’ लेकिन इस प्रार्थना का अर्थ यह बिलकुल नहीं था कि वह अगाता के आकर्षण से छूट जाये, बल्कि वह तो यह कहना चाह रहा था कि माता मरियम उसके मन की बात समझें, उसे क्षमा करें और उसके इरादों पर अपनी स्वीकृति दें. अचानक उसने प्रार्थना अधूरी छोड़ दी. उसे लगा, अगाता चली न गयी हो. लेकिन कमरे में आकर उसने देखा, अगाता पेट्रोनिका के साथ मौजूद है.

     आते ही फ्रांसेस्को ने घोषणा की- ‘मैंने सब ठीक कर दिया है. चर्च और पादरी तक आने का रास्ता सबके लिए खुला है. मुझ पर विश्वास रखो. आज की-सी घटना भविष्य में नहीं होगी.’ उसके बाद उसने बड़े बिशप के लिए एक संदेश लिखा और पेट्रोनिला को देते  हुए कहा- ‘इसे अभी-अभी पहुंचना है. तुम स्वयं चली जाओ- तुरंत.’ फिर बोला- ‘अरे देखो, रास्ते में कोई मिले तो कहना, अगाता चर्च में मेरे पास है और मैं उसे ईसाई धर्म की शिक्षा दे रहा हूं. अगर किसी ने बाधा पहुंचायी तो वह हमेशा के लिए नरक का भागी होगा. कहना, अगाता पर पत्थर मारा गया तो वह पत्थर अगाता को नहीं, पादरी को लगेगा. जाओ, अंधेरा होने पर मैं खुद ही अगाता को उसके घर पहुंचाने जाऊंगा.’

     वृद्धा चली गयी, तो कमरे में कुछ देर अटूट खामोशी छायी रही. अगाता कुर्सी पर बैठी थी- अपने दोनों हाथ गोद में रखे हुए. अब तक वह काफी स्वस्थ हो चुकी थी, लेकिन फ्रांसेस्को के सहानुभुतिपूर्ण शब्द सुनकर उसकी आंखों से आंसू बह-बहकर उसके कपोलों को भिगोने लगे. फ्रांसेस्को की समझ में नहीं आया कि क्या करे, क्या कहे. वह खिड़की से बाहर देखने लगा. पहाड़ों पर शाम उतने लगी थी. न जाने कितने क्षण यों ही बीते गये.

     फ्रांसेस्को को लगा, वह सपना देख रहा है. यह यथार्थ नहीं हो सकता कि उसके एकांत कमरे में उसकी चिरप्रतीक्षित प्रेयसी बैठी हो. वह अभी मुड़ेगा और पायेगा कि अगाता नहीं है. और अगाता मौजूद हुई तो क्या होगा? क्या यह मुड़कर देखना फ्रांसेस्को के सम्पूर्ण पार्थिव अस्तित्व का निर्णायक नहीं हो जायेगा? बल्कि पार्थिव अस्तित्व के आगे का भी?

     इन प्रश्नों में खोया वह काफी देर खड़ा रहा. इस बीच सारी ईसाइयत का पौराणिक इतिहास उसकी आंखों में घूम गया. सारे परिचित लोगों के चेहरे उसे दिखाई दे गये. अपनी मां दिखाई दी. सोआना के लोग दिखाई दिये और अंततः उसने अपना भावी रूप अपनी आंखों से देखा, समाज से बहिष्कृत लुकिनो स्कारोबाटा का रूप. उसने अपनी आंखें बद कर लीं और दोनों हाथों से कनपटियों को जोर से दबाया. और तब वह अगाता की ओर मुड़ा.

     अगाता चौंक उठी. फ्रांसेस्को का चेहरा विकृत हो रहा था, मानो मृत्यु की उंगली उसे छू गयी हो. वह धीरे-धीरे लड़खड़ाता हुआ अगाता की ओर आया और अचानक घुटनों के बल उसके सामने बैठकर उसने अगाता का चेहरा अपने हाथों में लिया. उसे लगा, गांव वाले कितने क्रूर हैं कि उन्होंने सौंदर्य की देवी अफ्रोदिते जैसी रूपवती इस लड़की पर इतना अत्याचार किया है! यदि यह इसी तरह असुरक्षित रही तो इसका क्या होगा? आज वह न होता तो, लोग  पत्थर मार-मारकर शायद उसे मार ही डालते…

     और यह सोचकर फ्रांसेस्को ने लड़की पर एक अधिकार-भाव अनुभव किया और अपनी उस भाव-विह्वल दशा में उसने तय किया कि अब वह उसे असुरक्षित नहीं छोड़ेगा. हर स्थिति में वह अगाता का साथ देगा, भले ही सारी  दुनिया उसके सामने आ जाये-भले ही ईश्वर भी.

