पश्चिम बंगाल का राज्यवृक्ष : सप्तपर्ण

♦   डॉ. परशुराम शुक्ल    >

एशिया प्रशांत क्षेत्र का वृक्ष सप्तपर्ण दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक भागों, भारत, नेपाल, श्रीलंका, म्यामार, मलेशिया, कम्बोडिया, न्यूगिनी फिलीपीन्स, थाईलैंड और वियतनाम से लेकर आस्ट्रेलिया और सोलोमन द्वीप तक पाया जाता है. यह वृक्ष चीन के अनेक भागों में भी मिलता है. संयुक्त राज्य अमेरिका में इसे सजावट और छायादार वृक्ष के रूप में बाग-बगीचों, पार्कों और सड़कों के किनारे लगाया जाता है.

सप्तपर्ण मूलरूप से उष्णकटिबंधीय भागों का वृक्ष है, किंतु इसे विविधतापूर्ण मिट्टी और जलवायु में भी लगाया जा सकता है. कहीं पर यह बहुत छोटे आकार में दिखाई देता है और कहीं विशाल आकार में. सप्तपर्ण सागर के किनारे के 100 सेंटीमीटर से लेकर 380 सेंटीमीटर तक वर्षा वाले क्षेत्रों में अधिक होता है. किंतु इसे सागर तल से 1000 मीटर की ऊंचाई वाले भागों में भी देखा जा सकता है. कभी-कभी तो यह 1300 मीटर तक की ऊंचाई पर भी मिल जाता है. सप्तपर्ण पथरीली मिट्टी में भी सरलता से उग जाता है. इसके लिए 15 डिग्री सेल्सियस से 35 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सर्वोत्तम है. प्राकृतिक रूप से यह आठ डिग्री सेल्सियस से नीचे के तापमान पर नहीं उगता. अर्थात यह ओस नहीं सहन कर पाता.

सीधे, ऊंचे और छाया देने वाले इस सुंदर वृक्ष की लम्बाई 40 मीटर तक और तने का घेरा 3.78 मीटर तक हो सकता है. पुराने वृक्ष के तने के नीचे का भाग अपेक्षाकृत मोटा, फूला हुआ, कटी-फटी छाल वाला, खुरदरा और दरारों वाला होता है. इस वृक्ष की प्रमुख विशेषता यह है कि यदि इसके किसी भी भाग को काटा जाये तो इसके भीतर से सफेद रंग का दूध जैसा पदार्थ निकलता है.

सप्तपर्ण का वृक्ष अपनी छाल के कारण विश्वविख्यात है. इसकी मोटी छाल नलिकादार होती है और तोड़ने पर चट् की आवाज़ करती हुई टूट जाती है. इसका ताज़ा टूटा हुआ तल कोमल मालूम पड़ता है. सप्तपर्ण की छाल का बाहर वाला भाग स्पंजी और गहरे रंग का होता है. इसकी छाल की बाहरी सतह चित्तीदार, धूसर, कत्थई अथवा गुलाबीपन लिये हुए कत्थई रंग की होती है तथा इसकी सतह पर सफेदी लिये हुए भूरे रंग के गोल अथवा अंडाकार बातरंध्र के चिह्न होते हैं. वास्तव में छाल रंध्रहीन होती है. यह छूने पर चेरी वृक्ष की छाल के समान दानेदार लगती है. सप्तपर्ण की छाल का स्वाद कड़वा होता है, किंतु यह खाने पर बुरी नहीं लगती. इसकी छाल के टेढ़े-मेढ़े चपटे टुकड़े पुराने पंसारियों की दुकान पर बिकते हैं.

यह एक सदाबहार वृक्ष है अर्थात इस वृक्ष पर पूरे वर्ष भर पत्तियां रहती हैं. सप्तपर्ण की पत्तियां फूल की पंखुड़ियों के समान चक्रिक क्रम में होती हैं. एक चक्र अथवा समूह में प्रायः सात पत्तियां होती हैं. इसीलिए इस वृक्ष को सप्तपर्ण नाम दिया गया है. एक चक्र में पत्तियों का सात होना आवश्यक नहीं है. इनकी संख्या कम अथवा अधिक भी हो सकती है.

