दुनिया के छह सर्वाधिक पढ़े गये पत्र

(पत्र अक्सर गोपनीय होते हैं, ताकि वही उन्हें पढ़े जिसके लिए वे लिखे गये हैं, पर खुले पत्रों का भी एक बहुत बड़ा इतिहास है. ये पत्र इसलिए लिखे जाते हैं, ताकि अधिकाधिक लोग उन्हें पढ़ सकें- पढ़ें. यहां प्रस्तुत है ऐसे छह पत्रों की बात, जिनकी गणना विश्व के सर्वश्रेष्ठ नहीं तो सर्वाधिक पढ़े गये प्रभावशाली पत्रों में की जाती है.)

 

मोटापे पर पत्र

 

पत्र लेखक      ः विलियम बेंटिंग

पत्र प्राप्तकर्ता  ः जनता, विशेषकर मोटे लोग

मुख्य बात    ः ‘हालांकि मैं बहुत बड़े आकार या वज़न वाला नहीं हूं, पर मैं झुककर बूट के फीते नहीं बांध सकता, बिना पीड़ा और कठिनाई के छोटे-मोटे काम नहीं कर सकता. इस पीड़ा को मोटे लोग ही समझ सकते हैं.’

सन 1893 में एक स्थूलकाय अंग्रेज़ ने कम कार्बोहाइड्रेट खाना लेना शुरू किया. 38 सप्ताह में उसने 35 पौंड वज़न कम कर लिया. उसने ‘मोटापे पर पत्र’ शीर्षक से एक खुला पत्र लिखा, जिसमें उसने प्रोटीन, हरी सब्जियां, फल और ड्राय वाइन वाली खाद्य-सामग्री के बारे में बताया जिसे दिन में चार बार लेना था. उसका यह डाइट फार्मूला इतना लोकप्रिय हुआ कि बेंट करना डाइट करने का पर्याय बन गया. बेंटिंग ने लिखा था-

‘…मैं हर मोटे व्यक्ति को तत्काल अपना खान-पान बदलने की सलाह कदापि नहीं दूंगा. यह काम काफी सोच-विचार करके, अपने डॉक्टर की सलाह से ही होना चाहिए.

मेरे खाने में पहले नाश्ते में डबलरोटी और दूध हुआ करता था, पर्याप्त दूध वाली चीनी वाली चाय, मक्खनवाला टोस्ट हुआ करता था और रात के खाने में ब्रेड और पेस्ट्री मुझे प्रिय थी. दोपहर का खाना सबेरे के नाश्ते जैसा ही होता था… तब मैं बेचैन रहता था, और नींद भी बहुत कम आती थी.

मुझे यह स्पष्ट लगता है कि अब जो कुछ मैं खाता हूं. वह पहले वाले खाने से कहीं बेहतर है… पहले वाले खाने से यह ज़्यादा ‘गरिष्ठ’ है पर जब यह सिद्ध हो गया है कि यह ज़्यादा स्वस्थ है तो तुलना करने का कोई अर्थ नहीं रह जाता… मैं यह कल्पना नहीं कर सकता कि अच्छे स्वास्थ्य वाला भी पहले वाले खाने को पसंद करेगा…’

बरमिंघम जेल से एक पत्र

 

पत्रलेखक        ः  मार्टिन लूथर किंग, जूनियर

पत्र प्राप्तकर्ता    ः   साथी पादरी गण

मुख्य बातें      ः   ‘अन्याय कहीं भी हो, सब जगह न्याय के लिए खतरा है’

                           ‘अमेरिका में रहने वाला कोई भी, अमेरिका में कहीं भी बाहरी नहीं माना जा सकता.’

अप्रैल 1963 में पृथक्करण के खिल़ाफ अहिंसक प्रदर्शन करने के अपराध में मार्टिन लूथर किंग, जूनियर को बरमिंघम, अलबामा में जेल में डाल दिया गया था. 16 अप्रैल 1963 को किंग ने बरमिंघम जेल से यह प्रसिद्ध पत्र लिखा था. जो बाद में ‘दि क्रिश्चियन सेंच्युरी’ एवं ‘एटलांटिक मासिक’ पत्रों में प्रकाशित हुआ. किंग की पुस्तक ‘वाइ वी कांट वेट’ पुस्तक में भी इसे सम्मिलित किया गया था. ग्यारह पृष्ठों का यह पत्र अलबामा के पादरियों के वक्तव्य के उत्तर में लिखा गया था. इन पादरियों ने पृथक्करण के विरुद्ध चलाये जा रहे आंदोलन को समाप्त करके मुद्दे को न्यायालय में सुलझाने का सुझाव दिया था. किंग ने अपने पत्र में लिखा था-

