पहला अंग्रेज़ जो भारत आया

    ♦    चारुमित्रा     

कहा जाता है, अंग्रेज़ तराजू हाथ में लेकर भारत आये. यह उक्ति एक व्यापक सत्य की आलंकारिक अभिव्यक्ति हो सकती है. मगर भारत-भूमि पर पग रखने वाले प्रथम अंग्रेज़ के हाथ में पवित्र पुस्तक इंजील थी, क्योंकि वह पादरी था.

     पादरी थामस स्टीफेंस का नाम कभी मराठी और कोंकणी भाषा-क्षेत्रों में लाखों लोगों की जिह्वा पर रहा है, भले ही इतिहास की पुस्तकों में उनका नाम न मिलता हो. उन्होंने चालीस साल तक इस देश के निर्धन और दलित वर्गों की सेवा की. उनका लिखा हुआ ग्रंथ ‘पुराण’ पिछले 355 वर्षों से कोंकण के यीशू-भक्तों के लिए शांति का स्रोत रहा है.

     पादरी स्टीफेंस जेसुइट मिशनरी थे. उन्होंने चालीस वर्षों तक सालसेट द्वीप को केंद्र बनाकर कार्य किया. पुर्तगालियों ने अपने कागजात में उनका उल्लेख ‘थामस स्टेवम’ के नाम से किया है और कहीं-कहीं उनका नाम ‘स्टीफन डी बस्टन’ या ‘बस्टन भी लिखा गया है.’

     ब्रिटेन के विन्चेस्टर कालेज के मूल रजिस्टर से पता चलता है कि स्टीफेंस ने 1564 में 13 वर्ष की आयु में वहां दाखिला लिया था और वे विलशायर के क्लिफ पिपार्ड गांव के निवासी थे. प्रसिद्ध इतिहासकार हकलुयात का मत है कि वे आक्सफोर्ड के न्यू कालेज के भी विद्यार्थी रहे, लेकिन उस कालेज के रजिस्टरों में उनका कोई उल्लेख नहीं है. उनके पिता लंदन में सौदागरी करते थे.

     रानी एलिजाबेथ प्रथम का शासन-काल इंग्लैंड में धार्मिक असहिष्णुता का जमाना था, रोमन कैथोलिक लोग राजनीतिक, सामाजिक अधिकारों से वंचित किये जा रहे थे. एक बार स्टीफेंस और उनके मित्र थामस पाउंड को श्रापशायर में जासूसी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था. पाउंड को 1572 में सरकार-विरोधी होने के आरोप में बार-बार अदालत के सामने उपस्थित होना पड़ा था. अतः दोनों मित्रों ने अपनी पहचान छिपाने के लिए नाम बदल लिये और वे मालिक तथा नौकर बन गये.

     तभी उन्होंने सुना कि कितने ही जेसुइट पादरी पुर्तगाली सौदागरों के साथ समुद्र पार दूर के देशों में जाते हैं. दोनों मित्र इससे बहुत प्रभावित हुए और अपना सर्वस्व बेचकर रोम जाने को तैयार हो गये. मगर रानी के कर्मचारियों ने पाउंड को रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया और उस बेचारे ने जीवन के अंतिम चालीस वर्ष जेल में बिताये.

     स्टीफेंस किसी तरह जान बचाकर भाग निकले और 1575 में सकुशल रोम पहुंच गया. 20 अक्टूबर को वहां उन्हें सोसायटी आफ जीसस में प्रवेश मिल गया और गोवा जाने के लिए आवश्यक प्रमाणपत्र भी प्राप्त हो गये. वे 4 अप्रैल 1579 को जोआओ द सालदान्हा के नेतृत्व में से एक पर सवार हुए और 24 अक्टूबर को गोवा आ पहुंचे.

     बहुत रोमांचकारी होती थी उन दिनों यूरोप से भारत की यात्रा. जहाजियों के पास न दिशासूचक यंत्र होते थे, न प्रामाणिक नक्शे. साहसी नाविक अपने और दूसरे यात्रियों के अनुभवों के आधार पर समुद्र में मार्ग का अनुमान करते हुए आगे बढ़ते थे. गुड़होप अंतरीप से छः मील दूर स्टीफेंस का जहाज अनुकूल हवा की प्रतीक्षा में ठहर गया. उनके 150 सहयात्रियों में से 27 तो मार्ग में ही चल बसे.

     गोवा में स्टीफेंस ने प्रोफेस्ड हाएस के पादरी और सालसेट जिले के मारगाओ नगर में कालेज रेक्टर के पद पर कार्य किया. 1853 में जब वे पादरी बनकर सालसेट आये, उस समय वहां आठ गिरजा घर थे.