सप्तपर्ण की पत्तियां चिकनी, चर्मिल, लम्बी और सिरे पर नोकदार होती है. इनकी लम्बाई 10 सेंटीमीटर से लेकर 20 सेंटीमीटर तक और चौड़ाई 2.5 सेंटीमीटर से लेकर 4 सेंटीमीटर तक होती है. इनका डंठल छोटा होता है. इसकी पत्तियों का ऊपर वाला भाग चिकना होता है और इसका रंग चमकीला हरा होता है. पत्तियों का नीचे वाला भाग चिकना नहीं होता और इसका रंग सफेदी लिये हुए हल्का हरा होता है. इस भाग पर पत्तियों की उभरी हुई नसें भी साफ़ दिखाई देती हैं.

शरद ऋतु में सप्तपर्ण के वृक्ष पर फूल आते हैं. इसीलिए इसे ‘शारद’ कहा जाता है. सप्तपर्ण के वृक्ष पर अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग समय पर फूल निकलते हैं. सप्तपर्ण विएतनाम में अगस्त-सितम्बर में, ऑस्ट्रेलिया में अक्टूबर से दिसम्बर तक और लाओस में वर्षा ऋतु के अंत में फूल देता है. श्रीलंका के सप्तपर्ण वृक्ष पर वर्ष में दो बार फूल खिलते हैं. यहां अप्रैल से जून तक और अक्टूबर से नवम्बर तक वृक्षों पर फूल देखे जा सकते हैं.

सप्तपर्ण के फूल लगभग 2.5 सेंटीमीटर, लम्बे एवं हल्का पीलापन अथवा हरापन लिये हुए सफेद होते हैं एवं इनमें तेज़ सुगंध होती है. सप्तपर्ण की पत्तियों के समान इसके फूल भी चक्रिक क्रम में होते हैं. इसके फूल घने गुच्छों में निकलते हैं अतः जिस समय वृक्ष पर फूल आते हैं, यह फूलों से लदा हुआ दिखाई देता है और इसके फूलों की गंध से आसपास का वातावरण महक उठता है.

फूल खिलने के बाद वृक्ष पर फलियां आती हैं. भारत में जनवरी-फरवरी के महीनों में सप्तपर्ण के वृक्ष फलियों से लद जाते हैं. फली लम्बी, चपटी और नीचे की ओर लटकी हुई होती है. यह प्रायः एक-एक अथवा दो-दो के समूह में होती हैं. फली की लम्बाई 15 सेंटीमीटर से लेकर 32 सेंटीमीटर तक तथा चौड़ाई 5 मिलीमीटर होती है.

फली पक जाने पर स्वतः फट जाती है तथा इसके भीतर भरे हुए बीज बाहर आ जाते हैं. इसका बीज चपटा, पतला और 4 सेंटीमीटर से लेकर 8.3 मिलीमीटर तक लम्बा  होता है. तथा इसका रंग कत्थई होता है. इसके एक सिरे पर 7 मिलीमीटर से लेकर 13 मिलीमीटर तक लम्बे रुई जैसे बालों का गुच्छा होता है. सप्तपर्ण के बीज बहुत हल्के और रुई जैसे बालों के गुच्छों से युक्त होने के कारण इसके बीज हवा में उड़कर बड़ी सरलता से दूर-दूर पहुंच जाते हैं.

सप्तपर्ण के दोनों प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं- जंगली और सप्रयास लगाये हुए. इसके सप्रयास उगाये गये वृक्ष प्रायः बीजों की सहायता से लगाये जाते हैं. इसके लिए वृक्ष से फलियां तोड़ते हैं अथवा शाखाओं को हिला कर फलियां एकत्रित करते हैं. सामान्यतया फलियों को पकने के पहले एकत्रित किया जाता है. पक जाने पर फलियों का रंग कत्थई हो जाता है. फलियों को एकत्रित करने के बाद इनके पक कर फूटने में एक सप्ताह से लेकर दो सप्ताह तक का समय लग जाता है.

पकी हुई फलियों को एकत्रित करके इन्हें धूप में सुखाते हैं. सामान्यतया ये एक सप्ताह में खुल जाती हैं और बीज बाहर आ जाते हैं. पकने के पूर्व तोड़ी गयी फलियों को छांह में सुखाया जाता है. सप्तपर्ण के बीज छोटे और हल्के होते हैं. अतः हवा में उड़ जाते हैं. इसलिए इन्हें प्लास्टिक के थैले में भर कर अथवा किसी कपड़े से ढंक कर सुखाना चाहिए. 