‘…मैं बरमिंघम में इसलिए हूं, क्योंकि यहां अन्याय है. जैसे आठवीं सदी ईसा पूर्व में पैगम्बर अपने गांवों को छोड़कर ‘ईश्वर ने ऐसा कहा…’ का संदेश अपने गांवों की सीमाओं से पार ले गये थे, और जैसे धर्म-प्रचारक पॉल अपना गांव तारसस छोड़कर यीशू के संदेश को बाहरी दुनिया में लेकर गये थे, उसी तरह मैं भी स्वतंत्रता के संदेश को अपने गांव से बाहर पहुंचाने के लिए बाध्य हूं. पॉल की तरह ही मुझे भी मैकोडोनिया की सहायता की पुकार का प्रतिसाद देना है.

साथ ही, मैं सभी समुदायों और राज्यों के अंतर्सम्बंधों से परिचित हूं. मैं बरमिंघम में जो कुछ हो रहा है उससे उदासीन होकर अटलांटा में निरर्थक नहीं बैठ सकता. अन्याय कहीं भी हो, सब जगह न्याय के लिए खतरा है. हम सब पारस्परिकता के अपरिहार्य संजाल में फंसे हुए हैं, नियति के एक ही वस्त्र में बंधे हुए. कुछ भी, जो किसी एक को सीधे प्रभावित करता है बाकी सब पर परोक्ष प्रभाव डालता है. हम संकुचित प्रांतीय ‘बाहरी आंदोलनकारी’ विचार के साथ अब नहीं जी सकते. कोई भी, जो अमेरिका में रहता है, अमेरिका में कहीं भी बाहरी नहीं माना जा सकता…’

जे ’ एक्य़ूज!

पत्रलेखक     – एमाइल ज़ोला

पत्र प्राप्तकर्ता – फेलिक्स फोयर (फ्रांस के राष्ट्रपति)

मुख्य वाक्य   – ‘कोई कैसे आशा कर सकता है कि युद्ध परिषद द्वारा किया काम युद्ध परिषद नाकाम कर देगी?’

उत्तर 19वीं सदी में फ्रांस में ‘ड्रायफस अफेयर’ नाम का एक राजनीतिक काण्ड हुआ था. कैप्टेन एल्फ्रेड ड्रायफस (यहूदी) को देशद्रोह के अपराध  में सज़ा मिली थी, पर अपराध के प्रमाण संदेहास्पद थे. बाद में पता चला कि वस्तुतः अपराध फर्डिनेण्ड वालसिन नामक व्यक्ति ने किया था, पर उसे बरी कर दिया गया. ड्रायफस को बचा सकनेवाले प्रमाण की अदालत ने उपेक्षा की.

लेखक एमाइल ज़ोला ने एक खुले पत्र में इस चूक की ओर जनता का ध्यान दिलाया. एक बड़े अखबार ने ‘जेएक्यूज़’ शीर्षक से 13 जनवरी 1898 को पहले पृष्ठ पर इसे छापा. ज़ोला ने फ्रांस-शासन की इस मामले में तीखी आलोचना की भी. तबसे ‘जेएक्यूज़’ शब्द का अर्थ ही गुस्सा हो गया है. ज़ोला ने लिखा था-

‘…राष्ट्रपति महोदय, ये वे तथ्य हैं, जो यह बताते हैं कि अन्याय कैसे हो सकता है, नैतिक प्रमाण, ड्रायफस की वित्तीय स्थितियां, विवेक का अभाव, बेकसूर होने की उसकी लगातार गुहार आदि से स्पष्ट हो जाता है कि अभियुक्त कमाण्डर दू परी दे क्लाम की कल्पनाशीलता का शिकार बनाया गया था. हमारे समय को अपमानित करने वाली यहूदी-विरोधी विचारधारा का यह एक उदाहरण है. …मैं सम्बंधित विभाग पर एक घृणित-अभियान चलाने का आरोप लगाता हूं, जिसके माध्यम से जन-मत को भ्रमित करने और अपराध को छिपाने का प्रयास किया गया. …अंततः मैं प्रथम युद्ध परिषद पर एक प्रतिवादी की रहस्य बनी रही गोपनीय जानकारी के आधार पर निंदा करने का आरोप लगाता हूं. दूसरी युद्ध परिषद ने इस अन्याय पर परदा डाला और एक अपराधी को जान-बूझकर रिहा करने का कानूनी अपराध किया…’

शौकीनों के नाम खुला पत्र

पत्रलेखक     – बिल गेट्स

पत्र प्राप्तकर्ता – कम्प्यूटर के शौकीन

मुख्य बात   – ‘तथ्य यह है कि हमारे अलावा किसी अन्य ने हॉबी सॉफ्टवेयर में इतना पैसा नहीं लगाया है.’