     फादर स्टीफेंस एक कुशल भाषाविद् थे और कोकणी भाषा पर उनका पूरा अधिकार था. माराठी भाषा की संपन्नता पर वे मुग्ध थे और उसकी उपमा चमेली के फूल से दिया करते थे. उनकी पुस्तक आर्टे द लिंग्वा केनेरिम’ कोंकणी भाषा का सर्वप्रथम व्याकरण है. इसका सम्पादक 1640 में मदुरा मिशन के रेक्टर फादर डायगो रिबेरियों ने किया था. स्टीफेंस की पुस्तक ‘डाक्ट्रिना क्रिस्तियाम एम लिंग्वा ब्राम्ना केनेरिम’ एक पांडित्यपूर्ण कृति है.

     लेकिन उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है ‘पुराण’. मूलतः यह पुस्तक पुर्तगाली भाषा में लिखी गयी थी. बाद में इसका अनुवाद कोंकणी में किया गया. 1614 में उन्होंने इसका प्रणयन पूरा किया. और 1616 में यह प्रकाशित हुई. द्वितीय संशोधित संस्करण 1649 में छपा. तृतीय संस्करण स्कूल आफ ओरिएंटल स्टडीज, लंदन के एकाधिकार में है. 1907 में इसे मंगलोर से जोसेफ एल. सलडान्हा ने फिर से प्रकाशित किया.

     ‘आदिपुराण’ में पांच खंड है, जिनमें कुल मिलाकर 4,035 पद है. ‘देवपुराण’ में 6,686 पद हैं. मंगलोर संस्करण में रोमन लिपिका उपयोग किया गया है, जबकि मूल पांडुलिपि देवनागरी में थी. यह दो भागों में विभक्त है. प्रथम पुराण में 59 सर्ग और 6,781 पद हैं. ईश्वर के बेटे का अवतार और मानव-जाति की मुक्ति ‘पुराण’ का मुख्य विषय है. इस ग्रंथ की गेयता ने शीघ्र ही कोंकण के समुद्रतट-वासियों के दिल जीत लिये.

     डॉ. कुन्हा ने अपनी पुस्तक ‘कोंकणी भाषा तथा साहित्य’ में लिखा है कि बहुत दिनों तक ‘पुराण’ का पाठ ‘सोती’ अर्थात षष्ठी-पूजन के अवसर पर होता रहा. इस अवसर पर बच्चे को दुष्ट आत्माओं से बचाने के लिए उनके जन्म के छठे दिन रात्रि-जागरण हुआ करता था. श्री सलडान्हा का मत है कि पुराण के पाठ ने कोंकण क्षेत्र के उन लोगों का मनोबल बनाये रखने में बहुत योग दिया, जो धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बने थे.

     पादरी स्टीफेंस नारियल के वृक्ष के बहुत प्रशंसक थे. वे प्रथम अंग्रेज़ थे, जिन्होंने नारियल के पेड़ के बारे में लिखा. उनका नारियल वर्णन पढ़ियेः ‘यहां एक ऐसा वृक्ष है, जिससे तेल, मदिरा, शरबत, चीनी और सिरका प्राप्त होता है. इससे रस्सी भी बटी जाती है और इसकी शाखाएं वर्षा से झोंपड़ियें की रक्षा करने में इस्तेमाल की जाती हैं. यह सारे वर्ष फलता है.

     ‘फल की शक्ल मनुष्य के सिर जैसी होती है. इसमें कठोर छिलके के भीतर गिरी रहती है. छिलका हटा देने पर फल दो मुट्ठी के बराबर रह जाता है. फल के अंदर पानी जैसी हल्की बीयर होती है. प्यास बुझाने के लिए यह एक अद्भुत पेय है. एक ही फल के पानी से तृप्ति हो जाती है, दूसरे की आवश्यकता नहीं पड़ती. इसकी गिरी उत्तम कोटि का भोजन है.’

     ‘छिलका कोयला बनाने के काम आता है. समुद्र के किनारे रहने वाले इस वृक्ष के तने से नौकाएं भी तैयार कर लेते हैं. इसका उपयोग रस्सी तथा पाल बनाने के लिए भी करते हैं.’

     स्टीफेंस ने भारत में अंग्रेज़ी शासन की कल्पना नहीं की थी, लेकिन उनके बाद आने वाली अंग्रेज़ों ने उनके उदाहरण से यह सीखा कि जिन लोगों के बीच रहना हो, उनकी भाषा और संस्कृति का अध्ययन जागरूकता और आस्था के साथ करना चाहिए.

(मार्च 1971)

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