सप्तपर्ण के वृक्ष तैयार करने के लिए सर्वप्रथम जमीन की जुताई करके भूमि तैयार करते हैं. इसके बाद गड्ढा खोद कर बीज डालते हैं अथवा 30 सेंटीमीटर से लेकर 50 सेंटीमीटर तक लम्बे पौधे रोपते हैं. इन्हें पालतू अथवा जंगली जानवरों से बचाने के लिए कांटेदार तारों का उपयोग किया जाता है. सप्तपर्ण के पौधे बहुत जल्दी सूखते हैं अतः पौधों को लगाने वाले स्थान तक, किसी पतले कपड़े में लपेट कर ले जाना चाहिए. इसके साथ ही जिस स्थान पर पौधा लगाया गया हो, उसके आसपास की एक मीटर व्यास की ज़मीन की खर-पतवार अच्छी तरह साफ कर देना चाहिए.

सप्तपर्ण के ताजे बीज जनवरी के महीने में दिन के समय धूप में बोते हैं. इनका 100 प्रतिशत अंकुरण होता है. सप्तपर्ण के बीजों को वायुरोधी डिब्बों में बंद कर दो माह अथवा इससे अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. इस प्रकार के बीजों को बोने के पहले इन्हें 5 घंटे से लेकर 10 घंटे तक पानी में भिगोये रखा जाता है. सप्तपर्ण के एक वर्ष तक पुराने बीजों का उपयोग किया जा सकता है. इसके पुराने बीजों को जून में बोया जाता है. सप्तपर्ण के बीजों को एक विशेष प्रकार की मिट्टी में दबाया जाता है. इस मिट्टी में एक भाग जंगल की मिट्टी, एक भाग नदियों की मिट्टी तथा चावल अथवा नारियल का बुरादा मिलाकर तैयार किया जाता है. सप्तपर्ण के ताज़े बीजों की तुलना में पुराने बीजों के अंकुरण का प्रतिशत कम होता है.

बीजों को धूप, पानी, खाद आदि ठीक ढंग से मिलती रहे तो11 दिन से 13 दिन के मध्य इनका अंकुरण आरम्भ हो जाता है. पौधे 5 सेंटीमीटर के हो जाने पर इनमें दो पत्तियां निकल आती हैं. अब इन्हें ज़मीन से निकाल कर गमलों में लगा देते हैं. सप्तपर्ण का पौधा 7 माह से 12 माह के मध्य लगभग 30 सेंटीमीटर ऊंचा और 6 मिलीमीटर व्यास वाला हो जाता है. अब इसे गमले से निकाल कर पुनः ज़मीन में रोप देते हैं. सप्तपर्ण के लिए 50 प्रतिशत से 70 प्रतिशत तक धूप आवश्यक है.

इसके जंगली और लगाये गये दोनों प्रकार के पौधों को खाद दी जा सकती है. सामान्यतया पौधा रोपने के एक माह बाद 10 ग्राम प्रति पौधे की दर से खाद दी जाती है. इसके तीन माह बाद 50 ग्राम से 100 ग्राम तक प्रति पौधे की दर से खाद दी जाती है. यह खाद सूखे का मौसम आरम्भ होने के पहले अवश्य दे दी जाती है. यह खाद पौधे के पास न डालकर, पौधे के आसपास आधा मीटर के व्यास में डाली जाती है.

सदाबहार और छायादार वृक्ष होने के कारण इसे मंदिरों, बाग-बगीचों, पार्कों और सड़कों के किनारे लगाया जाता है. इसकी लकड़ी अधिक टिकाऊ नहीं होती तथा इस पर शीघ्र ही दीमक लग जाती है. फिर भी इसका उपयोग अनेक प्रकार से किया जाता है. सप्तपर्ण की लकड़ी से बच्चों की पट्टी तैयार की जाती है. सप्तपर्ण की लकड़ी के विद्यालयों के बोर्ड भी बनाये जाते हैं. किसी समय इनका प्रचलन बहुत था. किंतु अब सीमेंट के ब्लैक बोर्ड बनने के कारण ये भी बहुत तेज़ी से कम होते जा रहे हैं.