वर्ष 1976 में बिल गेट्स इस बात से परेशान थे कि उनके ‘माइक्रो-सॉफ्ट’ सॉफ्टवेयर की रॉयल्टी दिये बिना ही लोग उसे काम में ले रहे थे. गेट्स और उनके हमवतनों ने बेसिक प्रोग्रामिंग भाषा ईजाद की थी जो कम्प्यूटर के शौकीनों में बहुत लोकप्रिय थी. पर इसका मुफ्त उपयोग करने वालों से बचाव का कोई प्रभावी तरीका उन दिनों उपलब्ध नहीं था. तब गेट्स ने ऐसे लोगों के नाम खुला पत्र लिखा था-

‘हमें सैकड़ों लोगों से प्रतिसाद मिला है कि ‘बेसिक’ के उपयोग से वे पूर्ण संतुष्ट हैं. पर दो बातें स्पष्ट हैं- पहली यह कि इनमें से अधिकांश ने ‘बेसिक’ के उपयोग के अधिकार खरीदे नहीं हैं (दस प्रतिशत से भी कम इसे खरीदकर काम में ले रहे हैं) और दूसरी यह कि इन कम्प्यूटर-शौकीनों से हमें जो राशि मिल रही है वह ‘बेसिक’ को तैयार करने में लगे समय के अनुपात में दो डॉलर प्रति घंटा बैठती है.’

ऐसा क्यों है? अधिकांश कम्प्यूटर-शौकीन यह जानते हैं कि वे सॉफ्टवेयर की चोरी करते हैं. हार्डवेयर तो खरीदना ही पड़ता है, पर सॉफ्टवेयर तो मुफ्त का माल है. इसे तैयार करने वालों के पारिश्रमिक की चिंता कोई क्यों करे?

…बिना कुछ पाये कोई क्यों काम करेगा? कौन शौकीन प्रोग्रामिंग वगैरह पर तीन मनुष्य-वर्ष लगाकर उसे मुफ्त में देगा? तथ्य यह है कि हमारे सिवाय किसी ने सॉफ्टवेयर तैयार करने में इतना पैसा नहीं लगाया है. हमने 6800 बेसिक लिखे हैं, और 8800 एपीएल तथा 6800 एपील लिख रहे हैं, पर हमें यह सब करने के लिए कोई उत्साह नहीं दे रहा. सीधी बात है, आप जो कुछ कर रहे हैं, वह चोरी है…’

एक सैनिक का घोषणा-पत्र

 

पत्रलेखक     – सीगफ्रीड ससून

पत्र पानेवाले   – ब्रिटिश सैन्य-नेतृत्व

मुख्य बातें   –  ‘मेरा मानना है कि जो (प्रथम विश्व) युद्ध को समाप्त कर सकते हैं, वही इसे लम्बा कर रहे हैं.’

सीगफ्रीड एल. ससून एक कवि था जो प्रथम विश्वयुद्ध में एक सैनिक की तरह लड़ा था. फ्रांस और फिलिस्तीन में मोर्चों पर रहा और अपनी बहादुरी के लिए ‘मिलिटरी क्रॉस’ से विभूषित हुआ. दो बार घायल होने के बाद ससून को स्वास्थ्य-लाभ के लिए सेना से छुट्टी मिल गयी थी. बाद में जब उन्हें युद्ध में शामिल होने के लिए बुलाया गया तो उन्होंने इनकार कर दिया. उन्होंने लिखा-

‘मैं सैन्य अधिकारियों की जानबूझकर अवमानना करते हुए यह पत्र लिख रहा हूं, क्योंकि मेरा यह मानना है कि जो युद्ध को समाप्त कर सकते हैं, वही इसे लम्बा कर रहे हैं. मैं एक सैनिक हूं, और मुझे विश्वास है कि मैं सैनिकों की ओर से बोल रहा हूं. मेरा मानना है कि रक्षा और मुक्ति के लिए शुरू किया गया युद्ध अब आक्रमण और विजय पाने के युद्ध में बदल गया है. मैं समझता हूं कि जिस उद्देश्य के लिए मैं और मेरे साथी सैनिक इस युद्ध में शामिल हुए थे, उसके उद्देश्यों को इस तरह से स्पष्ट किया जाता कि उन्हें बदलना असम्भव होता. यदि ऐसा हुआ होता तो जिन उद्देश्यों ने हमें प्रेरित किया वे अब समझौता-वार्ता से पूरे हो सकते थे.