     शायद और कोई स्थिति होती और कोई व्यक्ति होता तो अगाता डर जाती, लेकिन फ्रांसेस्को से वह नहीं डरी. ऐसा लगा, जैसे वह भूल गयी है कि फ्रांसेस्को एक अजनबी आदमी है, पादरी है. उसे लगा, फ्रांसेस्को अचानक उसका भाई बन गया है और उसने फ्रांसेस्को की पकड़ से छूटने के बजाय स्वयं ही सिसकते हुए अपना चेहरा उसके सीने में छिपा लिया.    

     और अब अगाता को लगा, जैसे वह नन्ही-सी बच्ची है और फ्रांसेस्को उसका पिता है. वह उससे लिपट गयी. लेकिन फ्रांसेस्को ने किसी स्त्री को इससे पहले अपने निकट अनुभव नहीं किया था. कुछ देर वह अगाता का चेहरा हाथों में लिये एकदम देखता रहा, फिर झुककर अचानक उसके आंसुओं से भीगे चेहरे पर अपने पागल ओंठ रख दिये. सारी सृष्टि उस परमानंद के क्षण में स्थिर हो गयी.

     कुछ क्षण उसी तरह बीते. फिर फ्रांसेस्को ने स्वयं को अगाता के आलिंगन से मुक्त करते हुए कहा- ‘चलो, तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचा दूं. तुम अकेली सही-सलामत नहीं जा सकतीं.’

         बाहर अंधेरा घिर आया था. वे दोनों चर्च से निकल आये और पहाड़ की ओर चल दिये. फ्रांसेस्को ने एक बार मुड़कर चर्च की ओर देखा और अनुभव किया कि अब कभी यहां लौटना नहीं होगा. लेकिन उसे इस बात पर खेद नहीं था. वह पूरी तरह परिवर्तित हो चुका था.  परिवर्तित ही नहीं, उदात्त और मुक्त.

     सुहावनी रात. फूलों की मादक गंध. झरनों की मधुर कलकल ध्वनि. शीतल पवन का सुखद स्पर्श. एक-दूसरे को पकड़े हुए, सहारा देते हुए वे चले जा रहे थे. दोनों ही जैसे नशे में हों. वे चुप थे. बोलने की जैसे आवश्यकता ही नहीं रह गयी थी. अगाता और फ्रांसेस्को. फ्रांसेस्को और अगाता. वे भूल गये थे कि कौन-क्या है. न वह पादरी था और न वह पापी परिवार में जनमी लड़की. बस, वे थे स्त्री और पुरुष. आदम और ईव. और कैसा सुख…

     फ्रांसेस्को ने जीवन में पहली बार ईश्वर से सच्ची निकटता अनुभव की. पाप-पुण्य की भावनाएं पीछे छूट गयीं थीं. फ्रांसेस्को के मन में चलने वाला द्वंद्व समाप्त हो गया. हमेशा के लिए.

     इतना सुनकर लुडोविको चुप हो गया. उसकी कहानी की पांडुलिपि वहीं समाप्त हो गयी थी. मैं आगे की कहानी भी सुनना चाहता था. लेकिन लुडोविको ने कहा- ‘कहानी यहीं खत्म होती है और वास्तव में होनी भी चाहिए.’

     ‘लेकिन आप तो कह रहे थे कि आपने यह कहानी सोआना के लोगों से सुनी है, क्या उन्होंने इसके आगे कुछ नहीं सुनाया?’ मैंने पूछा.

     ‘सोआना के लोगों ने मुझे यह कहानी नहीं सुनायी थी, उन्होंने मुझे एक सच्ची घटना सुनायी थी कि करीब छह वर्ष पहले सोआना के लोगों ने एक पादरी को चर्च में घुसकर लाठियों और पत्थरों से मारा था और भगा दिया था. यह घटना सच्ची है, इसका सबूत यह है कि जब मैं अर्जेंटाइना से यूरोप आया और इस क्षेत्र में आकर बसा, तो यहां मोंते गेनेरोसो पर वह पापी परिवार रहता था- हालांकि उसका नाम कहानी में कल्पित है.   उसी तरह अगाता भी मेरा गढ़ा हुआ नाम है- पर यह सच है कि उस परिवार में एक जवान लड़की थी और लोग कहते हैं कि पादरी से उसके अवैध सम्बंध थे. और कहते हैं कि पादरी ने असलियत को छिपाने की कोशिश भी नहीं की और न अपने पाप का प्रायश्चित करने की ही कोशिश की.’

     मैंने देखा कि लुडोविको आगे कुछ नहीं सुनाना चाहता तो मैंने विदा मांगी. काफी देर हो चुकी थी. सूरज डूब चुका था और पहाड़ पर शाम उतर आयी थी. लौटते समय की एक ही बात मैं आपको बताऊंगा कि पहाड़ से उतरते हुए मधुर गीत के स्वर सुने और फिर उसे देखा भी. वह पानी का घड़ा सिर पर उठाये हुए ऊपर आ रही थी. उसके पीछे-पीछे एक बच्चा था, जिससे वह शांत, मधुर स्वर में बातें करती आ रही थी. मैं उसका सौंदर्य देखता ही रह गया.

     वे दोनों लुडोविको की झोंपड़ी की ओर ही जा रहे थे.

(अप्रैल 1971)

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