सप्तपर्ण की पट्टियां और ब्लैक बोर्ड तो फैशन के बाहर होते जा रहे हैं, किंतु सागौन, शीशम आदि लकड़ियां महंगी हो जाने के कारण घरेलू साज-सज्जा में इसका उपयोग दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है. पिछले कुछ समय से इसका उपयोग प्लाईवुड और कागज़ के कारखानों में किया जाने लगा है. सप्तपर्ण की लकड़ी का उपयोग जलाने के लिए भी किया जाता है. किंतु इसका कोयला उपयोगी नहीं होता. सप्तपर्ण से सफेद रंग का दूध जैसा एक पदार्थ प्राप्त होता है. इससे च्युइंग गम तैयार होता है.

सप्तपर्ण की छाल का उपयोग किसी समय ऊनी-सूती कपड़ों को पीला रंगने के लिए किया जाता था. किंतु अब इसका उपयोग रंगाई में नहीं किया जाता.

सप्तपर्ण औषधीय उपयोग का वृक्ष है. यह अपने औषधीय गुणों के कारण विश्व भर में जाना जाता है. इसकी छाल बहुत उपयोगी होती है. भारतीय वैद्यों द्वारा सदियों से इसका औषधीय उपयोग किया जा रहा है. वैद्यों के अनुसार सप्तपर्ण की छाल कफ वात नाशक, व्रणशोधक, रक्तशोधक, विषमज्वर नाशक, कृमिघ्न, कृष्टघ्न, कफघ्न, और कुनैन जैसे प्रभाव से युक्त होती है. सप्तपर्ण की छाल की सहायता से तैयार की गयी आयुर्वेदिक औषधियों की प्रमुख विशेषता यह है कि इनका सेवन करने से कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता.

सप्तपर्ण की छाल और इसकी पत्तियों की सहायता से विभिन्न प्रकार के चर्मरोगों, सिरदर्द, खांसी, दुर्बलता, शरीर में रक्त की कमी जैसे रोगों की औषधियां तैयार की जाती हैं. सप्तपर्ण का टॉनिक उपयोग में लाने पर पाचन तंत्र शीघ्र ही स्वाभाविक स्थिति में आ जाता है. पेट के अल्सर और गठिया में इसके टिन्चर का प्रयोग किया जाता है. पेट की गर्मी और रक्त युक्त पेशाब आने पर भी सप्तपर्ण की छाल और पत्तियों की सहायता से तैयार की गयी औषधियां उपयोग में लायी जाती हैं.

सामान्यतया गर्भवती त्री को एलोपैथिक दवाइयां नहीं देते. ऐसे समय पर आयुर्वेदिक दवाओं का, विशेष रूप से सप्तपर्ण की सहायता से तैयार की गयी दवाओं का उपयोग किया जाता है.

सप्तपर्ण की सहायता से तैयार की गयी आयुर्वेदिक औषधियां बाज़ार में सरलता से मिल जाती हैं. इनमें सप्तपर्ण सत्वादि बटी और सप्तछादि कवाथ प्रमुख है. सप्तपर्ण की सहायता से कुछ एलोपैथिक दवाएं भी तैयार की गयी हैं. इनमें सप्तपर्ण का घनसत्व (लिक्विड एक्सट्रक्ट आफ एलस्टानिया) विशेष रूप से उपयोगी हैं. सप्तपर्ण की जड़ों, शाखाओं और पत्तियों में मेथानॉलिक नामक एक पदार्थ पाया जाता है. इससे अनेक प्रकार की एन्टीबायटिक दवाएं तैयार की जाती हैं.

कस्तूरबा मेडिकल कालेज, मणिपाल, कर्नाटक के रेडियो बायोलाजी विभाग ने सप्तपर्ण के औषधीय उपयोग पर कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयोग किये हैं. यहां के वैज्ञानिकों ने सप्तपर्ण की छाल और पत्तियों से निकलने वाले रस एलस्टानिया स्कॉलाटिस एक्सट्रैक्ट (ए.एस.ई.) में कैंसर के टयूमर फ्लोराइड (बी.सी.एल.) के साथ टयूमर वाले चूहों को दिया. वैज्ञानिकों ने प्रयोग में यह पाया कि सर्वोत्तम परिणाम 180 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम ए. एस. ई. और 8 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम बी.सी.एल. देने से प्राप्त हुए.

सप्तपर्ण की छाल के साथ ही इसकी पत्तियों का रस निकाल कर इससे अस्थमा सहित अनेक रोगों की औषधियां तैयार करने के लिए भी प्रयोग किये जा रहे हैं.

(फ़रवरी, 2014)

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