मैंने सैनिकों की पीड़ा को देखा और भोगा है और अब मैं उन उद्देश्यों के लिए इस पीड़ा को और नहीं बढ़ाना चाहता जिन्हें मैं अनुचित और बुरा मानता हूं. मैं युद्ध के संचालन के खिल़ाफ विरोध नहीं कर रहा हूं, मेरा विरोध उन राजनीतिक गलतियों और कुटिलताओं के खिल़ाफ है, जिनके लिए सैनिकों का बलिदान दिया जा रहा है…’

केंसस स्कूल बोर्ड को खुला पत्र

पत्र भेजनेवाला – बॉबी हेण्डरसन

पाने वाला   – केंसस स्कूल बोर्ड

मुख्य बात   – ‘मैं और दुनिया के बहुत-से लोग यह मानते हैं कि दुनिया का निर्माण एक उड़ने वाले ‘स्पेघेटी मोन्स्टर’ ने किया था’

                ‘आपको यह जानकारी अच्छी लगेगी कि ग्लोबल वार्मिंग, भूकम्प, तूफान आदि प्राकृतिक आपदाएं 19वीं शताब्दी के बाद जलदस्युओं के कम होने का परिणाम हैं.’

सन 2005 में केंसस स्कूल बोर्ड ने विकासवाद के सिद्धांतों के संदर्भ में गम्भीर विचार-विमर्श किया था. मुद्दा था कि थ्योरी ऑफ इंटेलिजेंट डिज़ाइन को विकासवाद के साथ पढ़ाया जाये. राजनीतिक अथवा धार्मिक पक्षों में न पड़ते हुए एक ‘नागरिक’ बॉबी हेण्डरसन ने एक पत्र द्वारा अपना मत रखा- उसने स्वयं को ‘रिसर्च ऑफ दि फ्लाइंग स्पेगिटी मोंस्टर’ का सदस्य बताया था. उसने लिखा- ‘…यदि इंटेलिजेंट डिज़ाइन का सिद्धांत विश्वास पर आधारित नहीं है और किसी अन्य वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित होने का दावा करता है, तो आपको हमारा सिद्धांत भी पढ़ाना चाहिए, क्योंकि यह भी विश्वास पर नहीं, विज्ञान पर आधारित है.

मैं आपको इस सिद्धांत के बारे में कुछ बताना चाहता हूं कि एक फ्लाइंग स्पेगिटी मोंस्टर ने ब्रह्माण्ड का निर्माण किया था. किसी ने उसे देखा तो नहीं, पर लिखित प्रमाण उपलब्ध हैं. उसकी ताकत का विवरण देने वाले अनेक ग्रंथ हैं. उसे मानने वालों की हमारी संख्या भी एक करोड़ से अधिक है, और बढ़ रही है. हम गोपनीयता बरतते हैं, क्योंकि बहुत से लोग यह मानते हैं कि प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं हैं. ये लोग यह नहीं समझते कि उसने विश्व का निर्माण हमें यह बताने के लिए किया कि पृथ्वी जितनी पुरानी है, वास्तव में उससे अधिक पुरानी है. उदाहरण के लिए एक वैज्ञानिक कार्बन डेटिंग प्रोसेस का उपयोग करता है. वह पाता है कि जांच की जाने वाली चीज़ का 75% कार्बन-14 इलेक्ट्रोन उत्सर्जन के कारण नाइट्रोजन-14 में परिणत हो गया है. इससे वह अनुमान लगाता है कि वह चीज़ दस हज़ार साल पुरानी है. पर हमारा वैज्ञानिक यह नहीं समझ पाता कि हर बार जब वह गणना करता है तो फ्लाइंग स्पेगिटी मोंस्टर ‘हिज़ नूडली एपेंडेज’ से परिणामों को बदल देता है. इस आशय के अनेक विवरण हैं कि यह कैसे सम्भव हो सकता है और वह ऐसा क्यों करता है. वह अदृश्य है और सामान्य पदार्थ से आसानी से गुज़र सकता है.

(जनवरी 2016)

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